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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 117"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 117

> ततो हि दुर्मना रामः श्रुत्वैवं वदतां गिरः ।  
> दध्यौ मुहूर्तं धर्मात्मा बाष्पव्याकुललोचनः ॥ १ ॥  
> ततो वैश्रवणो राजा यमश्च पितृभिः सह ।  
> सहस्राक्षश्च देवेशो वरुणश्च जलेश्वरः ॥ २ ॥  
> षडर्धनयनः श्रीमान् महादेवो वृषध्वजः ।  
> कर्ता सर्वस्य लोकस्य ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः ॥ ३ ॥  
> एते सर्वे समागम्य विमानैः सूर्यसंनिभैः ।  
> आगम्य नगरीं लङ्कामभिजग्मुश्च राघवम् ॥ ४ ॥

तदनन्तर धर्मात्मा श्रीराम हाहाकार करनेवाले वानर और राक्षसोंकी बातें सुनकर मन-ही-मन बहुत दुखी हुए और आँखोंमें आँसू भरकर दो घड़ीतक कुछ सोचते रहे ॥ इसी समय विश्रवाके पुत्र यक्षराज कुबेर, पितरोंसहित यमराज, देवताओंके स्वामी सहस्र नेत्रधारी इन्द्र, जलके अधिपति वरुण, त्रिनेत्रधारी श्रीमान् वृषभध्वज महादेव तथा सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी—ये सब देवता सूर्यतुल्य विमानोंद्वारा लङ्कापुरीमें आकर श्रीरघुनाथजीके पास गये ॥ २–४ ॥

> ततः सहस्ताभरणान् प्रगृह्य विपुलान् भुजान् ।  
> अब्रुवंस्त्रिदशश्रेष्ठा राघवं प्राञ्जलिं स्थितम् ॥ ५ ॥

भगवान् श्रीराम उनके सामने हाथ जोड़े खड़े थे । वे श्रेष्ठ देवता आभूषणोंसे अलंकृत अपनी विशाल भुजाओंको उठाकर उनसे बोले—॥ ५ ॥

> कर्ता सर्वस्य लोकस्य श्रेष्ठो ज्ञानविदां विभुः ।  
> उपेक्षसे कथं सीतां पतन्तीं हव्यवाहने ।  
> कथं देवगणश्रेष्ठमात्मानं नावबुद्ध्यसे ॥ ६ ॥

‘श्रीराम ! आप सम्पूर्ण विश्वके उत्पादक, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और सर्वव्यापक हैं । फिर इस समय आगमें गिरी हुई सीताकी उपेक्षा कैसे कर रहे हैं ? आप समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ विष्णु ही हैं । इस बातको कैसे नहीं समझ रहे हैं ॥ ६ ॥

> ऋतधामा वसुः पूर्वं वसूनां च प्रजापतिः ।

‘पूर्वकालमें वसुओंके प्रजापति जो ऋतधामा नामक वसु थे, वे आप ही हैं । आप तीनों लोकोंके आदिकर्ता स्वयंप्रभु हैं ॥ ७ ॥

> रुद्राणामष्टमो रुद्रः साध्यानामपि पञ्चमः ।  
> अश्विनौ चापि कर्णौ ते सूर्याचन्द्रमसौ दृशौ ॥ ८ ॥

‘रुद्रोंमें आठवें रुद्र और साध्योंमें पाँचवें साध्य भी आप ही हैं । दो अश्विनीकुमार आपके कान हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा नेत्र हैं ॥ ८ ॥

> अन्ते चादौ च मध्ये च दृश्यसे च परंतप ।  
> उपेक्षसे च वैदेहीं मानुषः प्राकृतो यथा ॥ ९ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले देव ! सृष्टिके आदि, अन्त और मध्यमें भी आप ही दिखायी देते हैं । फिर एक साधारण मनुष्यकी भाँति आप सीताकी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं ?’॥९॥

> इत्युक्तो लोकपालैस्तैः स्वामी लोकस्य राघवः ।  
> अब्रवीत् त्रिदशश्रेष्ठान् रामो धर्मभृतां वरः ॥ १० ॥

उन लोकपालोंके ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ लोकनाथ रघुनाथ श्रीरामने उन श्रेष्ठ देवताओंसे कहा—॥१०॥

> आत्मानं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम् ।  
> सोऽहं यश्च यतश्चाहं भगवांस्तद् ब्रवीतु मे ॥ ११ ॥

‘देवगण ! मैं तो अपनेको मनुष्य दशरथपुत्र राम ही समझता हूँ । भगवन् ! मैं जो हूँ और जहाँसे आया हूँ, वह सब आप ही मुझे बताइये’ ॥ ११ ॥

> इति ब्रुवाणं काकुत्स्थं ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः ।  
> अब्रवीच्छृणु मे वाक्यं सत्यं सत्यपराक्रम ॥ १२ ॥

श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजीने उनसे इस प्रकार कहा—‘सत्यपराक्रमी श्रीरघुवीर ! आप मेरी सच्ची बात सुनिये ॥ १२ ॥

> भवान् नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः ।  
> एकशृङ्गो वराहस्त्वं भूतभव्यसपत्नजित् ॥ १३ ॥

‘आप चक्र धारण करनेवाले सर्वसमर्थ श्रीमान् भगवान् नारायण देव हैं, एक दाढ़वाले पृथ्वीधारी वराह हैं तथा देवताओंके भूत एवं भावी शत्रुओंको जीतनेवाले हैं ॥ १३ ॥

> अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव ।  
> लोकानां त्वं परो धर्मो विष्वक्सेनश्चतुर्भुजः ॥ १४ ॥

‘रघुनन्दन ! आप अविनाशी परब्रह्म हैं । सृष्टिके आदि, मध्य और अन्तमें सत्यरूपसे विद्यमान हैं । आप ही लोकोंके परम धर्म हैं । आप ही विष्वक्सेन तथा चार भुजाधारी श्रीहरि हैं ॥ १४ ॥

> शार्ङ्गधन्वा हृषीकेशः पुरुषः पुरुषोत्तमः ।  
> अजितः खड्गधृग् विष्णुः कृष्णश्चैव बृहद्बलः ॥ १५ ॥  
> सेनानीर्ग्रामणीश्च त्वं बुद्धिः सत्त्वं क्षमा दमः ।  
> प्रभवश्चाप्ययश्च त्वमुपेन्द्रो मधुसूदनः ॥ १६ ॥

‘आप ही शार्ङ्गधन्वा, हृषीकेश, अन्तर्यामी पुरुष और पुरुषोत्तम हैं । आप किसीसे पराजित नहीं होते । आप नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले विष्णु एवं महाबली कृष्ण हैं ॥ ‘आप ही देव-सेनापति तथा गाँवोंके मुखिया अथवा नेता हैं । आप ही बुद्धि, सत्त्व, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह तथा सृष्टि एवं प्रलयके कारण हैं । आप ही उपेन्द्र ( वामन ) और मधुसूदन हैं ॥ १६ ॥

> इन्द्रकर्मा महेन्द्रस्त्वं पद्मनाभो रणान्तकृत् ।  
> शरण्यं शरणं च त्वामाहुर्दिव्या महर्षयः ॥ १७ ॥  
> सहस्रशृङ्गो वेदात्मा शतशीर्षो महर्षभः ।  
> त्वं त्रयाणां हि लोकानामादिकर्ता स्वयंप्रभुः ॥ १८ ॥

‘इन्द्रको भी उत्पन्न करनेवाले महेन्द्र और युद्धका अन्त करनेवाले शान्तस्वरूप पद्मनाभ भी आप ही हैं । दिव्य महर्षिगण आपको शरणदाता तथा शरणागतवत्सल बताये हैं ॥ ‘आप ही सहस्रों शाखारूप सींग तथा सैकड़ों विधिवाक्य-रूप मस्तकोंसे युक्त वेदरूप महाऋषभ हैं । आप ही तीनों लोकोंके आदिकर्ता और स्वयंप्रभु ( परम स्वतन्त्र ) हैं ॥१८॥

> सिद्धानामपि साध्यानामाश्रयश्चासि पूर्वजः ।  
> त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोंकारः परात्परः ॥ १९ ॥

‘आप सिद्ध और साध्योंके आश्रय तथा पूर्वज हैं । यज्ञ, वषट्कार और ओंकार भी आप ही हैं । आप श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ परमात्मा हैं ॥ १९ ॥

> प्रभवं निधनं चापि नो विदुः को भवानिति ।  
> दृश्यसे सर्वभूतेषु गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥ २० ॥

‘आपके आविर्भाव और तिरोभावको कोई नहीं जानता । आप कौन हैं—इसका भी किसीको पता नहीं है । समस्त प्राणियोंमें, गौओंमें तथा ब्राह्मणोंमें भी आप ही दिखायी देते हैं ॥ २० ॥

> दिक्षु सर्वासु गगने पर्वतेषु नदीषु च ।  
> सहस्रचरणः श्रीमाञ्शतशीर्षः सहस्रदृक् ॥ २१ ॥

‘समस्त दिशाओंमें, आकाशमें, पर्वतोंमें और नदियोंमें भी आपकी ही सत्ता है । आपके सहस्रों चरण, सैकड़ों मस्तक और सहस्रों नेत्र हैं ॥ २१ ॥

> त्वं धारयसि भूतानि पृथिवीं सर्वपर्वतान् ।  
> अन्ते पृथिव्याः सलिले दृश्यसे त्वं महोरगः ॥ २२ ॥  
> त्रींल्लोकान् धारयन् राम देवगन्धर्वदानवान् ।  
> अहं ते हृदयं राम जिह्वा देवी सरस्वती ॥ २३ ॥

‘आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंको, पृथ्वीको और समस्त पर्वतोंको धारण करते हैं । पृथ्वीका अन्त हो जानेपर आप ही जलके ऊपर महान् सर्प—शेषनागके रूपमें दिखायी देते हैं ॥ ‘श्रीराम ! आप ही तीनों लोकोंको तथा देवता, गन्धर्व और दानवोंको धारण करनेवाले विराट् पुरुष नारायण हैं । ‘सबके हृदयमें रमण करनेवाले परमात्मन् ! मैं ब्रह्मा आपका हृदय हूँ और देवी सरस्वती आपकी जिह्वा हैं ॥ २३ ॥

> देवा रोमाणि गात्रेषु ब्रह्मणा निर्मिताः प्रभो ।  
> निमेषस्ते स्मृता रात्रिरुन्मेषो दिवसस्तथा ॥ २४ ॥

‘प्रभो ! मुझ ब्रह्माने जिनकी सृष्टि की है, वे सब देवता आपके विराट् शरीरमें रोम हैं । आपके नेत्रोंका बंद होना रात्रि और खुलना ही दिन है ॥ २४ ॥

> संस्कारास्त्वभवन् वेदा नैतदस्ति त्वया विना ।  
> जगत् सर्वं शरीरं ते स्थैर्यं ते वसुधातलम् ॥ २५ ॥

‘वेद आपके संस्कार हैं । आपके बिना इस जगत्का अस्तित्व नहीं है । सम्पूर्ण विश्व आपका शरीर है । पृथ्वी आपकी स्थिरता है ॥ २५ ॥

> अग्निः कोपः प्रसादस्ते सोमः श्रीवत्सलक्षणः ।  
> त्वया लोकास्त्रयः क्रान्ताः पुरा स्वैर्विक्रमैस्त्रिभिः ॥ २६ ॥

‘अग्नि आपका कोप है और चन्द्रमा प्रसन्नता है, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न धारण करनेवाले भगवान् विष्णु आप ही हैं । पूर्वकालमें ( वामनावतारके समय ) आपने ही अपने तीन पगोंसे तीनों लोक नाप लिये थे ॥ २६ ॥

> महेन्द्रश्च कृतो राजा बलिं बद्ध्वा सुदारुणम् ।  
> सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ॥ २७ ॥

‘आपने अत्यन्त दारुण दैत्यराज बलिको बाँधकर इन्द्रको तीनों लोकोंका राजा बनाया था । सीता साक्षात् लक्ष्मी हैं और आप भगवान् विष्णु हैं । आप ही सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण एवं प्रजापति हैं ॥ २७ ॥

> वधार्थं रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् ।  
> तदिदं नस्त्वया कार्यं कृतं धर्मभृतां वर ॥ २८ ॥

‘धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ रघुवीर ! आपने रावणका वध करनेके लिये ही इस लोकमें मनुष्यके शरीरमें प्रवेश किया था । हमलोगोंका कार्य आपने सम्पन्न कर दिया ॥ २८ ॥

> निहतो रावणो राम प्रहृष्टो दिवमाक्रम ।  
> अमोघं देव वीर्यं ते न तेऽमोघाः पराक्रमाः ॥ २९ ॥  
> अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः ।  
> अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥ ३० ॥

‘श्रीराम ! आपके द्वारा रावण मारा गया । अब आप प्रसन्नतापूर्वक अपने दिव्य धाममें पधारिये । देव ! आपका बल अमोघ है । आपके पराक्रम भी व्यर्थ होनेवाले नहीं हैं ॥ ‘श्रीराम ! आपका दर्शन अमोघ है । आपका स्तवन भी अमोघ है तथा आपमें भक्ति रखनेवाले मनुष्य भी इस भूमण्डलमें अमोघ ही होंगे ॥ ३० ॥

> ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् ।  
> प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥ ३१ ॥

‘आप पुराणपुरुषोत्तम हैं । दिव्यरूपधारी परमात्मा हैं । जो लोग आपमें भक्ति रक्खेंगे, वे इस लोक और परलोकमें अपने सभी मनोरथ प्राप्त कर लेंगे’ ॥ ३१ ॥

> इममार्षं स्तवं दिव्यमितिहासं पुरातनम् ।  
> ये नराः कीर्तयिष्यन्ति नास्ति तेषां पराभवः ॥ ३२ ॥

यह परम ऋषि ब्रह्माका कहा हुआ दिव्य स्तोत्र तथा पुरातन इतिहास है । जो लोग इसका कीर्तन करेंगे, उनका कभी पराभव नहीं होगा ॥ ३२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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