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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 57"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 57

> अकम्पनवधं श्रुत्वा क्रुद्धो वै राक्षसेश्वरः ।  
> किंचिद् दीनमुखश्चापि सचिवांस्तानुदैक्षत ॥ १ ॥

अकम्पनके वधका समाचार पाकर राक्षसराज रावणको बड़ा क्रोध हुआ । उसके मुखपर कुछ दीनता छा गयी और वह मन्त्रियोंकी ओर देखने लगा ॥ १ ॥

> स तु ध्यात्वा मुहूर्तं तु मन्त्रिभिः संविचार्य च ।  
> ततस्तु रावणः पूर्वदिवसे राक्षसाधिपः ।  
> पुरीं परिययौ लङ्कां सर्वान् गुल्मानवेक्षितुम् ॥ २ ॥

पहले तो दो घड़ीतक वह कुछ सोचता रहा । फिर उसने मन्त्रियोंके साथ विचार किया और उसके बाद दिनके पूर्वभागमें राक्षसराज रावण स्वयं लङ्काके सब मोरचोंका निरीक्षण करनेके लिये गया ॥ २ ॥

> तां राक्षसगणैर्गुप्तां गुल्मैर्बहुभिरावृताम् ।  
> ददर्श नगरीं राजा पताकाध्वजमालिनीम् ॥ ३ ॥

राक्षसगणोंसे सुरक्षित और बहुत-सी छावनियोंसे घिरी हुई, ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित उस नगरीको राजा रावणने अच्छी तरह देखा ॥ ३ ॥

> रुद्धां तु नगरीं दृष्ट्वा रावणो राक्षसेश्वरः ।  
> उवाचात्महितं काले प्रहस्तं युद्धकोविदम् ॥ ४ ॥

लङ्कापुरी चारों ओरसे शत्रुओंद्वारा घेर ली गयी थी । यह देखकर राक्षसराज रावणने अपने हितैषी युद्धकलाकोविद प्रहस्तसे यह समयोचित बात कही—॥ ४ ॥

> पुरस्योपनिविष्टस्य सहसा पीडितस्य ह ।  
> नान्ययुद्धात् प्रपश्यामि मोक्षं युद्धविशारद ॥ ५ ॥

‘युद्धविशारद वीर ! नगरके अत्यन्त निकट शत्रुओंकी सेना छावनी डाले पड़ी है, इसीलिये सारा नगर सहसा व्यथित हो उठा है । अब मैं दूसरे किसीके युद्ध करनेसे इसका छुटकारा होता नहीं देखता हूँ ॥ ५ ॥

> अहं वा कुम्भकर्णो वा त्वं वा सेनापतिर्मम ।  
> इन्द्रजिद् वा निकुम्भो वा वहेयुर्भारमीदृशम् ॥ ६ ॥

‘अब तो इस तरहके युद्धका भार मैं, कुम्भकर्ण मेरे सेनापति तुम, बेटा इन्द्रजित् अथवा निकुम्भ ही उठा सकते हैं ॥ ६ ॥

> स त्वं बलमतः शीघ्रमादाय परिगृह्य च ।  
> विजयायाभिनिर्याहि यत्र सर्वे वनौकसः ॥ ७ ॥

‘अतः तुम शीघ्र ही सेना लेकर विजयके लिये प्रस्थान करो और जहाँ ये सब वानर जुटे हुए हैं, वहाँ जाओ ॥७॥

> निर्याणादेव तूर्णं च चलिता हरिवाहिनी ।  
> नर्दतां राक्षसेन्द्राणां श्रुत्वा नादं द्रविष्यति ॥ ८ ॥

‘तुम्हारे निकलते ही सारी वानरसेना तुरंत विचलित हो उठेगी और गर्जते हुए राक्षसशिरोमणियोंका सिंहनाद सुनकर भाग खड़ी होगी ॥ ८ ॥

> चपला ह्यविनीताश्च चलचित्ताश्च वानराः ।  
> न सहिष्यन्ति ते नादं सिंहनादमिव द्विपाः ॥ ९ ॥

‘वानरलोग बड़े चञ्चल, ढीठ और डरपोक होते हैं, जैसे हाथी सिंहकी गर्जना नहीं सह सकते, उसी प्रकार वे वानर तुम्हारा सिंहनाद नहीं सह सकेंगे ॥ ९ ॥

> विद्रुते च बले तस्मिन् रामः सौमित्रिणा सह ।  
> अवशस्ते निरालम्बः प्रहस्त वशमेष्यति ॥ १० ॥

‘प्रहस्त ! जब वानरसेना भाग जायगी, तब कोई सहारा न रहनेके कारण लक्ष्मणसहित श्रीराम विवश होकर तुम्हारे अधीन हो जायँगे ॥ १० ॥

> आपत्संशयिता श्रेयो नात्र निःसंशयीकृता ।  
> प्रतिलोमानुलोमं वा यत् तु नो मन्यसे हितम् ॥ ११ ॥

‘युद्धमें मृत्यु संदिग्ध होती है, हो भी सकती है और न भी हो । किंतु ऐसी मृत्यु ही श्रेष्ठ है । (इसके विपरीत) जीवनको बिना संशय ( जोखिम ) में डाले ( बिना युद्धस्थलके ) जो मृत्यु होती है, वह श्रेष्ठ नहीं होती ( ऐसा मेरा विचार है )। इसके अनुकूल या प्रतिकूल जो कुछ तुम हमारे लिये हितकर समझते हो, उसे बताओ’ ॥ ११ ॥

> रावणेनैवमुक्तस्तु प्रहस्तो वाहिनीपतिः ।  
> राक्षसेन्द्रमुवाचेदमसुरेन्द्रमिवोशना ॥ १२ ॥

रावणके ऐसा कहनेपर सेनापति प्रहस्तने उस राक्षसराजके समक्ष उसी तरह अपना विचार व्यक्त किया, जैसे शुक्राचार्य असुरराज बलिको अपनी सलाह दिया करते हैं ॥ १२ ॥

> राजन् मन्त्रितपूर्वं नः कुशलैः सह मन्त्रिभिः ।  
> विवादश्चापि नो वृत्तः समवेक्ष्य परस्परम् ॥ १३ ॥

( उसने कहा— ) ‘राजन् ! हमलोगोंने कुशल मन्त्रियोंके साथ पहले भी इस विषयपर विचार किया है । उन दिनों एक दूसरेके मतकी आलोचना करके हमलोगोंमें विवाद भी खड़ा हो गया था ( हमलोग सर्वसम्मतिसे किसी एक निर्णयपर नहीं पहुँच सके थे ) ॥ १३ ॥

> प्रदानेन तु सीतायाः श्रेयो व्यवसितं मया ।  
> अप्रदाने पुनर्युद्धं दृष्टमेव तथैव नः ॥ १४ ॥

‘मेरा पहलेसे ही यह निश्चय रहा है कि सीताजीको लौटा देनेसे ही हमलोगोंका कल्याण होगा और न लौटानेपर युद्ध अवश्य होगा । उस निश्चयके अनुसार ही हमें आज यह युद्धका संकट दिखायी दिया है ॥ १४ ॥

> सोऽहं दानैश्च मानैश्च सततं पूजितस्त्वया ।  
> सान्त्वैश्च विविधैः काले किं न कुर्यां हितं तव ॥ १५ ॥

‘परंतु आपने दान, मान और विविध सान्त्वनाओंके द्वारा समय-समयपर सदा ही मेरा सत्कार किया है । फिर मैं आपका हितसाधन क्यों नहीं करूँगा ? ( अथवा आपके हितके लिये कौन-सा कार्य नहीं कर सकूँगा ) ॥१५ ॥

> नहि मे जीवितं रक्ष्यं पुत्रदारधनानि च ।  
> त्वं पश्य मां जुह्वन्तं त्वदर्थे जीवितं युधि ॥ १६ ॥

‘मुझे अपने जीवन, स्त्री, पुत्र और धन आदिकी रक्षा नहीं करनी है—इनकी रक्षाके लिये मुझे कोई चिन्ता नहीं । आप देखिये कि मैं किस तरह आपके लिये युद्धकी ज्वालामें अपने जीवनकी आहुति देता हूँ’ ॥ १६ ॥

> एवमुक्त्वा तु भर्तारं रावणं वाहिनीपतिः ।  
> उवाचेदं बलाध्यक्षान् प्रहस्तः पुरतः स्थितान् ॥ १७ ॥

अपने स्वामी रावणसे ऐसा कहकर प्रधान सेनापति प्रहस्तने अपने सामने खड़े हुए सेनाध्यक्षोंसे इस प्रकार कहा—॥ १७ ॥

> समानयत मे शीघ्रं राक्षसानां महाबलम् ।  
> मद्बाणानां तु वेगेन हतानां च रणाजिरे ॥ १८ ॥  
> अद्य तृप्यन्तु मांसादाः पक्षिणः काननौकसाम् ।

‘तुमलोग शीघ्र मेरे पास राक्षसोंकी विशाल सेना ले आओ । आज मांसाहारी पक्षी समराङ्गणमें मेरे बाणोंके वेगसे मारे गये वानरोंके मांस खाकर तृप्त हो जायँ’ ॥ १८½ ॥

> तस्य तद् वचनं श्रुत्वा बलाध्यक्षा महाबलाः ॥ १९ ॥  
> बलमुद्योजयामासुस्तस्मिन् राक्षसमन्दिरे ।

प्रहस्तकी यह बात सुनकर महाबली सेनाध्यक्षोंने रावणके उस महलके पास विशाल सेनाको युद्धके लिये तैयार किया ॥ १९½ ॥

> सा बभूव मुहूर्तेन भीमैर्नानाविधायुधैः ॥ २० ॥  
> लङ्का राक्षसवीरैस्तैर्गजैरिव समाकुला ।

दो ही घड़ीमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये हाथी-जैसे भयानक राक्षसवीरोंसे लङ्कापुरी भर गयी ॥ २०½ ॥

> हुताशनं तर्पयतां ब्राह्मणांश्च नमस्यताम् ॥ २१ ॥  
> आज्यगन्धप्रतिवहः सुरभिर्मारुतो ववौ ।

कितने ही राक्षस घीकी आहुति देकर अग्निदेवको तृप्त करने लगे और ब्राह्मणोंको नमस्कार करके आशीर्वाद लेने लगे । उस समय घीकी गन्ध लेकर सुगन्धित वायु सब ओर बहने लगी ॥ २१½ ॥

> स्रजश्च विविधाकारा जगृहुस्त्वभिमन्त्रिताः ॥ २२ ॥  
> संग्रामसज्जाः संहृष्टा धारयन् राक्षसास्तदा ।

राक्षसोंने मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित नाना प्रकारकी मालाएँ ग्रहण कीं और हर्ष एवं उत्साहसे युक्त हो युद्धोपयोगी वेश-भूषा धारण की ॥ २२½ ॥

> सधनुष्काः कवचिनो वेगादाप्लुत्य राक्षसाः ॥ २३ ॥  
> रावणं प्रेक्ष्य राजानं प्रहस्तं पर्यवारयन् ।

धनुष और कवच धारण किये राक्षस वेगसे उछलकर आगे बढ़े और राजा रावणका दर्शन करते हुए प्रहस्तको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ २३½ ॥

> अथामन्त्र्य तु राजानं भेरीमाहत्य भैरवाम् ॥ २४ ॥  
> आरुरोह रथं युक्तः प्रहस्तः सज्जकल्पितम् ।

तदनन्तर राजाकी आज्ञा ले भयंकर भेरी बजवाकर कवच आदि धारण करके युद्धके लिये उद्यत हुआ प्रहस्त अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित रथपर आरूढ़ हुआ ॥ २४½ ॥

> हयैर्महाजवैर्युक्तं सम्यक्सूतं सुसंयतम् ॥ २५ ॥  
> महाजलदनिर्घोषं साक्षाच्चन्द्रार्कभास्वरम् ।

प्रहस्तके उस रथमें बड़े वेगशाली घोड़े जुते हुए थे, उसका सारथि भी अपने कार्यमें कुशल था । वह रथ पूर्णतः सारथिके नियन्त्रणमें था । उसके चलनेपर महान् मेघोंकी गर्जनाके समान घर्घर-ध्वनि होती थी । वह रथ साक्षात् चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशमान था ॥ २५½ ॥

> उरगध्वजदुर्धर्षं सुवरूथं स्वपस्करम् ॥ २६ ॥  
> सुवर्णजालसंयुक्तं प्रहसन्तमिव श्रिया ।

सर्पाकार या सर्पचिह्नित ध्वजके कारण वह दुर्धर्ष प्रतीत होता था । उस रथकी रक्षाके लिये जो कवच था, वह बहुत ही सुन्दर दिखायी देता था । उसके सारे अङ्ग सुन्दर थे और उसमें अच्छी-अच्छी सामग्रियाँ रक्खी गयी थीं । उस रथमें सोनेकी जाली लगी थी । वह अपनी कान्तिसे हँसता-सा प्रतीत होता था ( अथवा दूसरे कान्तिमान् पदार्थोंका उपहास-सा कर रहा था ) ॥ २६½ ॥

> ततस्तं रथमास्थाय रावणार्पितशासनः ॥ २७ ॥  
> लङ्काया निर्ययौ तूर्णं बलेन महता वृतः ।

उस रथपर बैठकर रावणकी आज्ञा शिरोधार्य करके विशाल सेनासे घिरा हुआ प्रहस्त तुरंत लङ्कासे बाहर निकला ॥ २७½ ॥

> ततो दुन्दुभिनिर्घोषः पर्जन्यनिनदोपमः ।  
> वादित्राणां च निनदः पूरयन्निव मेदिनीम् ॥ २८ ॥

उसके निकलते ही मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान घौंसा बजने लगा । अन्य रणवाद्योंका निनाद भी पृथ्वीको परिपूर्ण करता-सा प्रतीत होने लगा ॥ २८ ॥

> शुश्रुवे शङ्खशब्दश्च प्रयाते वाहिनीपतौ ।  
> निनदन्तः स्वरान् घोरान् राक्षसा जग्मुरग्रतः ॥ २९ ॥  
> भीमरूपा महाकायाः प्रहस्तस्य पुरःसराः ।

सेनापतिके प्रस्थानकालमें शङ्खोंकी ध्वनि भी सुनायी देने लगी। प्रहस्तके आगे चलनेवाले भयानक रूपधारी विशालकाय राक्षस भयंकर स्वरसे गर्जना करते हुए आगे बढ़े ॥ २९½ ॥

> नरान्तकः कुम्भहनुर्महानादः समुन्नतः ।  
> प्रहस्तसचिवा ह्येते निर्ययुः परिवार्य तम् ॥ ३० ॥

नरान्तक, कुम्भहनु, महानाद और समुन्नत—ये प्रहस्तके चार सचिव उसे चारों ओरसे घेरकर निकले ॥ ३० ॥

> व्यूढेनैव सुघोरेण पूर्वद्वारात् स निर्ययौ ।  
> गजयूथनिकाशेन बलेन महता वृतः ॥ ३१ ॥

प्रहस्तकी वह विशाल सेना हाथियोंके समूह-सी अत्यन्त भयंकर जान पड़ती थी । उसकी व्यूह-रचना हो चुकी थी । उस व्यूहबद्ध सेनाके साथ ही प्रहस्त लङ्काके पूर्वद्वारसे निकला ॥ ३१ ॥

> सागरप्रतिमौघेन वृतस्तेन बलेन सः ।  
> प्रहस्तो निर्ययौ क्रुद्धः कालान्तकयमोपमः ॥ ३२ ॥

समुद्रके समान उस अपार सेनाके साथ जब प्रहस्त बाहर निकला, उस समय वह क्रोधसे भरे हुए प्रलयकालके संहारकारी यमराजके समान जान पड़ता था ॥ ३२ ॥

> तस्य निर्णादघोषेण राक्षसानां च नर्दताम् ।  
> लङ्कायां सर्वभूतानि विनेदुर्विकृतैः स्वरैः ॥ ३३ ॥

उसके प्रस्थान करते समय जो भेरी आदि बाजों और गर्जते हुए राक्षसोंका गम्भीर घोष हुआ, उससे भयभीत हो लङ्काके सब प्राणी विकृत स्वरमें चीत्कार करने लगे ॥ ३३ ॥

> व्यभ्रमाकाशमाविश्य मांसशोणितभोजनाः ।  
> मण्डलान्यपसव्यानि खगाश्चक्रू रथं प्रति ॥ ३४ ॥

उस समय बिना बादलके आकाशमें उड़कर रक्त-मांसका भोजन करनेवाले पक्षी मण्डल बनाकर प्रहस्तके रथकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करने लगे ॥ ३४ ॥

> वमन्त्यः पावकज्वालाः शिवा घोरा ववाशिरे ।  
> अन्तरिक्षात् पपातोल्का वायुश्च परुषंववौ ॥ ३५ ॥

भयानक गीदड़ियाँ मुँहसे आगकी ज्वाला उगलती हुई अशुभसूचक बोली बोलने लगीं । आकाशसे उल्कापात होने लगा और प्रचण्ड वायु चलने लगी ॥ ३५ ॥

> अन्योन्यमभिसंरब्धा ग्रहाश्च न चकाशिरे ।  
> मेघाश्च खरनिर्घोषा रथस्योपरि रक्षसः ॥ ३६ ॥  
> ववर्षू रुधिरं चास्य सिषिचुश्च पुरःसरान् ।  
> केतुमूर्धनि गृध्रस्तु विलीनो दक्षिणामुखः ॥ ३७ ॥  
> नदन्नुभयतः पार्श्वं समग्रां श्रियमाहरत् ।

ग्रह रोषपूर्वक आपसमें युद्ध करने लगे, जिससे उनका प्रकाश मन्द पड़ गया तथा मेघ उस राक्षसके रथके ऊपर गधों-की-सी आवाजमें गर्जना करने लगे, रक्त बरसाने लगे और आगे चलनेवाले सैनिकोंको सींचने लगे । उसके ध्वजके ऊपर गीध दक्षिणकी ओर मुँह करके आ बैठा । उसने दोनों ओर अपनी अशुभ बोली बोलकर उस राक्षसकी सारी शोभा-सम्पत्ति हर ली ॥ ३६-३७½ ॥

> सारथेर्बहुशश्चास्य संग्राममवगाहतः ॥ ३८ ॥  
> प्रतोदो न्यपतद्धस्तात् सूतस्य हयसादिनः ।

संग्रामभूमिमें प्रवेश करते समय घोड़ेको काबूमें रखनेवाले उसके सारथिके हाथसे कई बार चाबुक गिर पड़ा ॥ ३८½ ॥

> निर्याणश्रीश्च या च स्याद् भास्वराच सुदुर्लभा ॥ ३९ ॥  
> सा ननाश मुहूर्तेन समे च स्खलिता हयाः ।

युद्धके लिये निकलते समय प्रहस्तकी जो परम दुर्लभ और प्रकाशमान शोभा थी, वह दो ही घड़ीमें नष्ट हो गयी । उसके घोड़े समतल भूमिमें भी लड़खड़ाकर गिर पड़े ॥ ३९½ ॥

> प्रहस्तं तं हि निर्यान्तं प्रख्यातगुणपौरुषम् ।  
> युधि नानाप्रहरणा कपिसेनाभ्यवर्तत ॥ ४० ॥

जिसके गुण और पौरुष विख्यात थे, वह प्रहस्त ज्यों ही युद्धभूमिमें उपस्थित हुआ, त्यों ही शिला, वृक्ष आदि नाना प्रकारके प्रहार-साधनोंसे सम्पन्न वानरसेना उसका सामना करनेके लिये आ गयी ॥ ४० ॥

> अथ घोषः सुतुमुलो हरीणां समजायत ।  
> वृक्षानारुजतां चैव गुर्वीर्वै गृह्णतां शिलाः ॥ ४१ ॥

तदनन्तर वृक्षोंको तोड़ते और भारी शिलाओंको उठाते हुए वानरोंका अत्यन्त भयंकर कोलाहल वहाँ सब ओर छा गया ॥ ४१ ॥

> नदतां राक्षसानां च वानराणां च गर्जताम् ।  
> उभे प्रमुदिते सैन्ये रक्षोगणवनौकसाम् ॥ ४२ ॥

एक ओर राक्षस सिंहनाद कर रहे थे तो दूसरी ओर वानर गरज रहे थे । उन सबका तुमुल नाद वहाँ फैल गया । राक्षसों और वानरोंकी वे दोनों सेनाएँ हर्ष और उल्लाससे भरी थीं ॥ ४२ ॥

> वेगितानां समर्थानामन्योन्यवधकाङ्क्षिणाम् ।  
> परस्परं चाह्वयतां निनादः श्रूयते महान् ॥ ४३ ॥

अत्यन्त वेगशाली, समर्थ तथा एक दूसरेके वधकी इच्छावाले योद्धा परस्पर ललकार रहे थे । उनका महान् कोलाहल सबको सुनायी देता था ॥ ४३ ॥

> ततः प्रहस्तः कपिराजवाहिनी-  
> मभिप्रतस्थे विजयाय दुर्मतिः ।  
> विवृद्धवेगां च विवेश तां चमूं  
> यथा मुमूर्षुः शलभो विभावसुम् ॥ ४४ ॥

इसी समय दुर्बुद्धि प्रहस्त विजयकी अभिलाषासे वानरराज सुग्रीवकी सेनाकी ओर बढ़ा और जैसे पतंग मरनेके लिये आगपर टूट पड़ता है, उसी प्रकार वह बढ़े हुए वेगवाली उस वानरसेनामें घुसनेकी चेष्टा करने लगा ॥ ४४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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