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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 38"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 38

> स तु कृत्वा सुवेलस्य मतिमारोहणं प्रति ।  
> लक्ष्मणानुगतो रामः सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥  
> विभीषणं च धर्मज्ञमनुरक्तं निशाचरम् ।  
> मन्त्रज्ञं च विधिज्ञं च श्लक्ष्णया परया गिरा ॥ २ ॥

सुवेल पर्वतपर चढ़नेका विचार करके जिनके पीछे लक्ष्मणजी चल रहे थे, वे भगवान् श्रीराम सुग्रीवसे और धर्मके ज्ञाता, मन्त्रवेत्ता, विधिज्ञ एवं अनुरागी निशाचर विभीषणसे भी उत्तम एवं मधुर वाणीमें बोले—॥ १-२ ॥

> सुवेलं साधु शैलेन्द्रमिमं धातुशतैश्चितम् ।  
> अध्यारोहामहे सर्वे वत्स्यामोऽत्र निशामिमाम् ॥ ३ ॥

‘मित्रो ! यह पर्वतराज सुवेल सैकड़ों धातुओंसे भलीभाँति भरा हुआ है । हम सब लोग इसपर चढ़ें और आजकी इस रातमें यहीं निवास करें ॥ ३ ॥

> लङ्कां चालोकयिष्यामो निलयं तस्य रक्षसः ।  
> येन मे मरणान्ताय हृता भार्या दुरात्मना ॥ ४ ॥

‘यहाँसे हमलोग उस राक्षसकी निवासभूत लङ्कापुरीका भी अवलोकन करेंगे, जिस दुरात्माने अपनी मृत्युके लिये ही मेरी भार्याका अपहरण किया है ॥ ४ ॥

> येन धर्मो न विज्ञातो न वृत्तं न कुलं तथा ।  
> राक्षस्या नीचया बुद्ध्या येन तद् गर्हितं कृतम् ॥ ५ ॥

‘जिसने न तो धर्मको जाना है, न सदाचारको ही कुछ समझा है और न कुलका ही विचार किया है; केवल राक्ष-सोचित नीच बुद्धिके कारण ही वह निन्दित कर्म किया है ॥५॥

> तस्मिन् मे वर्तते रोषः कीर्तिते राक्षसाधमे ।  
> यस्यापराधार्चीचस्य वधं द्रक्ष्यामि रक्षसाम् ॥ ६ ॥

‘उस नीच राक्षसका नाम लेते ही उसपर मेरा रोष जाग उठता है । केवल उसी अधम निशाचरके अपराधसे मैं समस्त राक्षसोंका वध देखूँगा ॥ ६ ॥

> एको हि कुरुते पापं कालपाशवशं गतः ।  
> नीचेनात्मापचारेण कुलं तेन विनश्यति ॥ ७ ॥

‘कालके पाशमें बँधा हुआ एक ही पुरुष पाप करता है, किंतु उस नीचके अपने ही दोषसे सारा कुल नष्ट हो जाता है’ ॥ ७ ॥

> एवं सम्मन्त्रयन्नेव सक्रोधो रावणं प्रति ।  
> रामः सुवेलं वासाय चित्रसानुमुपारुहत् ॥ ८ ॥

इस प्रकार चिन्तन करते हुए ही श्रीराम रावणके प्रति कुपित हो विचित्र शिखरवाले सुवेल पर्वतपर निवास करनेके लिये चढ़ गये ॥ ८ ॥

> पृष्ठतो लक्ष्मणश्चैनमन्वगच्छत् समाहितः ।  
> सशरं चापमुद्यम्य सुमहद्विक्रमे रतः ॥ ९ ॥

उनके पीछे लक्ष्मण भी महान् पराक्रममें तत्पर एवं एकाग्रचित्त हो धनुष-बाण लिये हुए उस पर्वतपर आरूढ़ हो गये ॥ ९ ॥

> तमन्वारोहत् सुग्रीवः सामात्यः सविभीषणः ।  
> हनुमानङ्गदो नीलो मैन्दो द्विविद एव च ॥ १० ॥  
> गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः ।  
> पनसः कुमुदश्चैव हरो रम्भश्च यूथपः ॥११॥  
> जाम्बवांश्च सुषेणश्च ऋषभश्च महामतिः ।  
> दुर्मुखश्च महातेजास्तथा शतवलिः कपिः ॥ १२ ॥  
> एते चान्ये च बहवो वानराः शीघ्रगामिनः ।  
> ते वायुवेगप्रवणास्तं गिरिं गिरिचारिणः ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् सुग्रीव, मन्त्रियोंसहित विभीषण, हनुमान्, अङ्गद, नील, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, पनस, कुमुद, हर, यूथपति रम्भ, जाम्बवान्, सुषेण, महामति ऋषभ, महातेजस्वी दुर्मुख तथा कपिवर शतवलि—ये और दूसरे भी बहुत-से शीघ्रगामी वानर जो वायुके समान वेगसे चलनेवाले तथा पर्वतोंपर ही विचरनेवाले थे, उस सुवेलगिरिपर चढ़ गये ॥१०—१३ ॥

> अध्यारोहन्त शतशः सुवेलं यत्र राघवः ।  
> ते त्वद्र्दीर्घेण कालेन गिरिमारुह्य सर्वतः ॥ १४ ॥

सुवेल पर्वतपर जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे, वे सैकड़ों वानर थोड़ी ही देरमें चढ़ गये और चढ़कर सब ओर विचरने लगे ॥ १४ ॥

> ददृशुः शिखरे तस्य विषक्तामिव खे पुरीम् ।  
> तां शुभां प्रवरद्वारां प्राकारवरशोभिताम् ॥ १५ ।  
> लङ्कां राक्षससम्पूर्णां ददृशुर्हरियूथपाः ।

उन वानर-यूथपतियोंने सुवेलपर्वतके शिखरपर खड़े हो उस सुन्दर लङ्कापुरीका निरीक्षण किया, जो आकाशमें ही बनी हुई-सी जान पड़ती थी । उसके फाटक बड़े मनोहर थे । उत्तम परकोटे उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे तथा वह पुरी राक्षसोंसे भरी-पूरी थी ॥ १५½ ॥

> प्राकारवरसंस्थैश्च तथा नीलैश्च राक्षसैः ॥ १६ ॥  
> ददृशुस्ते हरिश्रेष्ठाः प्राकारमपरं कृतम् ॥ १७ ॥

उत्तम परकोटोंपर खड़े हुए नीलवर्णके राक्षस ऐसे जान पड़ते थे, मानो उन परकोटोंपर दूसरा परकोटा बना दिया गया हो । उन श्रेष्ठ वानरोंने वह सब कुछ देखा ॥ १६-१७ ॥

> ते दृष्ट्वा वानराः सर्वे राक्षसान् युद्धकाङ्क्षिणः ।  
> मुमुचुर्विविधान् नादांस्तस्य रामस्य पश्यतः ॥ १८ ॥  
> ततोऽस्तमगमत् सूर्यः संध्यया प्रतिरञ्जितः ।  
> पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता च क्षपा समतिवर्तत ॥ १९ ॥

युद्धकी इच्छा रखनेवाले राक्षसोंको देखकर वे सब वानर श्रीरामके देखते-देखते नाना प्रकारसे सिंहनाद करने लगे ॥ तदनन्तर संध्याकी लालीसे रँगे हुए सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और पूर्णचन्द्रमासे प्रकाशित उजेली रात वहाँ सब ओर छा गयी ॥ १९ ॥

> ततः स रामो हरिवाहिनीपति-  
> र्विभीषणेन प्रतिनन्द्य सत्कृतः ।  
> सलक्ष्मणो यूथपयूथसंयुतः  
> सुवेलपृष्ठे न्यवसद् यथासुखम् ॥२०॥

तत्पश्चात् विभीषणद्वारा सादर सम्मानित हो वानरसेनाके स्वामी श्रीरामने अपने भाई लक्ष्मण और यूथपतियोंके समुदायके साथ सुवेलपर्वतके पृष्ठभागपर सुखपूर्वक निवास किया ।२०।

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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