---
title: "युद्धकाण्ड, Sarga 11"
canonical: "https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana/yuddha-kanda/sarga-11"
lang: "hi"
---

# युद्धकाण्ड, Sarga 11

> स बभूव कृशो राजा मैथिलीकाममोहितः ।  
> असन्मानाच्च सुहृदां पापः पापेन कर्मणा ॥ १ ॥

राक्षसोंका राजा रावण मिथिलेशकुमारी सीताके प्रति कामसे मोहित हो रहा था, उसके हितैषी सुहृद् विभीषण आदि उसका अनादर करने लगे थे—उसके कुकृत्योंकी निन्दा करते थे तथा वह सीताहरणरूपी जघन्य पाप-कर्मके कारण पापी घोषित किया गया था—इन सब कारणोंसे वह अत्यन्त कृश ( चिन्तायुक्त एवं दुर्बल ) हो गया था ॥ १ ॥

> अतीव कामसम्पन्नो वैदेहीमनुचिन्तयन् ।  
> अतीतसमये काले तस्मिन् वै युधि रावणः ।  
> अमात्यैश्च सुहृद्भिश्च प्राप्तकालममन्यत ॥ २ ॥

वह अत्यन्त कामसे पीड़ित होकर बारंबार विदेहकुमारीका चिन्तन करता था, इसलिये युद्धका अवसर बीत जानेपर भी उसने उस समय मन्त्रियों और सुहृदोंके साथ सलाह करके युद्धको ही समयोचित कर्तव्य माना ॥ २ ॥

> स हेमजालविततं मणिविद्रुमभूषितम् ।  
> उपगम्य विनीताश्वमारुरोह महारथम् ॥ ३ ॥

वह सोनेकी जालीसे आच्छादित तथा मणि एवं मूँगोंसे विभूषित एक विशाल रथपर, जिसमें सुशिक्षित घोड़े जुते हुए थे; जा चढ़ा ॥ ३ ॥

> तमास्थाय रथश्रेष्ठं महामेघसमस्वनम् ।  
> प्रययौ रक्षसां श्रेष्ठो दशग्रीवः सभां प्रति ॥ ४ ॥

महान् मेघोंकी गर्जनाके समान घर्घराहट पैदा करनेवाले उस उत्तम रथपर आरूढ़ हो राक्षसशिरोमणि दशग्रीव सभाभवनकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ ४ ॥

> असिचर्मधरा योधाः सर्वायुधधरास्ततः ।  
> राक्षसा राक्षसेन्द्रस्य पुरस्तात् सम्प्रतस्थिरे ॥ ५ ॥

उस समय राक्षसराज रावणके आगे-आगे ढाल-तलवार एवं सब प्रकारके आयुध धारण करनेवाले बहुसंख्यक राक्षस योद्धा जा रहे थे ॥ ५ ॥

> नानाविकृतवेषाश्च नानाभूषणभूषिताः ।  
> पार्श्वतः पृष्ठतश्चैनं परिवार्य ययुस्तदा ॥ ६ ॥

इसी तरह भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित और नाना प्रकारके विकराल वेषवाले अगणित निशाचर उसे दायें-बायें और पीछेकी ओरसे घेरकर चल रहे थे ॥ ६ ॥

> रथैश्चातिरथाः शीघ्रं मत्तैश्च वरवारणैः ।  
> अनूत्पेतुर्दशग्रीवमाक्रीडद्भिश्च वाजिभिः ॥ ७ ॥

रावणके प्रस्थान करते ही बहुत-से अतिरथी वीर रथों, मतवाले गजराजों और खेल-खेलमें तरह-तरहकी चालें दिखानेवाले घोड़ोंपर सवार हो तुरंत उसके पीछे चल दिये ॥ ७ ॥

> गदापरिघहस्ताश्च शक्तितोमरपाणयः ।  
> परश्वधधराश्चान्ये तथान्ये शूलपाणयः ।  
> ततस्तूर्यसहस्राणां संजज्ञे निःस्वनो महान् ॥ ८ ॥  
> तुमुलः शङ्खशब्दश्च सभां गच्छति रावणे ।  
> स नेमिघोषेण महान् सहसाभिनिनादयन् ॥ ९ ॥  
> राजमार्गं श्रिया जुष्टं प्रतिपेदे महारथः ।

किन्हींके हाथोंमें गदा और परिघ शोभा पा रहे थे । कोई शक्ति और तोमर लिये हुए थे । कुछ लोगोंने फरसे धारण कर रक्खे थे तथा अन्य राक्षसोंके हाथोंमें शूल चमक रहे थे, फिर तो वहाँ सहस्रों वाद्योंका महान् घोष होने लगा ॥ रावणके सभाभवनकी ओर यात्रा करते समय तुमुल शङ्खध्वनि होने लगी । उसका वह विशाल रथ अपने पहियोंकी घर्घराहटसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करता हुआ सहसा शोभाशाली राजमार्गपर जा पहुँचा ॥ ९½ ॥

> विमलं चातपत्रं च प्रगृहीतमशोभत ॥ १० ॥  
> पाण्डुरं राक्षसेन्द्रस्य पूर्णस्ताराधिपो यथा ।

उस समय राक्षसराज रावणके ऊपर तना हुआ निर्मल श्वेत छत्र पूर्ण चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ १०½ ॥

> हेममञ्जरिगर्भे च शुद्धस्फटिकविग्रहे ॥ ११ ॥  
> चामरव्यजने तस्य रेजतुः सव्यदक्षिणे ।

उसके दाहिने और बायें भागमें शुद्ध स्फटिकके डंडेवाले चँवर और व्यजन, जिनमें सोनेकी मञ्जरियाँ बनी हुई थीं, बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ११½ ॥

> ते कृताञ्जलयः सर्वे रथस्थं पृथिवीस्थिताः ॥ १२ ॥  
> राक्षसा राक्षसश्रेष्ठं शिरोभिस्तं ववन्दिरे ।

मार्गमें पृथ्वीपर खड़े हुए सभी राक्षस दोनों हाथ जोड़ रथपर बैठे हुए राक्षसशिरोमणि रावणकी सिर झुकाकर वन्दना करते थे ॥ १२½ ॥

> राक्षसैः स्तूयमानः सञ्जयाशीर्भिररिंदमः ॥ १३ ॥  
> आससाद महातेजाः सभां विरचितां तदा ।

राक्षसोंद्वारा की गयी स्तुति, जय-जयकार और आशीर्वाद सुनता हुआ शत्रुदमन महातेजस्वी रावण उस समय विश्वकर्माद्वारा निर्मित राजसभामें पहुँचा ॥ १३½ ॥

> सुवर्णरजतास्तीर्णां विशुद्धस्फटिकान्तराम् ॥ १४ ॥  
> विराजमानो वपुषा रुक्मपट्टोत्तरच्छदाम् ।  
> तां पिशाचशतैः षड्भिरभिगुप्तां सदाप्रभाम् ॥१५॥  
> प्रविवेश महातेजाः सुकृतां विश्वकर्मणा ।

उस सभाके फर्शमें सोने-चाँदीका काम किया हुआ था तथा बीच-बीचमें विशुद्ध स्फटिक भी जड़ा गया था । उसमें सोनेके कामवाले रेशामी वस्त्रोंकी चादरें बिछी हुई थीं । वह सभा सदा अपनी प्रभासे उद्भासित होती रहती थी । छः सौ पिशाच उसकी रक्षा करते थे । विश्वकर्माने उसे बहुत ही सुन्दर बनाया था । अपने शरीरसे सुशोभित होनेवाले महातेजस्वी रावणने उस सभामें प्रवेश किया ॥ १४-१५३ ॥

> तस्यां तु वैदूर्यमयं प्रियकाजिनसंवृतम् ॥१६॥  
> महत्सोपाश्रयं भेजे रावणः परमासनम् ।  
> ततः शशासेश्वरवद्दूताँल्लघुपराक्रमान् ॥१७॥  
> समानयत मे क्षिप्रमिहैतान् राक्षसानिति ।  
> कृत्यमस्ति महज्ज्ञाने कर्तव्यमिति शत्रुभिः ॥१८॥

उस सभाभवनमें वैदूर्यमणि ( नीलम ) का बना हुआ एक विशाल और उत्तम सिंहासन था, जिसपर अत्यन्त मुलायम चमड़ेवाले ‘प्रियक‘ नामक मृगका चर्म बिछा था और उसपर मसनँद भी रखा हुआ था । रावण उसीपर बैठ गया । फिर उसने अपने शीघ्रगामी दूतोंको आज्ञा दी—॥ ‘तुमलोग शीघ्र ही यहाँ बैठनेवाले सुविख्यात राक्षसोंको मेरे पास बुला ले आओ; क्योंकि शत्रुओंके साथ करने योग्य महान् कार्य मुझपर आ पड़ा है । इस बातको मैं अच्छी तरह समझ रहा हूँ ( अतः इसपर विचार करनेके लिये सब सभा-सदोंका यहाँ आना अत्यन्त आवश्यक है )‘ ॥ १८ ॥

> राक्षसास्तद्वचः श्रुत्वा लङ्कायां परिचक्रमुः ।  
> अनुगेहमवस्थाय विहारशयनेषु च ।  
> उद्यानेषु च रक्षांसि चोदयन्तो ह्यभीतवत् ॥१९॥

रावणका यह आदेश सुनकर वे राक्षस लङ्कामें सब ओर चक्कर लगाने लगे । वे एक-एक घर, विहारस्थान, शयनागार और उद्यानमें जा-जाकर बड़ी निर्भयतासे उन सब राक्षसोंको राजसभामें चलनेके लिये प्रेरित करने लगे ॥ १९ ॥

> ते रथान्तवरा एके दनानेके दढान् हयान् ।  
> नागानेकेऽधिरुरुहुर्जग्मुश्चैके पदातयः ॥२०॥

तब उन राक्षसोंमेंसे कोई रथपर चढ़कर चले, कोई मतवाले हाथियोंपर और कोई मजबूत घोड़ोंपर सवार होकर अपने-अपने स्थानसे प्रस्थित हुए । बहुत-से राक्षस पैदल ही चल दिये ॥ २० ॥

> सा पुरी परमाकीर्णा रथकुञ्जरवाजिभिः ।  
> सम्पतद्भिर्विरुरुचे गरुत्मद्भिरिवाम्बरम् ॥ २१॥

उस समय दौड़ते हुए रथों, हाथियों और घोड़ोंसे व्याप्त हुई वह पुरी बहुसंख्यक गरुड़ोंसे आच्छादित हुए आकाशकी भाँति शोभा पा रही थी ॥ २१ ॥

> ते वाहनान्यवस्थाय यानानि विविधानि च ।  
> सभां पद्भिः प्रविविशुः सिंहा गिरिगुहामिव ॥ २२ ॥

गन्तव्य स्थानतक पहुँचकर अपने-अपने वाहनों और नाना प्रकारकी सवारियोंको बाहर ही रखकर वे सब सभासद् पैदल ही उस सभाभवनमें प्रविष्ट हुए; मानो बहुत-से सिंह किसी पर्वतकी कन्दरामें घुस रहे हों ॥ २२ ॥

> राज्ञः पादौ गृहीत्वा तु राज्ञा ते प्रतिपूजिताः ।  
> पीठेष्वन्ये बृसीष्वन्ये भूमौ केचिदुपाविशन् ॥ २३ ॥

वहाँ पहुँचकर उन सबने राजाके पाँव पकड़े तथा राजाने भी उनका सत्कार किया । तत्पश्चात् कुछ लोग सोनेके सिंहासनोंपर, कुछ लोग कुशाकी चटाइयोंपर और कुछ लोग साधारण बिछौनोंसे ढकी हुई भूमिपर ही बैठ गये ॥ २३ ॥

> ते समेत्य सभायां वै राक्षसा राजशासनात् ।  
> यथार्हमुपतस्थुस्ते रावणं राक्षसाधिपम् ॥ २४ ॥  
> मन्त्रिणश्च यथामुख्या निश्चितार्थेषु पण्डिताः ।  
> अमात्याश्च गुणोपेताः सर्वज्ञा बुद्धिदर्शनाः ॥ २५ ॥  
> समीयुस्तत्र शतशः शूराश्च बहवस्तथा ।  
> सभायां हेमत्रर्णायां सर्वार्थस्य सुखाय वै ॥ २६ ॥  
> ततो महात्मा विपुलं सुयुग्यं  
> रथं वरं हेमविचित्रिताङ्गम् ।  
> शुभं समास्थाय ययौ यशस्वी  
> विभीषणः संसदमप्रजस्य ॥ २७ ॥

राजाकी आज्ञासे उस सभामें एकत्र होकर वे सब राक्षस राक्षसराज रावणके आसपास यथायोग्य आसनोंपर बैठ गये ॥ यथायोग्य भिन्न-भिन्न विषयोंके लिये उचित सम्मति देनेवाले मुख्य-मुख्य मन्त्री, कर्तव्य-निश्चयमें पाण्डित्यका परिचय देनेवाले सचिव, बुद्धिदर्शी, सर्वज्ञ, सद्गुण-सम्पन्न उपमन्त्री तथा और भी बहुत-से शूरवीर सम्पूर्ण अर्थोंके निश्चयके लिये और सुखप्राप्तिके उपायपर विचार करनेके लिये उस सुनहरी कान्तिवाली सभाके भीतर सैकड़ोंकी संख्यामें उपस्थित थे ॥ तत्पश्चात् यशस्वी महात्मा विभीषण भी एक सुवर्णजटित, सुन्दर अश्वोंसे युक्त, विशाल, श्रेष्ठ एवं शुभकारक रथपर आरूढ़ हो अपने बड़े भाईकी सभामें जा पहुँचे ॥ २७ ॥

> स पूर्वजायावरजः शशंस  
> नामाथ पश्चाच्चरणौ ववन्दे ।  
> शुक्रः प्रहस्तश्च तथैव तेभ्यो  
> ददौ यथार्हं पृथगासनानि ॥ २८ ॥

छोटे भाई विभीषणने पहले अपना नाम बताया, फिर बड़े भाईके चरणोंमें मस्तक झुकाया । इसी तरह शुक और प्रहस्तने भी किया । तब रावणने उन सबको यथायोग्य पृथक्-पृथक् आसन दिये ॥ २८ ॥

> सुवर्णनानामणिभूषणानां  
> सुवाससां संसदि राक्षसानाम् ।  
> तेषां परार्ध्यागुरुचन्दनानां  
> स्रजां च गन्धाः प्रववुः समन्तात् ॥ २९ ॥

सुवर्ण एवं नाना प्रकारकी मणियोंके आभूषणोंसे विभूषित उन सुन्दर वस्त्रधारी राक्षसोंकी उस सभामें सब ओर बहुमूल्य अगुरु, चन्दन तथा पुष्पहारोंकी सुगन्ध छा रही थी ॥ २९ ॥

> न चुकुशुर्नानृतमाह कश्चित्  
> सभासदो नापि जजल्पुरुच्चैः ।  
> संसिद्धार्थाः सर्वे एवोग्रवीर्या  
> भर्तुः सर्वे दद्दशुश्चाननं ते ॥ ३० ॥

उस समय उस सभाका कोई भी सदस्य असत्य नहीं बोलता था । वे सभी सभासद् न तो चिल्लाते थे और न जोर-जोरसे बातें ही करते थे । वे सब-के-सब सफलमनोरथ एवं भयंकर पराक्रमी थे और सभी अपने स्वामी रावणके मुँहकी ओर देख रहे थे ॥ ३० ॥

> स रावणः शस्त्रभृतां मनस्विनां  
> महाबलानां समितौ मनस्वी ।  
> तस्यां सभायां प्रभया चकाशे  
> मध्ये वसूनामिव वज्रहस्तः ॥ ३१ ॥

‘उस सभामें शस्त्रधारी महाबली मनस्वी वीरोंका समागम होनेपर उनके बीचमें बैठा हुआ मनस्वी रावण अपनी प्रभासे उसी प्रकार प्रकाशित हो रहा था, जैसे वसुओंके बीचमें वज्रधारी इन्द्र देदीप्यमान होते हैं ॥ ३१ ॥

Book: https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
