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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 123"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 123

> अनुज्ञातं तु रामेण तद् विमानमनुत्तमम् ।  
> हंसयुक्तं महानादमुत्पपात विहायसम् ॥ १ ॥

श्रीरामकी आज्ञा पाकर वह हंसयुक्त उत्तम विमान महान् शब्द करता हुआ आकाशमें उड़ने लगा ॥ १ ॥

> पातयित्वा ततश्चक्षुः सर्वतो रघुनन्दनः ।  
> अब्रवीन्मैथिलीं सीतां रामः शशिनिभाननाम् ॥ २ ॥

उस समय रघुकुलनन्दन श्रीरामने सब ओर दृष्टि डालकर चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली मिथिलेशकुमारी सीतासे कहा–॥ २ ॥

> कैलासशिखराकारे त्रिकूटशिखरे स्थिताम् ।  
> लङ्कामीक्षस्व वैदेहि निर्मितां विश्वकर्मणा ॥ ३ ॥

‘विदेहराजनन्दिनि ! कैलास-शिखरके समान सुन्दर त्रिकूट पर्वतके विशाल शृङ्गपर बसी हुई विश्वकर्माकी बनायी लङ्कापुरीको देखो, कैसी सुन्दर दिखायी देती है ! ॥ ३ ॥

> एतदायोधनं पश्य मांसशोणितकर्दमम् ।  
> हरीणां राक्षसानां च सीते विशसनं महत् ॥ ४ ॥

‘इधर इस युद्धभूमिको देखो । यहाँ रक्त और मांसकी कीच जमी हुई है । सीते ! इस युद्धक्षेत्रमें वानरों और राक्षसोंका महान् संहार हुआ है ॥ ४ ॥

> एष दत्तवरः शेते प्रमाथी राक्षसेश्वरः ।  
> तव हेतोर्विशालाक्षि निहतो रावणो मया ॥ ५ ॥

‘विशाललोचने ! यह राक्षसराज रावण राखका ढेर बनकर सो रहा है । यह बड़ा भारी हिंसक था और इसे ब्रह्माजीने वरदान दे रक्खा था; किंतु तुम्हारे लिये मैंने इसका वध कर डाला है ॥ ५ ॥

> कुम्भकर्णोऽत्र निहतः प्रहस्तश्च निशाचरः ।  
> धूम्राक्षश्चात्र निहतो वानरेण हनूमता ॥ ६ ॥

‘यहींपर मैंने कुम्भकर्णको मारा था, यहीं निशाचर प्रहस्त मारा गया है और इसी समराङ्गणमें वानरवीर हनुमान्ने धूम्राक्षका वध किया है ॥ ६ ॥

> विद्युन्माली हतश्चात्र सुषेणेन महात्मना ।  
> लक्ष्मणेनेन्द्रजिच्चात्र रावणिर्निहतो रणे ॥ ७ ॥

‘यहीं महात्मना सुषेणने विद्युन्मालीको मारा था और इसी रणभूमिमें लक्ष्मणने रावणपुत्र इन्द्रजित्का संहार किया था ॥ ७ ॥

> अङ्गदेनात्र निहतो विकटो नाम राक्षसः ।  
> विरूपाक्षश्च दुष्प्रेक्षो महापार्श्वमहोदरौ ॥ ८ ॥

‘यहीं अङ्गदने विकटनामक राक्षसका वध किया था । जिसकी ओर देखना भी कठिन था, वह विरूपाक्ष तथा महापार्श्व और महोदर भी यहीं मारे गये हैं ॥ ८ ॥

> अकम्पनश्च निहतो बलिनोऽन्ये च राक्षसाः ।  
> त्रिशिराश्चातिकायश्च देवान्तकनरान्तकौ ॥ ९ ॥

‘अकम्पन तथा दूसरे बलवान् राक्षस यहीं मौतके घाट उतारे गये थे । त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक और नरान्तक भी यहीं मार डाले गये थे ॥ ९ ॥

> युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च राक्षसप्रवरावुभौ ।  
> निकुम्भश्चैव कुम्भश्च कुम्भकर्णात्मजौ बली ॥ १० ॥

‘युद्धोन्मत्त और मत्त—ये दोनों श्रेष्ठ राक्षस तथा बलवान् कुम्भ और निकुम्भ—ये कुम्भकर्णके दोनों पुत्र भी यहीं मृत्युको प्राप्त हुए ॥ १० ॥

> वज्रदंष्ट्रश्च दंष्ट्रश्च बहवो राक्षसा हताः ।  
> मकराक्षश्च दुर्धर्षो मया युधि निपातितः ॥ ११ ॥

‘वज्रदंष्ट्र और दंष्ट्र आदि बहुत-से राक्षस यहीं कालके ग्रास बन गये । दुर्धर्ष वीर मकराक्षको इसी युद्धस्थलमें मैंने मार गिराया था ॥ ११ ॥

> अकम्पनश्च निहतः शोणिताक्षश्च वीर्यवान् ।  
> यूपाक्षश्च प्रजङ्घश्च निहतौ तु महाहवे ॥ १२ ॥

‘अकम्पन और पराक्रमी शोणिताक्षका भी यहीं काम तमाम हुआ था । यूपाक्ष और प्रजङ्घ भी इसी महासमरमें मारे गये थे ॥ १२ ॥

> विद्युज्जिह्वोऽत्र निहतो राक्षसो भीमदर्शनः ।  
> यज्ञशत्रुश्च निहतः सुप्तघ्नश्च महाबलः ॥ १३ ॥

‘जिसकी ओर देखनेसे भी भय होता था, वह राक्षस विद्युज्जिह्व यहीं मौतका ग्रास बन गया । यज्ञशत्रु और महाबली सुप्तघ्नको भी यहीं मारा गया था ॥ १३ ॥

> सूर्यशत्रुश्च निहतो ब्रह्मशत्रुस्तथापरः ।  
> अत्र मन्दोदरी नाम भार्या तं पर्यदेवयत् ॥ १४ ॥  
> सपत्नीनां सहस्रेण साग्रेण परिवारिता ।

‘सूर्यशत्रु और ब्रह्मशत्रु नामक निशाचरोंका भी यहीं वध किया गया था । यहीं रावणकी भार्या मन्दोदरीने उसके लिये विलाप किया था । उस समय वह अपनी हजारोंसे भी अधिक सौतोंसे घिरी हुई थी ॥ १४½ ॥

> एतत् तु दृश्यते तीर्थं समुद्रस्य वरानने ॥ १५ ॥  
> यत्र सागरमुत्तीर्य तां रात्रिमुषिता वयम् ।

‘सुमुखि ! यह समुद्रका तीर्थ दिखायी देता है, जहाँ समुद्रको पार करके हमलोगोंने वह रात बितायी थी ॥ १५½ ॥

> एष सेतुर्मया बद्धः सागरे लवणार्णवे ॥ १६ ॥  
> तव हेतोर्विशालाक्षि नलसेतुः सुदुष्करः ।

‘विशाललोचने ! खारे पानीके समुद्रमें यह मेरा बँधवाया हुआ पुल है, जो नलसेतुके नामसे विख्यात है । देवि ! तुम्हारे लिये ही यह अत्यन्त दुष्कर सेतु बाँधा गया था ॥ १६½ ॥

> पश्य सागरमक्षोभ्यं वैदेहि वरुणालयम् ॥ १७ ॥  
> अपारमिव गर्जन्तं शङ्खशुक्तिसमाकुलम् ।

‘विदेहनन्दिनि ! इस अक्षोभ्य वरुणालय समुद्रको तो देखो, जो अपार-सा दिखायी देता है । शङ्ख और सीपियोंसे भरा हुआ यह सागर कैसी गर्जना कर रहा है ॥ १७½ ॥

> हिरण्यनाभं शैलेन्द्रं काञ्चनं पश्य मैथिलि ॥ १८ ॥  
> विश्रमार्थं हनुमतो भित्त्वा सागरमुत्थितम् ।

‘मिथिलेशकुमारी ! इस सुवर्णमय पर्वतराज हिरण्यनाभको तो देखो, जो हनुमान्जीको विश्राम देनेके लिये समुद्रकी जल-राशिको चीरकर ऊपरको उठ गया था ॥ १८½ ॥

> एतत् कुक्षौ समुद्रस्य स्कन्धावारनिवेशनम् ॥ १९ ॥  
> अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद् विभुः ।

‘यह समुद्रके उदरमें ही विशाल टापू है, जहाँ मैंने सेनाका पड़ाव डाला था । यहीं पूर्वकालमें भगवान् महादेवने मुझपर कृपा की थी—सेतु बाँधनेसे पहले मेरे द्वारा स्थापित होकर वे यहाँ विराजमान हुए थे ॥ १९½ ॥

> एतत् तु दृश्यते तीर्थं सागरस्य महात्मनः ॥ २० ॥  
> सेतुबन्ध इति ख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम् ।

‘इस पुण्यस्थलमें विशालकाय समुद्रका तीर्थ दिखायी देता है, जो सेतुनिर्माणका मूलप्रदेश होनेके कारण सेतुबन्ध नामसे विख्यात तथा तीनों लोकोंद्वारा पूजित होगा ॥ २०½ ॥

> एतत् पवित्रं परमं महापातकनाशनम् ॥ २१ ॥  
> अत्र राक्षसराजोऽयमाजगाम विभीषणः ।

‘यह तीर्थ परम पवित्र और महान् पातकोंका नाश करनेवाला होगा । यहीं ये राक्षसराज विभीषण आकर मुझसे मिले थे ॥ २१½ ॥

> एषा सा दृश्यते सीते किष्किन्धा चित्रकानना ॥ २२ ॥  
> सुग्रीवस्य पुरी रम्या यत्र वाली मया हतः ।

‘सीते ! यह विचित्र वनप्रान्तसे सुशोभित किष्किन्धा दिखायी देती है, जो वानरराज सुग्रीवकी सुरम्य नगरी है । यहीं मैंने वालीका वध किया था’ ॥ २२½ ॥

> अथ दृष्ट्वा पुरीं सीता किष्किन्धां वालिपालिताम् ॥ २३ ॥  
> अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं रामं प्रणयसाध्वसा ।

तदनन्तर वालिपालित किष्किन्धापुरीका दर्शन करके सीताने प्रेमसे विह्वल हो श्रीरामसे विनयपूर्वक कहा—॥ २३½ ॥

> सुग्रीवप्रियभार्याभिस्ताराप्रमुखतो नृप ॥ २४ ॥  
> अन्येषां वानरेन्द्राणां स्त्रीभिः परिवृता ह्यहम् ।  
> गन्तुमिच्छे सहायोध्यां राजधानीं त्वया सह ॥ २५ ॥

‘महाराज ! मैं सुग्रीवकी तारा आदि प्रिय भार्याओं तथा अन्य वानरेश्वरोंकी स्त्रियोंको साथ लेकर आपके साथ अपनी राजधानी अयोध्यामें चलना चाहती हूँ’ * ॥ २४-२५ ॥

> एवमुक्तोऽथ वैदेह्या राघवः प्रत्युवाच ताम् ।  
> एवमस्त्विति किष्किन्धां प्राप्य संस्थाप्य राघवः ॥२६॥  
> विमानं प्रेक्ष्य सुग्रीवं वाक्यमेतदुवाच ह ।

विदेहनन्दिनी सीताके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने कहा—-‘ऐसा ही हो ।’ फिर किष्किन्धामें पहुँचनेपर उन्होंने विमान ठहराया और सुग्रीवकी ओर देखकर कहा—॥ २६½ ॥

> ब्रूहि वानरशार्दूल सर्वान् वानरपुङ्गवान् ॥ २७ ॥  
> स्त्रीभिः परिवृताः सर्वे ह्ययोध्यां यान्तु सीतया ।  
> तथा त्वमपि सर्वाभिः स्त्रीभिः सह महाबल ॥ २८ ॥  
> अभित्वरय सुग्रीव गच्छामः प्लवगाधिप ।

‘वानरश्रेष्ठ ! तुम समस्त वानरयूथपतियोंसे कहो कि वे सब लोग अपनी-अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर सीताके साथ अयोध्या चलें तथा महाबली वानरराज सुग्रीव ! तुम भी अपनी सब स्त्रियोंके साथ शीघ्र चलनेकी तैयारी करो, जिससे हम सब लोग जल्दी वहाँ पहुँचें’ ॥ २७-२८½ ॥

> एवमुक्तस्तु सुग्रीवो रामेणामिततेजसा ॥ २९ ॥  
> वानराधिपतिः श्रीमांस्तैश्च सर्वैः समावृतः ।  
> प्रविश्यान्तःपुरं शीघ्रं तारामुद्वीक्ष्य सोऽब्रवीत् ॥ ३० ॥

अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर उन सब वानरोंसे घिरे हुए श्रीमान् वानरराज सुग्रीवने शीघ्र ही अन्तःपुरमें प्रवेश करके तारासे भेंट की और इस प्रकार कहा—॥ २९-३० ॥

> प्रिये त्वं सह नारीभिर्वानराणां महात्मनाम् ।  
> राघवेणाभ्यनुज्ञाता मैथिलीप्रियकाम्यया ॥ ३१ ॥  
> त्वर त्वमभिगच्छामो गृह्य वानरयोषितः ।  
> अयोध्यां दर्शयिष्यामः सर्वा दशरथस्त्रियः ॥ ३२ ॥

‘प्रिये ! तुम मिथिलेशकुमारी सीताका प्रिय करनेकी इच्छासे श्रीरघुनाथजीकी आज्ञाके अनुसार सभी प्रधान-प्रधान महात्मा वानरोंकी स्त्रियोंके साथ शीघ्र चलनेकी तैयारी करो । हमलोग इन वानर-पत्नियोंको साथ लेकर चलेंगे और उन्हें अयोध्यापुरी तथा महाराज दशरथकी सब रानियोंका दर्शन करायेंगे’ ॥ ३१-३२ ॥

> सुग्रीवस्य वचः श्रुत्वा तारा सर्वाङ्गशोभना ।  
> आहूय चाब्रवीत् सर्वा वानराणां तु योषितः ॥ ३३ ॥

सुग्रीवकी यह बात सुनकर सर्वाङ्गसुन्दरी ताराने समस्त वानर-पत्नियोंको बुलाकर कहा—॥ ३३ ॥

> सुग्रीवेणाभ्यनुज्ञाता गन्तुं सर्वैश्च वानरैः ।  
> मम चापि प्रियं कार्यमयोध्यादर्शनेन च ॥ ३४ ॥  
> प्रवेशं चैव रामस्य पौरजानपदैः सह ।  
> विभूतिं चैव सर्वासां स्त्रीणां दशरथस्य च ॥ ३५ ॥

‘सखियो ! सुग्रीवकी आज्ञाके अनुसार तुम सब लोग अपने पतियों–समस्त वानरोंके साथ अयोध्या चलनेके लिये शीघ्र तैयार हो जाओ । अयोध्याका दर्शन करके तुमलोग मेरा भी प्रिय कार्य करोगी । वहाँ पुरवासियों तथा जनपदके लोगोंके साथ श्रीरामका जो अपने नगरमें प्रवेश होगा, वह उत्सव हमें देखनेको मिलेगा । हम वहाँ महाराज दशरथकी समस्त रानियोंके वैभवका भी दर्शन करेंगी’ ॥ ३४-३५ ॥

> तारया चाभ्यनुज्ञाताः सर्वा वानरयोषितः ।  
> नेपथ्यविधिपूर्वं तु कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ॥ ३६ ॥  
> अध्यारोहन् विमानं तत् सीतादर्शनकाङ्क्षया ।

ताराकी यह आज्ञा पाकर सारी वानर-पत्नियोंने शृङ्गार करके उस विमानकी परिक्रमा की और सीताजीके दर्शनकी इच्छासे वे उसपर चढ़ गयीं ॥ ३६½ ॥

> ताभिः सहोत्थितं शीघ्रं विमानं प्रेक्ष्य राघवः ॥ ३७ ॥  
> ऋष्यमूकसमीपे तु वैदेहीं पुनरब्रवीत् ।

उन सबके साथ विमानको शीघ्र ही ऊपर उठा देख श्रीरघुनाथजीने ऋष्यमूकके निकट आनेपर पुनः विदेहनन्दिनीसे कहा—॥ ३७½ ॥

> दृश्यतेऽसौ महान् सीते सविद्युदिव तोयदः ॥ ३८ ॥  
> ऋष्यमूको गिरिवरः काञ्चनैर्धातुभिर्वृतः ।

‘सीते ! वह जो बिजलीसहित मेघके समान सुवर्णमय धातुओंसे युक्त श्रेष्ठ एवं महान् पर्वत दिखायी देता है, उसका नाम ऋष्यमूक है ॥ ३८½ ॥

> अत्राहं वानरेन्द्रेण सुग्रीवेण समागतः ॥ ३९ ॥  
> समयश्च कृतः सीते वधार्थं वालिनो मया ।

‘सीते ! यहीं मैं वानरराज सुग्रीवसे मिला था और मित्रता करनेके पश्चात् वालीका वध करनेके लिये प्रतिज्ञा की थी ॥ ३९½ ॥

> एषा सा दृश्यते पम्पा नलिनी चित्रकानना ॥ ४० ॥  
> त्वया विहीनो यत्राहं विललाप सुदुःखितः ।

‘यही वह पम्पा नामक पुष्करिणी है, जो तटवर्ती विचित्र काननोंसे सुशोभित हो रही है । यहाँ तुम्हारे वियोगसे अत्यन्त दुखी होकर मैंने विलाप किया था ॥ ४०½ ॥

> अस्यास्तीरे मया दृष्टा शबरी धर्मचारिणी ॥ ४१ ॥  
> अत्र योजनबाहुश्च कबन्धो निहतो मया ।

‘इसी पम्पाके तटपर मुझे धर्मपरायणा शबरीका दर्शन हुआ था । इधर वह स्थान है, जहाँ एक योजन लंबी भुजावाले कबन्ध नामक असुरका मैंने वध किया था ॥ ४१½ ॥

> दृश्यतेऽसौ जनस्थाने श्रीमान् सीते वनस्पतिः ॥ ४२ ॥  
> जटायुश्च महातेजास्तव हेतोर्विलासिनि ।  
> रावणेन हतो यत्र पक्षिणां प्रवरो बली ॥ ४३ ॥

‘विलासशालिनी सीते ! जनस्थानमें वह शोभाशाली विशाल वृक्ष दिखायी दे रहा है, जहाँ बलवान् एवं महातेजस्वी पक्षिप्रवर जटायु तुम्हारी रक्षा करनेके कारण रावणके हाथसे मारे गये थे ॥ ४२-४३ ॥

> खरश्च निहतो यत्र दूषणश्च निपातितः ।  
> त्रिशिराश्च महावीर्यो मया बाणैरजिह्मगैः ॥ ४४ ॥

‘यह वह स्थान है, जहाँ मेरे सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा खर मारा गया, दूषण धराशायी किया गया और महापराक्रमी त्रिशिराको भी मौतके घाट उतार दिया गया ॥ ४४ ॥

> एतत् तदाश्रमपदमस्माकं वरवर्णिनि ।  
> पर्णशाला तथा चित्रा दृश्यते शुभदर्शने ॥ ४५ ॥  
> यत्र त्वं राक्षसेन्द्रेण रावणेन हृता बलात् ।

‘वरवर्णिनि ! शुभदर्शने ! यह हमलोगोंका आश्रम है तथा वह विचित्र पर्णशाला दिखायी देती है, जहाँ आकर राक्षसराज रावणने बलपूर्वक तुम्हारा अपहरण किया था ॥४५½॥

> एषा गोदावरी रम्या प्रसन्नसलिला शुभा ॥ ४६ ॥  
> अगस्त्यस्याश्रमश्चैव दृश्यते कदलीवृतः ।

‘यह स्वच्छ जलराशिसे सुशोभित मङ्गलमयी रमणीय गोदावरी नदी है तथा वह केलेके कुञ्जोंसे घिरा हुआ महर्षि अगस्त्यका आश्रम दिखायी देता है ॥ ४६½ ॥

> दीप्तश्चैवाश्रमो ह्येष सुतीक्ष्णस्य महात्मनः ॥ ४७ ॥  
> दृश्यते चैव वैदेहि शरभङ्गाश्रमो महान् ।  
> उपयातः सहस्राक्षो यत्र शक्रः पुरंदरः ॥ ४८ ॥

‘यह महात्मा सुतीक्ष्णका दीप्तिमान् आश्रम है और विदेहनन्दिनि ! वह शरभङ्ग मुनिका महान् आश्रम दिखायी देता है, जहाँ सहस्रनेत्रधारी पुरंदर इन्द्र पधारे थे ॥४७-४८॥

> अस्मिन् देशे महाकायो विराधो निहतो मया ।  
> एते ते तापसा देवि दृश्यन्ते तनुमध्यमे ॥ ४९ ॥

‘यह वह स्थान है, जहाँ मैंने विशालकाय विराधका वध किया था। देवि ! तनुमध्यमे ! ये वे तापस दिखायी देते हैं, जिनका दर्शन हमलोगोंने पहले किया था ॥ ४९ ॥

> अत्रिः कुलपतिर्यत्र सूर्यवैश्वानरोपमः ।  
> अत्र सीते त्वया दृष्ठा तापसी धर्मचारिणी ॥ ५० ॥

‘सीते ! इस तापसाश्रमपर ही सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी कुलपति अत्रि मुनि निवास करते हैं ।यहीं तुमने धर्मपरायणा तपस्विनी अनसूयादेवीका दर्शन किया था॥५०॥

> असौ सुतनु शैलेन्द्रश्चित्रकूटः प्रकाशते ।  
> अत्र मां कैकयीपुत्रः प्रसादयितुमागतः ॥ ५१ ॥

‘सुतनु ! वह गिरिराज चित्रकूट प्रकाशित हो रहा है । वहीं कैकेयीकुमार भरत मुझे प्रसन्न करके लौटा लेनेके लिये आये थे ॥ ५१ ॥

> एषा सा यमुना रम्या दृश्यते चित्रकानना ।  
> भरद्वाजाश्रमः श्रीमान् दृश्यते चैष मैथिलि ॥ ५२ ॥

‘मिथिलेशकुमारी ! यह विचित्र काननोंसे सुशोभित रमणीय यमुना नदी दिखायी देती है और यह शोभाशाली भरद्वाजाश्रम दृष्टिगोचर हो रहा है ॥ ५२ ॥

> इयं च दृश्यते गङ्गा पुण्या त्रिपथगा नदी ।  
> नानाद्विजगणाकीर्णा सम्प्रपुष्पितकानना ॥ ५३ ॥

‘ये पुण्यसलिला त्रिपथगा गङ्गा नदी दीख रही हैं,जिनके तटपर नाना प्रकारके पक्षी कलरव करते हैं और द्विजवृन्द पुण्यकर्मोंमें रत हैं । इनके तटवर्ती वनके वृक्ष सुन्दर फूलोंसे भरे हुए हैं ॥ ५३ ॥

> शृङ्गवेरपुरं चैतद् गुहो यत्र सखा मम ।  
> एषा सा दृश्यते सीते सरयूर्यूपमालिनी ॥ ५४ ॥  
> एषा सा दृश्यते सीते राजधानी पितुर्मम ।  
> अयोध्यां कुरु वैदेहि प्रणामं पुनरागता ॥ ५५ ॥

‘यह शृङ्गवेरपुर है, जहाँ मेरा मित्र गुह रहता है । सीते ! यह यूपमालाओंसे अलंकृत सरयू दिखायी देती है, जिसके तटपर मेरे पिताजीकी राजधानी है । विदेहनन्दिनि ! तुम वनवासके बाद फिर लौटकर अयोध्याको आयी हो । इसलिये इस पुरीको प्रणाम करो’ ॥ ५४-५५ ॥

> ततस्ते वानराः सर्वे राक्षसाः सविभीषणाः ।  
> उत्पत्योत्पत्य संहृष्टास्तां पुरीं ददृशुस्तदा ॥ ५६ ॥

तब विभीषणसहित वे सब राक्षस और वानर अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो उछल-उछलकर उस पुरीका दर्शन करने लगे ॥ ५६ ॥

> ततस्तु तां पाण्डुरहर्म्यमालिनीं  
> विशालकक्ष्यां गजवाजिभिर्वृताम् ।  
> पुरीमपश्यन् प्लवगाः सराक्षसाः  
> पुरीं महेन्द्रस्य यथामरावतीम् ॥ ५७ ॥

तत्पश्चात् वे वानर और राक्षस श्वेत अट्टालिकाओंसे अलंकृत और विशाल भवनोंसे विभूषित अयोध्यापुरीको, जो हाथी-घोड़ोंसे भरी थी और देवराज इन्द्रकी अमरावतीपुरीके समान शोभित होती थी, देखने लगे ॥ ५७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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