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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 6"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 6

> लङ्कायां तु कृतं कर्म घोरं दृष्ट्वा भयावहम् ।  
> राक्षसेन्द्रो हनुमता शक्रेणेव महात्मना ।  
> अब्रवीद् राक्षसान् सर्वान् ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः॥१ ॥

इधर इन्द्रतुल्य पराक्रमी महात्मा हनुमान्जीने लङ्कामें जो अत्यन्त भयावह घोर कर्म किया था, उसे देखकर राक्षसराज रावणका मुख लज्जासे कुछ नीचेको झुक गया और उसने समस्त राक्षसोंसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

> धर्षिता च प्रविष्टा च लङ्का दुष्प्रसहा पुरी ।  
> तेन वानरमात्रेण दग्धा सीता च जानकी ॥ २ ॥

‘निशाचरो ! वह हनुमान्, जो एक वानरमात्र है, अकेला इस दुर्धर्ष पुरीमें घुस आया । उसने इसे तहस-नहस कर डाला और जनककुमारी सीतासे भेंट भी कर लिया ॥ २ ॥

> प्रासादो धर्षितश्चैत्यः प्रवरा राक्षसा हताः ।  
> आविला च पुरी लङ्का सर्वा हनुमता कृता ॥ ३ ॥

‘इतना ही नहीं, हनुमान्ने चैत्यप्रासादको धराशायी कर दिया, मुख्य-मुख्य राक्षसोंको मार गिराया और सारी लङ्कापुरीमें खलबली मचा दी ॥ ३ ॥

> किं करिष्यामि भद्रं वः किं वो युक्तमनन्तरम् ।  
> उच्यतां नः समर्थं यत् कृतं च सुकृतं भवेत् ॥ ४ ॥

‘तुमलोगोंका भला हो । अब मैं क्या करूँ ? तुम्हें जो कार्य उचित और समर्थ जान पड़े तथा जिसे करनेपर कोई अच्छा परिणाम निकले, उसे बताओ ॥ ४ ॥

> मन्त्रमूलं च विजयं प्रवदन्ति मनस्विनः ।  
> तस्माद् वै रोचये मन्त्रं रामं प्रति महाबलाः ॥ ५ ॥

‘महाबली वीरो ! मनस्वी पुरुषोंका कहना है कि विजयका मूल कारण मन्त्रियोंकी दी हुई अच्छी सलाह ही है । इसलिये मैं श्रीरामके विषयमें आपलोगोंसे सलाह लेना अच्छा समझता हूँ ॥ ५ ॥

> त्रिविधाः पुरुषा लोके उत्तमाधममध्यमाः ।  
> तेषां तु समवेतानां गुणदोषौ वदाम्यहम् ॥ ६ ॥

‘संसारमें उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके पुरुष होते हैं । मैं उन सबके गुण-दोषोंका वर्णन करता हूँ ॥ ६ ॥

> मन्त्रत्रिभिर्हि संयुक्तः समर्थैर्मन्त्रनिर्णये ।  
> मित्रैर्वापि समानार्थैर्बान्धवैरपि वाधिकैः ॥ ७ ॥  
> सहितो मन्त्रयित्वा यः कर्मारम्भान् प्रवर्तयेत् ।  
> दैवे च कुरुते यत्नं तमाहुः पुरुषोत्तमम् ॥ ८ ॥

‘जिसका मन्त्र आगे बताये जानेवाले तीन लक्षणोंसे युक्त होता है तथा जो पुरुष मन्त्रनिर्णयमें समर्थ मित्रों, समान दुःख-सुखवाले बान्धवों और उनसे भी बढ़कर अपने हित-कारियोंके साथ सलाह करके कार्यका आरम्भ करता है तथा दैवके सहारे प्रयत्न करता है, उसे उत्तम पुरुष कहते हैं ॥ ७-८ ॥

> एकोऽर्थं विमृशेदेको धर्मं प्रकुरुते मनः ।  
> एकः कार्याणि कुरुते तमाहुर्मध्यमं नरम् ॥ ९ ॥

‘जो अकेला ही अपने कर्तव्यका विचार करता है, अकेला ही धर्ममें मन लगाता है और अकेला ही सब काम करता है, उसे मध्यम श्रेणीका पुरुष कहा जाता है ॥ ९ ॥

> गुणदोषौ न निश्चित्य त्यक्त्वा दैवव्यपाश्रयम् ।  
> करिष्यामीति यः कार्यमुपेक्षेत् स नराधमः ॥ १० ॥

‘जो गुण-दोषका विचार न करके दैवका भी आश्रय छोड़कर केवल ‘करूँगा’ इसी बुद्धिसे कार्य आरम्भ करता है और फिर उसकी उपेक्षा कर देता है, वह पुरुषोंमें अधम है ॥ १० ॥

> यथेमे पुरुषा नित्यमुत्तमाधममध्यमाः ।  
> एवं मन्त्रोऽपि विज्ञेय उत्तमाधममध्यमः ॥ ११ ॥

‘जैसे ये पुरुष सदा उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके होते हैं, वैसे ही मन्त्र ( निश्चित किया हुआ विचार ) भी उत्तम, मध्यम और अधम भेदसे तीन प्रकारका समझना चाहिये ॥ ११ ॥

> ऐकमत्यमुपागम्य शास्त्रदृष्टेन चक्षुषा ।  
> मन्त्रिणो यत्र निरतास्तमाहुर्मन्त्रमुत्तमम् ॥ १२ ॥

‘जिसमें शास्त्रोक्त दृष्टिसे सब मन्त्री एकमत होकर प्रवृत्त होते हैं, उसे उत्तम मन्त्र कहते हैं ॥ १२ ॥

> बह्वीरपि मतीर्गत्वा मन्त्रिणामर्थनिर्णयः ।  
> पुनर्यत्रैकतां प्राप्तः स मन्त्रो मध्यमः स्मृतः ॥ १३ ॥

‘जहाँ प्रारम्भमें कई प्रकारका मतभेद होनेपर भी अन्तमें सब मन्त्रियोंका कर्तव्यविषयक निर्णय एक हो जाता है, वह मन्त्र मध्यम माना गया है ॥ १३ ॥

> अन्योन्यमतिमास्थाय यत्र सम्प्रतिभाष्यते ।  
> न चैकमत्ये श्रेयोऽस्ति मन्त्रः सोऽधम उच्यते ॥ १४ ॥

‘जहाँ भिन्न-भिन्न बुद्धिका आश्रय ले सब ओरसे स्पर्धा-पूर्वक भाषण किया जाय और एकमत होनेपर भी जिससे कल्याणकी सम्भावना न हो, वह मन्त्र या निश्चय अधम कहलाता है ॥ १४ ॥

> तस्मात् सुमन्त्रितं साधु भवन्तो मतिसत्तमाः ।  
> कार्यं सम्प्रतिपद्यन्तमेतत् कृत्यं मतं मम ॥ १५ ॥

‘आप सब लोग परम बुद्धिमान् हैं; इसलिये अच्छी तरह सलाह करके कोई एक कार्य निश्चित करें । उसीको मैं अपना कर्तव्य समझूँगा ॥ १५ ॥

> वानराणां हि धीराणां सहस्रैः परिवारितः ।  
> रामोऽभ्येति पुरीं लङ्कामस्माकमुपरोधकः ॥ १६ ॥

‘( ऐसे निश्चयकी आवश्यकता इसलिये पड़ी है कि ) राम सहस्रों धीरवीर वानरोंके साथ हमारी लङ्कापुरीपर चढ़ाई करनेके लिये आ रहे हैं ॥ १६ ॥

> तरिष्यति च सुव्यक्तं राघवः सागरं सुखम् ।  
> तरसा युक्तरूपेण सानुजः सबलानुगः ॥ १७ ॥

‘यह बात भी भलीभाँति स्पष्ट हो चुकी है कि वे रघुवंशी राम अपने समुचित बलके द्वारा भाई, सेना और सेवकोंसहित सुखपूर्वक समुद्रको पार कर लेंगे ॥ १७ ॥

> समुद्रमुच्छोषयति वीर्येणान्यत्करोति वा ।  
> तस्मिन्नेवंविधे कार्ये विरुद्धे वानरैः सह ।  
> हितं पुरे च सैन्ये च सर्वं सम्मन्त्र्यतां मम ॥ १८ ॥

‘वे या तो समुद्रको ही सुखा डालेंगे या अपने पराक्रमसे कोई दूसरा ही उपाय करेंगे । ऐसी स्थितिमें वानरोंसे विरोध आ पड़नेपर नगर और सेनाके लिये जो भी हितकर हो, वैसी सलाह आपलोग दीजिये’ ॥ १८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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