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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 2"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 2

> तं तु शोकपरिद्यूनं रामं दशरथात्मजम् ।  
> उवाच वचनं श्रीमान् सुग्रीवः शोकनाशनम् ॥ १ ॥

इस प्रकार शोकसे संतप्त हुए दशरथनन्दन श्रीरामसे सुग्रीवने उनके शोकका निवारण करनेवाली बात कही—॥१॥

> किं त्वया तप्यते वीर यथान्यः प्राकृतस्तथा ।  
> मैवं भूस्त्यज संतापं कृतघ्न इव सौहृदम् ॥ २ ॥

‘वीरवर ! आप दूसरे साधारण मनुष्योंकी भाँति क्यों संताप कर रहे हैं ? आप इस तरह चिन्तित न हों । जैसे कृतघ्न पुरुष सौहार्दको त्याग देता है, उसी तरह आप भी इस संतापको छोड़ दें ॥ २ ॥

> संतापस्य च ते स्थानं नहि पश्यामि राघव ।  
> प्रवृत्तावुपलब्धायां ज्ञाते च निलये रिपोः ॥ ३ ॥

‘रघुनन्दन ! जब सीताका समाचार मिल गया और शत्रुके निवास-स्थानका पता लग गया, तब मुझे आपके इस दुःख और चिन्ताका कोई कारण नहीं दिखायी देता ॥ ३ ॥

> मतिमाञ्शास्त्रवित् प्राज्ञः पण्डितश्चासि राघव ।  
> त्यजेमां प्राकृतां बुद्धिं कृतात्मेवार्थदूषिणीम् ॥ ४ ॥

‘रघुकुलभूषण ! आप बुद्धिमान्, शास्त्रोंके ज्ञाता, विचारकुशल और पण्डित हैं, अतः कृतात्मा पुरुषकी भाँति इस अर्थदूषक प्राकृत बुद्धिका परित्याग कर दीजिये ॥ ४ ॥

> समुद्रं लङ्घयित्वा तु महानक्रसमाकुलम् ।  
> लङ्कामारोहयिष्यामो हनिष्यामश्च ते रिपुम् ॥ ५ ॥  
> निरुत्साहस्य दीनस्य शोकपर्याकुलात्मनः ।  
> सर्वार्था व्यवसीदन्ति व्यसनं चाधिगच्छति ॥ ६ ॥

‘बड़े-बड़े नाकोंसे भरे हुए समुद्रको लाँघकर हमलोग लङ्कापर चढ़ाई करेंगे और आपके शत्रुको नष्ट कर डालेंगे ॥ ‘जो पुरुष उत्साहशून्य, दीन और मन-ही-मन शोकसे व्याकुल रहता है, उसके सारे काम बिगड़ जाते हैं और वह बड़ी विपत्तिमें पड़ जाता है ॥ ६ ॥

> इमे शूराः समर्थाश्च सर्वतो हरियूथपाः ।  
> त्वत्प्रियार्थं कृतोत्साहाः प्रवेष्टुमपि पावकम् ।  
> एषां हर्षेण जानामि तर्कश्चापि दृढो मम ॥ ७ ॥

‘ये वानरयूथपति सब प्रकारसे समर्थ एवं शूरवीर हैं । आपका प्रिय करनेके लिये इनके मनमें बड़ा उत्साह है । ये आपके लिये जलती आगमें भी प्रवेश कर सकते हैं । समुद्रको लाँघने और रावणको मारनेका प्रसंग चलनेपर इनका मुँह प्रसन्नतासे खिल जाता है । इनके इस हर्ष और उत्साहसे ही मैं इस बातको जानता हूँ तथा इस विषयमें मेरा अपना तर्क ( निश्चय ) भी सुदृढ़ है ॥ ७ ॥

> विक्रमेण समानेष्ये सीतां हत्वा यथा रिपुम् ।  
> रावणं पापकर्माणं तथा त्वं कर्तुमर्हसि ॥ ८ ॥

‘आप ऐसा कीजिये, जिससे हमलोग पराक्रमपूर्वक अपने शत्रु पापाचारी रावणका वध करके सीताको यहाँ ले आवें ॥ ८ ॥

> सेतुरत्र यथा बद्ध्येद् यथा पश्येम तां पुरीम् ।  
> तस्य राक्षसराजस्य तथा त्वं कुरु राघव ॥ ९ ॥

‘रघुनन्दन ! आप ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे समुद्रपर सेतु बँध सके और हम उस राक्षसराजकी लङ्कापुरीको देख सकें ॥ ९ ॥

> दृष्ट्वा तां हि पुरीं लङ्कां त्रिकूटशिखरे स्थिताम् ।  
> हतं च रावणं युद्धे दर्शनादवधारय ॥ १० ॥

‘त्रिकूटपर्वतके शिखरपर बसी हुई लङ्कापुरी एक बार दीख जाय तो आप यह निश्चित समझिये कि युद्धमें रावण दिखायी दिया और मारा गया ॥ १० ॥

> अवद्ध्वा सागरे सेतुं घोरे च वरुणालये ।  
> लङ्का न मर्दितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥ ११ ॥

‘वरुणके निवासभूत घोर समुद्रपर पुल बाँधे बिना तो इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी लङ्काको पददलित नहीं कर सकते ॥ ११ ॥

> सेतुबन्धः समुद्रे च यावल्लङ्कासमीपतः ।  
> सर्वं तीर्णं च मे सैन्यं जितमित्युपधारय ।  
> इमे हि समरे वीरा हरयः कामरूपिणः ॥ १२ ॥

‘अतः जब लङ्काके निकटतक समुद्रपर पुल बँध जायगा, तब हमारी सारी सेना उस पार चली जायगी । फिर तो आप यही समझिये कि अपनी जीत हो गयी; क्योंकि इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले ये वानर युद्धमें बड़ी वीरता दिखानेवाले हैं ॥ १२ ॥

> तदलं विक्लवां बुद्धि राजन् सर्वार्थनाशिनीम् ।  
> पुरुषस्य हि लोकेऽस्मिञ्शोकः शौर्यापकर्षणः ॥ १३ ॥

‘अतः राजन् ! आप इस व्याकुल बुद्धिका आश्रय न लें— बुद्धिकी इस व्याकुलताको त्याग दें; क्योंकि यह समस्त कार्योंको बिगाड़ देनेवाली है और शोक इस जगत्में पुरुषके शौर्यको नष्ट कर देता है ॥ १३ ॥

> यत् तु कार्यं मनुष्येण शौटीर्यमवलम्ब्यताम् ।  
> तदलंकरणायैव कर्तुर्भवति सत्वरम् ॥ १४ ॥

‘मनुष्यको जिसका आश्रय लेना चाहिये, उस शौर्यका ही वह अवलम्बन करे; क्योंकि वह कर्ताको शीघ्र ही अलंकृत कर देता है—उसके अभीष्ट फलकी सिद्धि करा देता है ॥१४॥

> अस्मिन् काले महाप्राज्ञ सत्त्वमातिष्ठ तेजसा ।  
> शूराणां हिम्मनुष्याणां त्वद्विधानां महात्मनाम् ।  
> विनष्टे वा प्रणष्टे वा शोकः सर्वार्थनाशनः ॥ १५ ॥

‘अतः महाप्राज्ञ श्रीराम ! आप इस समय तेजके साथ ही धैर्यका आश्रय लें । कोई वस्तु खो गयी हो या नष्ट हो गयी हो, उसके लिये आप-जैसे शूरवीर महात्मा पुरुषोंको शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक सब कामोंको बिगाड़ देता है ॥ १५ ॥

> तत्त्वं बुद्धिमतां श्रेष्ठः सर्वशास्त्रार्थकोविदः ।  
> मद्विधैः सचिवैः सार्धमरिं जेतुं समर्हसि ॥ १६ ॥

‘आप बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण शास्त्रोंके मर्मज्ञ हैं । अतः हम-जैसे मन्त्रियों एवं सहायकोंके साथ रहकर अवश्य ही शत्रुपर विजय प्राप्त कर सकते हैं ॥ १६ ॥

> नहि पश्याम्यहं कंचित् त्रिषु लोकेषु राघव ।  
> गृहीतधनुषो यस्ते तिष्ठेदभिमुखो रणे ॥ १७ ॥

‘रघुनन्दन ! मुझे तो तीनों लोकोंमें ऐसा कोई वीर नहीं दिखायी देता, जो रणभूमिमें धनुष लेकर खड़े हुए आपके सामने ठहर सके ॥ १७ ॥

> वानरेषु समासक्तं न ते कार्यं विपत्स्यते ।  
> अचिराद् द्रक्ष्यसे सीतां तीर्त्वा सागरमक्षयम् ॥ १८ ॥

‘वानरोंपर जिसका भार रक्खा गया है, आपका वह कार्य बिगड़ने नहीं पायेगा । आप शीघ्र ही इस अक्षय समुद्रको पार करके सीताका दर्शन करेंगे ॥ १८ ॥

> तदलं शोकमालम्ब्य क्रोधमालम्ब भूपते ।  
> निश्चेष्टाः क्षत्रिया मन्दाः सर्वे चण्डस्य बिभ्यति ॥ १९ ॥

‘पृथ्वीनाथ ! अपने हृदयमें शोकको स्थान देना व्यर्थ है । इस समय तो आप शत्रुओंके प्रति क्रोध धारण कीजिये । जो क्षत्रिय मन्द ( क्रोधशून्य ) होते हैं, उनसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती; परंतु जो शत्रुके प्रति आवश्यक रोषसे भरा होता है, उससे सब डरते हैं ॥ १९ ॥

> लङ्घनार्थं च घोरस्य समुद्रस्य नदीपतेः ।  
> सहास्माभिरिहोपेतः सूक्ष्मबुद्धिर्विचारय ॥ २० ॥

‘नदियोंके स्वामी घोर समुद्रको पार करनेके लिये क्या उपाय किया जाय, इस विषयमें आप हमारे साथ बैठकर विचार कीजिये; क्योंकि आपकी बुद्धि बड़ी सूक्ष्म है ॥ २० ॥

> लङ्घिते तत्र तैः सैन्यैर्जितमित्येव निश्चितु ।  
> सर्वं तीर्णं च मे सैन्यं जितमित्यवधार्यताम् ॥ २१ ॥

‘यदि हमारे सैनिक समुद्रको लाँघ गये तो यही निश्चय रखिये कि अपनी जीत अवश्य होगी । सारी सेनाका समुद्रके उस पार पहुँच जाना ही अपनी विजय समझिये ॥ २१ ॥

> इमे हि हरयः शूराः समरे कामरूपिणः ।  
> तानरीन् विधमिष्यन्ति शिलापादपवृष्टिभिः ॥ २२ ॥

‘ये वानर संग्राममें बड़े शूरवीर हैं और इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हैं । ये पत्थरों और पेड़ोंकी वर्षा करके ही उन शत्रुओंका संहार कर डालेंगे ॥ २२ ॥

> कथंचित् परिपश्यामि लङ्घितं वरुणालयम् ।  
> हतमित्येव तं मन्ये युद्धे शत्रुनिबर्हण ॥ २३ ॥

‘शत्रुसूदन श्रीराम ! यदि किसी प्रकार मैं इस वानर-सेनाको समुद्रके उस पार पहुँची देख सकूँ तो मैं रावणको युद्धमें मरा हुआ ही समझता हूँ ॥ २३ ॥

> किमुक्त्वा बहुधा चापि सर्वथा विजयी भवान् ।  
> निमित्तानि च पश्यामि मनो मे सम्प्रहृष्यति ॥ २४ ॥

‘बहुत कहनेसे क्या लाभ ? मेरा तो विश्वास है कि आप सर्वथा विजयी होंगे; क्योंकि मुझे ऐसे ही शकुन दिखायी देते हैं और मेरा हृदय भी हर्ष एवं उत्साहसे भरा है’ ॥ २४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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