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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 121"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 121

> तां रात्रिमुषितं रामं सुखोदितमरिंदमम् ।  
> अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं जयं पृष्ट्वा विभीषणः ॥ १ ॥

उस रात्रिको विश्राम करके जब शत्रुसूदन श्रीराम दूसरे दिन प्रातःकाल सुखपूर्वक उठे, तब कुशल-प्रश्नके पश्चात् विभीषणने हाथ जोड़कर कहा—॥ १ ॥

> स्नानानि चाङ्गरागाणि वस्त्राण्याभरणानि च ।  
> चन्दनानि च माल्यानि दिव्यानि विविधानि च ॥ २ ॥

‘रघुनन्दन ! स्नानके लिये जल, अङ्गराग, वस्त्र, आभूषण, चन्दन और भाँति-भाँतिकी दिव्य मालाएँ आपकी सेवामें उपस्थित हैं ॥ २ ॥

> अलंकारविदश्चैता नार्यः पद्मनिभेक्षणाः ।  
> उपस्थितास्त्वां विधिवत् स्नापयिष्यन्ति राघव ॥ ३ ॥

‘रघुवीर ! शृंगारकलाको जाननेवाली ये कमलनयनी नारियाँ भी सेवाके लिये प्रस्तुत हैं, जो आपको विधिपूर्वक स्नान करायेंगी’ ॥ ३ ॥

> प्रवमुक्तस्तु काकुत्स्थः प्रत्युवाच विभीषणम् ।  
> हरीन् सुग्रीवमुख्यांस्त्वं स्नानेनोपनिमन्त्रय ॥ ४ ॥

विभीषणके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे कहा— ‘मित्र ! तुम सुग्रीव आदि वानरवीरोंसे स्नानके लिये अनुरोध करो ॥ ४ ॥

> स तु ताम्यति धर्मात्मा मम हेतोः सुखोचितः ।  
> सुकुमारो महाबाहुर्भरतः सत्यसंश्रयः ॥ ५ ॥

‘मेरे लिये तो इस समय सत्यका आश्रय लेनेवाले धर्मात्मा महाबाहु भरत बहुत कष्ट सह रहे हैं । वे सुकुमार हैं और सुख पानेके योग्य हैं ॥ ५ ॥

> तं विना कैकयीपुत्रं भरतं धर्मचारिणम् ।  
> न मे स्नानं बहु मतं वस्त्राण्याभरणानि च ॥ ६ ॥

‘उन धर्मपरायण कैकेयीकुमार भरतसे मिले बिना न तो मुझे स्नान अच्छा लगता है, न वस्त्र और आभूषणोंको धारण करना ही ॥ ६ ॥

> एतत् पश्य यथा क्षिप्रं प्रतिगच्छाम तां पुरीम् ।  
> अयोध्यां गच्छतो ह्येष पन्थाः परमदुर्गमः ॥ ७ ॥

‘अब तो तुम इस बातकी ओर ध्यान दो कि हम किस तरह जल्दी-से-जल्दी अयोध्यापुरीको लौट सकेंगे; क्योंकि वहाँ तक पैदल यात्रा करनेवालेके लिये यह मार्ग बहुत ही दुर्गम है’ ॥ ७ ॥

> एवमुक्तस्तु काकुत्स्थं प्रत्युवाच विभीषणः ।  
> अह्ना त्वां प्रापयिष्यामि तां पुरीं पार्थिवात्मज ॥ ८ ॥  
> पुष्पकं नाम भद्रं ते विमानं सूर्यसनिभम् ।  
> मम भ्रातुः कुबेरस्य रावणेन बलीयसा ॥ ९ ॥  
> हृतं निर्जित्य संग्रामे कामगं दिव्यमुत्तमम् ।  
> त्वदर्थं पालितं चेदं तिष्ठत्यतुलविक्रम ॥ १० ॥

उनके ऐसा कहनेपर विभीषणने श्रीरामचन्द्रजीको इस प्रकार उत्तर दिया—‘राजकुमार ! आप इसके लिये चिन्तित न हों । मैं एक ही दिनमें आपको उस पुरीमें पहुँचा दूँगा ॥ ‘आपका कल्याण हो । मेरे यहाँ मेरे बड़े भाई कुबेरका सूर्यतुल्य तेजस्वी पुष्पकविमान मौजूद है, जिसे महाबली रावणने संग्राममें कुबेरको हराकर छीन लिया था । अतुल पराक्रमी श्रीराम ! वह इच्छानुसार चलनेवाला, दिव्य एवं उत्तम विमान मैंने यहाँ आपहीके लिये रख छोड़ा है ॥ ९-१० ॥

> तदिदं मेघसंकाशं विमानमिह तिष्ठति ।  
> येन यास्यसि यानेन त्वमयोध्यां गतज्वरः ॥ ११ ॥

‘मेघ-जैसा दिखायी देनेवाला वह दिव्य विमान यहाँ विद्यमान है, जिसके द्वारा निश्चिन्त होकर आप अयोध्यापुरीको जा सकेंगे ॥ ११ ॥

> अहं ते यद्यनुग्राह्यो यदि स्मरसि मे गुणान् ।  
> वस तावदिह प्राज्ञ यद्यस्ति मयि सौहृदम् ॥ १२ ॥  
> लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या भार्यया सह ।  
> अर्चितः सर्वकामैस्त्वं ततो राम गमिष्यसि ॥ १३ ॥

‘श्रीराम ! यदि मुझे आप अपना कृपापात्र समझते हैं, मुझमें कुछ गुण देखते या मानते हैं और मेरे प्रति आपका सौहार्द है तो अभी भाई लक्ष्मण तथा पत्नी सीताजीके साथ कुछ दिन यहीं विराजिये । मैं सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओंद्वारा आपका सत्कार करूँगा । मेरे उस सत्कारको ग्रहण कर लेनेके पश्चात् अयोध्याको पधारियेगा ॥ १२-१३ ॥

> प्रीतियुक्तस्य विहितां ससैन्यः ससुहृद्गणः ।  
> सत्क्रियां राम मे तावद् गृहाण त्वं मयोद्यताम् ॥ १४ ॥

‘रघुनन्दन ! मैं प्रसन्नतापूर्वक आपका सत्कार करना चाहता हूँ । मेरे द्वारा प्रस्तुत किये गये उस सत्कारको आप सुहृदों तथा सेनाओंके साथ ग्रहण करें ॥ १४ ॥

> प्रणयाद् बहुमानाच्च सौहार्देन च राघव ।  
> प्रसादयामि प्रेष्योऽहं न खल्वाज्ञापयामि ते ॥ १५ ॥

‘रघुवीर ! मैं केवल प्रेम, सम्मान और सौहार्दके कारण ही आपसे यह प्रार्थना कर रहा हूँ । आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ । मैं आपका सेवक हूँ । इसलिये आपसे विनय करता हूँ, आपको आज्ञा नहीं देता हूँ’ ॥ १५ ॥

> एवमुक्तस्ततो रामः प्रत्युवाच विभीषणम् ।  
> रक्षसां वानराणां च सर्वेषामेव शृण्वताम् ॥ १६ ॥

जब विभीषणने ऐसी बात कही, तब श्रीराम समस्त राक्षसों और वानरोंके सुनते हुए ही उनसे बोले—॥ १६ ॥

> पूजितोऽस्मि त्वया वीर साचिव्येन परेण च ।  
> सर्वात्मना च चेष्टाभिः सौहार्देन परेण च ॥ १७ ॥

‘वीर ! मेरे परम सुहृद् और उत्तम सचिव बनकर तुमने सब प्रकारकी चेष्टाओंद्वारा मेरा सम्मान और पूजन किया है ॥ १७ ॥

> न खल्वेतन्न कुर्यां ते वचनं राक्षसेश्वर ।  
> तं तु मे भ्रातरं द्रष्टुं भरतं त्वरते मनः ॥ १८ ॥  
> मां निवर्तयितुं योऽसौ चित्रकूटमुपागतः ।  
> शिरसा याचतो यस्य वचनं न कृतं मया ॥ १९ ॥

‘राक्षसेश्वर ! तुम्हारी इस बातको मैं निश्चय ही अस्वीकार नहीं कर सकता हूँ; परंतु इस समय मेरा मन अपने उन भाई भरतको देखनेके लिये उतावला हो उठा है, जो मुझे लौटा ले जानेके लिये चित्रकूटतक आये थे और मेरे चरणोंमें सिर झुकाकर याचना करनेपर भी जिनकी बात मैंने नहीं मानी थी ॥ १८-१९ ॥

> कौसल्यां च सुमित्रां च कैकेयीं च यशस्विनीम् ।  
> गुहं च सुहृदं चैव पौराञ्जानपदैः सह ॥ २० ॥

‘उनके सिवा माता कौसल्या, सुमित्रा, यशस्विनी कैकेयी, मित्रवर गुह और नगर एवं जनपदके लोगोंको देखनेके लिये भी मुझे बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ॥ २० ॥

> अनुजानीहि मां सौम्य पूजितोऽस्मि विभीषण ।  
> मन्युर्न खलु कर्तव्यः सखे त्वां चानुमानये ॥ २१ ॥

‘सौम्य विभीषण ! अब तो तुम मुझे जानेकी ही अनुमति दो । मैं तुम्हारेद्वारा बहुत सम्मानित हो चुका हूँ । सखे ! मेरे इस हठके कारण मुझपर क्रोध न करना । इसके लिये मैं तुमसे बार-बार प्रार्थना करता हूँ ॥ २१ ॥

> उपस्थापय मे शीघ्रं विमानं राक्षसेश्वर ।  
> कृतकार्यस्य मे वासः कथं स्यादिह सम्मतः ॥ २२ ॥

‘राक्षसराज ! अब शीघ्र मेरे लिये पुष्पकविमानको यहाँ मँगाओ । जब मेरा यहाँ कार्य समाप्त हो गया, तब यहाँ ठहरना मेरे लिये कैसे ठीक हो सकता है ?’ ॥ २२ ॥

> एवमुक्तस्तु रामेण राक्षसेन्द्रो विभीषणः ।  
> विमानं सूर्यसंकाशमाजुहाव त्वरान्वितः ॥ २३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर राक्षसराज विभीषणने बड़ी उतावलीके साथ उस सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानका आवाहन किया ॥ २३ ॥

> ततः काञ्चनचित्राङ्गं वैदूर्यमणिवेदिकम् ।  
> कूटागारैः परिक्षिप्तं सर्वतो रजतप्रभम् ॥ २४ ॥

उस विमानका एक-एक अङ्ग सोनेसे जड़ा हुआ था, जिससे उसकी विचित्र शोभा होती थी । उसके भीतर वैदूर्य मणि ( नीलम ) की वेदियाँ थीं, जहाँ-तहाँ गुप्त गृह बने हुए थे और वह सब ओर चाँदीके समान चमकीला था ॥ २४ ॥

> पाण्डुराभिः पताकाभिर्ध्वजैश्च समलंकृतम् ।  
> शोभितं काञ्चनैर्हर्म्यैर्हेमपद्मविभूषितैः ॥ २५ ॥

वह श्वेत-पीत वर्णवाली पताकाओं तथा ध्वजोंसे अलंकृत था । उसमें सोनेके कमलोंसे सुसज्जित स्वर्णमयी अट्टालिकाएँ थीं, जो उस विमानकी शोभा बढ़ाती थीं ॥ २५ ॥

> प्रकीर्णं किङ्किणीजालैर्मुक्तामणिगवाक्षकम् ।  
> घण्टाजालैः परिक्षिप्तं सर्वतो मधुरस्वनम् ॥ २६ ॥

सारा विमान छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरोंसे व्याप्त था । उसमें मोती और मणियोंकी खिड़कियाँ लगी थीं । सब ओर घंटे बँधे थे, जिससे मधुर ध्वनि होती रहती थी ॥ २६ ॥

> तं मेरुशिखराकारं निर्मितं विश्वकर्मणा ।  
> बृहद्भिर्भूषितं हर्म्यैर्मुक्तारजतशोभितैः ॥ २७ ॥

वह विश्वकर्माका बनाया हुआ विमान सुमेरु-शिखरके समान ऊँचा तथा मोती और चाँदीसे सुसज्जित बड़े-बड़े कमरोंसे विभूषित था ॥ २७ ॥

> तलैः स्फटिकचित्राङ्गैर्वैदूर्यैश्च वरासनैः ।  
> महार्हास्तरणोपेतैरुपपन्नं महाधनैः ॥ २८ ॥

उसकी फर्श विचित्र स्फटिकमणिसे जड़ी हुई थी । उसमें ‘नीलमके बहुमूल्य सिंहासन थे, जिनपर महामूल्यवान् बिस्तर बिछे हुए थे ॥ २८ ॥

> उपस्थितमनाधृष्यं तद् विमानं मनोजवम् ।  
> निवेदयित्वा रामाय तस्थौ तत्र विभीषणः ॥ २९ ॥  
> तत् पुष्पकं कामगमं विमान-  
> मुपस्थितं भूधरसंनिकाशम् ।  
> दृष्ट्वा तदा विस्मयमाजगाम  
> रामः ससौमित्रिरुदारसत्त्वः ॥ ३० ॥

उसका मनके समान वेग था और उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी । वह विमान सेवामें उपस्थित हुआ । विभीषण श्रीरामको उसके आनेकी सूचना देकर वहाँ खड़े हो गये ॥ पर्वतके समान ऊँचे और इच्छानुसार चलनेवाले उस पुष्पकविमानको तत्काल उपस्थित देख लक्ष्मणसहित उदारचेता भगवान् श्रीरामको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ३० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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