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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 107"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 107

> ततः प्रवृत्तं सुकूरं रामरावणयोस्तदा।  
> सुमहद् द्वैरथं युद्धं सर्वलोकभयावहम् ॥ १ ॥

तदनन्तर श्रीराम और रावणमें अत्यन्त क्रूरतापूर्वक महान् द्वैरथ युद्ध आरम्भ हुआ, जो समस्त लोकोंके लिये भयंकर था ॥ १ ॥

> ततो राक्षससैन्यं च हरीणां च महद्बलम्।  
> प्रगृहीतप्रहरणं निश्चेष्टं समवर्तत ॥ २ ॥

उस समय राक्षसों और वानरोंकी विशाल सेनाएँ हाथमें हथियार लिये रहनेपर भी निश्चेष्ट खड़ी रहीं—कोई किसीपर प्रहार नहीं करता था ॥ २ ॥

> सम्प्रयुद्धौ तु तौ दृष्ट्वा बलवन्नरराक्षसौ।  
> व्याक्षिप्तहृदयाः सर्वे परं विस्मयमागताः ॥ ३ ॥

मनुष्य और निशाचर दोनों वीरोंको बलपूर्वक युद्ध करते देख सबके हृदय उन्हींकी ओर खिंच गये; अतः सभी बड़े आश्चर्यमें पड़ गये ॥ ३ ॥

> नानाप्रहरणैर्व्यग्रैर्भुजैर्विस्मितबुद्धयः।  
> तस्थुः प्रेक्ष्य च संग्रामं नाभिजग्मुः परस्परम् ॥ ४ ॥

दोनों ओरके सैनिकोंके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र विद्यमान थे और उनके हाथ युद्धके लिये व्यग्र थे, तथापि उस अद्भुत संग्रामको देखकर उनकी बुद्धि आश्चर्यचकित हो उठी थी; इसलिये वे चुपचाप खड़े थे। एक-दूसरेपर प्रहार नहीं करते थे ॥ ४ ॥

> रक्षसां रावणं चापि वानराणां च राघवम्।  
> पश्यतां विस्मिताक्षाणां सैन्यं चित्रमिवाबभौ ॥ ५ ॥

राक्षस रावणकी ओर देख रहे थे और वानर श्रीरघुनाथजीकी ओर । उन सबके नेत्र विस्मित थे; अतः निस्तब्ध खड़ी रहनेके कारण उभय पक्षकी सेनाएँ चित्रलिखित-सी जान पड़ती थीं ॥ ५ ॥

> तौ तु तत्र निमित्तानि दृष्ट्वा राघवरावणौ।  
> कृतबुद्धी स्थिरामर्षौ युयुधाते ह्यभीतवत् ॥ ६ ॥

श्रीराम और रावण दोनोंने वहाँ प्रकट होनेवाले निमित्तों-को देखकर उनके भावी फलका विचार करके युद्धविषयक विचारको स्थिर कर लिया था । उन दोनोंमेंसे एक-दूसरेके प्रति अमर्षका भाव दृढ़ हो गया था; इसलिये वे निर्भय-से होकर युद्ध करने लगे ॥ ६ ॥

> जेतव्यमिति काकुत्स्थो मर्तव्यमिति रावणः।  
> धृतौ स्ववीर्यसर्वस्वं युद्धेऽदर्शयतां तदा ॥ ७ ॥

श्रीरामचन्द्रजीको यह विश्वास था कि मेरी ही जीत होगी और रावणको भी यह निश्चय हो गया था कि मुझे अवश्य ही मरना होगा; अतः वे दोनों युद्धमें अपना सारा पराक्रम प्रकट करके दिखाने लगे ॥ ७ ॥

> ततः क्रोधाद् दशग्रीवः शरान् संधाय वीर्यवान् ।  
> मुमोच ध्वजमुद्दिश्य राघवस्य रथे स्थितम् ॥ ८ ॥

उस समय पराक्रमी दशाननने क्रोधपूर्वक बाणोंका संधान करके श्रीरघुनाथजीके रथपर फहराती हुई ध्वजाको निशाना बनाया और उन बाणोंको छोड़ दिया ॥ ८ ॥

> ते शरास्तमनासाद्य पुरंदररथध्वजम् ।  
> रथशक्ति परामृश्य निपेतुर्धरणीतले ॥ ९ ॥  
> ततो रामोऽपि संक्रुद्धश्चापमाकृष्य वीर्यवान् ।  
> कृतप्रतिकृतं कर्तुं मनसा सम्प्रचक्रमे ॥ १० ॥

परंतु उसके चलाये हुए वे बाण इन्द्रके रथकी ध्वजातक न पहुँच सके; केवल रथशक्तिको छूते हुए धरतीपर गिर पड़े॥ तब महाबली श्रीरामचन्द्रजीने भी कुपित होकर अपने धनुषको खींचा और मन-ही-मन रावणके कृत्यका बदला चुकाने—उसके ध्वजको काट गिरानेका विचार किया ॥१०॥

> रावणध्वजमुद्दिश्य मुमोच निशितं शरम् ।  
> महासर्पमिवासह्यं ज्वलन्तं स्वेन तेजसा ॥ ११ ॥

रावणके ध्वजको लक्ष्य करके उन्होंने विशाल सर्पके समान असह्य और अपने तेजसे प्रज्वलित तीखा बाण छोड़ दिया ॥ ११ ॥

> रामश्चिक्षेप तेजस्वी केतुमुद्दिश्य सायकम् ।  
> जगाम स महीं छित्त्वा दशग्रीवध्वजं शरः ॥ १२ ॥

तेजस्वी श्रीरामने उस ध्वजकी ओर निशाना साधकर अपना सायक चलाया और वह दशाननके उस ध्वजको काटकर पृथ्वीमें समा गया ॥ १२ ॥

> स निकृत्तोऽपतद् भूमौ रावणस्यन्दनध्वजः ।  
> ध्वजस्योन्मथनं दृष्ट्वा रावणः स महाबलः ॥ १३ ॥  
> सम्प्रदीप्तोऽभवत् क्रोधादमर्षात् प्रदहन्निव ।  
> स रोषवशमापन्नः शरवर्षं ववर्ष ह ॥ १४ ॥  
> रामस्य तुरगान् दीप्तैः शरैर्विव्याध रावणः ।  
> ते दिव्या हरयस्तत्र नास्खलन्नापि बभ्रमुः ॥ १५ ॥  
> बभूवुः स्वस्थहृदयाः पद्मनालैरिवाहताः ।

रावणके रथका वह ध्वज कटकर धरतीपर गिर पड़ा । अपने ध्वजका विध्वंस हुआ देख महाबली रावण क्रोधसे जल उठा और अमर्षके कारण विपक्षीको जलाता हुआ-सा जान पड़ा । वह रोषके वशीभूत होकर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ रावणने अपने तेजस्वी बाणोंसे श्रीरामचन्द्रजीके घोड़ोंको घायल करना आरम्भ किया; परंतु वे घोड़े दिव्य थे, इसलिये न तो लड़खड़ाये और न अपने स्थानसे विचलित ही हुए । वे पूर्ववत् स्वस्थचित्त बने रहे, मानो उनपर कमलकी नालों-से प्रहार किया गया हो ॥ १५½ ॥

> तेषामसम्भ्रमं दृष्ट्वा वाजिनां रावणस्तदा ॥ १६ ॥  
> भूय एव सुसंक्रुद्धः शरवर्षं मुमोच ह ।  
> गदाश्च परिघांश्चैव चक्राणि मुसलानि च ॥ १७ ॥  
> गिरिशृङ्गाणि वृक्षांश्च तथा शूलपरश्वधान् ।  
> मायाविहितमेतत् तु शस्त्रवर्षमपातयत् ।  
> सहस्रशस्तदा बाणानश्रान्तहृदयोद्यमः ॥ १८ ॥

उन घोड़ोंका घबराहटमें न पड़ना देख रावणका क्रोध और भी बढ़ गया । वह पुनः बाणोंकी वर्षा करने लगा । गदा, चक्र, परिघ, मूसल, पर्वत-शिखर, वृक्ष, शूल, फरसे तथा मायानिर्मित अन्यान्य शस्त्रोंकी वृष्टि करने लगा । उसने हृदयमें थकावटका अनुभव न करके सहस्रों बाण छोड़े ॥ १६–१८ ॥

> तुमुलं त्रासजननं भीमं भीमप्रतिस्वनम् ।  
> तद् वर्षमभवद् युद्धे नैकशस्त्रमयं महत् ॥ १९ ॥  
> विमुच्य राघवरथं समन्ताद् वानरे बले ।  
> सायकैरन्तरिक्षं च चकार सुनिरन्तरम् ॥ २० ॥  
> मुमोच च दशग्रीवो निःसङ्गेनान्तरात्मना ।

युद्धस्थलमें अनेक शस्त्रोंकी वह विशाल वर्षा बड़ी भयानक, तुमुल, त्रासजनक और भयंकर कोलाहलसे पूर्ण थी॥ वह शस्त्रवर्षा श्रीरामचन्द्रजीके रथको छोड़कर सब ओरसे वानर-सेनाके ऊपर पड़ने लगी । दशमुख रावणने प्राणोंका मोह छोड़कर बाणोंका प्रयोग किया और अपने सायकोंसे वहाँके आकाशको ठसाठस भर दिया ॥ २०½ ॥

> व्यायच्छमानं तं दृष्ट्वा तत्परं रावणं रणे ॥ २१ ॥  
> प्रहसन्निव काकुत्स्थः संदधे निशिताञ्छरान् ।  
> स मुमोच ततो बाणाञ्छतशोऽथ सहस्रशः ॥ २२ ॥

तदनन्तर रणभूमिमें रावणको बाण चलानेमें अधिक परिश्रम करते देख श्रीरामचन्द्रजीने हँसते हुए-से तीखे बाणोंका संधान किया और उन्हें सैकड़ों तथा हजारोंकी संख्यामें छोड़ा ॥ २१-२२ ॥

> तान् दृष्ट्वा रावणश्चक्रे स्वशरैः खं निरन्तरम् ।  
> ताभ्यां नियुक्तेन तदा शरवर्षेण भास्वता ॥ २३ ॥  
> शरबद्धमिवाभाति द्वितीयं भास्वदम्बरम् ।

उन बाणोंको देखकर रावणने पुनः अपने बाण बरसाये और आकाशको इतना भर दिया कि उसमें तिल रखनेकी भी जगह नहीं रह गयी । उन दोनोंके द्वारा की गयी चमकीले बाणोंकी वर्षासे वहाँका प्रकाशमान आकाश बाणोंसे बद्ध होकर किसी और ही आकाश-सा प्रतीत होता था ॥ २३½ ॥

> नानिमित्तोऽभवद् बाणो नानिर्भेत्ता न निष्फलः ॥ २४ ॥  
> अन्योन्यमभिसंहत्य निपेतुर्धरणीतले ।  
> तथा विसृजतोर्बाणान् रामरावणयोर्मृधे ॥ २५ ॥

उनका चलाया हुआ कोई भी बाण लक्ष्यतक पहुँचे बिना नहीं रहता था, लक्ष्यको बेधे या विदीर्ण किये बिना नहीं रुकता था तथा निष्फल भी नहीं होता था । इस तरह युद्धमें शस्त्रवर्षा करते हुए श्रीराम और रावणके बाण जब आपसमें टकराते थे, तब नष्ट होकर पृथ्वीपर गिर जाते थे ॥ २४-२५ ॥

> प्रायुध्येतामविच्छिन्नमस्यन्तौ सव्यदक्षिणम् ।  
> चक्रतुश्च शरैर्घोरैर्निरुच्छ्वासमिवाम्बरम् ॥ २६ ॥

वे दोनों योद्धा दायें-बायें प्रहार करते हुए निरन्तर युद्धमें लगे रहे । उन्होंने अपने भयंकर बाणोंसे आकाशको इस तरह भर दिया कि मानो उसमें साँस लेनेकी भी जगह नहीं रह गयी ॥ २६ ॥

> रावणस्य हयान् रामो हयान् रामस्य रावणः ।  
> जघ्नतुस्तौ तदान्योन्यं कृतानुकृतकारिणौ ॥ २७ ॥

श्रीरामने रावणके घोड़ोंको और रावणने श्रीरामके घोड़ोंको घायल कर दिया । वे दोनों एक दूसरेके प्रहारका बदला चुकाते हुए परस्पर आघात करते रहे ॥ २७ ॥

> एवं तु तौ सुसंक्रुद्धौ चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ।  
> मुहूर्तमभवद् युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥ २८ ॥

इस प्रकार वे दोनों अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए उत्तम रीतिसे युद्ध करने लगे । दो घड़ीतक तो उन दोनोंमें ऐसा भयंकर संग्राम हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ २८ ॥

> तौ तथा युध्यमानौ तु समरे रामरावणौ ।  
> दद्दशुः सर्वभूतानि विस्मितेनान्तरात्मना ॥ २९ ॥

इस प्रकार युद्धमें लगे हुए श्रीराम तथा रावणको सम्पूर्ण प्राणी चकितचित्तसे निहारने लगे ॥ २९ ॥

> अर्दयन्तौ तु समरे तयोस्तौ स्यन्दनोत्तमौ ।  
> परस्परमभिक्रुद्धौ परस्परमभिद्रुतौ ॥ ३० ॥

उन दोनोंके वे श्रेष्ठ रथ ( तथा उसमें बैठे हुए रथी ) समरभूमिमें अत्यन्त क्रोधपूर्वक एक दूसरेको पीड़ा देने और परस्पर धावा करने लगे ॥ ३० ॥

> परस्परवधे युक्तौ घोररूपौ बभूवतुः ।  
> मण्डलानि च वीथीश्च गतप्रत्यागतानि च ॥ ३१ ॥  
> दर्शयन्तौ बहुविधां सूतौ सारथ्यजां गतिम् ।

एक दूसरेके वधके प्रयत्नमें लगे हुए वे दोनों वीर बड़े भयानक जान पड़ते थे । उन दोनोंके सारथि कभी रथको चक्कर काटते हुए ले जाते, कभी सीधे मार्गसे दौड़ाते और कभी आगेकी ओर बढ़ाकर पीछेकी ओर लौटाते थे । इस तरह वे दोनों अपने रथ हाँकनेमें विविध प्रकारके ज्ञानका परिचय देने लगे ॥ ३१½ ॥

> अर्दयन् रावणं रामो राघवं चापि रावणः ॥ ३२ ॥  
> गतिवेगं समापन्नौ प्रवर्तननिवर्तने ।

श्रीराम रावणको पीड़ित करने लगे और रावण श्रीरामको पीड़ा देने लगा । इस प्रकार युद्धविषयक प्रवृत्ति और निवृत्ति-में वे दोनों तदनुरूप गतिवेगका आश्रय लेते थे ॥ ३२½ ॥

> क्षिपतोः शरजालानि तयोस्तौ स्यन्दनोत्तमौ ॥ ३३ ॥  
> चेरतुः संयुगमहीं धारासारौ जलदाविव ।

बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उन दोनों वीरोंके वे श्रेष्ठ रथ जलकी धारा गिराते हुए दो जलधरोंके समान युद्धभूमिमें विचर रहे थे ॥ ३३½ ॥

> दर्शयित्वा तदा तौ तु गतिं बहुविधां रणे ॥ ३४ ॥  
> परस्परस्याभिमुखौ पुनरेव च तस्थतुः ।

वे दोनों रथ युद्धस्थलमें भाँति-भाँतिकी गतिका प्रदर्शन करनेके बाद फिर आमने-सामने आकर खड़े हो गये॥३४½॥

> धुरं धुरेण रथयोर्वक्त्रं वक्त्रेण वाजिनाम् ॥ ३५ ॥  
> पताकाश्च पताकाभिः समीयुः स्थितयोस्तदा ।

उस समय वहाँ खड़े हुए उन दोनों रथोंके युगन्धर ( हरसोंकी संधि ) युगन्धरसे, घोड़ोंके मुख विपक्षी घोड़ोंके मुखसे तथा पताकाएँ पताकाओंसे मिल गयीं ॥ ३५½ ॥

> रावणस्य ततो रामो धनुर्मुक्तैः शितैः शरैः ॥ ३६ ॥  
> चतुर्भिश्चतुरो दीप्तान् हयान् प्रत्यपसर्पयत् ।

तत्पश्चात् श्रीरामने अपने धनुषसे छूटे हुए चार पैने बाणोंद्वारा रावणके चारों तेजस्वी घोड़ोंको पीछे हटनेके लिये विवश कर दिया ॥ ३६½ ॥

> स क्रोधवशमापन्नो हयानामपसर्पणे ॥ ३७ ॥  
> मुमोच निशितान् बाणान् राघवाय दशाननः ।

घोड़ोंके पीछे हटनेपर दशमुख रावण क्रोधके वशीभूत हो गया और श्रीरामपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ३७½ ॥

> सोऽतिविद्धो बलवता दशग्रीवेण राघवः ॥ ३८ ॥  
> जगाम न विकारं च न चापि व्यथितोऽभवत् ।

बलवान् दशानन के द्वारा अत्यन्त घायल किये जानेपर भी श्रीरघुनाथजीके चेहरेपर शिकनतक न आयी और न उनके मनमें व्यथा ही हुई ॥ ३८½ ॥

> विक्षेप च पुनर्बाणान् वज्रसारसमस्वनान् ॥ ३९ ॥  
> सारथिं वज्रहस्तस्य समुद्दिश्य दशाननः ।

तत्पश्चात् रावणने इन्द्रके सारथि मातलिको लक्ष्य करके वज्रके समान शब्द करनेवाले बाण छोड़े ॥ ३९½ ॥

> मातलेस्तु महावेगाः शरीरे पतिताः शराः ॥ ४० ॥  
> न सूक्ष्ममपि सम्मोहं व्यथां वा प्रददुर्युधि ।

वे महान् वेगशाली बाण युद्धस्थलमें मातलिके शरीरपर पड़कर उन्हें थोड़ा-सा भी मोह या व्यथा न दे सके ॥४०½॥

> तया धर्षणया क्रुद्धो मातलेर्न तथाऽऽत्मनः ॥ ४१ ॥  
> चकार शरजालेन राघवो विमुखं रिपुम् ।

रावणद्वारा मातलिके प्रति आक्रमणसे श्रीरामचन्द्रजीको जैसा क्रोध हुआ, वैसा अपनेपर किये गये आक्रमणसे नहीं हुआ था । अतः उन्होंने बाणोंका जाल-सा बिछाकर अपने शत्रुको युद्धसे विमुख कर दिया ॥ ४१½ ॥

> विंशति त्रिंशति षष्टिं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४२ ॥  
> मुमोच राघवो वीरः सायकान् स्यन्दने रिपोः ।

वीर रघुनाथजीने शत्रुके रथपर बीस, तीस, साठ, सौ और हजार-हजार बाणोंकी वृष्टि की ॥ ४२½ ॥

> रावणोऽपि ततः क्रुद्धो रथस्थो राक्षसेश्वरः ॥ ४३ ॥  
> गदामुसलवर्षेण रामं प्रत्यर्दयद् रणे ।

तब रथपर बैठा हुआ राक्षसराज रावण भी कुपित हो उठा और गदा तथा मूसलोंकी वर्षासे रणभूमिमें श्रीरामको पीड़ा देने लगा ॥ ४३½ ॥

> तत् प्रवृत्तं पुनर्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥ ४४ ॥  
> गदानां मुसलानां च परिघाणां च निःस्वनैः ।  
> शराणां पुङ्खवातैश्च क्षुभिताः सप्त सागराः ॥ ४५ ॥

इस प्रकार उन दोनोंमें पुनः बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा । गदाओं, मुसलों और परिघोंकी आवाजसे तथा बाणोंके पंखोंकी सनसनाती हुई हवासे सातों समुद्र विक्षुब्ध हो उठे ॥ ४४-४५ ॥

> क्षुब्धानां सागराणां च पातालतलवासिनः ।  
> व्यथिता दानवाः सर्वे पन्नगाश्च सहस्रशः ॥ ४६ ॥

उन विक्षुब्ध समुद्रोंके पातालतलमें निवास करनेवाले समस्त दानव और सहस्रों नाग व्यथित हो गये ॥ ४६ ॥

> चकम्पे मेदिनी कृत्स्ना सशैलवनकानना ।  
> भास्करो निष्प्रभश्चासीन्न ववौ चापि मारुतः ॥ ४७ ॥

पर्वतों, वनों और काननोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी, सूर्यकी प्रभा लुप्त हो गयी और वायुकी गति भी रुक गयी ॥ ४७ ॥

> ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।  
> चिन्तामापेदिरे सर्वे सकिंनरमहोरगाः ॥ ४८ ॥

देवता, गन्धर्व, सिद्ध, महर्षि, किन्नर और बड़े-बड़े नाग सभी चिन्तामें पड़ गये ॥ ४८ ॥

> स्वस्ति गोब्राह्मणेभ्यस्तु लोकास्तिष्ठन्तु शाश्वताः।  
> जयतां राघवः संख्ये रावणं राक्षसेश्वरम् ॥ ४९ ॥

सबके मुँहसे यही बात निकलने लगी—‘गौ और ब्राह्मणोंका कल्याण हो, प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाले इन लोकोंकी रक्षा हो और श्रीरघुनाथजी युद्धमें राक्षसराज रावणपर विजय पावें,’ ॥ ४९ ॥

> एवं जपन्तोऽपश्यंस्ते देवाः सर्षिगणास्तदा ।  
> रामरावणयोर्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम् ॥ ५० ॥  
> गन्धर्वाप्सरसां सङ्घा दृष्ट्वा युद्धमनूपमम् ।  
> गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः ॥ ५१ ॥  
> रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ।  
> एवं ब्रुवन्तो ददृशुस्तद् युद्धं रामरावणम् ॥ ५२ ॥

इसप्रकार कहते हुए ऋषियोंसहित वे देवगण श्रीराम और रावणके अत्यन्त भयंकर तथा रोमाञ्चकारी युद्धको देखने लगे ॥ गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय उस अनुपम युद्धको देखकर कहने लगे—‘आकाश आकाशके ही तुल्य है, समुद्र समुद्रके ही समान है तथा राम और रावणका युद्ध राम और रावणके युद्धके ही सदृश है’ * ऐसा कहते हुए वे सब लोग राम-रावणका युद्ध देखने लगे ॥ ५१-५२ ॥

> ततः क्रोधान्महाबाहू रघूणां कीर्तिवर्धनः ।  
> संधाय धनुषा रामः शरमाशीविषोपमम् ॥ ५३ ॥  
> रावणस्य शिरोऽच्छिन्दच्छ्रीमज्ज्वलितकुण्डलम् ।  
> तच्छिरः पतितं भूमौ दृष्टं लोकैस्त्रिभिस्तदा ॥ ५४ ॥

तदनन्तर रघुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीरामचन्द्रजीने कुपित होकर अपने धनुषपर एक विषधर सर्पके समान बाणका संधान किया और उसके द्वारा जगमगाते हुए कुण्डलोंसे युक्त रावणका एक सुन्दर मस्तक काट डाला । उसका वह कटा हुआ सिर उस समय पृथ्वीपर गिर पड़ा, जिसे तीनों लोकोंके प्राणियोंने देखा ॥ ५३-५४ ॥

> तस्यैव सदृशं चान्यद् रावणस्योत्थितं शिरः ।  
> तत् क्षितं क्षिप्रहस्तेन रामेण क्षिप्रकारिणा ॥ ५५ ॥  
> द्वितीयं रावणशिरश्छिन्नं संयति सायकैः ।

उसकी जगह रावणके वैसा ही दूसरा नया सिर उत्पन्न हो गया । शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले शीघ्रकारी श्रीरामने युद्धस्थलमें अपने सायकोंद्वारा रावणका वह दूसरा सिर भी शीघ्र ही काट डाला ॥ ५५½ ॥

> छिन्नमात्रं च तच्छीर्षं पुनरेव प्रदृश्यते ॥ ५६ ॥  
> तदप्यशनिसंकाशैश्छिन्नं रामस्य सायकैः ।

उसके कटते ही पुनः नया सिर उत्पन्न दिखायी देने लगा, किंतु उसे भी श्रीरामके वज्रतुल्य सायकोंने काट डाला ॥ ५६½ ॥

> एवमेव शतं छिन्नं शिरसां तुल्यवर्चसाम् ॥ ५७ ॥  
> न चैव रावणस्यान्तो दृश्यते जीवितक्षये ।

इस प्रकार एक-से तेजवाले उसके सौ सिर काट डाले गये, तथापि उसके जीवनका नाश होनेके लिये उसके मस्तकोंका अन्त होता नहीं दिखायी देता था ॥ ५७½ ॥

> ततः सर्वास्त्रविद् वीरः कौसल्यानन्दवर्धनः ॥ ५८ ॥  
> मार्गणैर्बहुभिर्युक्तश्चिन्तयामास राघवः ।

तदनन्तर कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले, सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता वीर श्रीरामचन्द्रजी अनेक प्रकारके बाणोंसे युक्त होनेपर भी इस प्रकार चिन्ता करने लगे—॥ ५८½ ॥

> मारीचो निहतो यैस्तु खरो यैस्तु सदूषणः ॥ ५९ ॥  
> क्रौञ्चावटे विराधस्तु कबन्धो दण्डकावने ।  
> यैः साला गिरयो भग्ना वाली च क्षुभितोऽम्बुधिः ॥ ६० ॥  
> त इमे सायकाः सर्वे युद्धे प्रात्ययिका मम ।  
> किं नु तत् कारणं येन रावणे मन्दतेजसः ॥ ६१ ॥

‘अहो ! मैंने जिन बाणोंसे मारीच, खर और दूषणको मारा, क्रौञ्चवनके गड्ढेमें विराधका वध किया, दण्डकारण्यमें कबन्धको मौतके घाट उतारा, सालवृक्ष और पर्वतोंको विदीर्ण किया, वालीके प्राण लिये और समुद्रको भी क्षुब्ध कर दिया, अनेक बारके संग्राममें परीक्षा करके जिनकी अमोघताका विश्वास कर लिया गया है, वे ही ये मेरे सब सायक आज रावणके ऊपर निस्तेज—कुण्ठित हो गये हैं; इसका क्या कारण हो सकता है ?’ ॥ ५९–६१ ॥

> इति चिन्तापरश्चासीदप्रमत्तश्च संयुगे ।  
> ववर्ष शरवर्षाणि राघवो रावणोरसि ॥ ६२ ॥

इस तरह चिन्तामें पड़े होनेपर भी श्रीरघुनाथजी युद्धस्थलमें सतत सावधान रहे । उन्होंने रावणकी छातीपर बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ ६२ ॥

> रावणोऽपि ततः क्रुद्धो रथस्थो राक्षसेश्वरः ।  
> गदामुसलवर्षेण रामं प्रत्यर्दयद् रणे ॥ ६३ ॥

तब रथपर बैठे हुए राक्षसराज रावणने भी कुपित होकर रणभूमिमें श्रीरामको गदा और मूसलोंकी वर्षासे पीड़ित करना आरम्भ किया ॥ ६३ ॥

> तत् प्रवृत्तं महद् युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ।  
> अन्तरिक्षे च भूमौ च पुनश्च गिरिमूर्धनि ॥ ६४ ॥

उस महायुद्धने बड़ा भयंकर रूप धारण किया । उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे । वह युद्ध कभी आकाशमें, कभी भूतलपर और कभी-कभी पर्वतके शिखरपर होता था ॥ ६४ ॥

> देवदानवयक्षाणां पिशाचोरगरक्षसाम् ।  
> पश्यतां तन्महद् युद्धं सर्वरात्रमवर्तत ॥ ६५ ॥

देवता, दानव, यक्ष, पिशाच, नाग और राक्षसोंके देखते-देखते वह महान् संग्राम सारी रात चलता रहा ॥६५॥

> नैव रात्रिं न दिवसं न मुहूर्तं न च क्षणम् ।  
> रामरावणयोर्युद्धं विराममुपगच्छति ॥ ६६ ॥

श्रीराम और रावणका वह युद्ध न रातमें बंद होता था और न दिनमें । दो घड़ी अथवा एक क्षणके लिये भी उसका विराम नहीं हुआ ॥ ६६ ॥

> दशरथसुतराक्षसेन्द्रयोस्तयो-  
> र्जयमनवेक्ष्य रणे स राघवस्य ।  
> सुरवररथसारथिर्महात्मा  
> रणरतराममुवाच वाक्यमाशु ॥ ६७ ॥

एक ओर दशरथकुमार श्रीराम थे और दूसरी ओर राक्षसराज रावण । उन दोनोंमेंसे श्रीरघुनाथजीकी युद्धमें विजय होती न देख देवराजके सारथि महात्मा मातलिने युद्धपरायण श्रीरामसे शीघ्रतापूर्वक कहा—॥ ६७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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