---
title: "युद्धकाण्ड, Sarga 26"
canonical: "https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana/yuddha-kanda/sarga-26"
lang: "hi"
---

# युद्धकाण्ड, Sarga 26

> तद्वचः सत्यमक्लीबं सारणेनाभिभाषितम् ।  
> निशम्य रावणो राजा प्रत्यभाषत सारणम् ॥ १ ॥

( शुक और) सारणके ये सच्चे और जोशीले शब्द सुनकर रावणने सारणसे कहा-- ॥ १॥

> यदि मामभियुञ्जीरन् देवगन्धर्वदानवाः ।  
> नैव सीतामहं दद्यां सर्वलोकभयादपि ॥ २ ॥

‘यदि देवता, गन्धर्व और दानव भी मुझसे युद्ध करने आ जायँ और समस्त लोक भय दिखाने लगे तो भी मैं सीताको नहीं दूँगा ॥ २ ॥

> त्वं तु सौम्य परित्रस्तो हरिभिः पीडितो भृशम् ।  
> प्रतिप्रदानमद्यैव सीतायाः साधु मन्यसे ॥ ३ ॥  
> को हि नाम सपत्नो मां समरे जेतुमर्हति ।

‘सौम्य ! जान पड़ता है कि तुम्हें बंदरोंने बहुत तंग किया है । इसीसे भयभीत होकर तुम आज ही सीताको लौटा देना ठीक समझने लगे हो । भला कौन ऐसा शत्रु है, जो समराङ्गणमें मुझे जीत सके’ ॥ ३½ ॥

> इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः ॥ ४ ॥  
> आरुरोह ततः श्रीमान् प्रासादं हिमपाण्डुरम् ।  
> बहुतालसमुत्सेधं रावणोऽथ दिदृक्षया ॥ ५ ॥  
> ताभ्यां चराभ्यां सहितो रावणः क्रोधमूर्च्छितः ।  
> पश्यमानः समुद्रं तं पर्वतांश्च वनानि च ॥ ६ ॥  
> ददर्श पृथिवीदेशं सुसम्पूर्णं प्लवंगमैः ।

ऐसा कठोर वचन कहकर श्रीमान् राक्षसराज रावण वानरोंकी सेनाका निरीक्षण करनेके लिये अपनी कई ताल ऊँची और बर्फके समान श्वेत रंगकी अट्टालिकापर चढ़ गया।४-५। उस समय रावण क्रोधसे तमतमा उठा था । उसने उन दोनों गुप्तचरोंके साथ जब समुद्र, पर्वत और वनोंपर दृष्टिपात किया, तब पृथ्वीका सारा प्रदेश वानरोंसे भरा दिखायी दिया ॥ ६½ ॥

> तदपारमसह्यं च वानराणां महाबलम् ॥ ७ ॥  
> आलोक्य रावणो राजा परिपप्रच्छ सारणम् ।

वानरोंकी वह विशाल सेना अपार और असह्य थी । उसे देखकर राजा रावणने सारणसे पूछा—॥ ७½ ॥

> एषां के वानरा मुख्याः के शूराः के महाबलाः ॥ ८ ॥

‘सारण ! इन वानरोंमें कौन-कौनसे मुख्य हैं ? कौन शूरवीर हैं और कौन बलमें बहुत बढ़े-चढ़े हैं ? ॥ ८ ॥

> के पूर्वमभिवर्तन्ते महोत्साहाः समन्ततः ।  
> केषां शृणोति सुग्रीवः के वा यूथपयूथपाः ॥ ९ ॥  
> सारणाचक्ष्व मे सर्वं किंप्रभावाः प्लवंगमाः ।

‘कौन-कौनसे वानर महान् उत्साहसे सम्पन्न होकर युद्धमें आगे-आगे रहते हैं ? सुग्रीव किनकी बातें सुनते हैं और कौन यूथपतियोंके भी यूथपति हैं ? सारण ! ये सारी बातें मुझे बताओ । साथ ही यह भी कहो कि उन वानरोंका प्रभाव कैसा है ?’ ॥ ९½ ॥

> सारणो राक्षसेन्द्रस्य वचनं परिपृच्छतः ॥ १० ॥  
> आबभाषेऽथ मुख्यज्ञो मुख्यांस्तत्र वनौकसः ।

इस प्रकार पूछते हुए राक्षसराज रावणका वचन सुनकर मुख्य-मुख्य वानरोंको जाननेवाले सारणने उन मुख्य वानरोंका परिचय देते हुए कहा—॥ १०½ ॥

> एष योऽभिमुखो लङ्कां नर्दंस्तिष्ठति वानरः ॥ ११ ॥  
> यूथपानां सहस्राणां शतेन परिवारितः ।  
> यस्य घोषेण महता सप्राकारा सतोरणा ॥ १२ ॥  
> लङ्का प्रतिहता सर्वा सशैलवनकानना ।  
> सर्वशाखामृगेन्द्रस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ॥ १३ ॥  
> बलाग्रे तिष्ठते वीरो नीलो नामैष यूथपः ।

‘महाराज ! यह जो लङ्काकी ओर मुख करके खड़ा है और गरज रहा है, एक लाख यूथपोंसे घिरा हुआ है तथा जिसकी गर्जनाके अत्यन्त गम्भीर घोषसे परकोटे, दरवाजे, पर्वत और वनोंके सहित सारी लङ्का प्रतिहत हो गूँज उठी है, इसका नाम नील है। यह वीर यूथपतियोंमेंसे है। समस्त वानरोंके राजा महामना सुग्रीवकी सेनाके आगे यही खड़ा होता है ॥ ११–१३½ ॥

> बाहू प्रगृह्य यः पद्भ्यां महीं गच्छति वीर्यवान् ॥ १४ ॥  
> लङ्कामभिमुखः कोपादभीक्ष्णं च विजृम्भते ।  
> गिरिशृङ्गप्रतीकाशः पद्मकिंजल्कसंनिभः ॥ १५ ॥  
> स्फोटयत्यतिसंरब्धो लाङ्गूलं च पुनः पुनः ।  
> यस्य लाङ्गूलशब्देन स्वनन्ति प्रदिशो दश ॥ १६ ॥  
> एष वानरराजेन सुग्रीवेणाभिषेचितः ।  
> युवराजोऽङ्गदो नाम त्वामाह्वयति संयुगे ॥ १७ ॥

‘जो पराक्रमी वानर दोनों उठी हुई बाँहोंको एक दूसरी-से पकड़कर दोनों पैरोंसे पृथ्वीपर टहल रहा है, लङ्काकी ओर मुख करके क्रोधपूर्वक देखता है और बारंबार अँगड़ाई लेता है, जिसका शरीर पर्वतशिखरके समान ऊँचा है, जिसकी कान्ति कमलकेसरके समान सुनहले रंगकी है, जो रोषसे भरकर बारंबार अपनी पूँछ पटक रहा है तथा जिसकी पूँछके पटकनेकी आवाजसे दसों दिशाएँ गूँज उठती हैं, यह युवराज अङ्गद है । वानरराज सुग्रीवने इसका युवराजके पदपर अभिषेक किया है । यह अपने साथ युद्धके लिये आपको ललकारता है ॥ १४–१७ ॥

> वालिनः सदृशः पुत्रः सुग्रीवस्य सदा प्रियः ।  
> राघवार्थे पराक्रान्तः शक्रार्थे वरुणो यथा ॥ १८ ॥

‘वालीका यह पुत्र अपने पिताके समान ही बलशाली है । सुग्रीवको यह सदा ही प्रिय है। जैसे वरुण इन्द्रके लिये पराक्रम प्रकट करते हैं, उसी प्रकार यह श्रीरामचन्द्रजीके लिये अपना पुरुषार्थ प्रकट करनेके लिये उद्यत है ॥ १८ ॥

> एतस्य सा मतिः सर्वा यद् दृष्टा जनकात्मजा ।  
> हनूमता वेगवता राघवस्य हितैषिणा ॥ १९ ॥

‘श्रीरघुनाथजीका हित चाहनेवाले वेगशाली हनुमान्जीने जो यहाँ आकर जनकनन्दिनी सीताका दर्शन किया, उसके भीतर इस अङ्गदकी ही सारी बुद्धि काम कर रही थी ॥ १९ ॥

> बहूनि वानरेन्द्राणामेष यूथानि वीर्यवान् ।  
> परिगृह्याभियाति त्वां स्वेनानीकेन मर्दितुम् ॥ २० ॥

‘पराक्रमी अङ्गद वानरशिरोमणियोंके बहुत-से यूथ लिये अपनी सेनाके साथ आपको कुचल डालनेके लिये आ रहा है ॥ २० ॥

> अनुवालिसुतस्यापि बलेन महता वृतः ।  
> वीरस्तिष्ठति संग्रामे सेतुहेतुरयं नलः ॥ २१ ॥

‘अङ्गदके पीछे संग्रामभूमिमें जो वीर विशाल सेनासे घिरा हुआ खड़ा है, इसका नाम नल है । यही सेतु-निर्माणका प्रधान हेतु है ॥ २१ ॥

> ये तु विष्टभ्य गात्राणि क्ष्वेडयन्ति नदन्ति च ।  
> उत्थाय च विजृम्भन्ते क्रोधेन हरिपुङ्गवाः ॥ २२ ॥  
> एते दुष्प्रसहा घोराश्चण्डाश्चण्डपराक्रमाः ।  
> अष्टौ शतसहस्राणि दशकोटिशतानि च ।  
> य एनमनुगच्छन्ति वीराश्चन्दनवासिनः ॥ २३ ॥  
> एवैवाशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम् ।

‘जो अपने अङ्गोंको सुस्थिर करके सिंहनाद करते और गर्जते हैं तथा जो कपिश्रेष्ठ वीर अपने आसनोंसे उठकर क्रोधपूर्वक अँगड़ाई लेते हैं, इनके वेगको सह लेना अत्यन्त कठिन है । ये बड़े भयंकर, अत्यन्त क्रोधी और प्रचण्ड पराक्रमी हैं । इनकी संख्या दस अरब और आठ लाख है । ये सब वानर तथा चन्दनवनमें निवास करनेवाले वीर वानर इस यूथपति नलका ही अनुसरण करते हैं । यह नल भी अपनी सेनाद्वारा लङ्कापुरीको कुचल देनेका हौसला रखता है ॥२२-२३½॥

> श्वेतो रजतसंकाशश्चपलो भीमविक्रमः ॥ २४ ॥  
> बुद्धिमान् वानरः शूरस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।  
> तूर्णं सुग्रीवमागम्य पुनर्गच्छति वानरः ॥ २५ ॥  
> विभजन् वानरीं सेनामनीकानि प्रहर्षयन् ।

‘यह जो चाँदीके समान सफेद रंगका चञ्चल वानर दिखायी देता है, इसका नाम श्वेत है । यह भयंकर पराक्रम करनेवाला, बुद्धिमान्, शूरवीर और तीनों लोकोंमें विख्यात है। श्वेत बड़ी तेजीसे सुग्रीवके पास आकर फिर लौट जाता है । यह वानरीसेनाका विभाग करता और सैनिकोंमें हर्ष तथा उत्साह भरता है ॥ २४-२५½ ॥

> यः पुरा गोमतीतीरे रम्यं पर्येति पर्वतम् ॥ २६ ॥  
> नाम्ना संरोचनो नाम नानानगयुतो गिरिः ।  
> तत्र राज्यं प्रशास्त्येष कुमुदो नाम यूथपः ॥ २७ ॥

‘गोमतीके तटपर जो नाना प्रकारके वृक्षोंसे युक्त संरोचन नामक पर्वत है, उसी रमणीय पर्वतके चारों ओर जो पहले विचरा करता था और वहीं अपने वानरराज्यका शासन करता था, वही यह कुमुदनामक यूथपति है ॥ २६-२७ ॥

> योऽसौ शतसहस्राणि सहर्षं परिकर्षति ।  
> यस्य वाला बहुव्यामा दीर्घलाङ्गूलमाश्रिताः ॥ २८ ॥  
> ताम्राः पीताः सिताः श्वेताः प्रकीर्णा घोरदर्शनाः ।  
> अदीनो वानरश्चण्डः संग्राममभिकाङ्क्षति ।  
> एषोऽप्याशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम् ॥ २९ ॥

‘वह जो लाखों वानर सैनिकोंको सहर्ष अपने साथ खींचे लाता है, जिसकी लंबी दुममें बहुत बड़े-बड़े लाल, पीले, भूरे और सफेद रंगके वाल फैले हुए हैं और देखनेमें बड़े भयंकर हैं तथा जो कभी दीनता न दिखाकर सदा युद्धकी ही इच्छा रखता है, उस वानरका नाम चण्ड है । यह चण्ड भी अपनी सेनाद्वारा लङ्काको कुचल देनेकी इच्छा रखता है ॥ २८-२९ ॥

> यस्त्वेष सिंहसंकाशः कपिलो दीर्घकेसरः ।  
> निभृतः प्रेक्षते लङ्कां दिधक्षन्निव चक्षुषा ॥ ३० ॥  
> विन्ध्यं कृष्णगिरिं सह्यं पर्वतं च सुदर्शनम् ।  
> राजन् सततमध्यास्ते स रम्भो नाम यूथपः ।  
> शतं शतसहस्राणां त्रिंशच्च हरिपुङ्गवाः ॥ ३१ ॥  
> यं यान्तं वानरा घोराश्चण्डाश्चण्डपराक्रमाः ।  
> परिवार्यानुगच्छन्ति लङ्कां मर्दितुमोजसा ॥ ३२ ॥

‘राजन् ! जो सिंहके समान पराक्रमी और कपिल वर्णका है, जिसकी गर्दनमें लंबे-लंबे बाल हैं और जो ध्यान लगाकर लङ्काकी ओर इस प्रकार देख रहा है, मानो इसे भस्म कर देगा, वह रम्भनामक यूथपति है । वह निरन्तर विन्ध्य, कृष्ण-गिरि, सह्य और सुदर्शन आदि पर्वतोंपर रहा करता है । जब वह युद्धके लिये चलता है, उस समय उसके पीछे एक करोड़ तीस श्रेष्ठ भयंकर, अत्यन्त क्रोधी और प्रचण्ड पराक्रमी वानर चलते हैं । वे सब-के-सब अपने बलसे लङ्काको मसल डालनेके लिये रम्भको सब ओरसे घेरे हुए आ रहे हैं ॥ ३०–३२ ॥

> यस्तु कर्णौ विवृणुते जृम्भते च पुनः पुनः ।  
> न तु संविजते मृत्योर्न च सेनां प्रधावति ॥ ३३ ॥  
> प्रकम्पते च रोषेण तिर्यक् च पुनरीक्षते ।  
> पश्य लाङ्गूलविक्षेपं क्ष्वेडत्येष महाबलः ॥ ३४ ॥

‘जो कानोंको फैलाता है, बारंबार जँभाई लेता है, मृत्युसे भी नहीं डरता है और सेनाके पीछे न जाकर अर्थात् सेनाका भरोसा न करके अकेले ही युद्ध करना चाहता है, रोषसे काँप रहा है, तिरछी नजरसे देखता है और पूँछ फटकारकर सिंहनाद करता है, इसका नाम शरभ है । देखिये, यह महाबली वानर कैसी गर्जना करता है ॥३३-३४॥

> महाजवो वीतभयो रम्यं साल्वेयपर्वतम् ।  
> राजन् सततमध्यास्ते शरभो नाम यूथपः ॥ ३५ ॥

‘इसका वेग महान् है । भय तो इसे छू तक नहीं गया है । राजन् ! यह यूथपति शरभ सदा रमणीय साल्वेय पर्वतपर निवास करता है ॥ ३५ ॥

> एतस्य बलिनः सर्वे विहारा नाम यूथपाः ।  
> राजञ्छतसहस्राणि चत्वारिंशत्तथैव च ॥ ३६ ॥

‘इसके पास जो यूथपति हैं, उन सबकी ‘विहार’ संज्ञा है । वे बड़े बलवान् हैं । राजन् ! उनकी संख्या एक लाख चालीस हजार है ॥ ३६ ॥

> यस्तु मेघ इवाकारं महानावृत्य तिष्ठति ।  
> मध्ये वानरवीराणां सुराणामिव वासवः ॥ ३७ ॥  
> भेरीणामिव संनादो यस्यैष श्रूयते महान् ।  
> घोषः शाखामृगेन्द्राणां संग्राममभिकाङ्क्षताम् ॥ ३८ ॥  
> एष पर्वतमध्यास्ते पारियात्रमनुत्तमम् ।  
> युद्धे दुष्प्रसहो नित्यं पनसो नाम यूथपः ॥ ३९ ॥  
> एनं शतसहस्राणां शतार्धं पर्युपासते ।  
> यूथपा यूथपश्रेष्ठं येषां यूथानि भागशः ॥ ४० ॥

‘जो विशाल वानर मेघके समान आकाशको घेरे हुए खड़ा है तथा वानरवीरोंके बीचमें ऐसा जान पड़ता है, जैसे देवताओंमें इन्द्र हों, युद्धकी इच्छावाले वानरोंके बीचमें जिसकी गम्भीर गर्जना ऐसी सुनायी देती है, मानो बहुत-सी भेरियोंका तुमुल नाद हो रहा हो, तथा जो युद्धमें दुःसह है, वह ‘पनस’ नामसे प्रसिद्ध यूथपति है । यह पनस परम उत्तम पारियात्र पर्वतपर निवास करता है । यूथपतियोंमें श्रेष्ठ पनसकी सेवामें पचास लाख यूथपति रहते हैं, जिनके अपने-अपने यूथ अलग-अलग हैं ॥ ३७–४० ॥

> यस्तु भीमां प्रवल्गन्तीं चमूं तिष्ठति शोभयन् ।  
> स्थितां तीरे समुद्रस्य द्वितीय इव सागरः ॥ ४१ ॥  
> एष दर्दुरसंकाशो विनतो नाम यूथपः ।  
> पिबंश्चरति यो वेणां नदीनामुत्तमां नदीम् ॥ ४२ ॥  
> षष्टिः शतसहस्राणि बलमस्य प्लवंगमाः ।

‘जो समुद्रके तटपर स्थित हुई इस उछलती-कूदती भीषण सेनाको दूसरे मूर्तिमान् समुद्रकी भाँति सुशोभित करता हुआ खड़ा है, वह दर्दुर पर्वतके समान विशालकाय वानर विनत नामसे प्रसिद्ध यूथपति है । वह नदियोंमें श्रेष्ठ वेणा नदीका पानी पीता हुआ विचरता है । साठ लाख वानर उसके सैनिक हैं ॥ ४१-४२½ ॥

> त्वामाह्वयति युद्धाय क्रोधनो नाम वानरः ॥ ४३ ॥  
> विक्रान्ता बलवन्तश्च यथा यूथानि भागशः ।

‘जो युद्धके लिये सदा आपको ललकारता रहता है तथा जिसके पास बल-विक्रमशाली अनेक यूथपति रहते हैं और उन यूथपतियोंके पास पृथक्-पृथक् बहुत-से यूथ हैं, वह ‘क्रोधन’ नामसे प्रसिद्ध वानर है ॥ ४३½ ॥

> यस्तु गैरिकवर्णाभं वपुः पुष्यति वानरः ॥ ४४ ॥  
> अवमत्य सदा सर्वान् वानरान् बलदर्पितः ।  
> गवयो नाम तेजस्वी त्वां क्रोधादभिवर्तते ॥ ४५ ॥  
> एनं शतसहस्राणि सप्ततिः पर्युपासते ।  
> एषैवाशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम् ॥ ४६ ॥

‘वह जो गेरुके समान लाल रंगके शरीरका पोषण करता है, उस तेजस्वी वानरका नाम ‘गवय’ है । उसे अपने बलपर बड़ा घमंड है । वह सदा सब वानरोंका तिरस्कार किया करता है । देखिये, कितने रोषसे वह आपकी ओर बढ़ा उग रहा है । इसकी सेवामें सत्तर लाख वानर रहते हैं । यह भी अपनी सेनाके द्वारा लङ्काको धूलमें मिला देनेकी इच्छा रखता है ॥ ४४-४६ ॥

> एते दुष्प्रसहा वीरा येषां संख्या न विद्यते ।  
> यूथपा यूथपश्रेष्ठास्तेषां यूथानि भागशः ॥ ४७ ॥

‘ये सारे-के-सारे वानर दुःसह वीर हैं। इनकी गणना करना भी असम्भव है । यूथपतियोंमें श्रेष्ठ जो यूथप हैं, उन सबके अलग-अलग यूथ हैं’ ॥ ४७ ॥

Book: https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
