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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 50"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 50

> अथोवाच महातेजा हरिराजो महाबलः।  
> किमियं व्यथिता सेना मूढवातेव नौर्जले ॥ १ ॥

उस समय महातेजस्वी महाबली वानरराज सुग्रीवने पूछा—‘वानरो ! जैसे जलमें बवंडरकी मारी हुई नौका डगमगाने लगती है, उसी प्रकार जो यह हमारी सेना सहसा व्यथित हो उठी है, इसका क्या कारण है ?’ ॥ १ ॥

> सुग्रीवस्य वचः श्रुत्वा वालिपुत्रोऽङ्गदोऽब्रवीत् ।  
> न त्वं पश्यसि रामं च लक्ष्मणं च महारथम् ॥ २ ॥

सुग्रीवकी यह बात सुनकर वालिपुत्र अङ्गदने कहा— ‘क्या आप श्रीराम और महारथी लक्ष्मणकी दशा नहीं देख रहे हैं ? ॥ २ ॥

> शरजालाचितौ वीराबुभौ दशरथात्मजौ।  
> शरतल्पे महात्मानौ शयानौ रुधिरोक्षितौ ॥ ३ ॥  
> अथाब्रवीद् वानरेन्द्रः सुग्रीवः पुत्रमङ्गदम्।  
> नानिमित्तमिदं मन्ये भवितव्यं भयेन तु ॥ ४ ॥

‘ये दोनों वीर महात्मा दशरथकुमार रक्तसे भीगे हुए बाण-शय्यापर पड़े हैं और बाणोंके समूहसे व्याप्त हो रहे हैं’॥ तब वानरराज सुग्रीवने पुत्र अङ्गदसे कहा—‘बेटा ! मैं ऐसा नहीं मानता कि सेनामें अकारण ही भगदड़ मच गयी है । किसी-न-किसी भयके कारण ऐसा होना चाहिये ॥ ४ ॥

> विषण्णवदना ह्येते त्यक्तप्रहरणा दिशः।  
> पलायन्तेऽत्र हरयस्त्रासादुत्फुल्ललोचनाः ॥ ५ ॥

‘ये वानर उदास मुँहसे अपने-अपने हथियार फेंकका सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग रहे हैं और भयके कारण आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे हैं ॥ ५ ॥

> अन्योन्यस्य न लज्जन्ते न निरीक्षन्ति पृष्ठतः।  
> विप्रकर्षन्ति चान्योन्यं पतितं लङ्घयन्ति च ॥ ६ ॥

‘पलायन करते समय उन्हें एक दूसरेसे लज्जा नहीं होती है । वे पीछेकी ओर नहीं देखते हैं । एक दूसरेको घसीटते हैं और जो गिर जाता है, उसे लाँघकर चल देते हैं ( भयके मारे उठातेतक नहीं हैं )’ ॥ ६ ॥

> एतस्मिन्नन्तरे वीरो गदापाणिर्विभीषणः।  
> सुग्रीवं वर्धयामास राघवं च जयाशिषा ॥ ७ ॥

इसी बीचमें वीर विभीषण हाथमें गदा लिये वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने विजयसूचक आशीर्वाद देकर सुग्रीव तथा श्रीरघुनाथजीकी अभ्युदय-कामना की ॥ ७ ॥

> विभीषणं च सुग्रीवो दृष्ट्वा वानरभीषणम् ।  
> ऋक्षराजं महात्मानं समीपस्थमुवाच ह ॥ ८ ॥

वानरोंको भयभीत करनेवाले विभीषणको देखकर सुग्रीवने अपने पास ही खड़े हुए महात्मा ऋक्षराज जाम्बवान्से कहा—॥ ८ ॥

> विभीषणोऽयं सम्प्राप्तो यं दृष्ट्वा वानरर्षभाः।  
> द्रवन्त्यायतसंत्रासा रावणात्मजशङ्कया ॥ ९ ॥

‘ये विभीषण आये हैं, जिन्हें देखकर वानरशिरोमणियोंको यह संदेह हुआ है कि रावणका बेटा इन्द्रजित् आ गया । इसीलिये इनका भय बहुत बढ़ गया है और वे भागे जा रहे हैं ॥ ९ ॥

> शीघ्रमेतान् सुसंत्रस्तान् बहुधा विप्रधावितान्।  
> पर्यवस्थापयाख्याहि विभीषणमुपस्थितम् ॥ १० ॥  
> सुग्रीवेणैवमुक्तस्तु जाम्बवान्ऋक्षपार्थिवः।  
> वानरान् सान्त्वयामास संनिवर्त्य प्रधावतः ॥ ११ ॥

‘तुम शीघ्र जाकर यह बताओ कि इन्द्रजित् नहीं, विभीषण आये हैं । ऐसा कहकर बहुधा भयभीत हो पलायन करते हुए इन सब वानरोंको सुस्थिर करो—भागनेसे रोको’ ॥ सुग्रीवके ऐसा कहनेपर ऋक्षराज जाम्बवान्ने भागते हुए वानरोंको लौटाकर उन्हें सान्त्वना दी ॥ ११ ॥

> ते निवृत्ताः पुनः सर्वे वानरास्त्यक्तसाध्वसाः।  
> ऋक्षराजवचः श्रुत्वा तं च दृष्ट्वा विभीषणम् ॥ १२ ॥

ऋक्षराजकी बात सुनकर और विभीषणको अपनी आँखों देखकर वानरोंने भयको त्याग दिया तथा वे सब-के-सब फिर लौट आये ॥ १२ ॥

> विभीषणस्तु रामस्य दृष्ट्वा गात्रं शरैश्चितम्।  
> लक्ष्मणस्य तु धर्मात्मा बभूव व्यथितस्तदा ॥ १३ ॥

श्रीराम और लक्ष्मणके शरीरको बाणोंसे व्याप्त हुआ देख धर्मात्मा विभीषणको उस समय बड़ी व्यथा हुई ॥१३॥

> जलक्लिन्नेन हस्तेन तयोर्नेत्रे विमृज्य च।  
> शोकसम्पीडितमना रुरोद विललाप च ॥ १४ ॥

उन्होंने जलसे भीगे हुए उन दोनों भाइयोंके नेत्र पोंछे और मन-ही-मन शोकसे पीड़ित हो वे रोने और विलाप करने लगे—॥ १४ ॥

> इमौ तौ सत्त्वसम्पन्नौ विक्रान्तौ प्रियसंयुगौ।  
> इमामवस्थां गमितौ राक्षसैः कूटयोधिभिः ॥ १५ ॥

‘हाय ! जिन्हें युद्ध अधिक प्रिय था और जो बल-विक्रमसे सम्पन्न थे, वे ही ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण मायासे युद्ध करनेवाले राक्षसोंद्वारा इस अवस्थाको पहुँचा दिये गये ॥ १५ ॥

> भ्रातृपुत्रेण चैतेन दुष्पुत्रेण दुरात्मना ।  
> राक्षस्या जिह्मया बुद्ध्या वञ्चितावृजुविक्रमौ ॥ १६ ॥

‘ये दोनों वीर सरलतापूर्वक पराक्रम प्रकट कर रहे थे । परंतु भाईके इस दुरात्मा कुपुत्रने अपनी कुटिल राक्षसी बुद्धिके द्वारा इन दोनोंके साथ धोखा किया ॥ १६ ॥

> शरैरिमावलं विद्धौ रुधिरेण समुक्षितौ ।  
> वसुधायामिमौ सुप्तौ दृश्येते शल्यकाविव ॥ १७ ॥

‘इन दोनोंके शरीर बाणोंद्वारा पूर्णतः छिद गये हैं । ये दोनों भाई खूनसे नहा उठे हैं और इस अवस्थामें पृथ्वीपर सोये हुए ये दोनों राजकुमार काँटोंसे भरे हुए साही नामक जन्तुके समान दिखायी देते हैं ॥ १७ ॥

> ययोर्वीर्यमुपाश्रित्य प्रतिष्ठा काङ्क्षिता मया ।  
> ताविमौ देहनाशाय प्रसुप्तौ पुरुषर्षभौ ॥ १८ ॥

‘जिनके बल-पराक्रमका आश्रय लेकर मैंने लङ्काके राज्यपर प्रतिष्ठित होनेकी अभिलाषा की थी, वे ही दोनों भाई पुरुषशिरोमणि श्रीराम और लक्ष्मण देह-त्यागके लिये सोये हुए हैं ॥ १८ ॥

> जीवन्नद्य विपन्नोऽस्मि नष्टराज्यमनोरथः ।  
> प्राप्तप्रतिज्ञश्च रिपुः सकामो रावणः कृतः ॥ १९ ॥

‘आज मैं जीते-जी मर गया । मेरा राज्यविषयक मनोरथ नष्ट हो गया । शत्रु रावणने जो सीताको न लौटानेकी प्रतिज्ञा की थी, उसकी वह प्रतिज्ञा पूरी हुई । उसके पुत्रने उसे सफलमनोरथ बना दिया’ ॥ १९ ॥

> एवं विलपमानं तं परिष्वज्य विभीषणम् ।  
> सुग्रीवः सत्त्वसम्पन्नो हरिराजोऽब्रवीदिदम् ॥ २० ॥

इस प्रकार विलाप करते हुए विभीषणको हृदयसे लगाकर शक्तिशाली वानरराज सुग्रीवने उनसे यों कहा—॥ २० ॥

> राज्यं प्राप्स्यसि धर्मज्ञ लङ्कायां नेह संशयः ।  
> रावणः सह पुत्रेण स्वकामं नेह लप्स्यते ॥ २१ ॥

‘धर्मज्ञ ! तुम्हें लङ्काका राज्य प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं है । पुत्रसहित रावण यहाँ अपनी कामना पूरी नहीं कर सकेगा ॥ २१ ॥

> गरुडाधिष्ठितावेतावुभौ राघवलक्ष्मणौ ।  
> त्यक्त्वा मोहं वधिष्येते सगणं रावणं रणे ॥ २२ ॥

‘ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण मूर्छा त्यागनेके पश्चात् गरुड़की पीठपर बैठकर रणभूमिमें राक्षसगणोंसहित रावणका वध करेंगे’ ॥ २२ ॥

> तमेवं सान्त्वयित्वा तु समाश्वास्य तु राक्षसम् ।  
> सुषेणं श्वशुरं पार्श्वे सुग्रीवस्तमुवाच ह ॥ २३ ॥

राक्षस विभीषणको इस प्रकार सान्त्वना और आश्वासन देकर सुग्रीवने अपने बगलमें खड़े हुए श्वशुर सुषेणसे कहा—॥ २३ ॥

> सह शूरैर्हरिगणैर्लब्धसंज्ञावरिंदमौ ।  
> गच्छ त्वं भ्रातरौ गृह्य किष्किन्धां रामलक्ष्मणौ ॥ २४ ॥

‘आप होशमें आ जानेपर इन दोनों शत्रुदमन श्रीराम और लक्ष्मणको साथ ले शूरवीर वानरगणोंके साथ किष्किन्धाको चले जाइये ॥ २४ ॥

> अहं तु रावणं हत्वा सपुत्रं सहबान्धवम् ।  
> मैथिलीमानयिष्यामि शक्रो नष्टामिव श्रियम् ॥ २५ ॥

‘मैं रावणको पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर उसके हाथसे मिथिलेशकुमारी सीताको उसी प्रकार छीन लाऊँगा, जैसे देवराज इन्द्र अपनी खोयी हुई राजलक्ष्मीको दैत्योंके यहाँसे हर लाये थे’ ॥ २५ ॥

> श्रुत्वैतद् वानरेन्द्रस्य सुषेणो वाक्यमब्रवीत् ।  
> देवासुरं महायुद्धमनुभूतं पुरातनम् ॥ २६ ॥

वानरराज सुग्रीवकी यह बात सुनकर सुषेणने कहा—— ‘पूर्वकालमें जो देवासुर-महायुद्ध हुआ था, उसे हमने देखा था ॥ २६ ॥

> तदा स्म दानवा देवान् शरसंस्पर्शकोविदान् ।  
> निजघ्नुः शस्त्रविदुषश्छादयन्तो मुहुर्मुहुः ॥ २७ ॥

‘उस समय अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता तथा लक्ष्यवेधमें कुशल देवताओंको बारंबार बाणोंसे आच्छादित करते हुए दानवोंने बहुत घायल कर दिया था ॥ २७ ॥

> तानार्तान् नष्टसंज्ञांश्च गतासूंश्च बृहस्पतिः ।  
> विद्याभिर्मन्त्रयुक्ताभिरोषधीभिश्चिकित्सति ॥ २८ ॥

‘उस युद्धमें जो देवता अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित, अचेत और प्राणशून्य हो जाते थे, उन सबकी रक्षाके लिये बृहस्पतिजी मन्त्रयुक्त विद्याओं तथा दिव्य ओषधियोंद्वारा उनकी चिकित्सा करते थे ॥ २८ ॥

> तान्यौषधान्यानयितुं क्षीरोदं यान्तु सागरम् ।  
> जवेन वानराः शीघ्रं सम्पातिपनसादयः ॥ २९ ॥

‘मेरी राय है कि उन ओषधियोंको ले आनेके लिये सम्पाति और पनस आदि वानर शीघ्र ही वेगपूर्वक क्षीरसागरके तटपर जायँ ॥ २९ ॥

> हरयस्तु विजानन्ति पार्वती ते महौषधी ।  
> संजीवकरणीं दिव्यां विशल्यां देवनिर्मिताम् ॥ ३० ॥

‘सम्पाति आदि वानर वहाँ पर्वतपर प्रतिष्ठित हुई दो प्रसिद्ध महौषधियोंको जानते हैं । उनमेंसे एकका नाम है संजीवकरणी और दूसरीका नाम है विशल्यकरणी । इन दोनों दिव्य ओषधियोंका निर्माण साक्षात् ब्रह्माजीने किया है ॥३०॥

> चन्द्रश्च नाम द्रोणश्च क्षीरोदे सागरोत्तमे ।  
> अमृतं यत्र मथितं तत्र ते परमौषधी ॥ ३१ ॥  
> तौ तत्र विहितौ देवैः पर्वतौ तौ महोदधौ ।  
> अयं वायुसुतो राजन् हनूमांस्तत्र गच्छतु ॥ ३२ ॥

‘सागरोंमें उत्तम क्षीरसमुद्रके तटपर चन्द्र और द्रोण नामक दो पर्वत हैं, जहाँ पूर्वकालमें अमृतका मन्थन किया गया था । उन्हीं दोनों पर्वतोंपर वे श्रेष्ठ ओषधियाँ वर्तमान हैं । महासागरमें देवताओंने ही उन दोनों पर्वतोंको प्रतिष्ठित किया था । राजन् ! ये वायुपुत्र हनुमान् उन दिव्य ओषधियोंको लानेके लिये वहाँ जायँ’ ॥ ३१-३२ ॥

> एतस्मिन्नन्तरे वायुर्मेघाश्चापि सविद्युतः ।  
> पर्यस्य सागरे तोयं कम्पयन्निव पर्वतान् ॥ ३३ ॥

ओषधियोंको लानेकी वार्ता वहाँ चल ही रही थी कि बड़े जोरसे वायु प्रकट हुई, मेघोंकी घटा घिर आयी और बिजलियाँ चमकने लगीं । वह वायु सागरके जलमें हलचल मचाकर पर्वतोंको कम्पित-सी करने लगी ॥ ३३ ॥

> महता पक्षवातेन सर्वद्वीपमहाद्रुमाः ।  
> निपेतुर्भग्नविटपाः सलिले लवणाम्भसि ॥ ३४ ॥

गरुड़के पंखसे उठी हुई प्रचण्ड वायुने सम्पूर्ण द्वीपके बड़े-बड़े वृक्षोंकी डालियाँ तोड़ डालीं और उन्हें लवणसमुद्रके जलमें गिरा दिया ॥ ३४ ॥

> अभवन् पन्नगास्त्रस्ता भोगिनस्तत्रवासिनः ।  
> शीघ्रं सर्वाणि यादांसि जग्मुश्च लवणार्णवम् ॥ ३५ ॥

लङ्कावासी महाकाय सर्प भयसे थर्रा उठे । सम्पूर्ण जल-जन्तु शीघ्रतापूर्वक समुद्रके जलमें घुस गये ॥ ३५ ॥

> ततो मुहूर्ताद् गरुडं वैनतेयं महाबलम् ।  
> वानरा दद्दशुः सर्वे ज्वलन्तमिव पावकम् ॥ ३६ ॥

तदनन्तर दो ही घड़ीमें समस्त वानरोंने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी महाबली विनतानन्दन गरुडको वहाँ उपस्थित देखा ॥ ३६ ॥

> तमागतमभिप्रेक्ष्य नागास्ते विप्रदुद्रुवुः ।  
> यैस्तु तौ पुरुषौ बद्धौ शरभूतैर्महाबलैः ॥ ३७ ॥

उन्हें आया देख जिन महाबली नागोंने बाणके रूपमें आकर उन दोनों महापुरुषोंको बाँध रक्खा था, वे सब-के-सब वहाँसे भाग खड़े हुए ॥ ३७ ॥

> ततः सुपर्णः काकुत्स्थौ स्पृष्ट्वा प्रत्यभिनन्द्य च ।  
> विममर्श च पाणिभ्यां मुखे चन्द्रसमप्रभे ॥ ३८ ॥

तत्पश्चात् गरुड़ने उन दोनों रघुवंशी बन्धुओंको स्पर्श करके अभिनन्दन किया और अपने हाथोंसे उनके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुखोंको पोंछा ॥ ३८ ॥

> वैनतेयेन संस्पृष्टास्तयोः संरुरुहुर्व्रणाः ।  
> सुवर्णे च तनू स्निग्धे तयोरार्शु बभूवतुः ॥ ३९ ॥

गरुड़जीका स्पर्श प्राप्त होते ही श्रीराम और लक्ष्मणके सारे घाव भर गये और उनके शरीर तत्काल ही सुन्दर कान्तिसे युक्त एवं स्निग्ध हो गये ॥ ३९ ॥

> तेजो वीर्यं बलं चौज उत्साहश्च महागुणाः ।  
> प्रदर्शनं च बुद्धिश्च स्मृतिश्च द्विगुणा तयोः ॥ ४० ॥

उनमें तेज, वीर्य, बल, ओज, उत्साह, दृष्टिशक्ति, बुद्धि और स्मरणशक्ति आदि महान् गुण पहलेसे भी दुगुने हो गये ॥ ४० ॥

> तावुत्थाप्य महातेजा गरुडो वासवोपमौ ।  
> उभौ च सस्वजे हृष्टो रामश्चैनमुवाच ह ॥ ४१ ॥

फिर महातेजस्वी गरुड़ने उन दोनों भाइयोंको, जो साक्षात् इन्द्रके समान थे, उठाकर हृदयसे लगा लिया । तब श्रीरामजीने प्रसन्न होकर उनसे कहा—॥ ४१ ॥

> भवत्प्रसादाद् व्यसनं रावणिप्रभवं महत् ।  
> उपायेन व्यतिक्रान्तौ शीघ्रं च बलिनौ कृतौ ॥ ४२ ॥

‘इन्द्रजित्के कारण हमलोगोंपर जो महान् संकट आ गया था, उसे हम आपकी कृपासे लाँघ गये । आप विशिष्ट उपायके ज्ञाता हैं; अतः आपने हम दोनोंको शीघ्र ही पूर्ववत् बलसे सम्पन्न कर दिया ॥ ४२ ॥

> यथा तातं दशरथं यथाजं च पितामहम् ।  
> तथा भवन्तमासाद्य हृदयं मे प्रसीदति ॥ ४३ ॥

‘जैसे पिता दशरथ और पितामह अजके पास जानेसे मेरा मन प्रसन्न हो सकता था, वैसे ही आपको पाकर मेरा हृदय हर्षसे खिल उठा है ॥ ४३ ॥

> को भवान् रूपसम्पन्नो दिव्यस्रगनुलेपनः ।  
> वसानो विरजे वस्त्रे दिव्याभरणभूषितः ॥ ४४ ॥

‘आप बड़े रूपवान् हैं, दिव्य पुष्पोंकी माला और दिव्य अङ्गरागसे विभूषित हैं । आपने दो स्वच्छ वस्त्र धारण कर रक्खे हैं तथा दिव्य आभूषण आपकी शोभा बढ़ाते हैं । हम जानना चाहते हैं कि आप कौन हैं ?’ ( सर्वज्ञ होते हुए भी भगवान्ने मानवभावका आश्रय लेकर गरुड़से ऐसा प्रश्न किया ) ॥ ४४ ॥

> तमुवाच महातेजा वैनतेयो महाबलः ।  
> पतत्रिराजः प्रीतात्मा हर्षपर्याकुलेक्षणम् ॥ ४५ ॥

तब महातेजस्वी महाबली पक्षिराज विनतानन्दन गरुड़ने मन-ही-मन प्रसन्न हो आनन्दके आँसुओंसे भरे हुए नेत्रवाले श्रीरामसे कहा—॥ ४५ ॥

> अहं सखा ते काकुत्स्थ प्रियः प्राणो बहिश्चरः ।  
> गरुत्मानिह सम्प्राप्तो युवयोः साह्यकारणात् ॥ ४६ ॥

‘काकुत्स्थ ! मैं आपका प्रिय मित्र गरुड़ हूँ । बाहर विचरनेवाला आपका प्राण हूँ । आप दोनोंकी सहायताके लिये ही मैं इस समय यहाँ आया हूँ ॥ ४६ ॥

> असुरा वा महावीर्या दानवा वा महाबलाः ।  
> सुराश्चापि सगन्धर्वाः पुरस्कृत्य शतक्रतुम् ॥ ४७ ॥  
> नेमं मोक्षयितुं शक्ताः शरबन्धं सुदारुणम् ।

‘महापराक्रमी असुर, महाबली दानव, देवता तथा गन्धर्व भी यदि इन्द्रको आगे करके यहाँ आते तो वे भी इस भयंकर सर्पाकार बाणके बन्धनसे आपको छुड़ानेमें समर्थ नहीं हो सकते थे ॥ ४७½ ॥

> मायाबलादिन्द्रजिता निर्मितं क्रूरकर्मणा ॥ ४८ ॥  
> एते नागाः काद्रवेयास्तीक्ष्णदंष्ट्रा विषोल्बणाः ।  
> रक्षोमायाप्रभावेण शरभूतास्त्वदाश्रयाः ॥ ४९ ॥

‘क्रूरकर्मा इन्द्रजित्ने मायाके बलसे जिन नागरूपी बाणोंका बन्धन तैयार किया था; वे नाग ये कद्रूके पुत्र ही थे । इनके दाँत बड़े तीखे होते हैं । इन नागोंका विष बड़ा भयंकर होता है । ये राक्षसकी मायाके प्रभावसे बाण बनकर आपके शरीरमें लिपट गये थे ॥ ४८-४९ ॥

> सभाग्यश्चासि धर्मज्ञ राम सत्यपराक्रम ।  
> लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा समरे रिपुघातिना ॥ ५० ॥

‘धर्मके ज्ञाता सत्यपराक्रमी श्रीराम ! समराङ्गणमें शत्रुओंका संहार करनेवाले अपने भाई लक्ष्मणके साथ ही आप बड़े सौभाग्यशाली हैं ( जो अनायास ही इस नागपाशसे मुक्त हो गये ) ॥ ५० ॥

> इमं श्रुत्वा तु वृत्तान्तं त्वरमाणोऽहमागतः ।  
> सहसैवाप्ययोः स्नेहात् सखित्वमनुपालयन् ॥ ५१ ॥

‘मैं देवताओंके मुखसे आपलोगोंके नागपाशमें बँधनेका समाचार सुनकर बड़ी उतावलीके साथ यहाँ आया हूँ । हम दोनोंमें जो स्नेह है, उससे प्रेरित हो मित्रधर्मका पालन करता हुआ सहसा आ पहुँचा हूँ ॥ ५१ ॥

> मोक्षितौ च महाघोरादस्मात् सायकबन्धनात् ।  
> अप्रमादश्च कर्तव्यो युवाभ्यां नित्यमेव हि ॥ ५२ ॥

‘आकर मैंने इस महाभयंकर बाण-बन्धनसे आप दोनोंको छुड़ा दिया । अब आपको सदा ही सावधान रहना चाहिये ॥ ५२ ॥

> प्रकृत्या राक्षसाः सर्वे संग्रामे कूटयोधिनः ।  
> शूराणां शुद्धभावानां भवतामार्जवं बलम् ॥ ५३ ॥

‘समस्त राक्षस स्वभावसे ही संग्राममें कपटपूर्वक युद्ध करनेवाले होते हैं, परंतु शुद्धभाववाले आप-जैसे शूरवीरोंका सरलता ही बल है ॥ ५३ ॥

> तन्न विश्वसनीयं वो राक्षसानां रणाजिरे ।  
> एतेनैवोपमानेन नित्यं जिह्मा हि राक्षसाः ॥ ५४ ॥

‘इसलिये इसी दृष्टान्तको सामने रखकर आपको रणक्षेत्रमें राक्षसोंका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि राक्षस सदा ही कुटिल होते हैं’ ॥ ५४ ॥

> एवमुक्त्वा तदा रामं सुपर्णः स महाबलः ।  
> परिष्वज्य च सुस्निग्धमाप्रष्टुमुपचक्रमे ॥ ५५ ॥

ऐसा कहकर महाबली गरुड़ने उस समय परम स्नेही श्रीरामको हृदयसे लगाकर उनसे जानेकी आज्ञा लेनेका विचार किया ॥ ५५ ॥

> सखे राघव धर्मज्ञ रिपूणामपि वत्सल ।  
> अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि गमिष्यामि यथासुखम् ॥ ५६ ॥

वे बोले—‘शत्रुओंपर भी दया दिखानेवाले धर्मज्ञ मित्र रघुनन्दन ! अब मैं सुखपूर्वक यहाँसे प्रस्थान करूँगा । इसके लिये आपकी आज्ञा चाहता हूँ ॥ ५६ ॥

> न च कौतूहलं कार्यं सखित्वं प्रति राघव ।  
> कृतकर्मा रणे वीर सखित्वं प्रतिवेत्स्यसि ॥ ५७ ॥

‘वीर रघुनन्दन ! मैंने जो अपनेको आपका सखा बताया है, इसके विषयमें आपको अपने मनमें कोई कौतूहल नहीं रखना चाहिये । आप युद्धमें सफलता प्राप्त कर लेनेपर मेरे इस सख्यभावको स्वयं समझ लेंगे ॥ ५७ ॥

> बालवृद्धावशेषां तु लङ्कां कृत्वा शरोर्मिभिः ।  
> रावणं तु रिपुं हत्वा सीतां त्वमुपलप्स्यसे ॥ ५८ ॥

‘आप समुद्रकी लहरोंके समान अपने बाणोंकी परम्परासे लङ्काकी ऐसी दशा कर देंगे कि यहाँ केवल बालक और बूढ़े ही शेष रह जायँगे । इस तरह अपने शत्रु रावणका संहार करके आप सीताको अवश्य प्राप्त कर लेंगे’ ॥ ५८ ॥

> इत्येवमुक्त्वा वचनं सुपर्णः शीघ्रविक्रमः ।  
> रामं च नीरुजं कृत्वा मध्ये तेषां वनौकसाम् ॥ ५९ ॥  
> प्रदक्षिणं ततः कृत्वा परिष्वज्य च वीर्यवान् ।  
> जगामाकाशमाविश्य सुपर्णः पवनो यथा ॥ ६० ॥

ऐसी बातें कहकर शीघ्रगामी एवं शक्तिशाली गरुड़ने श्रीरामको नीरोग करके उन वानरोंके बीचमें उनकी परिक्रमा की और उन्हें हृदयसे लगाकर वे वायुके समान गतिसे आकाशमें चले गये ॥ ५९-६० ॥

> नीरुजौ राघवौ दृष्ट्वा ततो वानरयूथपाः ।  
> सिंहनादं तदा नेदुर्लाङ्गूलं दुधुवुश्च ते ॥ ६१ ॥

श्रीराम और लक्ष्मणको नीरोग हुआ देख उस समय सारे वानर-यूथपति सिंहनाद करने और पूँछ हिलाने लगे ॥ ६१ ॥

> ततो भेरीः समाजघ्नुर्मृदङ्गांश्चाप्यवादयन् ।  
> दध्मुः शङ्खान् सम्प्रहृष्टाः क्ष्वेलन्त्यपि यथापुरम् ॥ ६२ ॥

फिर तो वानरोंने डंके पीटे, मृदंग बजाये, शङ्खनाद किये और हर्षोल्लाससे भरकर पहलेकी भाँति वे गर्जने और ताल ठोंकने लगे ॥ ६२ ॥

> अपरे स्फोट्य विक्रान्ता वानरा नगयोधिनः ।  
> द्रुमानुत्पाट्य विविधांस्तस्थुः शतसहस्रशः ॥ ६३ ॥

दूसरे पराक्रमी वानर जो वृक्षों और पर्वत-शिखरोंको हाथमें लेकर युद्ध करते थे, नाना प्रकारके वृक्ष उखाड़कर लाखोंकी संख्यामें युद्धके लिये खड़े हो गये ॥ ६३ ॥

> विसृजन्तो महानादांस्त्रासयन्तो निशाचरान् ।  
> लङ्काद्वाराण्युपाजग्मुर्योद्धुकामाः प्लवंगमाः ॥ ६४ ॥  
> तेषां सुभीमस्तुमुलो निनादो  
> बभूव शाखामृगयूथपानाम् ।  
> क्षये निदाघस्य यथा घनानां  
> नादः सुभीमो नदतां निशीथे ॥ ६५ ॥

जोर-जोरसे गर्जते और निशाचरोंको डराते हुए सारे वानर युद्धकी इच्छासे लङ्काके दरवाजोंपर आकर डट गये ॥ उस समय उन वानरयूथपतियोंका बड़ा भयंकर एवं तुमुल सिंहनाद सब ओर गूँजने लगा, मानो ग्रीष्म ऋतुके अन्तमें आधी रातके समय गर्जते हुए मेघोंकी गम्भीर गर्जना सब ओर व्याप्त हो रही हो ॥ ६५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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