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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 105"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 105

> ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।  
> रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥ १ ॥  
> दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।  
> उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥ २ ॥

उधर श्रीरामचन्द्रजी युद्धसे थककर चिन्ता करते हुए रणभूमिमें खड़े थे । इतनेमें रावण भी युद्धके लिये उनके सामने उपस्थित हो गया । यह देख भगवान् अगस्त्य मुनि, जो देवताओंके साथ युद्ध देखनेके लिये आये थे, श्रीरामके पास जाकर बोले—॥ १-२ ॥

> राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् ।  
> येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥ ३ ॥

‘सबके हृदयमें रमण करनेवाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो । वत्स ! इसके जपसे तुम युद्धमें अपने समस्त शत्रुओंपर विजय पा जाओगे ॥ ३ ॥

> आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।  
> जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥ ४ ॥  
> सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।  
> चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥ ५ ॥  
> रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।  
> पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥ ६ ॥  
> सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।  
> एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥ ७ ॥

‘इस गोपनीय स्तोत्रका नाम है ‘आदित्यहृदय’ । यह परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओंका नाश करनेवाला है । इसके जपसे सदा विजयकी प्राप्ति होती है । यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है । सम्पूर्ण मङ्गलोंका भी मङ्गल है । इससे सब पापोंका नाश हो जाता है । यह चिन्ता और शोकको मिटाने तथा आयुको बढ़ानेवाला उत्तम साधन है ॥ ‘भगवान् सूर्य अपनी अनन्त किरणोंसे सुशोभित ( रश्मिमान् ) हैं । ये नित्य उदय होनेवाले ( समुद्यन् ), देवता और असुरोंसे नमस्कृत, विवस्वान् नामसे प्रसिद्ध, प्रभाका विस्तार करनेवाले ( भास्कर ) और संसारके स्वामी ( भुवनेश्वर ) हैं । तुम इनका [ रश्मिमते नमः, समुद्यते नमः, देवासुरनमस्कृताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय नमः—इन नाम-मन्त्रोंके द्वारा ] पूजन करो ॥ ‘सम्पूर्ण देवता इन्हींके स्वरूप हैं । ये तेजकी राशि तथा अपनी किरणोंसे जगत्को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करनेवाले हैं । ये ही अपनी रश्मियोंका प्रसार करके देवता और असुरों-सहित सम्पूर्ण लोकोंका पालन करते हैं ॥ ७ ॥

> एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।  
> महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥ ८ ॥  
> पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः ।  
> वायुर्वह्निः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥ ९ ॥

‘ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओंको प्रकट करनेवाले तथा प्रभाके पुञ्ज हैं ॥ ८-९ ॥

> आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् ।  
> सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥ १० ॥  
> हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।  
> तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोऽंशुमान् ॥ ११ ॥  
> हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहस्करो रविः ।  
> ॐ अस्य आदित्यहृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुप्छन्दः, आदित्यहृदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्म-  
> विद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः ।  
> ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि । अनुष्टुप्छन्दसे नमः, मुखे । आदित्यहृदयभूतब्रह्मदेवतायै नमः, हृदि । ॐ बीजाय  
> नमः, गुह्ये । रश्मिमते शक्तये नमः, पादयोः । ॐ तत्सवितुरित्यादिगायत्रीकीलकाय नमः, नाभौ ।  
> ॐ रश्मिमते अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः । ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः । ॐ विवस्वते अनामिका-  
> भ्यां नमः । ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।  
> ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः । ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहा । ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट् । ॐ विवस्वते कवचाय हुम् ।  
> ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट् । इस प्रकार न्यास करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे भगवान् सूर्यका ध्यान  
> एवं नमस्कार करना चाहिये—  
> ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।  
> अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥ १२ ॥  
> व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः ।  
> घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥ १३ ॥  
> आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः ।  
> कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥ १४ ॥  
> नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः ।  
> तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥ १५ ॥

इस स्तोत्रके अङ्गन्यास और करन्यास तीन प्रकारसे किये जाते हैं । केवल प्रणवसे, गायत्रीमन्त्रसे अथवा ‘रश्मिमते नमः’ इत्यादि छः नाम-मन्त्रोंसे । यहाँ नाम-मन्त्रोंसे किये जानेवाले न्यासका प्रकार बताया जाता है— तत्पश्चात् ‘आदित्यहृदय’ स्तोत्रका पाठ करना चाहिये । ‘इन्हींके नाम—आदित्य ( अदितिपुत्र ), सविता ( जगत् को उत्पन्न करनेवाले ), सूर्य ( सर्वव्यापक ), खग ( आकाशमें विचरनेवाले ), पूषा ( पोषण करनेवाले ), गभस्तिमान् ( प्रकाशमान ), सुवर्णसदृश, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता ( ब्रह्माण्ड की उत्पत्तिके बीज ), दिवाकर ( रात्रिका अन्धकार दूर करके दिनका प्रकाश फैलानेवाले ), हरिदश्व ( दिशाओंमें व्यापक अथवा हरे रंगके घोड़ेवाले), सहस्रार्चि ( हजारों किरणोंसे सुशोभित ), सप्तसप्ति ( सात घोड़ोंवाले ), मरीचिमान् ( किरणोंसे सुशोभित ), तिमिरो-न्मथन ( अन्धकारका नाश करनेवाले ), शम्भु ( कल्याणके उद्गमस्थान ), त्वष्टा ( भक्तोंका दुःख दूर करने अथवा जगत्का संहार करनेवाले ), मार्तण्डक ( ब्रह्माण्डको जीवन प्रदान करनेवाले ), अंशुमान् ( किरण धारण करनेवाले ), हिरण्यगर्भ ( ब्रह्मा ), शिशिर ( स्वभावसे ही सुख देनेवाले ), तपन ( गर्मी पैदा करनेवाले ), अहस्कर ( दिनकर ), रवि ( सबकी स्तुतिके पात्र ), अग्निगर्भ ( अग्निको गर्भमें धारण करनेवाले ), अदितिपुत्र, शङ्ख ( आनन्दस्वरूप एवं व्यापक ), शिशिरनाशन ( शीतका नाश करनेवाले ), व्योमनाथ ( आकाशके स्वामी ), तमो-भेदी ( अन्धकारको नष्ट करनेवाले ), ऋग्, यजुः और सामवेदके पारगामी, घनवृष्टि ( घनी वृष्टिके कारण ), अपां मित्र ( जलको उत्पन्न करनेवाले ), विन्ध्यवीथीप्लवङ्गम ( आकाशमें तीव्रवेगसे चलनेवाले ), आतपी ( घाम उत्पन्न करनेवाले ), मण्डली ( किरणसमूहको धारण करनेवाले ), मृत्यु ( मौतके कारण ), पिङ्गल ( भूरे रंगवाले ), सर्वतापन ( सबको ताप देनेवाले ), कवि ( त्रिकालदर्शी ), विश्व ( सर्वस्वरूप ), महातेजस्वी, रक्त ( लाल रंगवाले ), सर्वभवोद्भव ( सबकी उत्पत्तिके कारण ), नक्षत्र, ग्रह और तारोंके स्वामी, विश्वभावन ( जगत्की रक्षा करनेवाले ), तेजस्वियोंमें भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा ( बारह स्वरूपोंमें अभिव्यक्त )हैं । [इन सभी नामोंसे प्रसिद्ध सूर्यदेव !] आपको नमस्कार है ॥ १०—१५ ॥

> नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ।  
> ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥ १६ ॥

‘पूर्वगिरि—उदयाचल तथा पश्चिमगिरि—अस्ताचलके रूपमें आपको नमस्कार है । ज्योतिर्गणों ( ग्रहों और तारों ) के स्वामी तथा दिनके अधिपति आपको प्रणाम है ॥ १६ ॥

> जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः ।  
> नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥ १७ ॥

‘आप जयस्वरूप तथा विजय और कल्याणके दाता हैं । आपके रथमें हरे रंगके घोड़े जुते रहते हैं । आपको बारंबार नमस्कार है । सहस्रों किरणोंसे सुशोभित भगवान् सूर्य ! आपको बारंबार प्रणाम है । आप अदितिके पुत्र होनेके कारण आदित्यनामसे प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है । ॥ १७ ॥

> नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः ।  
> नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥ १८ ॥

‘उग्र ( अभक्तोंके लिये भयंकर ), वीर ( शक्तिसम्पन्न ) और सारंग ( शीघ्रगामी ) सूर्यदेवको नमस्कार है । कमलोंको विकसित करनेवाले प्रचण्ड तेजधारी मार्तण्डको प्रणाम है ॥ १८ ॥

> ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूरायादित्यवर्चसे ।  
> भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥ १९ ॥

‘( परात्पर-रूपमें ) आप ब्रह्मा शिव और विष्णुके भी स्वामी हैं । सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमण्डल आपका ही तेज है, आप प्रकाशसे परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देनेवाला अग्नि आपका ही स्वरूप है, आप रौद्ररूप धारण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है ॥ १९ ॥

> तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।  
> कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥ २० ॥

‘आप अज्ञान और अन्धकारके नाशक, जडता एवं शीत-के निवारक तथा शत्रुका नाश करनेवाले हैं, आपका स्वरूप अप्रमेय है । आप कृतघ्नोंका नाश करनेवाले, सम्पूर्ण ज्योतियों-के स्वामी और देवस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है ॥ २० ॥

> तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे ।  
> नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥ २१ ॥

‘आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्णके समान है, आप हरि ( अज्ञानका हरण करनेवाले ) और विश्वकर्मा ( संसारकी सृष्टि करनेवाले ) हैं; तमके नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत्के साक्षी हैं; आपको नमस्कार है ॥ २१ ॥

> नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः ।  
> पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥ २२ ॥

‘रघुनन्दन ! ये भगवान् सूर्य ही सम्पूर्ण भूतोंका संहार, सृष्टि और पालन करते हैं। ये ही अपनी किरणोंसे गर्मी पहुँचाते और वर्षा करते हैं ॥ २२ ॥

> एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।  
> एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥ २३ ॥

‘ये सब भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित होकर उनके सो जानेपर भी जागते रहते हैं । ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषोंको मिलनेवाले फल हैं ॥ २३ ॥

> देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।  
> यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः ॥ २४ ॥

‘( यज्ञमें भाग ग्रहण करनेवाले ) देवता, यज्ञ और यज्ञोंके फल भी ये ही हैं । सम्पूर्ण लोकोंमें जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका फल देनेमें ये ही पूर्ण समर्थ हैं ॥ २४ ॥

> एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।  
> कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥ २५ ॥

‘राघव ! विपत्तिमें, कष्टमें, दुर्गम मार्गमें तथा और किसी भयके अवसरपर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेवका कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता ॥ २५ ॥

> पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।  
> एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यति ॥ २६ ॥

‘इसलिये तुम एकाग्रचित्त होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वरकी पूजा करो । इस आदित्यहृदयका तीन बार जप करनेसे तुम युद्धमें विजय पाओगे ॥ २६ ॥

> अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।  
> एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्॥ २७ ॥

महाबाहो ! ‘तुम इसीक्षण रावणका वध कर सकोगे ।’ यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे, उसी प्रकार चले गये ॥२७॥

> एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा ।  
> धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥ २८ ॥  
> आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् ।  
> त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥ २९ ॥  
> रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागमत् ।  
> सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् ॥ ३० ॥

उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीका शोक दूर हो गया । उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्तसे आदित्य-हृदयको धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान् सूर्यकी ओर देखते हुए इसका तीन बार जप किया । इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ । फिर परम पराक्रमी रघुनाथजीने धनुष उठाकर रावणकी ओर देखा और उत्साहपूर्वक विजय पानेके लिये वे आगे बढ़े । उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावणके वधका निश्चय किया ॥ २८–३० ॥

> अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं  
> मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः ।  
> निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा  
> सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥ ३१ ॥

उस समय देवताओंके मध्यमें खड़े हुए भगवान् सूर्यने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखा और निशाचरराज रावणके विनाशका समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा— ‘रघुनन्दन ! अब जल्दी करो’ ॥ ३१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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