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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 34"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 34

> अथ तां जातसंतापां तेन वाक्येन मोहिताम् ।  
> सरमा ह्लादयामास महीं दग्धामिवाम्भसा ॥ १ ॥

रावणके पूर्वोक्त वचनसे मोहित एवं संतप्त हुई सीताको सरमाने अपनी वाणीद्वारा उसी प्रकार आह्लाद प्रदान किया, जैसे ग्रीष्मऋतुके तापसे दग्ध हुई पृथ्वीको वर्षाकालकी मेघमाला अपने जलसे आह्लादित कर देती है ॥ १ ॥

> ततस्तस्या हितं सख्याश्चिकीर्षन्ती सखी वचः ।  
> उवाच काले कालज्ञा स्मितपूर्वाभिभाषिणी ॥ २ ॥

तदनन्तर समयको पहचानने और मुसकराकर बात करनेवाली सखी सरमा अपनी प्रिय सखी सीताका हित करनेकी इच्छा रखकर यह समयोचित वचन बोली—॥ २ ॥

> उत्सहेयमहं गत्वा त्वद्वाक्यमसितेक्षणे ।  
> निवेद्य कुशलं रामे प्रतिच्छन्ना निवर्तितुम् ॥ ३ ॥

‘कजरारे नेत्रोंवाली सखी ! मुझमें यह साहस और उत्साह है कि मैं श्रीरामके पास जाकर तुम्हारा संदेश और कुशल-समाचार निवेदन कर दूँ और फिर छिपी हुई वहाँसे लौट आऊँ ॥ ३ ॥

> नहि मे क्रममाणाया निरालम्बे विहायसि ।  
> समर्थो गतिमन्वेतुं पवनो गरुडोऽपि वा ॥ ४ ॥

‘निराधार आकाशमें तीव्र वेगसे जाती हुई मेरी गतिका अनुसरण करनेमें वायु अथवा गरुड़ भी समर्थ नहीं हैं’ ॥४॥

> एवं ब्रुवाणां तां सीता सरमामिदमब्रवीत् ।  
> मधुरं श्लक्ष्णया वाचा पूर्वशोकाभिपन्नया ॥ ५ ॥

ऐसी बात कहती हुई सरमासे सीताने उस स्नेहभरी मधुर वाणीद्वारा जो पहले शोकसे व्याप्त थी, इस प्रकार कहा—॥ ५ ॥

> समर्था गगनं गन्तुमपि च त्वं रसातलम् ।  
> अवगच्छाद्य कर्तव्यं कर्तव्यं ते मदन्तरे ॥ ६ ॥

‘सरमे ! तुम आकाश और पाताल सभी जगह जानेमें समर्थ हो । मेरे लिये जो कर्तव्य तुम्हें करना है, उसे अब बता रही हूँ, सुनो और समझो ॥ ६ ॥

> मत्प्रियं यदि कर्तव्यं यदि बुद्धिः स्थिरा तव ।  
> ज्ञातुमिच्छामि तं गत्वा किं करोतीति रावणः ॥ ७ ॥

‘यदि तुम्हें मेरा प्रिय कार्य करना है और यदि इस विषयमें तुम्हारी बुद्धि स्थिर है तो मैं यह जानना चाहती हूँ कि रावण यहाँसे जाकर क्या कर रहा है ? ॥ ७ ॥

> स हि मायाबलः क्रूरो रावणः शत्रुरावणः ।  
> मां मोहयति दुष्टात्मा पीतमात्रेव वारुणी ॥ ८ ॥

‘शत्रुओंको रुलानेवाला रावण मायाबलसे सम्पन्न है । वह दुष्टात्मा मुझे उसी प्रकार मोहित कर रहा है, जैसे वारुणी अधिक मात्रामें पी लेनेपर वह पीनेवालेको मोहित ( अचेत ) कर देती है ॥ ८ ॥

> तर्जापयति मां नित्यं भर्त्सापयति चासकृत् ।  
> राक्षसीभिः सुघोराभिर्यों मां रक्षति नित्यशः ॥ ९ ॥

‘वह राक्षस अत्यन्त भयानक राक्षसियोंद्वारा प्रतिदिन मुझे डाँट बताता है, धमकाता है और सदा मेरी रखवाली करता है ॥ ९ ॥

> उद्विग्ना शङ्किता चास्मि न स्वस्थं च मनो मम ।  
> तद्भयाच्चाहमुद्विग्ना अशोकवनिकां गता ॥ १० ॥

‘मैं सदा उससे उद्विग्न और शङ्कित रहती हूँ । मेरा चित्त स्वस्थ नहीं हो पाता । मैं उसीके भयसे व्याकुल होकर अशोकवाटिकामें चली आयी थी ॥ १० ॥

> यदि नाम कथा तस्य निश्चितं वापि यद् भवेत् ।  
> निवेदयेथाः सर्वं तद् वरो मे स्यादनुग्रहः ॥ ११ ॥

‘यदि मन्त्रियोंके साथ उसकी बातचीत चल रही है तो वहाँ जो कुछ निश्चय हो अथवा रावणका जो निश्चित विचार हो, वह सब मुझे बताती रहो । यह मुझपर तुम्हारी बहुत बड़ी कृपा होगी’ ॥ ११ ॥

> साप्येवं ब्रुवतीं सीतां सरमा मृदुभाषिणी ।  
> उवाच वदनं तस्याः स्पृशन्ती वाष्पविक्लवम् ॥ १२ ॥

ऐसी बातें कहती हुई सीतासे मधुरभाषिणी सरमाने उनके आँसुओंसे भीगे हुए मुखमण्डलको हाथसे पोंछते हुए इस प्रकार कहा—॥ १२ ॥

> एष ते यद्यभिप्रायस्तस्माद् गच्छामि जानकि ।  
> गृह्य शत्रोरभिप्रायमुपावर्तामि मैथिलि ॥ १३ ॥

‘मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनि ! यदि तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं जाती हूँ और शत्रुके अभिप्रायको जानकर अभी लौटती हूँ’ ॥ १३ ॥

> एवमुक्त्वा ततो गत्वा समीपं तस्य रक्षसः ।  
> शुश्राव कथितं तस्य रावणस्य समन्त्रिणः ॥ १४ ॥

ऐसा कहकर सरमाने उस राक्षसके समीप जाकर मन्त्रियोंसहित रावणकी कही हुई सारी बातें सुनीं ॥ १४ ॥

> सा श्रुत्वा निश्चयं तस्य निश्चयज्ञा दुरात्मनः ।  
> पुनरेवागमत् क्षिप्रमशोकवनिकां शुभाम् ॥ १५ ॥

उस दुरात्माके निश्चयको सुनकर उसने अच्छी तरह समझ लिया और फिर वह शीघ्र ही सुन्दर अशोकवाटिकामें लौट आयी ॥ १५ ॥

> सा प्रविष्टा ततस्तत्र ददर्श जनकात्मजाम् ।  
> प्रतीक्षमाणां स्वामेव भ्रष्टपद्मामिव श्रियम् ॥ १६ ॥

वहाँ प्रवेश करके उसने अपनी ही प्रतीक्षामें बैठी हुई जनककिशोरीको देखा, जो उस लक्ष्मीके समान जान पड़ती थीं, जिसके हाथका कमल कहीं गिर गया हो ॥ १६ ॥

> तां तु सीता पुनः प्राप्तां सरमां प्रियभाषिणीम् ।  
> परिष्वज्य च सुस्निग्धं ददौ च स्वयमासनम् ॥ १७ ॥

फिर लौटकर आयी हुई प्रियभाषिणी सरमाको बड़े स्नेहसे गले लगाकर सीताने स्वयं उसे बैठनेके लिये आसन दिया और कहा—॥ १७ ॥

> इहासीना सुखं सर्वमाख्याहि मम तत्त्वतः ।  
> क्रूरस्य निश्चयं तस्य रावणस्य दुरात्मनः ॥ १८ ॥  
> एवमुक्ता तु सरमा सीतया वेपमानया ।  
> कथितं सर्वमाचष्ट रावणस्य समन्त्रिणः ॥ १९ ॥

‘सखी ! यहाँ सुखसे बैठकर सारी बातें ठीक-ठीक बताओ । उस क्रूर एवं दुरात्मा रावणने क्या निश्चय किया’ ॥ काँपती हुई सीताके इस प्रकार पूछनेपर सरमाने मन्त्रियोंसहित रावणकी कही हुई सारी बातें बतायीं—॥ १९ ॥

> जनन्या राक्षसेन्द्रो वै त्वन्मोक्षार्थं बृहद्वचः ।  
> अतिस्निग्धेन वैदेहि मन्त्रिवृद्धेन चोदितः ॥ २० ॥

‘विदेहनन्दिनि ! राक्षसराज रावणकी माताने तथा रावणके प्रति अत्यन्त स्नेह रखनेवाले एक बूढ़े मन्त्रीने भी बड़ी-बड़ी बातें कहकर तुम्हें छोड़ देनेके लिये रावणको प्रेरित किया ॥ २० ॥

> दीयतामभिसत्कृत्य मनुजेन्द्राय मैथिली ।  
> निदर्शनं ते पर्याप्तं जनस्थाने यदद्भुतम् ॥ २१ ॥

‘राक्षसराज ! तुम महाराज श्रीरामको सत्कारपूर्वक उनकी पत्नी सीता लौटा दो । जनस्थानमें जो अद्भुत घटना घटित हुई थी, वही श्रीरामके पराक्रमको समझनेके लिये पर्याप्त प्रमाण एवं उदाहरण है ॥ २१ ॥

> लङ्घनं च समुद्रस्य दर्शनं च हनूमतः ।  
> वधं च रक्षसां युद्धे कः कुर्यान्मानुषो युधि ॥ २२ ॥

‘( उनके सेवकोंमें भी अद्भुत शक्ति है ) हनुमान्ने जो समुद्रको लाँघा,सीतासे भेंट की और युद्धमें बहुत-से राक्षसोंका वध किया—यह सब कार्य दूसरा कौन मनुष्य कर सकता है?’ ॥२२॥

> एवं स मन्त्रिवृद्धैश्च मात्रा च बहुबोधितः ।  
> न त्वामुत्सहते मोक्तुमर्थमर्थपरो यथा ॥ २३ ॥

‘इस प्रकार बूढ़े मन्त्रियों तथा माताके बहुत समझानेपर भी वह तुम्हें उसी तरह छोड़नेकी इच्छा नहीं करता है, जैसे धनका लोभी धनको त्यागना नहीं चाहता है ॥ २३ ॥

> नोत्सहत्यमृतो मोक्तुं युद्धे त्वामिति मैथिलि ।  
> सामात्यस्य नृशंसस्य निश्चयो ह्येष वर्तते ॥ २४ ॥

‘मिथिलेशकुमारी ! वह युद्धमें मरे बिना तुम्हें छोड़नेका साहस नहीं कर सकता । मन्त्रियोंसहित उस नृशंस निशाचरका यही निश्चय है ॥ २४ ॥

> तदेषा सुस्थिरा बुद्धिर्मृत्युलोभादुपस्थिता ।  
> भयान्न शक्तस्त्वां मोक्तुमनिरस्तः स संयुगे ॥ २५ ॥  
> राक्षसानां च सर्वेषामात्मनश्च वधेन हि ।

‘रावणके सिरपर काल नाच रहा है । इसलिये उसके मनमें मृत्युके प्रति लोभ पैदा हो गया है । यही कारण है कि तुम्हें न लौटानेके निश्चयपर उसकी बुद्धि सुस्थिर हो गयी है । वह जबतक युद्धमें राक्षसोंके संहार और अपने वधके द्वारा ( नष्ट ) नहीं हो जायगा; केवल भय दिखानेसे तुम्हें नहीं छोड़ सकता ॥ २५½ ॥

> निहत्य रावणं संख्ये सर्वथा निशितैः शरैः ।  
> प्रतिनेष्यति रामस्त्वामयोध्यामसितेक्षणे ॥ २६ ॥

‘कजरारे नेत्रोंवाली सीते ! इसका परिणाम यही होगा कि भगवान् श्रीराम अपने सर्वथा तीखे बाणोंसे युद्धस्थलमें रावणका वध करके तुम्हें अयोध्याको ले जायँगे’ ॥ २६ ॥

> एतस्मिन्नन्तरे शब्दो मेरीशङ्खसमाकुलः ।  
> श्रुतो वै सर्वसैन्यानां कम्पयन् धरणीतलम् ॥ २७ ॥

इसी समय भेरीनाद और शङ्खध्वनिसे मिला हुआ समस्त सैनिकोंका महान् कोलाहल सुनायी दिया, जो भूकम्प पैदा कर रहा था ॥ २७ ॥

> श्रुत्वा तु तं वानरसैन्यनादं  
> लङ्कागता राक्षसराजभृत्याः ।  
> हतौजसो दैन्यपरीतचेष्टाः  
> श्रेयो न पश्यन्ति नृपस्य दोषात् ॥ २८ ॥

वानरसैनिकोंके उस भीषण सिंहनादको सुनकर लङ्कामें रहनेवाले राक्षसराज रावणके सेवक हतोत्साह हो गये । उनकी सारी चेष्टा दीनतासे व्याप्त हो गयी । रावणके दोषसे उन्हें भी कोई कल्याणका उपाय नहीं दिखायी देता था ॥ २८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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