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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 113"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 113

> इति प्रतिसमादिष्टो हनूमान् मारुतात्मजः ।  
> प्रविवेश पुरीं लङ्कां पूज्यमानो निशाचरैः ॥ १ ॥

भगवान् श्रीरामका यह आदेश पाकर पवनपुत्र हनुमान्जीने निशाचरोंसे सम्मानित होते हुए लङ्कापुरीमें प्रवेश किया ॥ १ ॥

> प्रविश्य च पुरीं लङ्कामनुज्ञाप्य विभीषणम् ।  
> ततस्तेनाभ्यनुज्ञातो हनूमान् वृक्षवाटिकाम् ॥ २ ॥

पुरीमें प्रवेश करके उन्होंने विभीषणसे आज्ञा माँगी । उनकी आज्ञा मिल जानेपर हनुमान्जी अशोकवाटिकामें गये ॥ २ ॥

> सम्प्रविश्य यथान्यायं सीताया विदितो हरिः ।  
> ददर्श मृजया हीनां सातङ्कां रोहिणीमिव ॥ ३ ॥

अशोकवाटिकामें प्रवेश करके न्यायानुसार उन्होंने सीताजीको अपने आगमनकी सूचना दी । तत्पश्चात् निकट जाकर उनका दर्शन किया । वे स्नान आदिसे हीन होनेके कारण कुछ मलिन दिखायी देती थीं और सशङ्क हुई रोहिणीके समान जान पड़ती थीं ॥ ३ ॥

> वृक्षमूले निरानन्दां राक्षसीभिः परीवृताम् ।  
> निभृतः प्रणतः प्रह्वः सोऽभिगम्याभिवाद्य च ॥ ४ ॥

सीताजी आनन्दशून्य हो वृक्षके नीचे राक्षसियोंसे घिरी बैठी थीं । हनुमान्जीने शान्त और विनीतभावसे सामने जाकर उन्हें प्रणाम किया । प्रणाम करके वे चुपचाप खड़े हो गये ॥ ४ ॥

> दृष्ट्वा तमागतं देवी हनूमन्तं महाबलम् ।  
> तूष्णीमास्त तदा दृष्ट्वा स्मृत्वा हृष्टाभवत् तदा ॥ ५ ॥

महाबली हनुमान्को आया देख देवी सीता उन्हें पहचानकर मन-ही-मन प्रसन्न हुईं; किंतु कुछ बोल न सकीं । चुपचाप बैठी रहीं ॥ ५ ॥

> सौम्यं तस्या मुखं दृष्ट्वा हनूमान् प्लवगोत्तमः ।  
> रामस्य वचनं सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥ ६ ॥

सीताके मुखपर सौम्यभाव लक्षित हो रहा था । उसे देखकर कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुई सब बातोंको उनसे कहना आरम्भ किया—॥ ६ ॥

> वैदेहि कुशली रामः सहसुग्रीवलक्ष्मणः ।  
> कुशलं चाह सिद्धार्थो हतशत्रुरमित्रजित् ॥ ७ ॥

‘विदेहनन्दिनि ! श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सुग्रीवके साथ सकुशल हैं । अपने शत्रुका वध करके सफलमनोरथ हुए उन शत्रुविजयी श्रीरामने आपकी कुशल पूछी है ॥ ७ ॥

> विभीषणसहायेन रामेण हरिभिः सह ।  
> निहतो रावणो देवि लक्ष्मणेन च वीर्यवान् ॥ ८ ॥

‘देवि ! विभीषणकी सहायता पाकर वानरों और लक्ष्मणसहित श्रीरामने बल-विक्रमसम्पन्न रावणको युद्धमें मार डाला है ॥ ८ ॥

> प्रियमाख्यामि ते देवि भूयश्च त्वां सभाजये ।  
> तव प्रभावाद् धर्मज्ञे महान् रामेण संयुगे ॥ ९ ॥  
> लब्धोऽयं विजयः सीते स्वस्था भव गतज्वरा ।  
> रावणश्च हतः शत्रुर्लङ्का चैव वशीकृता ॥ १० ॥

‘धर्मको जाननेवाली देवि सीते ! मैं आपको यह प्रिय संवाद सुनाता हूँ और अधिक-से-अधिक प्रसन्न देखना चाहता हूँ । आपके पातिव्रत्य धर्मके प्रभावसे ही युद्धमें श्रीरामने यह महान् विजय प्राप्त की है । अब आप चिन्ता छोड़कर स्वस्थ हो जायँ । हमलोगोंका शत्रु रावण मारा गया और लङ्का भगवान् श्रीरामके अधीन हो गयी ॥ ९-१० ॥

> मया ह्यलब्धनिद्रेण धृतेन तव निर्जये ।  
> प्रतिज्ञैषा विनिस्तीर्णा बद्ध्वा सेतुं महोदधौ ॥ ११ ॥

‘श्रीरामने आपको यह संदेश दिया है—‘देवि ! मैंने तुम्हारे उद्धारके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसके लिये निद्रा त्यागकर अथक प्रयत्न किया और समुद्रमें पुल बाँधकर रावणवधके द्वारा उस प्रतिज्ञाको पूर्ण किया ॥ ११ ॥

> सम्भ्रमश्च न कर्तव्यो वर्तन्त्या रावणालये ।  
> विभीषणविधेयं हि लङ्कैश्वर्यमिदं कृतम् ॥ १२ ॥  
> तदाश्वसिहि विस्रब्धं स्वगृहे परिवर्तसे ।  
> अयं चाभ्येति संहृष्टस्त्वद्दर्शनसमुत्सुकः ॥ १३ ॥

‘‘अब तुम अपनेको रावणके घरमें वर्तमान समझकर भयभीत न होना; क्योंकि लङ्काका सारा ऐश्वर्य विभीषणके अधीन कर दिया गया है । अब तुम अपने ही घरमें हो । ऐसा जानकर निश्चिन्त होकर धैर्य धारण करो ।’ देवि । ये विभीषण भी हर्षसे भरकर आपके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो अभी यहाँ आ रहे हैं’ ॥ १२-१३ ॥

> एवमुक्ता तु सा देवी सीता शशिनिभानना ।  
> प्रहर्षेणावरुद्धा सा व्याहर्तुं न शशाक ह ॥ १४ ॥

हनुमान्जीके इस प्रकार कहनेपर चन्द्रमुखी सीतादेवीको बड़ा हर्ष हुआ । हर्षसे उनका गला भर आया और वे कुछ बोल न सकीं ॥ १४ ॥

> ततोऽब्रवीद्धरिवरः सीतामप्रतिजल्पतीम् ।  
> किं त्वं चिन्तयसे देवि किं च मां नाभिभाषसे ॥ १५ ॥

सीताजीको मौन देख कपिवर हनुमान्जी बोले—‘देवि ! आप क्या सोच रही हैं ? मुझसे बोलती क्यों नहीं’ ॥ १५ ॥

> एवमुक्ता हनुमता सीता धर्मपथे स्थिता ।  
> अब्रवीत् परमप्रीता बाष्पगद्गदया गिरा ॥ १६ ॥

हनुमान्जीके इस प्रकार पूछनेपर धर्मपरायणा सीतादेवी अत्यन्त प्रसन्न हो आनन्दके आँसू बहाती हुई गद्गदवाणीमें बोलीं—॥ १६ ॥

> प्रियमेतदुपश्रुत्य भर्तुर्विजयसंश्रितम् ।  
> प्रहर्षवशमापन्ना निर्वाक्यास्मि क्षणान्तरम् ॥ १७ ॥

‘अपने स्वामीकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला यह प्रिय संवाद सुनकर मैं आनन्दविभोर हो गयी थी; इसलिये कुछ देरतक मेरे मुँहसे बात नहीं निकल सकी है ॥ १७ ॥

> नहि पश्यामि सदृशं चिन्तयन्ती प्लवंगम ।  
> आख्यानकस्य भवतो दातुं प्रत्यभिनन्दनम् ॥ १८ ॥

‘वानर वीर ! ऐसा प्रिय समाचार सुनानेके कारण मैं तुम्हें कुछ पुरस्कार देना चाहती हूँ; किंतु बहुत सोचनेपर भी मुझे इसके योग्य कोई वस्तु दिखायी नहीं देती ॥ १८ ॥

> न हि पश्यामि तत् सौम्य पृथिव्यामपि वानर ।  
> सदृशं यत्प्रियाख्याने तव दत्त्वा भवेत् सुखम् ॥ १९ ॥

‘सौम्य वानर वीर ! इस भूमण्डलमें मैं कोई ऐसी वस्तु नहीं देखती, जो इस प्रिय संवादके अनुरूप हो और जिसे तुम्हें देकर मैं संतुष्ट हो सकूँ ॥ १९ ॥

> हिरण्यं वा सुवर्णं वा रत्नानि विविधानि च ।  
> राज्यं वा त्रिषु लोकेषु एतन्नार्हति भाषितम् ॥ २० ॥

‘सोना, चाँदी, नाना प्रकारके रत्न अथवा तीनों लोकोंका राज्य भी इस प्रिय समाचारकी बराबरी नहीं कर सकता’॥२०॥

> एवमुक्तस्तु वैदेह्या प्रत्युवाच प्लवंगमः ।  
> प्रगृहीताञ्जलिर्हर्षात् सीतायाः प्रमुखे स्थितः ॥ २१ ॥

विदेहनन्दिनीके ऐसा कहनेपर वानरवीर हनुमान्जीको बड़ा हर्ष हुआ । वे सीताजीके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये और इस प्रकार बोले—॥ २१ ॥

> भर्तुः प्रियहिते युक्ते भर्तुर्विजयकाङ्क्षिणि ।  
> स्निग्धमेवंविधं वाक्यं त्वमेवार्हस्यनिन्दिते ॥ २२ ॥

‘पतिकी विजय चाहनेवाली और पतिके ही प्रिय एवं हितमें सदा संलग्न रहनेवाली सती-साध्वी देवि ! आपके ही मुँहसे ऐसा स्नेहपूर्ण वचन निकल सकता है ( आपके इस वचनसे मैं सब कुछ पा गया ) ॥ २२ ॥

> तवैतद् वचनं सौम्ये सारवत् स्निग्धमेव च ।  
> रत्नौघाद् विविधाच्चापि देवराज्याद् विशिष्यते ॥ २३ ॥

‘सौम्ये ! आपका यह वचन सारगर्भित और स्नेहयुक्त है, अतः भाँति-भाँतिकी रत्नराशि और देवताओंके राज्यसे भी बढ़कर है ॥ २३ ॥

> अर्थतश्च मया प्राप्ता देवराज्यादयो गुणाः ।  
> हतशत्रुं विजयिनं रामं पश्यामि सुस्थितम् ॥ २४ ॥

‘मैं जब यह देखता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी अपने शत्रुका वध करके विजयी हो गये और स्वयं सकुशल हैं, तब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मेरे सारे प्रयोजन सिद्ध हो गये— देवताओंके राज्य आदि सभी उत्कृष्ट गुणोंसे युक्त पदार्थ मुझे मिल गये’ ॥ २४ ॥

> तस्य तद् वचनं श्रुत्वा मैथिली जनकात्मजा ।  
> ततः शुभतरं वाक्यमुवाच पवनात्मजम् ॥ २५ ॥

उनकी बात सुनकर मिथिलेशकुमारी जानकीने उन पवनकुमारसे यह परम सुन्दर वचन कहा—॥ २५ ॥

> अतिलक्षणसम्पन्नं माधुर्यगुणभूषणम् ।  
> बुद्ध्या ह्यष्टाङ्गया युक्तं त्वमेवार्हसि भाषितुम् ॥ २६ ॥

‘वीरवर ! तुम्हारी वाणी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न, माधुर्य गुणसे भूषित तथा बुद्धिके आठ अङ्गों ( गुणों )से अलंकृत है। ऐसी वाणी केवल तुम्हीं बोल सकते हो ॥ २६ ॥

> श्लाघनीयोऽनिलस्य त्वं सुतः परमधार्मिकः ।  
> बलं शौर्यं श्रुतं सत्त्वं विक्रमो दाक्ष्यमुत्तमम् ॥ २७ ॥  
> तेजः क्षमा धृतिः स्थैर्यं विनीतत्वं न संशयः ।  
> एते चान्ये च बहवो गुणास्त्वय्येव शोभनाः ॥ २८ ॥

‘तुम वायुदेवताके प्रशंसनीय पुत्र तथा परम धर्मात्मा हो । शारीरिक बल, शूरता, शास्त्रज्ञान, मानसिक बल, पराक्रम, उत्तम दक्षता, तेज, क्षमा, धैर्य, स्थिरता, विनय तथा अन्य बहुत-से सुन्दर गुण केवल तुम्हींमें एक साथ विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है’ ॥ २७-२८ ॥

> अथोवाच पुनः सीतामसम्भ्रान्तो विनीतवत् ।  
> प्रगृहीताञ्जलिर्हर्षात् सीतायाः प्रमुखे स्थितः ॥ २९ ॥

तदनन्तर सीताके सामने बिना किसी घबराहटके हाथ जोड़कर विनीतभावसे खड़े हुए हनुमान्जी पुनः हर्षपूर्वक उनसे बोले—- ॥ २९ ॥

> इमास्तु खलु राक्षस्यो यदि त्वमनुमन्यसे ।  
> हन्तुमिच्छामि ताः सर्वा याभिस्त्वं तर्जिता पुरा ॥ ३० ॥

‘देवि ! यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं इन समस्त राक्षसियोंको, जो पहले आपको बहुत डराती-धमकाती रही हैं, मार डालना चाहता हूँ ॥ ३० ॥

> क्लिश्यन्तीं पतिदेवीं त्वामशोकवनिकां गताम् ।  
> घोररूपसमाचाराः क्रूराः क्रूरतरेक्षणाः ॥ ३१ ॥  
> इह श्रुता मया देवि राक्षस्यो विकृताननाः ।  
> असकृत्परुषैर्वाक्यैर्वदन्त्यो रावणाज्ञया ॥ ३२ ॥

‘आप-जैसी पतिव्रता देवी अशोकवाटिकामें बैठकर क्लेश भोग रही थीं और ये भयंकर रूप एवं आचारसे युक्त अत्यन्त क्रूर दृष्टिवाली विकरालमुखी क्रूर राक्षसियाँ आपको बारंबार कठोर वचनोंद्वारा डाँटती-फटकारती रहती थीं । रावणकी आज्ञासे ये जैसी-जैसी बातें आपको सुनाती थीं, उन सबको मैंने यहाँ रहकर सुना है ॥ ३१-३२ ॥

> विकृता विकृताकाराः क्रूराः क्रूरकचेक्षणाः ।  
> इच्छामि विविधैर्घातैर्हन्तुमेताः सुदारुणाः ॥ ३३ ॥

‘ये सब-की-सब विकराल, विकट आकारवाली, क्रूर और अत्यन्त दारुण हैं । इनके नेत्रों और केशोंसे भी क्रूरता टपकती है । मैं तरह-तरहके आघातोंद्वारा इन सबका वध कर डालना चाहता हूँ ॥ ३३ ॥

> राक्षस्यो दारुणकथा वरमेतत् प्रयच्छ मे ।  
> मुष्टिभिः पार्ष्णिघातैश्च विशालैश्चैव बाहुभिः ॥ ३४ ॥  
> जङ्घाजानुप्रहारैश्च दन्तानां चैव पीडनैः ।  
> कर्तनैः कर्णनासानां केशानां लुञ्चनैस्तथा ॥ ३५ ॥  
> निपात्य हन्तुमिच्छामि तव विप्रियकारिणीः ।  
> एवं प्रहारैर्बहुभिः सम्प्रहार्य यशस्विनि ॥ ३६ ॥  
> घातये तीव्ररूपाभिर्याभिस्त्वं तर्जिता पुरा ।

‘मेरी इच्छा है कि मुक्कों, लातों, विशाल भुजाओं—थप्पड़ों, पिण्डलियों और घुटनोंकी मारसे इन्हें घायल करके इनके दाँत तोड़ दूँ, इनकी नाक और कान काट लूँ तथा इनके सिरके बाल नोचूँ । यशस्विनि ! इस तरह बहुत-से प्रहारोंद्वारा इन सबको पीटकर क्रूरतापूर्ण बातें करनेवाली इन अप्रियकारिणी राक्षसियोंको पटक-पटककर मार डालूँ । जिन-जिन भयानक रूपवाली राक्षसियोंने पहले आपको डाँट बतायी है, उन सबको मैं अभी मौतके घाट उतार दूँगा । इसके लिये आप मुझे केवल वर ( आज्ञा ) दे दें’ ॥ ३४-३६½ ॥

> इत्युक्ता सा हनुमता कृपणा दीनवत्सला ॥ ३७ ॥  
> हनूमन्तमुवाचेदं चिन्तयित्वा विमृश्य च ।

हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर करुणामय स्वभाववाली दीनवत्सला सीताने मन-ही-मन बहुत कुछ सोच-विचार करके उनसे इस प्रकार कहा–॥ ३७½ ॥

> राजसंश्रयवश्यानां कुर्वतीनां पराज्ञया ॥ ३८ ॥  
> विधेयानां च दासीनां कः कुप्येद् वानरोत्तम ।  
> भाग्यवैषम्यदोषेण पुरस्ताद्दुष्कृतेन च ॥ ३९ ॥  
> मयैतत् प्राप्यते सर्वं स्वकृतं ह्युपभुज्यते ।  
> मैवं वद महाबाहो दैवी ह्येषा परा गतिः ॥ ४० ॥

‘कपिश्रेष्ठ ! ये बेचारी राजाके आश्रयमें रहनेके कारण पराधीन थीं । दूसरोंकी आज्ञासे ही सब कुछ करती थीं, अतः स्वामीकी आज्ञाका पालन करनेवाली इन दासियोंपर कौन क्रोध करेगा ? मेरा भाग्य ही अच्छा नहीं था तथा मेरे पूर्वजन्मके दुष्कर्म अपना फल देने लगे थे, इसीसे मुझे यह सब कष्ट प्राप्त हुआ है; क्योंकि सभी प्राणी अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका ही फल भोगते हैं, अतः महाबाहो ! तुम इन्हें मारनेकी बात न कहो । मेरे लिये दैवका ही ऐसा विधान था ॥ ३८–४० ॥

> प्राप्तव्यं तु दशायोगान्मयैतदिति निश्चितम् ।  
> दासीनां रावणस्याहं मर्षयामीह दुर्बला ॥ ४१ ॥

‘मुझे अपने पूर्वकर्मजनित दशाके योगसे यह सारा दुःख निश्चितरूपसे भोगना ही था; इसलिये रावणकी दासियोंका यदि कुछ अपराध हो भी तो उसे मैं क्षमा करती हूँ; क्योंकि इनके प्रति दयाके उद्रेकसे मैं दुर्बल हो रही हूँ ॥ ४१ ॥

> आज्ञप्ता राक्षसेनेह राक्षस्यस्तर्जयन्ति माम् ।  
> हते तस्मिन् न कुर्वन्ति तर्जनं मारुतात्मज ॥ ४२ ॥  
> अयं व्याघ्रसमीपे तु पुराणो धर्मसंहितः ।  
> ऋक्षेण गीतः श्लोकोऽस्ति तं निबोध प्लवंगम ॥ ४३ ॥

‘पवनकुमार ! उस राक्षसकी आज्ञासे ही ये मुझे [UNCLEAR]मकाया करती थीं । जबसे वह मारा गया है, तबसे ये बेचारी मुझसे कुछ नहीं कहती हैं । इन्होंने डराना-धमकाना छोड़ दिया है ॥ ‘वानरवीर ! इस विषयमें एक पुराना धर्मसम्मत श्लोक है, जिसे किसी व्याघ्रके निकट एक रीछने कहा था* । वह श्लोक मैं बता रही हूँ, सुनो ॥ ४३ ॥

> न परः पापमादत्ते परेषां पापकर्मणाम् ।  
> समयो रक्षितव्यस्तु सन्तश्चारित्रभूषणाः ॥ ४४ ॥  
> पापानां वा शुभानां वा वधार्हाणामथापि वा ।  
> कार्यं कारुण्यमार्येण न कश्चिन्नापराध्यति ॥ ४५ ॥

‘श्रेष्ठ पुरुष दूसरेकी बुराई करनेवाले पापियोंके पापकर्मको नहीं अपनाते हैं—बदलेमें उनके साथ स्वयं भी पापपूर्ण बर्ताव नहीं करना चाहते हैं, अतः अपनी प्रतिज्ञा एवं सदाचारकी रक्षा ही करनी चाहिये; क्योंकि साधुपुरुष अपने उत्तम चरित्रसे ही विभूषित होते हैं । सदाचार ही उनका आभूषण है’ ॥ ‘श्रेष्ठ पुरुषको चाहिये कि कोई पापी हों या पुण्यात्मा अथवा वे वधके योग्य अपराध करनेवाले ही क्यों न हों, उन सबपर दया करें; क्योंकि ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जिससे कभी अपराध होता ही न हो ॥ ४५ ॥

> लोकहिंसाविहाराणां क्रूराणां पापकर्मणाम् ।  
> कुर्वतामपि पापानि नैव कार्यमशोभनम् ॥ ४६ ॥

‘जो लोगोंकी हिंसामें ही रमते और सदा पापका ही आचरण करते हैं, उन क्रूर स्वभाववाले पापियोंका भी कभी अमङ्गल नहीं करना चाहिये’ ॥ ४६ ॥

> एवमुक्तस्तु हनुमान् सीतया वाक्यकोविदः ।  
> प्रत्युवाच ततः सीतां रामपत्नीमनिन्दिताम् ॥ ४७ ॥  
> युक्ता रामस्य भवती धर्मपत्नी गुणान्विता ।  
> प्रतिसंदिश मां देवि गमिष्ये यत्र राघवः ॥ ४८ ॥

सीताजीके ऐसा कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल हनुमान्जीने उन सती-साध्वी श्रीरामपत्नीको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ‘देवि ! आप श्रीरामकी धर्मपत्नी हैं; अतः आपका ऐसे सद्गुणोंसे सम्पन्न होना उचित ही है । अब आप अपनी ओरसे मुझे कोई संदेश दें । मैं श्रीरघुनाथजीके पास जाऊँगा’ ॥ ४८ ॥

> एवमुक्ता हनुमता वैदेही जनकात्मजा ।  
> साब्रवीद् द्रष्टुमिच्छामि भर्तारं भक्तवत्सलम् ॥ ४९ ॥

हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर विदेहनन्दिनी जनकराजकिशोरी बोलीं—‘मैं अपने भक्तवत्सल स्वामीका दर्शन करना चाहती हूँ’ ॥ ४९ ॥

> तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनुमान् मारुतात्मजः ।  
> हर्षयन् मैथिलीं वाक्यमुवाचेदं महामतिः ॥ ५० ॥

सीताजीकी यह बात सुनकर परम बुद्धिमान् पवनकुमार हनुमान्जी उन मिथिलेशकुमारीका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार बोले—॥ ५० ॥

> पूर्णचन्द्रमुखं रामं द्रक्ष्यस्यद्य सलक्ष्मणम् ।  
> स्थितमित्रं हतामित्रं शचीवेन्द्रं सुरेश्वरम् ॥ ५१ ॥

‘देवि ! जैसे शची देवराज इन्द्रका दर्शन करती हैं, उसी प्रकार आप पूर्णचन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले उन श्रीराम और लक्ष्मणको आज देखेंगी, जिनके मित्र विद्यमान हैं और शत्रु मारे जा चुके हैं’ ॥ ५१ ॥

> तामेवमुक्त्वा भ्राजन्तीं सीतां साक्षादिव श्रियम् ।  
> आजगाम महातेजा हनुमान् यत्र राघवः ॥ ५२ ॥

साक्षात् लक्ष्मीकी भाँति सुशोभित होनेवाली सीतादेवीसे ऐसा कहकर महातेजस्वी हनुमान्जी उस स्थानपर लौट आये, जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे ॥ ५२ ॥

> सपदि हरिवरस्ततो हनुमान्  
> प्रतिवचनं जनकेश्वरात्मजायाः ।  
> कथितमकथयद् यथाक्रमेण  
> त्रिदशवरप्रतिमाय राघवाय ॥ ५३ ॥

वहाँसे लौटते ही कपिवर हनुमान्जीने देवराज इन्द्रके तुल्य तेजस्वी श्रीरघुनाथजीसे जनकराजकिशोरी सीताजीका दिया हुआ उत्तर क्रमशः कह सुनाया ॥ ५३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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