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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 111"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 111

> तासां विलपमानानां तदा राक्षसयोषिताम् ।  
> ज्येष्ठपत्नी प्रिया दीना भर्तारं समुदैक्षत ॥ १ ॥  
> दशग्रीवं हतं दृष्ट्वा रामेणाचिन्त्यकर्मणा ।  
> पतिं मन्दोदरी तत्र कृपणा पर्यदेवयत् ॥ २ ॥

उस समय विलाप करती हुई उन राक्षसियोंमें जो रावणकी ज्येष्ठ एवं प्यारी पत्नी मन्दोदरी थी, उसने अचिन्त्यकर्मा भगवान् श्रीरामके द्वारा मारे गये अपने पति दशमुख रावणको देखा । पतिको उस अवस्थामें देखकर वह वहाँ अत्यन्त दीन एवं दुखी हो गयी और इस प्रकार विलाप करने लगी—॥ १-२ ॥

> ननु नाम महाबाहो तव वैश्रवणानुज ।  
> क्रुद्धस्य प्रमुखे स्थातुं त्रस्यत्यपि पुरंदरः ॥ ३ ॥

‘महाराज कुबेरके छोटे भाई ! महाबाहु राक्षसराज ! जब आप क्रोध करते थे, उस समय इन्द्र भी आपके सामने खड़े होनेमें भय खाते थे ॥ ३ ॥

> ऋषयश्च महान्तोऽपि गन्धर्वाश्च यशस्विनः ।  
> ननु नाम तवोद्वेगाच्चारणाश्च दिशो गताः ॥ ४ ॥

‘बड़े-बड़े ऋषि, यशस्वी गन्धर्व और चारण भी आपके डरसे चारों दिशाओंमें भाग गये थे ॥ ४ ॥

> स त्वं मानुषमात्रेण रामेण युधि निर्जितः ।  
> न व्यपत्रपसे राजन् किमिदं राक्षसेश्वर ॥ ५ ॥

‘वही आप आज युद्धमें एक मानवमात्र रामसे परास्त हो गये । राजन् ! क्या आपको इससे लज्जा नहीं आती है । राक्षसेश्वर ! बोलिये तो सही, यह क्या बात है ? ॥ ५ ॥

> कथं त्रैलोक्यमाक्रम्य श्रिया वीर्येण चान्वितम् ।  
> अविषह्यं जघान त्वां मानुषो वनगोचरः ॥ ६ ॥

‘आपने तीनों लोकोंको जीतकर अपनेको सम्पत्तिशाली और पराक्रमी बनाया था । आपके वेगको सह लेना किसीके लिये सम्भव नहीं था; फिर आप-जैसे वीरको एक वनवासी मनुष्यने कैसे मार डाला ? ॥ ६ ॥

> मानुषाणामविषये चरतः कामरूपिणः ।  
> विनाशस्तव रामेण संयुगे नोपपद्यते ॥ ७ ॥

‘आप ऐसे देशमें विचरते थे, जहाँ मनुष्योंकी पहुँच नहीं हो सकती थी । आप इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ थे तो भी युद्धमें रामके हाथसे आपका विनाश हुआ; यह सम्भव अथवा विश्वासके योग्य नहीं जान पड़ता ॥ ७ ॥

> न चैतत् कर्म रामस्य श्रद्दधामि चमूमुखे ।  
> सर्वतः समुपेतस्य तव तेनाभिमर्षणम् ॥ ८ ॥

‘युद्धके मुहानेपर सब ओरसे विजय पानेवाले आपकी श्रीरामके द्वारा जो पराजय हुई, यह श्रीरामका काम है— ऐसा मुझे विश्वास नहीं होता ( जब कि आप उन्हें निरा मनुष्य समझते रहे ) ॥ ८ ॥

> अथवा रामरूपेण कृतान्तः स्वयमागतः ।  
> मायां तव विनाशाय विधायाप्रतितर्किताम् ॥ ९ ॥

‘अथवा साक्षात् काल ही अतर्कित माया रचकर आपके विनाशके लिये श्रीरामके रूपमें यहाँ आ पहुँचा था ॥ ९ ॥

> अथवा वासवेन त्वं धर्षितोऽसि महाबल ।  
> वासवस्य तु का शक्तिस्त्वां द्रष्टुमपि संयुगे ॥ १० ॥  
> महाबलं महावीर्यं देवशत्रुं महौजसम् ।

‘महाबली वीर ! अथवा यह भी सम्भव है कि साक्षात् इन्द्रने आपपर आक्रमण किया हो; परंतु इन्द्रकी क्या शक्ति है जो युद्धमें वे आपकी ओर आँख उठाकर देख भी सकें; क्योंकि आप महाबली, महापराक्रमी और महातेजस्वी देवशत्रु थे ।॥ १०½ ॥

> व्यक्तमेष महायोगी परमात्मा सनातनः ॥ ११ ॥  
> अनादिमध्यनिधनो महतः परमो महान् ।  
> तमसः परमो धाता शङ्खचक्रगदाधरः ॥ १२ ॥  
> श्रीवत्सवक्षा नित्यश्रीरजय्यः शाश्वतो ध्रुवः ।  
> मानुषं रूपमास्थाय विष्णुः सत्यपराक्रमः ॥ १३ ॥  
> सर्वैः परिवृतो देवैर्वानरत्वमुपागतैः ।  
> सर्वलोकेश्वरः श्रीमाँल्लोकानां हितकाम्यया ॥ १४ ॥  
> स राक्षसपरीवारं देवशत्रुं भयावहम् ।  
> इन्द्रियाणि पुरा जित्वा जितं त्रिभुवनं त्वया ॥ १५ ॥  
> स्मरद्भिरिव तद् वैरमिन्द्रियैरेव निर्जितः ।

‘निश्चय ही ये श्रीरामचन्द्रजी महान् योगी एवं सनातन परमात्मा हैं । इनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है । ये महान्से भी महान्, अज्ञानान्धकारसे परे तथा सबको धारण करनेवाले परमेश्वर हैं, जो अपने हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करते हैं, जिनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न है, भगवती लक्ष्मी जिनका कभी साथ नहीं छोड़तीं, जिन्हें परास्त करना सर्वथा असम्भव है तथा जो नित्य स्थिर एवं सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर हैं, उन सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णुने ही समस्त लोकोंका हित करनेकी इच्छासे मनुष्यका रूप धारण करके वानररूपमें प्रकट हुए सम्पूर्ण देवताओंके साथ आकर राक्षसोंसहित आपका वध किया है; क्योंकि आप देवताओंके शत्रु और समस्त संसारके लिये भयंकर थे ॥ ‘नाथ ! पहले आपने अपनी इन्द्रियोंको जीतकर ही तीनों लोकोंपर विजय पायी थी, उस वैरको याद रखती हुई-सी इन्द्रियोंने ही अब आपको परास्त किया है ॥ १५½ ॥

> यदैव हि जनस्थाने राक्षसैर्बहुभिर्वृतः ॥ १६ ॥  
> खरस्तु निहतो भ्राता तदा रामो न मानुषः ।

‘जब मैंने सुना कि जनस्थानमें बहुतेरे राक्षसोंसे घिरे होनेपर भी आपके भाई खरको श्रीरामने मार डाला है, तभी मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामचन्द्रजी कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं ॥ १६½ ॥

> यदैव नगरीं लङ्कां दुष्प्रवेशां सुरैरपि ॥ १७ ॥  
> प्रविष्टो हनुमान् वीर्यात् तदैव व्यथिता वयम् ।  
> क्रियतामविरोधश्च राघवेणेति यन्मया ॥ १८ ॥  
> उच्यमानो न गृह्णासि तस्येयं व्युष्टिरागता ।

‘जिस लङ्का नगरीमें देवताओंका भी प्रवेश होना कठिन था, वहीं जब हनुमान्जी बलपूर्वक घुस आये, उसी समय हमलोग भावी अनिष्टकी आशङ्कासे व्यथित हो उठी थीं ॥ ‘मैंने बारबार कहा—प्राणनाथ ! आप रघुनाथजीसे वैर-विरोध न कीजिये; परंतु आपने मेरी बात नहीं मानी । उसीका आज यह फल मिला है ॥ १८½ ॥

> अकस्माच्चाभिकामोऽसि सीतां राक्षसपुङ्गव ॥ १९ ॥  
> ऐश्वर्यस्य विनाशाय देहस्य स्वजनस्य च ।

‘राक्षसराज ! आपने अपने ऐश्वर्यका, शरीरका तथा स्वजनोंका विनाश करनेके लिये ही अकस्मात् सीताकी कामना की थी ॥ १९½ ॥

> अरुन्धत्या विशिष्टां तां रोहिण्याश्चापि दुर्मते ॥ २० ॥  
> सीतां धर्षयता मान्यां त्वया ह्यसदृशं कृतम् ।  
> वसुधाया हि वसुधां श्रियाः श्रीं भर्तृवत्सलाम् ॥ २१ ॥

‘दुर्मते ! भगवती सीता अरुन्धती और रोहिणीसे भी बढ़कर पतिव्रता हैं । वे वसुधाकी भी वसुधा और श्रीकी भी श्री हैं । अपने स्वामीके प्रति अनन्य अनुराग रखनेवाली और सबकी पूजनीया उन सीतादेवीका तिरस्कार करके आपने बड़ा अनुचित कार्य किया था ॥ २०-२१ ॥

> सीतां सर्वानवद्याङ्गीमरण्ये विजने शुभाम् ।  
> आनयित्वा तु तां दीनां छद्मनाऽऽत्मखदूषणम् ॥ २२ ॥  
> अप्राप्य तं चैव कामं मैथिलीसंगमे कृतम् ।  
> पतिव्रतायास्तपसा नूनं दग्धोऽसि मे प्रभो ॥ २३ ॥

‘मेरे प्राणनाथ ! सर्वाङ्गसुन्दरी शुभलक्षणा सीता निर्जन वनमें निवास करती थीं । आप छलसे उन्हें दुःखमें डालकर यहाँ हर लाये । यह आपके लिये बड़े कलङ्ककी बात हुई । मिथिलेशकुमारीके साथ समागमके लिये जो आपके मनमें कामना थी, उसे तो आप पा नहीं सके, उल्टे उन पतिव्रता देवीकी तपस्यासे जलकर भस्म हो गये । अवश्य ऐसी ही बात हुई है ॥ २२-२३ ॥

> तदैव यन्न दग्धस्त्वं धर्षयंस्तनुमध्यमाम् ।  
> देवा बिभ्यति ते सर्वे सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः ॥ २४ ॥

‘तन्वङ्गी सीताका अपहरण करते समय ही आप जलकर राख नहीं हो गये—यही आश्चर्यकी बात है । आपकी जिस महिमासे इन्द्र और अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता आपसे डरते थे, उसीने उस समय आपको दग्ध नहीं होने दिया ॥ २४ ॥

> अवश्यमेव लभते फलं पापस्य कर्मणः ।  
> भर्तः पर्यागते काले कर्ता नास्त्यत्र संशयः ॥ २५ ॥

‘प्राणवल्लभ ! इसमें कोई संदेह नहीं कि समय आनेपर कर्ताको उसके पाप-कर्मका फल अवश्य मिलता है ॥ २५ ॥

> शुभकृच्छुभमाप्नोति पापकृत् पापमश्नुते ।  
> विभीषणः सुखं प्राप्तस्त्वं प्राप्तः पापमीदृशम् ॥ २६ ॥

‘शुभकर्म करनेवालेको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है और पापीको पापका फल—दुःख भोगना पड़ता है । विभीषणको अपने शुभ कर्मोंके कारण ही सुख प्राप्त हुआ है और आपको ऐसा दुःख भोगना पड़ा है ॥ २६ ॥

> सन्त्यन्याः प्रमदास्तुभ्यं रूपेणाभ्यधिकास्ततः ।  
> अनङ्गवशमापन्नस्त्वं तु मोहान्न बुद्ध्यसे ॥ २७ ॥

‘आपके घरमें सीतादेवीसे भी अधिक सुन्दर रूपवाली दूसरी युवतियाँ मौजूद हैं; परंतु आप कामके वशीभूत हो मोहवश इस बातको समझ नहीं पाते थे ॥ २७ ॥

> न कुलेन न रूपेण न दाक्षिण्येन मैथिली ।  
> मयाधिका वा तुल्या वा तत् तु मोहान्न बुद्ध्यसे ॥ २८ ॥

‘मिथिलेशकुमारी सीता न तो कुलमें, न रूपमें और न दाक्षिण्य आदि गुणोंमें ही मुझसे बढ़कर हैं । वे मेरे बराबर भी नहीं हैं; परंतु आप मोहवश इस बातकी ओर नहीं ध्यान देते थे ॥ २८ ॥

> सर्वदा सर्वभूतानां नास्ति मृत्युरलक्षणः ।  
> तव तद्वदयं मृत्युमैथिलीकृतलक्षणः ॥ २९ ॥

‘संसारमें कभी किसी भी प्राणीकी मृत्यु अकारण नहीं होती है । इस नियमके अनुसार मिथिलेशकुमारी सीता आपकी मृत्युका कारण बन गयीं ॥ २९ ॥

> सीतानिमित्तजो मृत्युस्त्वया दूरादुपाहृतः ।  
> मैथिली सह रामेण विशोका विहरिष्यति ॥ ३० ॥  
> अल्पपुण्या त्वहं घोरे पतिता शोकसागरे ।

‘आपने सीताके कारण होनेवाली मृत्युको स्वयं ही दूरसे बुला लिया । मिथिलेशनन्दिनी सीता अब शोकरहित हो श्रीरामके साथ विहार करेंगी; परंतु मेरा पुण्य बहुत थोड़ा था, इसलिये वह जल्दी समाप्त हो गया और मैं शोकके घोर समुद्रमें गिर पड़ी ॥ ३०½ ॥

> कैलासे मन्दरे मेरौ तथा चैत्ररथे वने ॥ ३१ ॥  
> देवोद्यानेषु सर्वेषु विहृत्य सहिता त्वया ।  
> विमानेनानुरूपेण या याम्यतुलया श्रिया ॥ ३२ ॥  
> पश्यन्ती विविधान् देशांस्तांस्तांश्चित्रस्रगम्बरा ।  
> भ्रंशिता कामभोगेभ्यः सास्मि वीर वधात् तव ॥ ३३ ॥

‘वीर ! जो मैं विचित्र वस्त्राभूषण धारण करके अनुपम शोभासे सम्पन्न हो मनके अनुरूप विमानद्वारा आपके साथ कैलास, मन्दराचल, मेरुपर्वत, चैत्ररथ वन तथा सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें विहार करती हुई नाना प्रकारके देशोंको देखती फिरती थी, वही मैं आज आपका वध हो जानेसे समस्त कामभोगोंसे वञ्चित हो गयी ॥ ३१—३३ ॥

> सैवान्येवास्मि संवृत्ता धिग् राज्ञां चञ्चलां श्रियम् ।  
> हा राजन् सुकुमारं ते सुभ्रु सुत्वक्समुन्नसम् ॥ ३४ ॥  
> कान्तिश्रीद्युतिभिस्तुल्यमिन्दुपद्मदिवाकरैः ।  
> किरीटकूटोज्ज्वलितं ताम्रास्यं दीप्तकुण्डलम् ॥ ३५ ॥  
> मद्व्याकुललोलाक्षं भूत्वा यत्पानभूमिषु ।  
> विविधस्रग्धरं चारु वल्गुस्मितकथं शुभम् ॥ ३६ ॥  
> तदेवाद्य तवैवं हि वक्त्रं न भ्राजते प्रभो ।  
> रामसायकनिर्भिन्नं रक्तं रुधिरविस्रवैः ॥ ३७ ॥  
> विशीर्णमेदोमस्तिष्कं रूक्षं स्यन्दनरेणुभिः ।

‘मैं वही रानी मन्दोदरी हूँ, किंतु आज दूसरी स्त्रीके समान हो गयी हूँ । राजाओंकी चञ्चल राजलक्ष्मीको धिक्कार है ! हा राजन् ! आपका जो सुकुमार मुखमण्डल सुन्दर भौंहों, मनोहर त्वचा और ऊँची नासिकासे युक्त था, कान्ति, शोभा और तेजके द्वारा जो क्रमशः चन्द्रमा, सूर्य और कमलको लज्जित करता था, किरीटोंके समूह जिसे जगमग बनाये रहते थे, जिसके अधर ताँबेके समान लाल थे, जिसमें दीप्तिमान् कुण्डल दमकते रहते थे, पान-भूमिमें जिसके नेत्र नशेसे व्याकुल और चञ्चल देखे जाते थे, जो नाना प्रकारके गजरे धारण करता था, मनोहर और सुन्दर था तथा मुस्कराकर मीठी-मीठी बातें किया करता था, वही आपका मुखारविन्द आज शोभा नहीं पा रहा है । प्रभो ! वह श्रीरामके सायकोंसे विदीर्ण हो खूनकी धारासे रँग गया है । इसका मेदा और मस्तिष्क छिन्न-भिन्न हो गया है तथा रथकी धूलोंसे इसमें रूक्षता आ गयी है ॥ ३४-३७½ ॥

> हा पश्चिमा मे सम्प्राप्ता दशा वैधव्यदायिनी ॥ ३८ ॥  
> या मयाऽऽसीन्न सम्बुद्धा कदाचिदपि मन्दया ।

‘हाय ! मुझ मन्दभागिनीने कभी जिसके विषयमें सोचा तक नहीं था, वही मुझे वैधव्यका दुःख प्रदान करनेवाली अन्तिम अवस्था ( मृत्यु ) आपको प्राप्त हो गयी ॥ ३८½ ॥

> पिता दानवराजो मे भर्ता मे राक्षसेश्वरः ॥ ३९ ॥  
> पुत्रो मे शक्रनिर्जेता इत्यहं गर्विता भृशम् ।

‘दानवराज मय मेरे पिता, राक्षसराज रावण मेरे पति और इन्द्रपर भी विजय प्राप्त करनेवाला इन्द्रजित् मेरा पुत्र है—यह सोचकर मैं अत्यन्त गर्वसे भरी रहती थी ॥ ३९½ ॥

> दप्तारिमथनाः क्रूराः प्रख्यातबलपौरुषाः ॥ ४० ॥  
> अकुतश्चिद्भया नाथा ममेत्यासीन्मतिर्ध्रुवा ।

‘मेरी यह दृढ़ धारणा बनी हुई थी कि मेरे रक्षक ऐसे लोग हैं जो दर्पसे भरे हुए शत्रुओंको मथ डालनेमें समर्थ, क्रूर, विख्यात बल और पौरुषसे सम्पन्न तथा किसीसे भी भयभीत नहीं होनेवाले हैं ॥ ४०½ ॥

> तेषामेवंप्रभावाणां युष्माकं राक्षसर्षभाः ॥ ४१ ॥  
> कथं भयमसम्बुद्धं मानुषादिदमागतम् ।

‘राक्षसशिरोमणियो ! ऐसे प्रभावशाली तुमलोगोंको यह मनुष्यसे अज्ञात भय किस प्रकार प्राप्त हुआ ? ॥ ४१½ ॥

> स्निग्धेन्द्रनीलनीलं तु प्रांशुशैलोपमं महत् ॥ ४२ ॥  
> केयूराङ्गदवैदूर्यमुक्काहारस्रगुज्ज्वलम्  
> कान्तं विहारेष्वधिकं दीप्तं संग्राममूमिषु ॥ ४३ ॥  
> भात्याभरणभाभिर्यद् विद्युद्भिरिव तोयदः ।  
> तदेवाद्य शरीरं ते तीक्ष्णैर्नैकशरैश्चितम् ॥ ४४ ॥  
> पुनर्दुर्लभसंस्पर्शं परिष्वक्तुं न शक्यते ।

‘जो चिकने इन्द्रनील-मणिके समान श्याम, ऊँचे शैल-शिखरके समान विशाल तथा केयूर, अङ्गद, नीलम और मोतियोंके हार एवं फूलोंकी मालाओंसे सुसज्जित होनेके कारण अत्यन्त प्रकाशमान दिखायी देता था, विहार-स्थलोंमें अधिक कान्तिमान् तथा संग्राम-भूमियोंमें अतिशय दीप्तिमान् प्रतीत होता था और आभूषणोंकी प्रभासे जिसकी विद्युन्मालामण्डित मेघकी-सी शोभा होती थी, वही आपका शरीर आज अनेक तीखे बाणोंसे भरा हुआ है; अतः यद्यपि आजसे फिर इसका स्पर्श मेरे लिये दुर्लभ हो जायगा; तथापि इन बाणोंके कारण मैं इसका आलिङ्गन नहीं कर पाती हूँ ॥ ४२–४४½ ॥

> श्वाविधः शल्लकैर्यद्वद् बाणैर्लग्नैर्निरन्तरम् ॥ ४५ ॥  
> स्वर्पितैर्मर्मसु भृशं संछिन्नस्नायुबन्धनम् ।  
> क्षितौ निपतितं राजन्दृयामं वै रुधिरच्छवि ॥ ४६ ॥  
> वज्रप्रहाराभिहतो विकीर्ण इव पर्वतः ।  
> हा स्वप्नः सत्यमेवेदं त्वं रामेण कथं हतः ॥ ४७ ॥  
> त्वं मृत्योरपि मृत्युः स्याः कथं मृत्युवशं गतः ।

‘राजन् ! जैसे साहीकी देह काँटोंसे भरी होती है, उसी प्रकार आपके शरीरमें इतने बाण लगे हैं कि कहीं एक अंगुल भी जगह नहीं रह गयी है । वे सभी बाण मर्म-स्थानोंमें धँस गये हैं और उनसे शरीरका स्नायु-बन्धन छिन्न-भिन्न हो गया है । इस अवस्थामें पृथ्वीपर पड़ा हुआ आपका यह श्याम शरीर, जिसपर रक्तकी अरुण छटा छा रही है, वज्रकी मारसे चूर-चूर होकर बिखरे हुए पर्वतके समान जान पड़ता है ॥ ‘नाथ ! यह स्वप्न है या सत्य । हाय ! आप श्रीरामके हाथसे कैसे मारे गये ? आप तो मृत्युकी भी मृत्यु थे; फिर स्वयं ही मृत्युके अधीन कैसे हो गये ? ॥ ४७½ ॥

> त्रैलोक्यवसुभोक्तारं त्रैलोक्योद्वेगदं महत् ॥ ४८ ॥  
> जेतारं लोकपालानां क्षेत्तारं शंकरस्य च ।  
> दत्तानां निग्रहीतारमाविष्कृतपराक्रमम् ॥ ४९ ॥

‘आपने तीनों लोकोंकी सम्पत्तिका उपभोग किया और त्रिलोकीके प्राणियोंको महान् उद्वेगमें डाल दिया था । आप लोकपालोंपर भी विजय पा चुके थे । आपने कैलास-पर्वतके साथ ही भगवान् शङ्करको भी उठा लिया था तथा बड़े-बड़े अभिमानी वीरोंको युद्धमें बंदी बनाकर अपने पराक्रमको प्रकट किया था ॥ ४८-४९ ॥

> लोकक्षोभयितारं च साधुभूतविदारणम् ।  
> ओजसा दप्तवाक्यानां वक्तारं रिपुसंनिधौ ॥ ५० ॥

‘आपने समस्त संसारको क्षोभमें डाला, साधु पुरुषोंकी हिंसा की और शत्रुओंके समीप बलपूर्वक अहंकारपूर्ण बातें कहीं ॥ ५० ॥

> स्वयूथभृत्यगोप्तारं हन्तारं भीमकर्मणाम् ।  
> हन्तारं दानवेन्द्राणां यक्षाणां च सहस्रशः ॥ ५१ ॥

‘भयानक पराक्रम करनेवाले विपक्षियोंको मारकर अपने पक्षके लोगों और सेवकोंकी रक्षा की । दानवोंके सरदारों और हजारों यक्षोंको भी मौतके घाट उतारा ॥ ५१ ॥

> निवातकवचानां तु निग्रहीतारमाहवे ।  
> नैकयज्ञविलोप्तारं त्रातारं स्वजनस्य च ॥ ५२ ॥

‘आपने समराङ्गणमें निवातकवच नामक दानवोंका भी दमन किया, बहुत-से यज्ञ नष्ट कर डाले तथा आत्मीयजनोंकी सदा ही रक्षा की ॥ ५२ ॥

> धर्मव्यवस्थाभेत्तारं मायास्रष्टारमाहवे ।  
> देवासुरनृकन्यानामाहर्तारं ततस्ततः ॥ ५३ ॥

‘आप धर्मकी व्यवस्थाको तोड़नेवाले तथा संग्राममें माया-की सृष्टि करनेवाले थे । देवताओं, असुरों और मनुष्योंकी कन्याओंको इधर-उधरसे हर लाते थे ॥ ५३ ॥

> शत्रुस्त्रीशोकदातारं नेतारं स्वजनस्य च ।  
> लङ्काद्वीपस्य गोप्तारं कर्तारं भीमकर्मणाम् ॥ ५४ ॥  
> अस्माकं कामभोगानां दातारं रथिनां वरम् ।  
> एवंप्रभावं भर्तारं दृष्ट्वा रामेण पातितम् ॥ ५५ ॥  
> स्थिरास्मि या देहमिमं धारयामि हतप्रिया ।

‘आप शत्रुकी स्त्रियोंको शोक प्रदान करनेवाले, स्वजनोंके नेता, लङ्कापुरीके रक्षक, भयानक कर्म करनेवाले तथा हम सब लोगोंको कामोपभोगका सुख देनेवाले थे । ऐसे प्रभावशाली तथा रथियोंमें श्रेष्ठ अपने प्रियतम पतिको श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा धराशायी किया गया देखकर भी जो मैं अबतक इस शरीरको धारण कर रही हूँ, प्रियतमके मारे जानेपर भी जी रही हूँ—यह मेरी पाषाणहृदयताका परिचायक है ॥५४-५५½॥

> शयनेषु महार्हेषु शयित्वा राक्षसेश्वर ॥ ५६ ॥  
> इह कस्मात् प्रसुप्तोऽसि धरण्यां रेणुगुण्ठितः ।

‘राक्षसराज ! आप तो बहुमूल्य पलंगोंपर शयन करते थे, फिर यहाँ धरतीपर धूलिमें लिपटे हुए क्यों सो रहे हैं ? ५६½

> यदा मे तनयः शस्तो लक्ष्मणेनेन्द्रजिद् युधि ॥ ५७ ॥  
> तदा त्वभिहता तीव्रमद्य त्वस्मिन् निपातिता ।

‘जब लक्ष्मणने युद्धमें मेरे बेटे इन्द्रजित्को मारा था, उस समय मुझे गहरा आघात पहुँचा था और आज आपका वध होनेसे तो मैं मार ही डाली गयी ॥ ५७½ ॥

> साहं बन्धुजनैर्हीना हीना नाथेन च त्वया ॥ ५८ ॥  
> विहीना कामभोगैश्च शोचिष्ये शाश्वतीः समाः ।

‘अब मैं बन्धुजनोंसे हीन, आप-जैसे स्वामीसे रहित तथा कामभोगोंसे वञ्चित होकर अनन्त वर्षोंतक शोकमें ही डूबी रहूँगी ॥ ५८½ ॥

> प्रपन्नो दीर्घमध्वानं राजन्नद्य सुदुर्गमम् ॥ ५९ ॥  
> नय मामपि दुःखार्तां न वर्तिष्ये त्वया विना ।

‘राजन् ! आज आप जिस अत्यन्त दुर्गम एवं विशाल मार्गपर गये हैं, वहींमुझ दुखियाको भी ले चलिये । मैं आपके बिना जीवित नहीं रह सकूँगी ॥ ५९½ ॥

> कस्मात् त्वं मां विहायेह कृपणां गन्तुमिच्छसि ॥ ६० ॥  
> दीनां विलपतीं मन्दां किं च मां नाभिभाषसे ।

‘हाय ! मुझ असहायाको यहीं छोड़कर आप क्यों अन्यत्र चला जाना चाहते हैं ? मैं दीन अभागिनी होकर आपके लिये रो रही हूँ । आप मुझसे बोलते क्यों नहीं ? ॥ ६०½ ॥

> दृष्ट्वा न खल्वभिक्रुद्धो मामिहानवगुण्ठिताम् ॥ ६१ ॥  
> निर्गतां नगरद्वारात् पद्भ्यामेवागतां प्रभो ।

‘प्रभो ! आज मेरे मुँहपर घूघट नहीं है । मैं नगर-द्वारसे पैदल ही चलकर यहाँ आयी हूँ । इस दशामें मुझे देखकर आप क्रोध क्यों नहीं करते हैं ? ॥ ६१½ ॥

> पश्येष्वदार दारांस्ते भ्रष्टलज्जावगुण्ठनान् ॥ ६२ ॥  
> बहिर्निष्पतितान् सर्वान् कथं दृष्ट्वा न कुप्यसि ।

‘आप अपनी स्त्रियोंसे बड़ा प्रेम करते थे । आज आपकी सभी स्त्रियाँ लाज छोड़कर, परदा हटाकर बाहर निकल आयी हैं । इन्हें देखकर आपको क्रोध क्यों नहीं होता ? ॥ ६२½॥

> अयं क्रीडासहायस्तेऽनाथो लालप्यते जनः ॥ ६३ ॥  
> न चैनमाश्वासयसि किं वा न बहुमन्यसे ।

‘नाथ ! आपकी क्रीडासहचरी यह मन्दोदरी आज अनाथ होकर विलाप कर रही है । आप इसे आश्वासन क्यों नहीं देते अथवा अधिक आदर क्यों नहीं करते ? ॥ ६३½ ॥

> यास्त्वया विधवा राजन् कृता नैकाः कुलस्त्रियः ॥ ६४ ॥  
> पतिव्रता धर्मरता गुरुशुश्रूषणे रताः ।  
> ताभिः शोकाभितप्ताभिः शप्तः परवशं गतः ॥ ६५ ॥  
> त्वया विप्रकृताभिश्च तदा शप्तस्तदागतम् ।

‘राजन् ! आपने बहुत-सी कुलललनाओंको, जो गुरुजनोंकी सेवामें लगी रहनेवाली, धर्मपरायणा तथा पतिव्रता थीं, विधवा बनाया और उनका अपमान किया था; अतः उस समय उन्होंने शोकसे संतप्त होकर आपको शाप दे दिया था, उसीका यह फल है कि आपको शत्रु एवं मृत्युके अधीन होना पड़ा है ॥ ६४-६५½ ॥

> प्रवादः सत्यमेवायं त्वां प्रति प्रायशो नृप ॥ ६६ ॥  
> पतिव्रतानां नाकस्मात् पतन्त्यश्रूणि भूतले ।

‘महाराज ! पतिव्रताओंके आँसू इस पृथ्वीपर व्यर्थ नहीं गिरते, यह कहावत आपके ऊपर प्रायः ठीक-ठीक घटी है ॥ ६६½ ॥

> कथं च नाम ते राजँल्लोकानाक्रम्य तेजसा ॥ ६७ ॥  
> नारीचौर्यमिदं क्षुद्रं कृतं शौण्डीर्यमानिना ।

‘राजन् ! आप तो अपने तेजसे तीनों लोकोंको आक्रान्त करके अपनेको बड़ा शूरवीर मानते थे; फिर भी परायी स्त्रीको चुरानेका यह नीच काम आपने कैसे किया ? ॥ ६७½ ॥

> अपनीयाश्रमाद् रामं यन्मृगच्छद्मना त्वया ॥ ६८ ॥  
> आनीता रामपत्नी सा अपनीय च लक्ष्मणम् ।

‘मायामय मृगके बहाने श्रीरामको आश्रमसे दूर हटाया और लक्ष्मणको भी अलग किया । उसके बाद आप श्रीरामपत्नी सीताको चुराकर यहाँ ले आये; यह कितनी बड़ी कायरता है ॥ ६८½ ॥

> कातर्यं च न ते युद्धे कदाचित् संसराम्यहम् ॥ ६९ ॥  
> तत् तु भाग्यविपर्यासान्नूनं ते पकलक्षणम् ।

‘युद्धमें कभी आपने कायरता दिखायी हो, यह मुझे याद नहीं पड़ता; परंतु भाग्यके फेरसे उस दिन सीताका हरण करते समय निश्चय ही आपमें कायरता आ गयी थी, जो आपके निकट विनाशकी सूचना दे रही थी ॥ ६९½ ॥

> अतीतानागतार्थज्ञो वर्तमानविचक्षणः ॥ ७० ॥  
> मैथिलीमाहृतां दृष्ट्वा ध्यात्वा निःश्वस्य चायतम् ।  
> सत्यवाक् स महाबाहो देवरो मे यदब्रवीत् ॥ ७१ ॥  
> अयं राक्षसमुख्यानां विनाशः प्रत्युपस्थितः ।

‘महाबाहो ! मेरे देवर विभीषण सत्यवादी, भूत और भविष्यके ज्ञाता तथा वर्तमानको भी समझनेमें कुशल हैं । उन्होंने हरकर लायी हुई मिथिलेशकुमारी सीताको देखकर मन-ही-मन कुछ विचार किया और अन्तमें लंबी साँस छोड़कर कहा— अब प्रधान-प्रधान राक्षसोंके विनाशका समय उपस्थित हो गया है । उनकी यह बात ठीक निकली ॥ ७०-७१½ ॥

> कामक्रोधसमुत्थेन व्यसनेन प्रसङ्गिना ॥ ७२ ॥  
> निवृत्तस्त्वत्कृतेनार्थः सोऽयं मूलहरो महान् ।  
> त्वया कृतमिदं सर्वमनाथं राक्षसं कुलम् ॥ ७३ ॥

‘काम और क्रोधसे उत्पन्न आपके आसक्तिविषयक दोषके कारण यह सारा ऐश्वर्य नष्ट हो गया और जड़मूलका नाश करनेवाला यह महान् अनर्थ प्राप्त हुआ । आज आपने समस्त राक्षसकुलको अनाथ कर दिया ॥ ७२-७३ ॥

> नहि त्वं शोचितव्यो मे प्रख्यातबलपौरुषः ।  
> स्त्रीस्वभावात् तु मे बुद्धिः कारुण्ये परिवर्तते ॥ ७४ ॥  
> सुकृतं दुष्कृतं च त्वं गृहीत्वा स्वां गतिं गतः ।  
> आत्मानमनुशोचामि त्वद्विनाशेन दुःखिताम् ॥ ७५ ॥  
> सुहृदां हितकामानां न श्रुतं वचनं त्वया ।  
> भ्रातॄणां चैव कार्त्स्न्येन हितमुक्तं दशानन ॥ ७६ ॥

‘आप अपने बल और पुरुषार्थके लिये विख्यात थे, अतः आपके लिये शोक करना मेरे लिये उचित नहीं है, तथापि स्त्रीस्वभावके कारण मेरे हृदयमें दीनता आ गयी है ॥ ‘आप अपना पुण्य और पाप साथ लेकर अपनी वीरोचित गतिको प्राप्त हुए हैं । आपके विनाशसे मैं महान् दुःखमें पड़ गयी हूँ; इसलिये बारंबार अपने ही लिये शोक करती हूँ ।७५। ‘महाराज दशानन ! हित चाहनेवाले सुहृदों तथा बन्धुओंने जो आपसे सम्पूर्णतः हितकी बातें कही थीं, उन्हें आपने अनसुनी कर दिया ॥ ७६ ॥

> हेत्वर्थयुक्तं विधिवच्छ्रेयस्करमदारुणम् ।  
> विभीषणेनाभिहितं न कृतं हेतुमत् त्वया ॥ ७७ ॥

‘विभीषणका कथन भी युक्ति और प्रयोजनसे पूर्ण था । विधिपूर्वक आपके सामने प्रस्तुत किया गया था । वह कल्याणकारी तो था ही, बहुत ही सौम्य भाषामें कहा गया था; किंतु उस युक्तियुक्त बातको भी आपने नहीं माना ॥ ७७ ॥

> मारीचकुम्भकर्णाभ्यां वाक्यं मम पितुस्तथा ।  
> न कृतं वीर्यमत्तेन तस्येदं फलमीदृशम् ॥ ७८ ॥  
> नीलजीमूतसंकाश पीताम्बर शुभाङ्गद ।  
> खगात्राणि विनिक्षिप्य किं शेषे रुधिरावृतः ॥ ७९ ॥

‘आप अपने बलके घमंडमें मतवाले हो रहे थे; अतः मारीच, कुम्भकर्ण तथा मेरे पिताकी कही हुई बात भी आपने नहीं मानी । उसीका यह ऐसा फल आपको प्राप्त हुआ है ॥ ‘प्राणनाथ ! आपका नील मेघके समान श्याम वर्ण है। आप शरीरपर पीत वस्त्र और बाँहोंमें सुन्दर बाजूबंद धारण करनेवाले हैं । आज खूनसे लथपथ हो अपने शरीरको सब ओर छितराकर यहाँ क्यों सो रहे हैं ? ॥ ७९ ॥

> प्रसुप्त इव शोकार्तो किं मां न प्रतिभाषसे ।

‘मैं शोकसे पीड़ित हो रही हूँ और आप गहरी नींदमें सोये हुए पुरुषकी भाँति मेरी बातका जवाब नहीं दे रहे हैं । नाथ ! ऐसा क्यों हो रहा है ! ॥ ७९½ ॥

> महावीर्यस्य दक्षस्य संयुगेष्वपलायिनः ॥ ८० ॥  
> यातुधानस्य दौहित्रीं किं मां न प्रतिभाषसे ।

‘मैं महान् पराक्रमी, युद्धकुशल और समरभूमिसे पीछे न हटनेवाले सुमाली नामक राक्षसकी दौहित्री ( नतिनी ) हूँ । आप मुझसे बोलते क्यों नहीं हैं ! ॥ ८०½ ॥

> उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे नवे परिभवे कृते ॥ ८१ ॥  
> अद्य वै निर्भया लङ्कां प्रविष्टः सूर्यरश्मयः ।

‘राक्षसराज ! उठिये, उठिये । श्रीरामके द्वारा आपका नूतन पराभव किया गया है तो भी आप सो कैसे रहे हैं ? आज ही ये सूर्यकी किरणें लङ्कामें निर्भय होकर प्रविष्ट हुई हैं ॥ ८१½ ॥

> येन सूदयसे शत्रून् समरे सूर्यवर्चसा ॥ ८२ ॥  
> वज्रं वज्रधरस्येव सोऽयं ते सततार्चितः ।  
> रणे बहुप्रहरणो हेमजालपरिष्कृतः ॥ ८३ ॥  
> परिघो व्यवकीर्णस्ते बाणैश्छिन्नः सहस्रधा ।

‘वीरवर ! आप समरभूमिमें जिस सूर्यतुल्य तेजस्वी परिघके द्वारा शत्रुओंका संहार किया करते थे, वज्रधारी इन्द्रके वज्रकी भाँति जो सदा आपके द्वारा पूजित हुआ था, रणभूमिमें बहुसंख्यक शत्रुओंके प्राण लेनेवाला था और जिसे सोनेकी जालीसे विभूषित किया गया था, आपका वह परिघ श्रीरामके बाणोंसे सहस्रों टुकड़ोंमें विभक्त होकर इधर-उधर बिखरा पड़ा है ॥ ८२-८३½ ॥

> प्रियामिवोपसंगृह्य किं शेषे रणमेदिनीम् ॥ ८४ ॥  
> अप्रियामिव कस्माच्च मां नेच्छस्यभिभाषितुम् ।

‘प्राणनाथ ! आप अपनी प्यारी पत्नीकी भाँति रणभूमिका आलिंगन करके क्यों सो रहे हैं और किस कारणसे मुझे अप्रिय-सी मानकर मुझसे बोलना तक नहीं चाहते हैं ? ॥ ८४½ ॥

> धिगस्तु हृदयं यस्या ममेदं न सहस्रधा ॥ ८५ ॥  
> त्वयि पञ्चत्वमापन्ने फलते शोकपीडितम् ।

‘आपकी मृत्यु हो जानेपर भी मेरे शोकपीड़ित हृदयके हजारों टुकड़े नहीं हो जाते; अतः मुझ पाषाणहृदया नारीको धिक्कार है’ ॥ ८५½ ॥

> इत्येवं विलपन्ती सा बाष्पपर्याकुलेक्षणा ॥ ८६ ॥  
> स्नेहोपस्कन्नहृदया तदा मोहमुपागमत् ।  
> कश्मलाभिहता सन्ना बभौ सा रावणोरसि ॥ ८७ ॥  
> संध्यानुरक्ते जलदे दीप्ता विद्युदिवोज्ज्वला ।

इस प्रकार विलाप करती हुई मन्दोदरीके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे । उसका हृदय स्नेहसे द्रवीभूत हो रहा था । वह रोती-रोती सहसा मूर्च्छित हो गयी और उसी अवस्थामें रावणकी छातीपर गिर पड़ी । रावणके वक्षःस्थलपर मन्दोदरीकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे संध्याकी लालीसे रँगे हुए बादलमें दीप्तिमती विद्युत् चमक रही हो ॥ ८६-८७½ ॥

> तथागतां समुत्थाप्य सपत्न्यस्तां भृशातुराः ॥ ८८ ॥  
> पर्यवस्थापयामासू रुदत्यो रुदतीं भृशम् ।

उसकी सौतें भी शोकसे अत्यन्त आतुर हो रही थीं, उन्होंने उसे उस अवस्थामें देखकर उठाया और स्वयं भी रोते-रोते जोर-जोरसे विलाप करती हुई मन्दोदरीको धीरज बँधाया ॥ ८८½ ॥

> किं ते न विदिता देवि लोकानां स्थितिरध्रुवा ॥ ८९ ॥  
> दशाविभागपर्याये राज्ञां वै चञ्चलाः श्रियः ।

वे बोलीं—‘महारानी !क्या आप नहीं जानतीं कि संसारका स्वरूप अस्थिर है । दशा बदल जानेपर राजाओंकी लक्ष्मी स्थिर नहीं रहती’ ॥ ८९½ ॥

> इत्येवमुच्यमाना सा सशब्दं प्ररुरोद ह ॥ ९० ॥  
> स्रपयन्ती तदास्रेण स्तनौ वक्त्रं सुनिर्मलम् ।

उनके ऐसा कहनेपर मन्दोदरी फूट-फूटकर रोने लगी । उस समय उसके दोनों स्तन और उज्ज्वल मुख आँसुओंसे नहा उठे थे ॥ ९०½ ॥

> एतस्मिन्नन्तरे रामो विभीषणमुवाच ह ॥ ९१ ॥  
> संस्कारः क्रियतां भ्रातुः स्त्रीगणः परिसान्त्व्यताम् ।

इसी समय श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणसे कहा–‘इन स्त्रियोंको धैर्य बँधाओ और अपने भाईका दाह-संस्कार करो’ ॥ ९१½ ॥

> तमुवाच ततो धीमान् विभीषण इदं वचः ॥ ९२ ॥  
> विमृश्य बुद्ध्या प्रज्ञितं धर्मार्थसहितं हितम् ।

यह सुनकर बुद्धिमान् विभीषणने ( श्रीरामका अभिप्राय जाननेके उद्देश्यसे ) बुद्धिसे सोच-विचारकर उनसे यह धर्म और अर्थसे युक्त विनयपूर्ण तथा हितकर बात कही—॥ ९२½ ॥

> त्यक्तधर्मव्रतं क्रूरं नृशंसमनृतं तथा ॥ ९३ ॥  
> नाहमर्हामि संस्कर्तुं परदाराभिमर्शनम् ।

‘भगवन् ! जिसने धर्म और सदाचारका त्याग कर दिया था, जो क्रूर, निर्दयी, असत्यवादी तथा परायी स्त्रीका स्पर्श करनेवाला था, उसका दाहसंस्कार करना मैं उचित नहीं समझता हूँ ॥ ९३½ ॥

> भ्रातृरूपो हि मे शत्रुरेष सर्वाहिते रतः ॥ ९४ ॥  
> रावणो नार्हते पूजां पूज्योऽपि गुरुगौरवात् ।

‘सबके अहितमें संलग्न रहनेवाला यह रावण भाईके रूपमें मेरा शत्रु था । यद्यपि ज्येष्ठ होनेसे गुरुजनोचित गौरवके कारण वह मेरा पूज्य था, तथापि वह मुझसे सत्कार पाने योग्य नहीं है ॥ ९४½ ॥

> नृशंस इति मां राम वक्ष्यन्ति मनुजा भुवि ॥ ९५ ॥  
> श्रुत्वा तस्यागुणान् सर्वे वक्ष्यन्ति सुकृतं पुनः ।

‘श्रीराम ! मेरी यह बात सुनकर संसारके मनुष्य मुझे क्रूर अवश्य कहेंगे; परंतु जब रावणके दुर्गुणोंको भी सुनेंगे, तब सब लोग मेरे इस विचारको उचित ही बतायेंगे’ ॥ ९५½॥

> तच्छ्रुत्वा परमप्रीतो रामो धर्मभृतां वरः ॥ ९६ ॥  
> विभीषणमुवाचेदं वाक्यज्ञं वाक्यकोविदः ।

यह सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए । वे बातचीत करनेमें बड़े प्रवीण थे; अतः बातोंका अभिप्राय समझनेवाले विभीषणसे इस प्रकार बोले– ॥९६½॥

> तवापि मे प्रियं कार्यं त्वत्प्रभावान्मया जितम् ॥ ९७ ॥  
> अवश्यं तु क्षमं वाच्यो मया त्वं राक्षसेश्वर ।

‘राक्षसराज ! मुझे तुम्हारा भी प्रिय करना है, क्योंकि तुम्हारे ही प्रभावसे मेरी जीत हुई है । अवश्य ही मुझे तुमसे उचित बात कहनी चाहिये; अतः सुनो ॥ ९७½ ॥

> अधर्मानृतसंयुक्तः कामं त्वेष निशाचरः ॥ ९८ ॥  
> तेजस्वी बलवाञ्छूरः संग्रामेषु च नित्यशः ।

‘यह निशाचर भले ही अधर्मी और असत्यवादी रहा हो; परंतु संग्राममें सदा ही तेजस्वी, बलवान् तथा शूरवीर रहा है ॥ ९८½ ॥

> शतक्रतुमुखैर्देवैः श्रूयते न पराजितः ॥ ९९ ॥  
> महात्मा बलसम्पन्नो रावणो लोकरावणः ।

‘सुना जाता है—इन्द्र आदि देवता भी इसे परास्त नहीं कर सके थे । समस्त लोकोंको रुलानेवाला रावण बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा महामनस्वी था ॥ ९९½ ॥

> मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम् ॥१००॥  
> क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ।

‘वैर मरनेतक ही रहता है । मरनेके बाद उसका अन्त हो जाता है । अब हमारा प्रयोजन भी सिद्ध हो चुका है, अतः इस समय जैसे यह तुम्हारा भाई है, वैसे ही मेरा भी है; इसलिये इसका दाहसंस्कार करो ॥ १००½ ॥

> त्वत्सकाशान्महाबाहो संस्कारं विधिपूर्वकम् ॥१०१॥  
> क्षिप्रमर्हति धर्मेण त्वं यशोभाग् भविष्यसि ।

‘महाबाहो ! धर्मके अनुसार रावण तुम्हारी ओरसे शीघ्र ही विधिपूर्वक दाह-संस्कार प्राप्त करनेके योग्य है । ऐसा करनेसे तुम यशके भागी होओगे’ ॥ १०१½ ॥

> राघवस्य वचः श्रुत्वा त्वरमाणो विभीषणः ॥१०२॥  
> संस्कारयितुमारेभे भ्रातरं रावणं हतम् ।

श्रीरामचन्द्रजीके इस वचनको सुनकर विभीषण युद्धमें मारे गये अपने भाई रावणके दाह-संस्कारकी शीघ्रतापूर्वक तैयारी करने लगे ॥ १०२½ ॥

> स प्रविश्य पुरीं लङ्कां राक्षसेन्द्रो विभीषणः ॥१०३॥  
> रावणस्याग्निहोत्रं तु निर्यापयति सत्वरम् ।

राक्षसराज विभीषणने लङ्कापुरीमें प्रवेश करके रावणके अग्निहोत्रको शीघ्र ही विधिपूर्वक समाप्त किया ॥ १०३½ ॥

> शकटान् दारुरूपाणि अग्नींश्च वै याजकांस्तथा ॥१०४॥  
> तथा चन्दनकाष्ठानि काष्ठानि विविधानि च ।  
> अगरूणि सुगन्धीनि गन्धांश्च सुरभींस्तथा ॥१०५॥  
> मणिमुक्ताप्रवालानि निर्यापयति राक्षसः ।

इसके बाद शकट, लकड़ी, अग्निहोत्रकी अग्नियाँ, यज्ञ करानेवाले पुरोहित, चन्दनकाष्ठ, अन्य विविध प्रकारकी लकड़ियाँ, सुगन्धित अगरु, अन्यान्य सुन्दर गन्धयुक्त पदार्थ, मणि, मोती और मूँगा—इन सब वस्तुओंको उन्होंने एकत्र किया ॥ १०४-१०५½ ॥

> आजगाम मुहूर्तेन राक्षसैः परिवारितः ॥१०६॥  
> ततो माल्यवता सार्धं क्रियामेव चकार सः ।

फिर दो ही घड़ीमें राक्षसोंसे घिरे हुए वे शीघ्र वहाँसे चले आये । तदनन्तर माल्यवान्के साथ मिलकर उन्होंने दाह-संस्कारकी तैयारीका सारा कार्य पूर्ण किया ॥ १०६½ ॥

> सौवर्णी शिबिकां दिव्यामारोप्य क्षौमवाससम् ॥१०७॥  
> रावणं राक्षसाधीशमश्रुवर्णमुखा द्विजाः ।  
> तूर्यघोषैश्च विविधैः स्तुवद्भिश्चाभिनन्दितम् ॥१०८॥

भाँति-भाँतिके वाद्यघोषोंद्वारा स्तुति करनेवाले मागधोंने जिसका अभिनन्दन किया था, राक्षसराज रावणके उस शवको रेशमी वस्त्रसे ढककर उसे सोनेके दिव्य विमानमें रखनेके पश्चात् राक्षसजातीय ब्राह्मण वहाँ नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए खड़े हो गये ॥ १०७-१०८ ॥

> पताकाभिश्च चित्राभिः सुमनोभिश्च चित्रिताम् ।  
> उत्क्षिप्य शिबिकां तां तु विभीषणपुरोगमाः ॥१०९॥  
> दक्षिणाभिमुखाः सर्वे गृह्य काष्ठानि भेजिरे ।

उस शिबिकाको विचित्र पताकाओं तथा फूलोंसे सजाया गया था । जिससे वह विचित्र शोभा धारण करती थी । विभीषण आदि राक्षस उसे कंधेपर उठाकर तथा अन्य सब लोग हाथमें सूखे काठ लिये दक्षिण दिशामें श्मशानभूमिकी ओर चले ॥ १०९½ ॥

> अग्नयो दीप्यमानास्ते तदाध्वर्युसमीरिताः ॥ ११० ॥  
> शरणाभिगताः सर्वे पुरस्तात् तस्य ते ययुः ।

यजुर्वेदीय याजकोंद्वारा ढोयी जाती हुई त्रिविध अग्नियाँ प्रज्वलित हो उठीं । वे सब कुण्डमें रक्खी हुई थीं और पुरोहितगण उन्हें लेकर शवके आगे-आगे चल रहे थे ११०½

> अन्तःपुराणि सर्वाणि रुदमानानि सत्वरम् ॥१११॥  
> पृष्ठतोऽन्वयुस्तानि प्लवमानानि सर्वतः ।

अन्तःपुरकी सारी स्त्रियाँ रोती हुई तुरंत ही शवके पीछे-पीछे चल पड़ीं। वे सब ओर लड़खड़ाती चलती थीं ॥ ११२½॥

> रावणं प्रयते देशे स्थाप्य ते भृशदुःखिताः ॥ ११२॥  
> चितां चन्दनकाष्ठैश्च पद्मकोशीरचन्दनैः ।  
> ब्राह्मण्या संवर्तयामासू राङ्कवास्तरणावृताम् ॥ ११३॥

आगे जाकर रावणके विमानको एक पवित्र स्थानमें रखकर अत्यन्त दुखी हुए विभीषण आदि राक्षसोंने मलयचन्दन-काष्ठ, पद्मक, उशीर ( खस ) तथा अन्य प्रकारके चन्दनों-द्वारा वेदोक्त विधिसे चिता बनायी और उसके ऊपर रङ्कु नामक मृगका चर्म बिछाया ॥ ११२-११३ ॥

> प्रचक्रू राक्षसेन्द्रस्य पितृमेधमनुत्तमम् ।  
> वेदिं च दक्षिणाप्राचीं यथास्थानं च पावकम् ॥ ११४॥  
> पृषदाज्येन सम्पूर्ण स्रुवं स्कन्धे प्रचिक्षिपुः ।  
> पादयोः शकटं प्रापुरूर्वोश्चोलूखलं तदा ॥ ११५॥

उसके ऊपर राक्षसराजके शवको सुलाकर उन्होंने उत्तम विधिसे उसका पितृमेध ( दाहसंस्कार ) किया। उन्होंने चिता-के दक्षिण-पूर्वमें वेदी बनाकर उसपर यथास्थान अग्निको स्थापित किया था। फिर दधिमिश्रित घीसे भरी हुई स्रुवा रावणके कंधेपर रक्खी। इसके बाद पैरोंपर शकट और जाँघों पर उलूखल रक्खा ॥ ११४-११५ ॥

> दारुपात्राणि सर्वाणि अरणिं चोत्तरारणिम् ।  
> दत्त्वा तु मुसलं चान्यं यथास्थानं विचक्रमुः ॥ ११६॥

तथा काष्ठके सभी पात्र, अरणि, उत्तरारणि और मूसल आदिको भी यथास्थान रख दिया ॥ ११६ ॥

> शास्त्रदृष्टेन विधिना महर्षिविहितेन च ।  
> तत्र मेध्यं पशुं हत्वा राक्षसेन्द्रस्य राक्षसाः ॥ ११७॥  
> परिस्तरणिकां राज्ञो घृताक्तां समवेशयन् ।  
> गन्धैर्माल्यैरलंकृत्य रावणं दीनमानसाः ॥ ११८॥

वेदोक्त विधि और महर्षियोंद्वारा रचित कल्पसूत्रोंमें बतायी गयी प्रणालीसे वहाँ सारा कार्य हुआ। राक्षसोंने ( राक्षसोंकी रीतिके अनुसार ) मेध्य पशुका हनन करके राजा रावणकी चितापर फैलाये हुए मृगचर्मको घीसे तर कर दिया, फिर रावणके शवको चन्दन और फूलोंसे अलंकृत करके वे राक्षस मन-ही-मन दुःखका अनुभव करने लगे ॥ ११७-११८॥

> विभीषणसहायास्ते वस्त्रैश्च विविधैरपि ।  
> लाजैरवकिरन्ति स्म बाष्पपूर्णमुखास्तथा ॥ ११९॥

फिर विभीषणके साथ अन्यान्य राक्षसोंने भी चितापर नाना प्रकारके वस्त्र और लावा बिखेरे। उस समय उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली ॥ ११९ ॥

> स ददौ पावकं तस्य विधियुक्तं विभीषणः ।  
> स्नात्वा चैवार्द्रवस्त्रेण तिलान् दर्भविमिश्रितान् ॥ १२०॥  
> उदकेन च सम्मिश्रान् प्रदाय विधिपूर्वकम् ।  
> ताः स्त्रियोऽनुनयामास सान्त्वयित्वा पुनः पुनः॥ १२१॥

तदनन्तर विभीषणने चितामें विधिके अनुसार आग लगायी। उसके बाद स्नान करके भीगे वस्त्र पहने हुए ही उन्होंने तिल, कुश और जलके द्वारा विधिवत् रावणको जलाञ्जलि दी। तत्पश्चात् रावणकी स्त्रियोंको बारबार सान्त्वना देकर उनसे घर चलनेके लिये अनुनय-विनय की १२०-१२१

> गम्यतामिति ताः सर्वा विविशुर्नगरं ततः ।  
> प्रविष्टासु पुरीं स्त्रीषु राक्षसेन्द्रो विभीषणः ।  
> रामपार्श्वमुपागम्य समतिष्ठद् विनीतवत् ॥ १२२॥

‘महलमें चलो’ यह विभीषणका आदेश सुनकर वे सारी स्त्रियाँ नगरमें चली गयीं। स्त्रियोंके पुरीमें प्रवेश कर जानेपर राक्षसराज विभीषण श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर विनीतभावसे खड़े हो गये ॥ १२२ ॥

> रामोऽपि सह सैन्येन ससुग्रीवः सलक्ष्मणः ।  
> हर्षं लेभे रिपुं हत्वा वृत्रं वज्रधरो यथा ॥ १२३॥

श्रीराम भी लक्ष्मण, सुग्रीव तथा समस्त सेनाके साथ शत्रुका वध करके बहुत प्रसन्न थे। ठीक उसी तरह, जैसे वज्रधारी इन्द्र वृत्रासुरको मारकर प्रसन्नताका अनुभव करने लगे थे ॥ १२३ ॥

> ततो विमुक्त्वा सशरं शरासनं  
> महेन्द्रदत्तं कवचं स तन्महत् ।  
> विमुच्य रोषं रिपुनिग्रहात् ततो  
> रामः स सौम्यत्वमुपागतोऽरिहा॥ १२४॥

तदनन्तर इन्द्रके दिये हुए धनुष, बाण और विशाल कवचको त्यागकर तथा शत्रुका दमन कर देनेके कारण रोषको भी छोड़कर शत्रुसूदन श्रीरामने शान्तभाव धारण कर लिया॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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