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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 53"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 53

> धूम्राक्षं निहतं श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः ।  
> क्रोधेन महताऽऽविष्टो निःश्वसन्नुरगो यथा ॥ १ ॥

धूम्राक्षके मारे जानेका समाचार सुनकर राक्षसराज रावणको महान् क्रोध हुआ । वह फुफकारते हुए सर्पके समान जोर-जोरसे साँस लेने लगा ॥ १ ॥

> दीर्घमुष्णं विनिःश्वस्य क्रोधेन कलुषीकृतः ।  
> अब्रवीद् राक्षसं क्रूरं वज्रदंष्ट्रं महाबलम् ॥ २ ॥

क्रोधसे कलुषित हो गर्म-गर्म लंबी साँस खींचकर उसने क्रूर निशाचर महाबली वज्रदंष्ट्रसे कहा--॥ २ ॥

> गच्छ त्वं वीर निर्याहि राक्षसैः परिवारितः ।  
> जहि दाशरथिं रामं सुग्रीवं वानरैः सह ॥ ३ ॥

‘वीर ! तुम राक्षसोंके साथ जाओ और दशरथकुमार राम और वानरोंसहित सुग्रीवको मार डालो’ ॥ ३ ॥

> तथेत्युक्त्वा द्रुततरं मायावी राक्षसेश्वरः ।  
> निर्जगाम बलैः सार्धं बहुभिः परिवारितः ॥ ४ ॥

तब वह मायावी राक्षस ‘बहुत अच्छा’ कहकर बहुत बड़ी सेनाके साथ तुरंत युद्धके लिये चल दिया ॥ ४ ॥

> नागैरश्वैः खरैरुष्ट्रैः संयुक्तः सुसमाहितः ।  
> पताकाध्वजचित्रैश्च बहुभिः समलंकृतः ॥ ५ ॥

वह हाथी, घोड़े, गदहे और ऊँट आदि सवारियोंसे युक्त था, चित्तको पूर्णतः एकाग्र किये हुए था और पताका, ध्वज आदिसे विचित्र शोभा पानेवाले बहुत-से सेनाध्यक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ५ ॥

> ततो विचित्रकेयूरमुकुटेन विभूषितः ।  
> तनुत्रं च समावृत्य सधनुर्निर्ययौ द्रुतम् ॥ ६ ॥

विचित्र भुजबंद और मुकुटसे विभूषित हो कवच धारण करके हाथमें धनुष लिये वह शीघ्र ही निकला ॥ ६ ॥

> पताकालंकृतं दीप्तं तप्तकाञ्चनभूषितम् ।  
> रथं प्रदक्षिणं कृत्वा समारोहच्चमूपतिः ॥ ७ ॥

ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत, दीप्तिमान् तथा सोनेके साज-बाजसे सुसज्जित रथकी परिक्रमा करके सेनापति वज्रदंष्ट्र उसपर आरूढ़ हुआ ॥ ७ ॥

> ऋष्टिभिस्तोमरैश्चित्रैः श्लक्ष्णैश्च मुसलैरपि ।  
> भिन्दिपालैश्च चापैश्च शक्तिभिः पट्टिशैरपि ॥ ८ ॥  
> खड्गैश्चक्रैर्गदाभिश्च निशितैश्च परश्वधैः ।  
> पदातयश्च निर्यान्ति विविधाः शस्त्रपाणयः ॥ ९ ॥

उसके साथ ऋष्टि, विचित्र तोमर, चिकने मुसल, भिन्दिपाल, धनुष, शक्ति, पट्टिश, खड्ग, चक्र, गदा और तीखे फरसोंसे सुसज्जित बहुत-से पैदल योद्धा चले । उनके हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र शोभा पा रहे थे ॥ ८-९ ॥

> विचित्रवाससः सर्वे दीप्ता राक्षसपुङ्गवाः ।  
> गजा महोत्कटाः शूराश्चलन्त इव पर्वताः ॥ १० ॥

विचित्र वस्त्र धारण करनेवाले सभी राक्षस वीर अपने तेजसे उद्भासित हो रहे थे । शौर्यसम्पन्न मदमत्त गजराज चलते-फिरते पर्वतोंके समान जान पड़ते थे ॥ १० ॥

> ते युद्धकुशला रूढास्तोमराङ्कुशपाणिभिः ।  
> अन्ये लक्षणसंयुक्ताः शूरारूढा महाबलाः ॥ ११ ॥

हाथोंमें तोमर, अंकुश धारण करनेवाले महावत जिनकी गर्दनपर सवार थे तथा जो युद्धकी कलामें कुशल थे, वे हाथी युद्धके लिये आगे बढ़े । उत्तम लक्षणोंसे युक्त जो दूसरे-दूसरे महाबली घोड़े थे, जिनके ऊपर शूरवीर सैनिक सवार थे, वे भी युद्धके लिये निकले ॥ ११ ॥

> तद् राक्षसबलं सर्वं विप्रस्थितमशोभत ।  
> प्रावृट्काले यथा मेघा नर्दमानाः सविद्युतः ॥ १२ ॥

युद्धके उद्देश्यसे प्रस्थित हुई राक्षसोंकी वह सारी सेना वर्षाकालमें गर्जते हुए बिजलियोंसहित मेघके समान शोभा पा रही थी ॥ १२ ॥

> निःसृता दक्षिणद्वारादङ्गदो यत्र यूथपः ।  
> तेषां निष्क्रममाणानामशुभं समजायत ॥ १३ ॥

वह सेना लङ्काके दक्षिणद्वारसे निकली, जहाँ वानरयूथपति अङ्गद राह रोके खड़े थे । उधरसे निकलते ही उन राक्षसोंके सामने अशुभसूचक अपशकुन होने लगा ॥ १३ ॥

> आकाशाद् विघनात् तीव्रा उल्काश्चाभ्यपतंस्तदा ।  
> वमन्तः पावकज्वालाः शिवा घोरा ववाशिरे ॥ १४ ॥

मेघरहित आकाशसे तत्काल दुःसह उल्कापात होने लगे । भयानक गीदड़ मुँहसे आगकी ज्वाला उगलते हुए अपनी बोली बोलने लगे ॥ १४ ॥

> व्याहरन्त मृगा घोरा रक्षसां निधनं तदा ।  
> समापतन्तो योधास्तु प्रास्खलंस्तत्र दारुणम् ॥ १५ ॥

घोर पशु ऐसी बोली बोलने लगे, जिससे राक्षसोंके संहारकी सूचना मिल रही थी । युद्धके लिये आते हुए योद्धा बुरी तरह लड़खड़ाकर गिर पड़ते थे । इससे उनकी बड़ी दारुण अवस्था हो जाती थी ॥ १५ ॥

> एतानौत्पातिकान् दृष्ट्वा वज्रदंष्ट्रो महाबलः ।  
> धैर्यमालम्ब्य तेजस्वी निर्जगाम रणोत्सुकः ॥ १६ ॥

इन उत्पातसूचक लक्षणोंको देखकर भी महाबली वज्रदंष्ट्रने धैर्य नहीं छोड़ा । वह तेजस्वी वीर युद्धके लिये उत्सुक होकर निकला ॥ १६ ॥

> तांस्तु विद्रवतो दृष्ट्वा वानरा जितकाशिनः ।  
> प्रणेदुः सुमहानादान् दिशः शब्देन पूरयन् ॥ १७ ॥

तीव्रगतिसे आते हुए उन राक्षसोंको देखकर विजयलक्ष्मी-से सुशोभित होनेवाले वानर बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे । उन्होंने अपने सिंहनादसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजा दिया ॥ १७ ॥

> ततः प्रवृत्तं तुमुलं हरीणां राक्षसैः सह ।  
> घोराणां भीमरूपाणामन्योन्यवधकाङ्क्षिणाम् ॥ १८ ॥

तदनन्तर भयानक रूप धारण करनेवाले घोर वानरोंका राक्षसोंके साथ तुमुल युद्ध आरम्भ हुआ । दोनों दलोंके योद्धा एक दूसरेका वध करना चाहते थे ॥ १८ ॥

> निष्पतन्तो महोत्साहा भिन्नदेहशिरोधराः ।  
> रुधिरोक्षितसर्वाङ्गा न्यपतन् धरणीतले ॥ १९ ॥

वे बड़े उत्साहसे युद्धके लिये निकलते; परंतु देह और गर्दन कट जानेसे पृथ्वीपर गिर पड़ते थे । उस समय उनके सारे अङ्ग रक्तसे भीग जाते थे ॥ १९ ॥

> केचिदन्योन्यमासाद्य शूराः परिघबाहवः ।  
> चिक्षिपुर्विविधाञ्शस्त्रान् समरेष्वनिवर्तिनः ॥ २० ॥

युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले और परिघ-जैसी बाँहोंवाले कितने ही शूरवीर एक दूसरेके निकट पहुँचकर परस्पर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते थे ॥ २० ॥

> द्रुमाणां च शिलानां च शस्त्राणां चापि निःस्वनः ।  
> श्रूयते सुमहांस्तत्र घोरो हृदयभेदनः ॥ २१ ॥

उस युद्धस्थलमें प्रयुक्त होनेवाले वृक्षों, शिलाओं और शस्त्रोंका महान् एवं घोर शब्द जब कानोंमें पड़ता था, तब वह हृदयको विदीर्ण-सा कर देता था ॥ २१ ॥

> रथनेमिस्वनस्तत्र धनुषश्चापि घोरवत् ।  
> शङ्खभेरीमृदङ्गानां बभूव तुमुलः स्वनः ॥ २२ ॥

वहाँ रथके पहियोंकी घर्घराहट, धनुषकी भयानक टंकार तथा शङ्ख, भेरी और मृदङ्गोंका शब्द एकमें मिलकर बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ २२ ॥

> केचिदस्त्राणि संत्यज्य बाहुयुद्धमकुर्वत ॥ २३ ॥  
> तलैश्च चरणैश्चापि मुष्टिभिश्च द्रुमैरपि ।  
> जानुभिश्च हताः केचिद् भग्नदेहाश्च राक्षसाः ।  
> शिलाभिश्चूर्णिताः केचिद् वानरैर्युद्धदुर्मदैः ॥ २४ ॥

कुछ योद्धा अपने हथियार फेंककर बाहुयुद्ध करने लगते थे । थप्पड़ों, लातों, मुक्कों, वृक्षों और घुटनोंकी मार खाकर कितने ही राक्षसोंके शरीर चूर-चूर हो गये थे । रणदुर्मद वानरोंने शिलाओंसे मार-मारकर कितने ही राक्षसोंका चूरा बना दिया था ॥ २३-२४ ॥

> वज्रदंष्ट्रो भृशं बाणै रणे वित्रासयन् हरीन् ।  
> चचार लोकसंहारे पाशहस्त इवान्तकः ॥ २५ ॥

उस समय वज्रदंष्ट्र अपने बाणोंकी मारसे वानरोंको अत्यन्त भयभीत करता हुआ तीनों लोकोंके संहारके लिये उठे हुए पाशधारी यमराजके समान रणभूमिमें विचरने लगा ॥ २५ ॥

> बलवन्तोऽस्त्रविदुषो नानाप्रहरणा रणे ।  
> जघ्नुर्वानरसैन्यानि राक्षसाः क्रोधमूर्च्छिताः ॥ २६ ॥

साथ ही क्रोधसे भरे तथा नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये अन्य अस्त्रवेत्ता बलवान् राक्षस भी वानरसेनाओंका रणभूमिमें संहार करने लगे ॥ २६ ॥

> जघ्ने तान् राक्षसान् सर्वान् धृष्टो वालिसुतो रणे।  
> क्रोधेन द्विगुणाविष्टः संवर्तक इवानलः ॥ २७ ॥

किंतु प्रलयकालमें संवर्तक अग्नि जैसे प्राणियोंका संहार करती है, उसी तरह वालिपुत्र अङ्गद और भी निर्भय हो दूने क्रोधसे भरकर उन सब राक्षसोंका वध करने लगे ॥ २७ ॥

> तान् राक्षसगणान् सर्वान् वृक्षमुद्यम्य वीर्यवान् ।  
> अङ्गदः क्रोधताम्राक्षः सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ २८ ॥  
> चकार कदनं घोरं शक्रतुल्यपराक्रमः ।

उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वे इन्द्रके तुल्य पराक्रमी थे। जैसे सिंह छोटे वन्य-पशुओंको अनायास ही नष्ट कर देता है, उसी तरह पराक्रमी अङ्गदने एक वृक्ष उठाकर उन समस्त राक्षसगणोंका घोर संहार आरम्भ किया ॥ २८½ ॥

> अङ्गदाभिहतास्तत्र राक्षसा भीमविक्रमाः ॥ २९ ॥  
> विभिन्नशिरसः पेतुर्निकृत्ता इव पादपाः ।

अङ्गदकी मार खाकर वे भयानक पराक्रमी राक्षस सिर फट जानेके कारण कटे हुए वृक्षोंके समान पृथ्वीपर गिरने लगे ॥२९½॥

> रथैश्चित्रैर्ध्वजैरश्वैः शरीरैर्हरिरक्षसाम् ॥ ३० ॥  
> रुधिरौघेण संछन्ना भूमिर्भयकरी तदा ।

उस समय रथों, चित्र-विचित्र ध्वजों, घोड़ों, राक्षस और वानरोंके शरीरों तथा रक्तकी धाराओंसे भर जानेके कारण वह रणभूमि बड़ी भयानक जान पड़ती थी ॥ ३०½ ॥

> हारकेयूरवस्त्रैश्च शस्त्रैश्च समलंकृता ॥ ३१ ॥  
> भूमिर्भाति रणे तत्र शारदीव यथा निशा ।

योद्धाओंके हार, केयूर ( बाजूबंद ), वस्त्र और शस्त्रोंसे अलंकृत हुई रणभूमि शरत्कालकी रात्रिके समान शोभा पाती थी ॥ ३१½ ॥

> अङ्गदस्य च वेगेन तद् राक्षसबलं महत् ।  
> प्राकम्पत तदा तत्र पवनेनाम्बुदो यथा ॥ ३२ ॥

अङ्गदके वेगसे वहाँ वह विशाल राक्षससेना उस समय उसी तरह काँपने लगी, जैसे वायुके वेगसे मेघ कम्पित हो उठता है ॥ ३२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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