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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 18"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 18

> अथ रामः प्रसन्नात्मा श्रुत्वा वायुसुतस्य ह ।  
> प्रत्यभाषत दुर्धर्षः श्रुतवानात्मनि स्थितम् ॥ १ ॥

वायुनन्दन हनुमान्जीके मुखसे अपने मनमें बैठी हुई बात सुनकर दुर्जय वीर भगवान् श्रीरामका चित्त प्रसन्न हो गया । वे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥

> ममापि च विवक्षास्ति काचित् प्रति विभीषणम् ।  
> श्रोतुमिच्छामि तत् सर्वं भवद्भिः श्रेयसि स्थितैः ॥ २ ॥

‘मित्रो ! विभीषणके सम्बन्धमें मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ । आप सब लोग मेरे हितसाधनमें संलग्न रहनेवाले हैं । अतः मेरी इच्छा है कि आप भी उसे सुन लें ॥ २ ॥

> मित्रभावेन सम्प्राप्तं न त्यजेयं कथंचन ।  
> दोषो यद्यपि तस्य स्यात् सतामेतदगर्हितम् ॥ ३ ॥

‘जो मित्रभावसे मेरे पास आ गया हो, उसे मैं किसी तरह त्याग नहीं सकता । सम्भव है उसमें कुछ दोष भी हों, परंतु दोषीको आश्रय देना भी सत्पुरुषोंके लिये निन्दित नहीं है ( अतः विभीषणको मैं अवश्य अपनाऊँगा )’ ॥ ३ ॥

> सुग्रीवस्त्वथ तद्वाक्यमाभाष्य च विमृश्य च ।  
> ततः शुभतरं वाक्यमुवाच हरिपुङ्गवः ॥ ४ ॥

वानरराज सुग्रीवने भगवान् श्रीरामके इस कथनको सुनकर स्वयं भी उसे दोहराया और उसपर विचार करके यह परम सुन्दर बात कही—॥ ४ ॥

> स दुष्टो वाप्यदुष्टो वा किमेष रजनीचरः ।  
> ईदृशं व्यसनं प्राप्तं भ्रातरं यः परित्यजेत् ॥ ५ ॥  
> को नाम स भवेत् तस्य यमेष न परित्यजेत् ।

‘प्रभो ! यह दुष्ट हो या अदुष्ट, इससे क्या ? है तो यह निशाचर ही । फिर जो पुरुष ऐसे संकटमें पड़े हुए अपने भाईको छोड़ सकता है, उसका दूसरा ऐसा कौन सम्बन्धी होगा, जिसे वह त्याग न सके’ ॥ ५½ ॥

> वानराधिपतेर्वाक्यं श्रुत्वा सर्वानुदीक्ष्य तु ॥ ६ ॥  
> ईषदुत्स्मयमानस्तु लक्ष्मणं पुण्यलक्षणम् ।  
> इति होवाच काकुत्स्थो वाक्यं सत्यपराक्रमः ॥ ७ ॥

वानरराज सुग्रीवकी यह बात सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरघुनाथजी सबकी ओर देखकर कुछ मुस्कराये और पवित्र लक्षणवाले लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले—॥ ६-७ ॥

> अनधीत्य च शास्त्राणि वृद्धाननुपसेव्य च ।  
> न शक्यमीदृशं वक्तुं यदुवाच हरीश्वरः ॥ ८ ॥

‘सुमित्रानन्दन ! इस समय वानरराजने जैसी बात कही है, वैसी कोई भी पुरुष शास्त्रोंका अध्ययन और गुरुजनोंकी सेवा किये बिना नहीं कह सकता ॥ ८ ॥

> अस्ति सूक्ष्मतरं किंचिद् यथात्र प्रतिभाति मा ।  
> प्रत्यक्षं लौकिकं चापि वर्तते सर्वराजसु ॥ ९ ॥

‘परंतु सुग्रीव ! तुमने विभीषणमें जो भाईके परित्यागरूप दोषकी उद्भावना की है, उस विषयमें मुझे एक ऐसे अत्यन्त सूक्ष्म अर्थकी प्रतीति हो रही है, जो समस्त राजाओंमें प्रत्यक्ष देखा गया है और सभी लोगोंमें प्रसिद्ध है ( मैं उसीको तुम सब लोगोंसे कहना चाहता हूँ ) ॥ ९ ॥

> अमित्रास्तत्कुलीनाश्च प्रातिदेश्याश्च कीर्तिताः ।  
> व्यसनेषु प्रहर्तारस्तस्माद्यमिहागतः ॥ १० ॥

‘राजाओंके छिद्र दो प्रकारके बताये गये हैं—एक तो उसी कुलमें उत्पन्न हुए जाति-भाई और दूसरे पड़ोसी देशोंके निवासी । ये संकटमें पड़नेपर अपने विरोधी राजा या राजपुत्र-पर प्रहार कर बैठते हैं । इसी भयसे यह विभीषण यहाँ आया है ( इसे भी अपने जाति-भाइयोंसे भय है ) ॥ १० ॥

> अपापास्तत्कुलीनाश्च मानयन्ति स्वकान् हितान् ।  
> एष प्रायो नरेन्द्राणां शङ्कनीयस्तु शोभनः ॥ ११ ॥

‘जिनके मनमें पाप नहीं है, ऐसे एक कुलमें उत्पन्न हुए भाई-बन्धु अपने कुटुम्बीजनोंको हितैषी मानते हैं, परंतु यही सजातीय बन्धु अच्छा होनेपर भी प्रायः राजाओंके लिये शङ्क-नीय होता है ( रावण भी विभीषणको शङ्काकी दृष्टिसे देखने लगा है; इसलिये इसका अपनी रक्षाके लिये यहाँ आना अनुचित नहीं है । अतः तुम्हें इसके ऊपर भाईके त्यागका दोष नहीं लगाना चाहिये ) ॥ ११ ॥

> यस्तु दोषस्त्वया प्रोक्तो ह्यादानेऽरिबलस्य च ।  
> तत्र ते कीर्तयिष्यामि यथाशास्त्रमिदं शृणु ॥ १२ ॥

‘तुमने शत्रुपक्षीय सैनिकको अपनानेमें जो यह दोष बताया है कि वह अवसर देखकर प्रहार कर बैठता है, उसके विषयमें मैं तुम्हें यह नीतिशास्त्रके अनुकूल उत्तर दे रहा हूँ, सुनो ॥ १२ ॥

> न वयं तत्कुलीनाश्च राज्यकाङ्क्षी च राक्षसः ।  
> पण्डिता हि भविष्यन्ति तस्माद् ग्राह्यो विभीषणः ॥ १३ ॥

‘हमलोग इसके कुटुम्बी तो हैं नहीं ( अतः हमसे स्वार्थ-हानिकी आशङ्का इसे नहीं है ) और यह राक्षस राज्य पानेका अभिलाषी है ( इसलिये भी यह हमारा त्याग नहीं कर सकता ) । इन राक्षसोंमें बहुत-से लोग बड़े विद्वान् भी होते हैं; ( अतः वे मित्र होनेपर बड़े कामके सिद्ध होंगे ) इसलिये विभीषणको अपने पक्षमें मिला लेना चाहिये ॥१३ ॥

> अव्यग्राश्च प्रहृष्टाश्च ते भविष्यन्ति संगताः ।  
> प्रणादश्च महानेषोऽन्योन्यस्य भयमागतम् ।  
> इति भेदं गमिष्यन्ति तस्माद् ग्राह्यो विभीषणः ॥ १४ ॥

‘हमसे मिल जानेपर ये विभीषण आदि निश्चिन्त एवं प्रसन्न हो जायँगे । इनकी जो यह शरणागतिके लिये प्रबल पुकार है, इससे मालूम होता है, राक्षसोंमें एक दूसरेसे भय बना हुआ है । इसी कारणसे इनमें परस्पर फूट होगी और ये नष्ट हो जायँगे । इसलिये भी विभीषणको ग्रहण कर लेना चाहिये ॥ १४ ॥

> न सर्वे भ्रातरस्तात भवन्ति भरतोपमाः ।  
> मद्विधा वा पितुः पुत्राः सुहृदो वा भवद्विधाः ॥ १५ ॥

‘तात सुग्रीव ! संसारमें सब भाई भरतके ही समान नहीं होते । बापके सब बेटे मेरे ही-जैसे नहीं होते और सभी मित्र तुम्हारे ही समान नहीं हुआ करते हैं’ ॥ १५ ॥

> एवमुक्तस्तु रामेण सुग्रीवः सहलक्ष्मणः ।  
> उत्थायेदं महाप्राज्ञः प्रणतो वाक्यमब्रवीत् ॥ १६ ॥  
> रावणेन प्रणिहितं तमवेहि निशाचरम् ।  
> तस्याहं निग्रहं मन्ये क्षमं क्षमवतां वर ॥ १७ ॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणसहित महाबुद्धिमान् सुग्रीवने उठकर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—॥ ‘उचित कार्य करनेवालोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! आप उस राक्षसको रावणका भेजा हुआ ही समझें । मैं तो उसे कैद कर लेना ही ठीक समझता हूँ ॥ १७ ॥

> राक्षसो जिह्मया बुद्ध्या संदिष्टोऽयमिहागतः ।  
> प्रहर्तुं त्वयि विश्वस्ते विश्वस्ते मयि वानघ ॥ १८ ॥  
> लक्ष्मणे वा महाबाहो स वध्यः सचिवैः सह ।  
> रावणस्य नृशंसस्य भ्राता ह्येष विभीषणः ॥ १९ ॥

‘निष्पाप श्रीराम ! यह निशाचर रावणके कहनेसे मनमें कुटिल विचार लेकर ही यहाँ आया है । जब हमलोग इसपर विश्वास करके इसकी ओरसे निश्चिन्त हो जायँगे, उस समय यह आपपर, मुझपर अथवा लक्ष्मणपर भी प्रहार कर सकता है । इसलिये महाबाहो ! क्रूर रावणके भाई इस विभीषणका मन्त्रियोंसहित बध कर देना ही उचित है’ ॥ १८-१९ ॥

> एवमुक्त्वा रघुश्रेष्ठं सुग्रीवो वाहिनीपतिः ।  
> वाक्यज्ञो वाक्यकुशलं ततो मौनमुपागमत् ॥ २० ॥

प्रवचनकुशल रघुकुलतिलक श्रीरामसे ऐसा कहकर बातचीतकी कला जाननेवाले सेनापति सुग्रीव मौन हो गये ॥ २० ॥

> स सुग्रीवस्य तद् वाक्यं रामः श्रुत्वा विमृश्य च ।  
> ततः शुभतरं वाक्यमुवाच हरिपुङ्गवम् ॥ २१ ॥

सुग्रीवका वह वचन सुनकर और उसपर भलीभाँति विचार करके श्रीरामने उन वानरशिरोमणिसे यह परम मङ्गलमयी बात कही—॥ २१ ॥

> स दुष्टो वाप्यदुष्टो वा किमेष रजनीचरः ।  
> सूक्ष्ममप्यहितं कर्तुं मम शक्तः कथंचन ॥ २२ ॥

‘वानरराज ! विभीषण दुष्ट हो या साधु । क्या यह निशाचर किसी तरह भी मेरा सूक्ष्म-से-सूक्ष्मरूपमें भी अहित कर सकता है ? ॥ २२ ॥

> पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्यां चैव राक्षसान् ।  
> अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ॥ २३ ॥

‘वानरयूथपते ! यदि मैं चाहूँ तो पृथ्वीपर जितने भी पिशाच, दानव, यक्ष और राक्षस हैं, उन सबको एक अंगुलि-के अग्रभागसे मार सकता हूँ ॥ २३ ॥

> श्रूयते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः ।  
> अर्चितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥ २४ ॥

‘सुना जाता है कि एक कबूतरने अपनी शरणमें आये हुए अपने ही शत्रु एक व्याधका यथोचित आतिथ्य-सत्कार किया था और उसे निमन्त्रण दे अपने शरीरके मांसका भोजन कराया था ॥ २४ ॥

> स हि तं प्रतिजग्राह भार्याहर्तारमागतम् ।  
> कपोतो वानरश्रेष्ठ किं पुनर्मद्विधो जनः ॥ २५ ॥

‘उस व्याधने उस कबूतरकी भार्या कबूतरीको पकड़ लिया था तो भी अपने घर आनेपर कबूतरने उसका आदर किया; फिर मेरे-जैसा मनुष्य शरणागतपर अनुग्रह करे, इसके लिये तो कहना ही क्या है ? ॥ २५ ॥

> ऋषेः कण्वस्य पुत्रेण कण्डुना परमर्षिणा ।  
> शृणु गाथा पुरा गीता धर्मिष्ठा सत्यवादिना ॥ २६ ॥

‘पूर्वकालमें कण्व मुनिके पुत्र सत्यवादी महर्षि कण्डुने एक धर्मविषयक गाथाका गान किया था । उसे बताता हूँ, सुनो ॥ २६ ॥

> बद्धाञ्जलिपुटं दीनं याचन्तं शरणागतम् ।  
> न हन्यादानृशंस्यार्थमपि शत्रुं परंतप ॥ २७ ॥

‘परंतप ! यदि शत्रु भी शरणमें आये और दीनभावसे हाथ जोड़कर दयाकी याचना करे तो उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये ॥ २७ ॥

> आर्तो वा यदि वा दृप्तः परेषां शरणं गतः ।  
> अरिः प्राणान् परित्यज्य रक्षितव्यः कृतात्मना ॥ २८ ॥

‘शत्रु दुखी हो या अभिमानी, यदि वह अपने विपक्षी-की शरणमें जाय तो शुद्ध हृदयवाले श्रेष्ठ पुरुषको अपने प्राणोंका मोह छोड़कर उसकी रक्षा करनी चाहिये ॥ २८ ॥

> स चेद् भयाद् वा मोहाद् वा कामाद् वापि न रक्षति ।  
> स्वया शक्त्या यथान्यायं तत् पापं लोकगर्हितम् ॥ २९ ॥

‘यदि वह भय, मोह अथवा किसी कामनासे न्यायानुसार यथाशक्ति उसकी रक्षा नहीं करता तो उसके उस पाप-कर्मकी लोकमें बड़ी निन्दा होती है ॥ २९ ॥

> विनष्टः पश्यतस्तस्य रक्षिणः शरणं गतः ।  
> आनाय सुकृतं तस्य सर्वं गच्छेदरक्षितः ॥ ३० ॥

‘यदि शरणमें आया हुआ पुरुष संरक्षण न पाकर उस रक्षकके देखते-देखते नष्ट हो जाय तो वह उसके सारे पुण्यको अपने साथ ले जाता है ॥ ३० ॥

> एवं दोषो महानत्र प्रपन्नानामरक्षणे ।  
> अस्वर्ग्यं चायशस्यं च बलवीर्यविनाशनम् ॥ ३१ ॥

‘इस प्रकार शरणागतकी रक्षा न करनेमें महान् दोष बताया गया है । शरणागतका त्याग स्वर्ग और सुयशकी प्राप्तिको मिटा देता है और मनुष्यके बल और वीर्यका नाश करता है ॥ ३१ ॥

> करिष्यामि यथार्थं तु कण्डोर्वचनमुत्तमम् ।  
> धर्मिष्ठं च यशस्यं च स्वर्ग्यं स्यात् तु फलोदये ॥ ३२ ॥

‘इसलिये मैं तो महर्षि कण्डुके उस यथार्थ और उत्तम वचनका ही पालन करूँगा; क्योंकि वह परिणाममें धर्म, यश और स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ ३२ ॥

> सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।  
> अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥ ३३ ॥

‘जो एक बार भी शरणमें आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे रक्षाकी प्रार्थना करता है, उसे मैं समस्त प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ । यह मेरा सदाके लिये व्रत है ॥३३॥

> आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया ।  
> विभीषणो वा सुग्रीव यदि वा रावणः स्वयम् ॥ ३४ ॥

‘अतः कपिश्रेष्ठ सुग्रीव ! वह विभीषण हो या स्वयं रावण आ गया हो । तुम उसे ले आओ । मैंने उसे अभयदान दे दिया’ ॥ ३४ ॥

> रामस्य तु वचः श्रुत्वा सुग्रीवः प्लवगेश्वरः ।  
> प्रत्यभाषत काकुत्स्थं सौहार्देनाभिपूरितः ॥ ३५ ॥

भगवान् श्रीरामका यह वचन सुनकर वानरराज सुग्रीवने सौहार्दसे भरकर उनसे कहा—॥ ३५ ॥

> किमत्र चित्रं धर्मज्ञ लोकनाथशिखामणे ।  
> यत् त्वमार्य प्रभाषेथाः सत्त्ववान् सत्पथे स्थितः ॥ ३६ ॥

‘धर्मज्ञ ! लोकेश्वरशिरोमणे ! आपने जो यह श्रेष्ठ धर्मकी बात कही है, इसमें क्या आश्चर्य है ? क्योंकि आप महान् शक्तिशाली और सन्मार्गपर स्थित हैं ॥ ३६ ॥

> मम चाप्यन्तरात्मायं शुद्धं वेत्ति विभीषणम् ।  
> अनुमानाच्च भावाच्च सर्वतः सुपरीक्षितः ॥ ३७ ॥

‘यह मेरी अन्तरात्मा भी विभीषणको शुद्ध समझती है । हनुमान्जीने भी अनुमान और भावसे उनकी भीतर-बाहर सब ओरसे भलीभाँति परीक्षा कर ली है ॥ ३७ ॥

> तस्मात् क्षिप्रं सहास्माभिस्तुल्यो भवतु राघव ।  
> विभीषणो महाप्राज्ञः सखित्वं चाभ्युपैतु नः ॥ ३८ ॥

‘अतः रघुनन्दन ! अब विभीषण शीघ्र ही यहाँ हमारे-जैसे होकर रहें और हमारी मित्रता प्राप्त करें’ ॥ ३८ ॥

> ततस्तु सुग्रीववचो निशम्य त-  
> द्धरीश्वरेणाभिहितं नरेश्वरः ।  
> विभीषणेनाशु जगाम संगमं  
> पतत्रिराजेन यथा पुरंदरः ॥ ३९ ॥

तदनन्तर वानरराज सुग्रीवकी कही हुई वह बात सुनकर राजा श्रीराम शीघ्र आगे बढ़कर विभीषणसे मिले, मानो देवराज इन्द्र पक्षिराज गरुड़से मिल रहे हों ॥ ३९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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