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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 116"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 116

> एवमुक्ता तु वैदेही परुषं रोमहर्षणम् ।  
> राघवेण सरोषेण श्रुत्वा प्रव्यथिताभवत् ॥ १ ॥

श्रीरघुनाथजीने रोषपूर्वक जब इस तरह रोंगटे खड़े कर देनेवाली कठोर बात कही, तब उसे सुनकर विदेहराजकुमारी सीताके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ १ ॥

> सा तदाश्रुतपूर्वं हि जने महति मैथिली ।  
> श्रुत्वा भर्तुर्वचो घोरं लज्जयावनताभवत् ॥ २ ॥

इतने बड़े जनसमुदायमें अपने स्वामीके मुँहसे ऐसी भयंकर बात, जो पहले कभी कानोंमें नहीं पड़ी थी, सुनकर मिथिलेशकुमारी लाजसे गड़ गयीं ॥ २ ॥

> प्रविशन्तीव गात्राणि स्वानि सा जनकात्मजा ।  
> वाक्शरैस्तैः सशल्येव भृशमश्रुण्यवर्तयत् ॥ ३ ॥

उन वाग्बाणोंसे पीड़ित होकर वे जनककिशोरी अपने ही अङ्गोंमें विलीन-सी होने लगीं । उनके नेत्रोंसे आँसुओंका अविरल प्रवाह जारी हो गया ॥ ३ ॥

> ततो बाष्पपरिक्लिन्नं प्रमार्जन्ती स्वमाननम् ।  
> शनैर्गद्गदया वाचा भर्तारमिदमब्रवीत् ॥ ४ ॥

नेत्रोंके जलसे भीगे हुए अपने मुखको अंचलसे पोंछती हुई वे धीरे-धीरे गद्गद वाणीमें पतिदेवसे इस प्रकार बोलीं—॥ ४ ॥

> किं मामसदृशं वाक्यमीदृशं श्रोत्रदारुणम् ।  
> रूक्षं श्रावयसे वीर प्राकृतः प्राकृतामिव ॥ ५ ॥

‘वीर ! आप ऐसी कठोर, अनुचित, कर्णकटु और रूखी बात मुझे क्यों सुना रहे हैं । जैसे कोई निम्न श्रेणीका पुरुष निम्नकोटिकी ही स्त्रीसे न कहने योग्य बातें भी कह डालता है, उसी तरह आप भी मुझसे कह रहे हैं ॥ ५ ॥

> न तथास्मि महाबाहो यथा मामवगच्छसि ।  
> प्रत्ययं गच्छ मे स्वेन चारित्रेणैव ते शपे ॥ ६ ॥

‘महाबाहो ! आप मुझे अब जैसी समझते हैं, वैसी मैं नहीं हूँ । मुझपर विश्वास कीजिये । मैं अपने सदाचारकी ही शपथ खाकर कहती हूँ कि मैं संदेहके योग्य नहीं हूँ ॥ ६ ॥

> पृथक्स्त्रीणां प्रचारेण जातिं त्वं परिशङ्कसे ।  
> परित्यजैनां शङ्कां तु यदि तेऽहं परीक्षिता ॥ ७ ॥

‘नीच श्रेणीकी स्त्रियोंका आचरण देखकर यदि आप समूची स्त्री-जातिपर ही संदेह करते हैं तो यह उचित नहीं है । यदि आपने मुझे अच्छी तरह परख लिया हो तो अपने इस संदेहको मनसे निकाल दीजिये ॥ ७ ॥

> यदहं गात्रसंस्पर्शं गतास्मि विवशा प्रभो ।  
> कामकारो न मे तत्र दैवं तत्रापराध्यति ॥ ८ ॥

‘प्रभो ! रावणके शरीरसे जो मेरे इस शरीरका स्पर्श हो गया है, उसमें मेरी विवशता ही कारण है । मैंने स्वेच्छासे ऐसा नहीं किया था । इसमें मेरे दुर्भाग्यका ही दोष है ॥८॥

> मदधीनं तु यत् तन्मे हृदयं त्वयि वर्तते ।  
> पराधीनेषु गात्रेषु किं करिष्याम्यनीश्वरी ॥ ९ ॥

‘जो मेरे अधीन है, वह मेरा हृदय सदा आपमें ही लगा रहता है ( उसपर दूसरा कोई अधिकार नहीं कर सकता ); परंतु मेरे अङ्ग तो पराधीन थे । उनका यदि दूसरेसे स्पर्श हो गया तो मैं विवश अबला क्या कर सकती थी ॥ ९ ॥

> सह संवृद्धभावेन संसर्गेण च मानद ।  
> यदि तेऽहं न विज्ञाता हता तेनास्मि शाश्वतम् ॥ १० ॥

‘दूसरोंको मान देनेवाले प्राणनाथ ! हम दोनोंका परस्पर अनुराग सदा साथ-साथ बढ़ा है । हम सदा एक साथ रहते आये हैं । इतनेपर भी यदि आपने मुझे अच्छी तरह नहीं समझा तो मैं सदाके लिये मारी गयी ॥ १० ॥

> प्रेषितस्ते महावीरो हनुमानवलोककः ।  
> लङ्कास्थाहं त्वया राजन् किं तदा न विसर्जिता ॥ ११ ॥

‘महाराज ! लङ्कामें मुझे देखनेके लिये जब आपने महावीर हनुमान्को भेजा था, उसी समय मुझे क्यों नहीं त्याग दिया ? ॥ ११ ॥

> प्रत्यक्षं वानरस्यास्य तद्वाक्यसमनन्तरम् ।  
> त्वया संत्यक्तया वीर त्यक्तं स्याज्जीवितं मया ॥ १२ ॥

‘उस समय वानरवीर हनुमान्के मुखसे आपके द्वारा अपने त्यागकी बात सुनकर तत्काल इनके सामने ही मैंने अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया होता ॥ १२ ॥

> न वृथा ते श्रमोऽयं स्यात् संशये न्यस्य जीवितम् ।  
> सुहृज्जनपरिक्लेशो न चायं विफलस्तव ॥ १३ ॥

‘फिर इस प्रकार अपने जीवनको संकटमें डालकर आपको यह युद्ध आदिका व्यर्थ परिश्रम नहीं करना पड़ता तथा आपके ये मित्र लोग भी अकारण कष्ट नहीं उठाते ॥ १३ ॥

> त्वया तु नृपशार्दूल रोषमेवानुवर्तता ।  
> लघुनेव मनुष्येण स्त्रीत्वमेव पुरस्कृतम् ॥ १४ ॥  
> अपदेशो मे जनकान्नोत्पत्तिर्वसुधातलात् ।  
> मम वृत्तं च वृत्तज्ञ बहु ते न पुरस्कृतम् ॥ १५ ॥

‘नृपश्रेष्ठ ! आपने ओछे मनुष्यकी भाँति केवल रोषका ही अनुसरण करके मेरे शील-स्वभावका विचार छोड़कर केवल निम्नकोटिकी स्त्रियोंके स्वभावको ही अपने सामने रक्खा है ॥ ‘सदाचारके मर्मको जाननेवाले देवता ! राजा जनककी यज्ञभूमिसे आविर्भूत होनेके कारण ही मुझे जानकी कहकर पुकारा जाता है । वास्तवमें मेरी उत्पत्ति जनकसे नहीं हुई है । मैं भूतलसे प्रकट हुई हूँ । ( साधारण मानव-जातिसे विलक्षण हूँ—दिव्य हूँ । उसी तरह मेरा आचार-विचार भी अलौकिक एवं दिव्य है; मुझमें चारित्रिक बल विद्यमान है, परंतु) आपने मेरी इन विशेषताओंको अधिक महत्त्व नहीं दिया—इन सबको अपने सामने नहीं रखा ॥ १५ ॥

> न प्रमाणीकृतः पाणिर्बाल्ये मम निपीडितः ।  
> मम भक्तिश्च शीलं च सर्वं ते पृष्ठतः कृतम् ॥ १६ ॥

‘बाल्यावस्थामें आपने मेरा पाणिग्रहण किया है, इसकी ओर भी ध्यान नहीं दिया । आपके प्रति मेरे हृदयमें जो भक्ति है और मुझमें जो शील है, वह सब आपने पीछे ढकेल दिया—एक साथ ही भुला दिया’ ॥ १६ ॥

> इति ब्रुवन्ती रुदती बाष्पगद्गदभाषिणी ।  
> उवाच लक्ष्मणं सीता दीनं ध्यानपरायणम् ॥ १७ ॥

इतना कहते-कहते सीताका गला भर आया । वे रोती और आँसू बहाती हुई दुखी एवं चिन्तामग्न होकर बैठे हुए लक्ष्मणसे गद्गद वाणीमें बोलीं—॥ १७ ॥

> चितां मे कुरु सौमित्रे व्यसनस्यास्य भेषजम् ।  
> मिथ्यापवादोपहता नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ १८ ॥

‘सुमित्रानन्दन ! मेरे लिये चिता तैयार कर दो । मेरे इस दुःखकी यही दवा है । मिथ्या कलङ्कसे कलङ्कित होकर मैं जीवित नहीं रह सकती ॥ १८ ॥

> अप्रीतेन गुणैर्भर्त्रा त्यक्ताया जनसंसदि ।  
> या क्षमा मे गतिर्गन्तुं प्रवेक्ष्ये हव्यवाहनम् ॥ १९ ॥

‘मेरे स्वामी मेरे गुणोंसे प्रसन्न नहीं हैं । इन्होंने भरी सभामें मेरा परित्याग कर दिया है । ऐसी दशामें मेरे लिये जो उचित मार्ग है, उसपर जानेके लिये मैं अग्निमें प्रवेश करूँगी’ ॥ १९ ॥

> एवमुक्तस्तु वैदेह्या लक्ष्मणः परवीरहा ।  
> अमर्षवशमापन्नो राघवं समुदैक्षत ॥ २० ॥

विदेहनन्दिनीके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने अमर्षके वशीभूत होकर श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखा ( उनसे सीताजीका वह अपमान सहा नहीं जाता था ) ॥ २० ॥

> स विज्ञाय मनश्छन्दं रामस्याकारसूचितम् ।  
> चितां चकार सौमित्रिर्मते रामस्य वीर्यवान् ॥ २१ ॥

परंतु श्रीरामके इशारेसे सूचित होनेवाले उनके हार्दिक अभिप्रायको जानकर पराक्रमी लक्ष्मणने उनकी सम्मतिसे ही चिता तैयार की ॥ २१ ॥

> नहि रामं तदा कश्चित् कालान्तकयमोपमम् ।  
> अनुनेतुमथो वक्तुं द्रष्टुं वाप्यशकत् सुहृत् ॥ २२ ॥

उस समय श्रीरघुनाथजी प्रलयकालीन संहारकारी यमराजके समान लोगोंके मनमें भय उत्पन्न कर रहे थे । उनका कोई भी मित्र उन्हें समझाने, उनसे कुछ कहने अथवा उनकी ओर देखनेका साहस न कर सका ॥ २२ ॥

> अधोमुखं स्थितं रामं ततः कृत्वा प्रदक्षिणम् ।  
> उपावर्तत वैदेही दीप्यमानं हुताशनम् ॥ २३ ॥

भगवान् श्रीराम सिर झुकाये खड़े थे । उसी अवस्थामें सीताजीने उनकी परिक्रमा की । इसके बाद वे प्रज्वलित अग्निके पास गयीं ॥ २३ ॥

> प्रणम्य दैवतेभ्यश्च ब्राह्मणेभ्यश्च मैथिली ।  
> बद्धाञ्जलिपुटा वेदमुवाचाग्निसमीपतः ॥ २४ ॥

वहाँ देवताओं तथा ब्राह्मणोंको प्रणाम करके मिथिलेशकुमारीने दोनों हाथ जोड़कर अग्निदेवके समीप इस प्रकार कहा—॥ २४ ॥

> यथा मे हृदयं नित्यं नापसर्पति राघवात् ।  
> तथा लोकस्य साक्षी मां सर्वतः पातु पावकः ॥ २५ ॥

‘यदि मेरा हृदय कभी एक क्षणके लिये भी श्रीरघुनाथजीसे दूर न हुआ हो तो सम्पूर्ण जगत्के साक्षी अग्निदेव मेरी सब ओरसे रक्षा करें ॥ २५ ॥

> यथा मां शुद्धचारित्रां दुष्टां जानाति राघवः ।  
> तथा लोकस्य साक्षी मां सर्वतः पातु पावकः ॥ २६ ॥

‘मेरा चरित्र शुद्ध है फिर भी श्रीरघुनाथजी मुझे दूषित समझ रहे हैं । यदि मैं सर्वथा निष्कलङ्क होऊँ तो सम्पूर्ण जगत्के साक्षी अग्निदेव मेरी सब ओरसे रक्षा करें ॥ २६ ॥

> कर्मणा मनसा वाचा यथा नातिचराम्यहम् ।  
> राघवं सर्वधर्मज्ञं तथा मां पातु पावकः ॥ २७ ॥

‘यदि मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता श्रीरघुनाथजीका अतिक्रमण न किया हो तो अग्निदेव मेरी रक्षा करें ॥ २७ ॥

> आदित्यो भगवान् वायुर्दिशश्चन्द्रस्तथैव च ।  
> अहश्चापि तथा संध्ये रात्रिश्च पृथिवी तथा ।  
> यथान्येऽपि विजानन्ति तथा चारित्रसंयुताम् ॥ २८ ॥

‘यदि भगवान् सूर्य, वायु, दिशाएँ, चन्द्रमा, दिन, रात, दोनों संध्याएँ, पृथ्वी देवी तथा अन्य देवता भी मुझे शुद्ध चरित्रसे युक्त जानते हों तो अग्निदेव मेरी सब ओरसे रक्षा करें’ ॥ २८ ॥

> एवमुक्त्वा तु वैदेही परिक्रम्य हुताशनम् ।  
> विवेश ज्वलनं दीप्तं निःशङ्केनान्तरात्मना ॥ २९ ॥  
> जनश्च सुमहांस्तत्र बालवृद्धसमाकुलः ।  
> ददर्श मैथिलीं दीप्तां प्रविशन्तीं हुताशनम् ॥ ३० ॥

ऐसा कहकर विदेहराजकुमारीने अग्निदेवकी परिक्रमा की और निःशङ्क चित्तसे वे उस प्रज्वलित अग्निमें समा गयीं ॥ बालकों और वृद्धोंसे भरे हुए वहाँके महान् जन-समुदायने उन दीप्तिमती मिथिलेशकुमारीको जलती आगमें प्रवेश करते देखा ॥ ३० ॥

> सा तप्तनवहेमाभा तप्तकाञ्चनभूषणा ।  
> पपात ज्वलनं दीप्तं सर्वलोकस्य संनिधौ ॥ ३१ ॥

तपाये हुए नूतन सुवर्णकी-सी कान्तिवाली सीता आगमें तपाकर शुद्ध किये गये सुवर्णके आभूषणोंसे विभूषित थीं । वे सब लोगोंके निकट उनके देखते-देखते उस जलती आगमें कूद पड़ीं ॥ ३१ ॥

> ददृशुस्तां विशालाक्षीं पतन्तीं हव्यवाहनम् ।  
> सीतां सर्वाणि रूपाणि रुक्मवेदिनिभां तदा ॥ ३२ ॥  
> ददृशुस्तां महाभागां प्रविशन्तीं हुताशनम् ।  
> ऋषयो देवगन्धर्वा यज्ञे पूर्णाहुतीमिव ॥ ३३ ॥

सोनेकी बनी हुई वेदीके समान कान्तिमती विशाललोचना सीतादेवीको उस समय सम्पूर्ण भूतोंने आगमें गिरते देखा ॥ ऋषियों, देवताओं और गन्धर्वोंने देखा, जैसे यज्ञमें पूर्णाहुतिका होम होता है, उसी प्रकार महाभागा सीता जलती आगमें प्रवेश कर रही हैं ॥ ३३ ॥

> प्रचुक्रुशुः स्त्रियः सर्वास्तां दृष्ट्वा हव्यवाहने ।  
> पतन्तीं संस्कृतां मन्त्रैर्वसोर्धारामिवाध्वरे ॥ ३४ ॥

जैसे यज्ञमें मन्त्रोंद्वारा संस्कार की हुई वसुधाराकी आहुति दी जाती है, उसी प्रकार दिव्य आभूषणोंसे विभूषित सीताको आगमें गिरते देख वहाँ आयी हुई सभी स्त्रियाँ चीख उठीं ॥ ३४ ॥

> ददृशुस्तां त्रयो लोका देवगन्धर्वदानवाः ।  
> शप्तां पतन्तीं निरये त्रिदिवाद् देवतामिव ॥ ३५ ॥

तीनों लोकोंके दिव्य प्राणी, ऋषि, देवता, गन्धर्व तथा दानवोंने भी भगवती सीताको आगमें गिरते देखा, मानो स्वर्गसे कोई देवी शापग्रस्त होकर नरकमें गिरी हो ॥ ३५ ॥

> तस्यामग्निं विशन्त्यां तु हाहेति विपुलः स्वनः ।  
> रक्षसां वानराणां च सम्बभूवाद्भुतोपमः ॥ ३६ ॥

उनके अग्निमें प्रवेश करते समय राक्षस और वानर जोर-जोरसे हाहाकार करने लगे । उनका वह अद्भुत आर्तनाद चारों ओर गूँज उठा ॥ ३६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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