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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 24"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 24

> सा वीरसमिती राज्ञा विरराज व्यवस्थिता ।  
> शशिना शुभनक्षत्रा पौर्णमासीव शारदी ॥ १ ॥

सुग्रीवने उस वीर वानरसेनाकी यथोचित व्यवस्था की थी । उनके कारण वह वैसी ही शोभा पाती थी, जैसे चन्द्रमा और शुभ नक्षत्रोंसे युक्त शरत्कालकी पूर्णिमा सुशोभित हो रही हो ॥ १ ॥

> प्रचचाल च वेगेन त्रस्ता चैव वसुंधरा ।  
> पीड्यमाना बलौघेन तेन सागरवर्चसा ॥ २ ॥

वह विशाल सैन्य-समूह समुद्रके समान जान पड़ता था । उसके भारसे दबी हुई वसुधा भयभीत हो उठी और उसके वेगसे डोलने लगी ॥ २ ॥

> ततः शुश्रुवुराक्रुष्टं लङ्कायां काननौकसः ।  
> भेरीमृदङ्गसंघुष्टं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ ३ ॥

तदनन्तर वानरोंने लङ्कामें महान् कोलाहल सुना, जो भेरी और मृदङ्गके गम्भीर घोषसे मिलकर बड़ा ही भयंकर और रोमाञ्चकारी जान पड़ता था ॥ ३ ॥

> बभूवुस्तेन घोषेण संहृष्टा हरियूथपाः ।  
> अमृष्यमाणास्तद् घोषं विनेदुर्घोषवक्तरम् ॥ ४ ॥

उस तुमुलनादको सुनकर वानरयूथपति हर्ष और उत्साहमें भर गये और उसे न सह सकनेके कारण उससे भी बढ़कर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ४ ॥

> राक्षसास्तत् प्लवंगानां शुश्रुवुस्तेऽपि गर्जितम् ।  
> नर्दतामिव हृष्टानां मेघानामम्बरे स्वनम् ॥ ५ ॥

राक्षसोंने वानरोंकी वह गर्जना सुनी, जो दर्पमें भरकर सिंहनाद कर रहे थे । उनकी आवाज आकाशमें मेघोंकी गर्जनाके समान जान पड़ती थी ॥ ५ ॥

> दृष्ट्वा दाशरथिर्लङ्कां चित्रध्वजपताकिनीम् ।  
> जगाम मनसा सीतां दूयमानेन चेतसा ॥ ६ ॥

दशरथनन्दन श्रीरामने विचित्र ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित लङ्कापुरीको देखकर व्यथितचित्तसे मन-ही-मन सीताका स्मरण किया ॥ ६ ॥

> अत्र सा मृगशावाक्षी रावणेनोपरुध्यते ।  
> अभिभूता ग्रहेणेव लोहिताङ्गेन रोहिणी ॥ ७ ॥

वे भीतर-ही-भीतर कहने लगे—‘हाय ! यहीं वह मृग-लोचना सीता रावणके कैदमें पड़ी है । उसकी दशा मंगलग्रहसे आक्रान्त हुई रोहिणीके समान हो रही है’ ॥ ७ ॥

> दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य समुद्वीक्ष्य च लक्ष्मणम् ।  
> उवाच वचनं वीरस्तत्कालहितमात्मनः ॥ ८ ॥

मन-ही-मन ऐसा कहकर वीर श्रीराम गरम-गरम लंबी साँस खींचकर लक्ष्मणकी ओर देखते हुए अपने लिये समयानुकूल हितकर वचन बोले—॥ ८ ॥

> आलिखन्तीमिवाकाशमुत्थितां पश्य लक्ष्मण ।  
> मनसेव कृतां लङ्कां नगाग्रे विश्वकर्मणा ॥ ९ ॥

‘लक्ष्मण ! इस लङ्काकी ओर तो देखो । यह अपनी ऊँचाईसे आकाशमें रेखा खींचती हुई-सी जान पड़ती है । जान पड़ता है पूर्वकालमें विश्वकर्मानें अपने मनसे ही इस पर्वत-शिखरपर लङ्कापुरीका निर्माण किया है ॥ ९ ॥

> विमानैर्बहुभिर्लङ्का संकीर्णा रचिता पुरा ।  
> विष्णोः पदमिवाकाशं छादितं पाण्डुभिर्घनैः ॥ १० ॥

‘पूर्वकालमें यह पुरी अनेक सतमंजले मकानोंसे भरी-पूरी बनायी गयी थी । इसके श्वेत एवं सघन विमानाकार भवनोंसे भगवान् विष्णुके चरणस्थापनका स्थानभूत आकाश आच्छादित-सा हो गया ॥ १० ॥

> पुष्पितैः शोभिता लङ्का वनैश्चित्ररथोपमैः ।  
> नानापतगसंघुष्टफलपुष्पोपगैः शुभैः ॥ ११ ॥

‘फूलोंसे भरे हुए चैत्ररथ वनके सदृश सुन्दर काननोंसे लङ्कापुरी सुशोभित हो रही है । उन काननोंमें नाना प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे हैं तथा फलों और फूलोंकी प्राप्ति करानेके कारण वे बड़े सुन्दर जान पड़ते हैं ॥ ११ ॥

> पश्य मत्तविहंगानि प्रलीनभ्रमराणि च ।  
> कोकिलाकुलखण्डानि दोधवीति शिवोऽनिलः ॥ १२ ॥

‘देखो, यह शीतल सुखद वायु इन वनोंको, जिनमें मतवाले पक्षी चहचहा रहे हैं, भौंरे पत्तों और फूलोंमें लीन हो रहे हैं तथा जिनके प्रत्येक खण्ड कोकिलोंके समूह एवं संगीतसे व्याप्त हैं, बारंबार कम्पित कर रहा है’ ॥ १२ ॥

> इति दाशरथी रामो लक्ष्मणं समभाषत ।  
> बलं च तत्र विभजच्छास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ १३ ॥

दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामने लक्ष्मणसे ऐसा कहा और युद्धके शास्त्रीय नियमानुसार सेनाका विभाग किया ॥ १३ ॥

> शशास कपिसेनां तां बलादादाय वीर्यवान् ।  
> अङ्गदः सह नीलेन तिष्ठेदुरसि दुर्जयः ॥ १४ ॥

उस समय श्रीरामने वानरसैनिकोंको यह आदेश दिया— ‘इस विशाल सेनामेंसे अपनी सेनाको साथ लेकर दुर्जय एवं पराक्रमी वीर अङ्गद नीलके साथ वानरसेनाके पुरुषव्यूहमें हृदयके स्थानमें स्थित हों ॥ १४ ॥

> तिष्ठेद् वानरवाहिन्या वानरौघसमावृतः ।  
> आश्रितो दक्षिणं पार्श्वमृषभो नाम वानरः ॥ १५ ॥

‘इसी तरह ऋषभ नामक वानर कपियोंके समुदायसे घिरे रहकर इस वानर-वाहिनीके दाहिने पार्श्वमें खड़े रहें ॥ १५ ॥

> गन्धहस्तीव दुर्धर्षस्तरस्वी गन्धमादनः ।  
> तिष्ठेद् वानरवाहिन्याः सव्यं पार्श्वमधिष्ठितः ॥ १६ ॥

‘जो गन्धहस्तीके समान दुर्जय एवं वेगशाली हैं, वे कपिश्रेष्ठ गन्धमादन वानरसेनाके वाम पार्श्वमें खड़े हों ॥ १६ ॥

> मूर्ध्नि स्थास्याम्यहं यत्तो लक्ष्मणेन समन्वितः ।  
> जाम्बवांश्च सुषेणश्च वेगदर्शी च वानरः ॥ १७ ॥  
> ऋक्षमुख्या महात्मानः कुक्षिं रक्षन्तु ते त्रयः ।

‘मैं लक्ष्मणके साथ सावधान रहकर इस व्यूहके मस्तकके स्थानमें खड़ा होऊँगा । जाम्बवान्, सुषेण और वानर वेगदर्शी— ये तीन महामनस्वी वीर जो रीछोंकी सेनाके प्रधान हैं, वे सैन्य-व्यूहके कुक्षिभागकी रक्षा करें ॥ १७½ ॥

> जघनं कपिसेनायाः कपिराजोऽभिरक्षतु ।  
> पश्चार्धमिव लोकस्य प्रचेतास्तेजसा वृतः ॥ १८ ॥

‘वानरराज सुग्रीव वानरवाहिनीके पिछले भागकी रक्षामें उसी प्रकार लगे रहें, जैसे तेजस्वी वरुण इस जगत्की पश्चिम दिशाका संरक्षण करते हैं’ ॥ १८ ॥

> सुविभक्तमहाव्यूहा महावानररक्षिता ।  
> अनीकिनी सा विबभौ यथा चौः साभ्रसम्प्लवा ॥ १९ ॥

इस प्रकार सुन्दरतासे विभक्त हो विशाल व्यूहमें बद्ध हुई वह सेना, जिसकी बड़े-बड़े वानर रक्षा करते थे, मेघोंसे घिरे हुए आकाशके समान जान पड़ती थी ॥ १९ ॥

> प्रगृह्य गिरिशृङ्गाणि महतश्च महीरुहान् ।  
> आसेदुर्वानरा लङ्कां मिमर्दयिषवो रणे ॥ २० ॥

वानरलोग पर्वतोंके शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष लेकर युद्धके लिये लङ्कापर चढ़ आये । वे उस पुरीको पददलित करके धूलमें मिला देना चाहते थे ॥ २० ॥

> शिखरैर्विकिरामैनां लङ्कां मुष्टिभिरेव वा ।  
> इति स्म दधिरे सर्वे मनांसि हरिपुङ्गवाः ॥ २१ ॥

सभी वानरयूथपति ये ही मनसूबे बाँधते थे कि हम लङ्कापर पर्वत-शिखरोंकी वर्षा करें और लङ्कावासियोंको मुक्कोंसे मार-मारकर यमलोक पहुँचा दें ॥ २१ ॥

> ततो रामो महातेजाः सुग्रीवमिदमब्रवीत् ।  
> सुविभक्तानि सैन्यानि शुक एष विमुच्यताम् ॥ २२ ॥

तदनन्तर महातेजस्वी रामने सुग्रीवसे कहा—‘हमलोगोंने अपनी सेनाओंको सुन्दर ढंगसे विभक्त करके उन्हें व्यूहबद्ध कर लिया है, अतः अब इस शुकको छोड़ दिया जाय’ ॥२२॥

> रामस्य तु वचः श्रुत्वा वानरेन्द्रो महाबलः ।  
> मोचयामास तं दूतं शुकं रामस्य शासनात् ॥ २३ ॥  
> मोचितो रामवाक्येन वानरैश्च निपीडितः ।  
> शुकः परमसंत्रस्तो रक्षोधिपमुपागमत् ॥ २४ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर महाबली वानरराजने उनके आदेशसे रावणदूत शुकको बन्धनमुक्त करा दिया ॥ श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे छुटकारा पाकर वानरोंसे पीड़ित होनेके कारण अत्यन्त भयभीत हुआ शुक राक्षसराजके पास गया ॥ २४ ॥

> रावणः प्रहसन्नेव शुकं वाक्यमुवाच ह ।  
> किमिमौ ते सितौ पक्षौ लूनपक्षश्च दृश्यसे ॥ २५ ॥  
> कच्चिन्नानेकचित्तानां तेषां त्वं वशमागतः ।

उस समय रावणने हँसते हुए-से ही शुकसे कहा—‘ये तुम्हारी दोनों पाँखें बाँध क्यों दी गयी हैं । इससे तुम इस तरह दिखायी देते हो मानो तुम्हारे पंख नोच लिये गये हों । कहीं तुम उन चञ्चलचित्तवाले वानरोंके चंगुलमें तो नहीं फँस गये थे ?’ ॥ २५½ ॥

> ततः स भयसंविग्नस्तेन राज्ञाभिचोदितः ।  
> वचनं प्रत्युवाचेदं राक्षसाधिपमुत्तमम् ॥ २६ ॥

राजा रावणके इस प्रकार पूछनेपर भयसे घबराये हुए शुकने उस समय उस श्रेष्ठ राक्षसराजको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २६ ॥

> सागरस्योत्तरे तीरेऽब्रुवं ते वचनं तथा ।  
> यथा संदेशमक्लिष्टं सान्त्वयंश्चक्ष्णया गिरा ॥ २७ ॥

‘महाराज ! मैंने समुद्रके उत्तर तटपर पहुँचकर आपका संदेश बहुत स्पष्ट शब्दोंमें मधुर वाणीद्वारा सान्त्वना देते हुए सुनाया ॥ २७ ॥

> क्रुद्धैस्तैरहमुत्प्लुत्य दष्टमात्रः प्लवंगमैः ।  
> गृहीतोऽस्म्यपि चारब्धो हन्तुं लोतुं च मुष्टिभिः ॥ २८ ॥

‘किंतु मुझपर दृष्टि पड़ते ही कुपित हुए वानरोंने उछलकर मुझे पकड़ लिया और घूसोंसे मारना एवं पाँखें नोचना आरम्भ किया ॥ २८ ॥

> न ते संभाषितुं शक्याः सम्प्रश्नोऽत्र न विद्यते ।  
> प्रकृत्या कोपनास्तीक्ष्णा वानरा राक्षसाधिप ॥ २९ ॥

‘राक्षसराज ! ये वानर स्वभावसे ही क्रोधी और तीखे हैं । उनसे बात भी नहीं की जा सकती थी । फिर यह पूछनेका अवसर कहाँ था कि तुम मुझे क्यों मार रहे हो ? ॥ २९ ॥

> स च हन्ता विराधस्य कबन्धस्य खरस्य च ।  
> सुग्रीवसहितो रामः सीतायाः पदमागतः ॥ ३० ॥

‘जो विराध, कबन्ध और खरका वध कर चुके हैं, वे श्रीराम सुग्रीवके साथ सीताके स्थानका पता पाकर उनका उद्धार करनेके लिये आये हैं ॥ ३० ॥

> स कृत्वा सागरे सेतुं तीर्त्वा च लवणोदधिम् ।  
> एष रक्षांसि निर्धूय धन्वी तिष्ठति राघवः ॥ ३१ ॥

‘वे रघुनाथजी समुद्रपर पुल बाँध लवणसागरको पार करके राक्षसोंको तिनकोंके समान समझकर धनुष हाथमें लिये यहाँ पास ही खड़े हैं ॥ ३१ ॥

> ऋक्षवानरसङ्घानामनीकानि सहस्रशः ।  
> गिरिमेघनिकाशानां छादयन्ति वसुंधराम् ॥ ३२ ॥

‘पर्वत और मेघोंके समान विशालकाय रीछों और वानर-समूहोंकी सहस्रों सेनाएँ इस पृथ्वीपर छा गयी हैं ॥३२॥

> राक्षसानां बलौघस्य वानरेन्द्रबलस्य च ।  
> नैतयोर्विद्यते सन्धिर्देवदानवयोरिव ॥ ३३ ॥

‘देवता और दानवोंमें जैसे मेल होना असम्भव है, उसी प्रकार राक्षसों और वानरराज सुग्रीवके सैनिकोंमें संधि नहीं हो सकती ॥ ३३ ॥

> पुरा प्राकारमायान्ति क्षिप्रमेकतरं कुरु ।  
> सीतां चास्मै प्रयच्छाशु युद्धं वापि प्रदीयताम् ॥ ३४ ॥

‘अतः जबतक वे लङ्कापुरीकी चहारदिवारीपर नहीं चढ़ आते, उसके पहले ही आप शीघ्रतापूर्वक दोमेंसे एक काम कर डालिये—या तो तुरंत ही उन्हें सीताको लौटा दीजिये या फिर सामने खड़े होकर युद्ध कीजिये’ ॥ ३४ ॥

> शुकस्य वचनं श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् ।  
> रोषसंरक्तनयनो निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ ३५॥

शुककी यह बात सुनकर रावणकी आँखें रोषसे लाल हो गयीं । वह इस तरह घूर-घूरकर देखने लगा, मानो अपनी दृष्टिसे उसको दग्ध कर देगा । वह बोला—॥ ३५ ॥

> यदि मां प्रति युद्धेरन् देवगन्धर्वदानवाः ।  
> नैव सीतां प्रदास्यामि सर्वलोकभयादपि ॥ ३६॥

‘यदि देवता, गन्धर्व और दानव भी मुझसे युद्ध करनेको तैयार हो जायँ तथा सारे संसारके लोग मुझे भय दिखाने लगें तो भी मैं सीताको नहीं लौटाऊँगा ॥ ३६ ॥

> कदा समभिधावन्ति मामका राघवं शराः ।  
> वसन्ते पुष्पितं मत्ता भ्रमरा इव पादपम् ॥ ३७॥

‘जैसे मतवाले भ्रमर वसन्त ऋतुमें फूलोंसे भरे हुए वृक्षपर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार मेरे बाण कब उस रघुवंशीपर धावा करेंगे ? ॥ ३७ ॥

> कदा शोणितदिग्धाङ्गं दीप्तैः कार्मुकविच्युतैः ।  
> शरैरादीपयिष्यामि उल्काभिरिव कुञ्जरम् ॥ ३८॥  
> तच्चास्य बलमादास्ये बलेन महता वृतः ।  
> ज्योतिषामिव सर्वेषां प्रभामुद्यन् दिवाकरः ॥ ३९॥

‘वह अवसर कब आयेगा जब मेरे धनुषसे छूटे हुए तेजस्वी बाणोंद्वारा घायल होकर रामका शरीर लहूलुहान हो जायगा और जैसे जलती हुई लुकारीसे लोग हाथीको जलाते हैं, उसी तरह मैं उन बाणोंसे रामको दग्ध कर डालूँगा ॥ ‘जैसे सूर्य अपने उदयके साथ ही समस्त नक्षत्रोंकी प्रभा हर लेते हैं, उसी प्रकार मैं विशाल सेनाके साथ रणभूमिमें खड़ा हो रामकी समस्त वानर-सेनाको आत्मसात् कर लूँगा ॥ ३९ ॥

> सागरस्येव मे वेगो मारुतस्येव मे बलम् ।  
> न च दाशरथिर्वेद तेन मां योद्धुमिच्छति ॥ ४०॥

दशरथकुमार रामने अभी समरभूमिमें समुद्रके समान मेरे वेग और वायुके समान मेरे बलका अनुभव नहीं किया है, इसलिये वह मेरे साथ युद्ध करना चाहता है ॥ ४० ॥

> न मे तूणीशयान् बाणान् सविषानिव पन्नगान् ।  
> रामः पश्यति संग्रामे तेन मां योद्धुमिच्छति ॥ ४१ ॥

‘मेरे तरकसमें सोये हुए बाण विषधर सर्पोंके समान भयंकर हैं । रामने संग्राममें उन बाणोंको देखा ही नहीं है; इसलिये वह मुझसे जूझना चाहता है ॥ ४१ ॥

> न जानाति पुरा वीर्यं मम युद्धे स राघवः ।  
> मम चापमयीं वीणां शरकोणैः प्रवादिताम् ॥ ४२ ॥  
> ज्याशब्दतुमुलां घोरामार्तगीतमहास्वनाम् ।  
> नाराचतलसंनादां नदीमहितवाहिनीम् ।  
> अवगाह्य महारङ्गं वादयिष्याम्यहं रणे ॥ ४३ ॥

‘पहले कभी युद्धमें रामका मेरे बल-पराक्रमसे पाला नहीं पड़ा है, इसीलिये वह मेरे साथ लड़नेका हौसला रखता है । मेरा धनुष एक सुन्दर वीणा है, जो बाणोंके कोनोंसे बजायी जाती है । उसकी प्रत्यञ्चासे जो टङ्कारध्वनि उठती है, वही उसकी भयंकर स्वरलहरी है । आर्तोंकी चीत्कार और पुकार ही उसपर उच्चस्वरसे गाया जानेवाला गीत है । नाराचोंको छोड़ते समय जो चट-चट शब्द होता है, वही मानो हथेलीपर दिया जानेवाला ताल है । बहती हुई नदीके समान जो शत्रुओंकी वाहिनी है, वही मानो उस संगीतोत्सवके लिये विशाल रंगभूमि है । मैं समराङ्गणमें उस रंगभूमिके भीतर प्रवेश करके अपनी वह भयंकर वीणा बजाऊँगा ॥ ४२-४३ ॥

> न वासवेनापि सहस्रचक्षुषा  
> युद्धेऽस्मि शक्यो वरुणेन वा स्वयम् ।  
> यमेन वा धर्षयितुं शराग्निना  
> महाहवे वैश्रवणेन वा पुनः ॥ ४४ ॥

‘यदि महासमरमें सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अथवा साक्षात् वरुण या स्वयं यमराज अथवा मेरे बड़े भाई कुबेर ही आ जायँ तो वे भी अपनी बाणाग्निसे मुझे पराजित नहीं कर सकते’ ॥ ४४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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