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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 104"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 104

> स तु मोहात् सुसंक्रुद्धः कृतान्तबलचोदितः ।  
> क्रोधसंरक्तनयनो रावणः सूतमब्रवीत् ॥ १ ॥

रावण कालकी शक्तिसे प्रेरित हो रहा था, अतः मोहवश अत्यन्त कुपित हो क्रोधसे लाल आँखें करके अपने सारथिसे बोला—॥ १ ॥

> हीनवीर्यमिवाशक्तं पौरुषेण विवर्जितम् ।  
> भीरुं लघुमिवासत्त्वं विहीनमिव तेजसा ॥ २ ॥  
> विमुक्तमिव मायाभिरस्त्रैरिव बहिष्कृतम् ।  
> मामवज्ञाय दुर्बुद्धे स्वया बुद्ध्या विचेष्टसे ॥ ३ ॥

‘दुर्बुद्धे ! क्या तूने मुझे पराक्रमशून्य, असमर्थ, पुरुषार्थ-शून्य, डरपोक, अंछा, धैर्यहीन, निस्तेज, मायारहित और अस्त्रोंके ज्ञानसे वञ्चित समझ रक्खा है, जो मेरी अवहेलना करके तू अपनी बुद्धिसे मनमाना काम कर रहा है ( तूने मुझसे पूछा क्यों नहीं ? ) ॥ २-३ ॥

> किमर्थं मामवज्ञाय मच्छन्दमनवेक्ष्य च ।  
> त्वया शत्रुसमक्षं मे रथोऽयमपवाहितः ॥ ४ ॥

‘मेरा अभिप्राय क्या है, यह जाने बिना ही मेरी अवहेलना करके तू किस लिये शत्रुके सामनेसे मेरा यह रथ हटा लाया ? ॥ ४ ॥

> त्वयाद्य हि ममानार्य चिरकालमुपार्जितम् ।  
> यशो वीर्यं च तेजश्च प्रत्ययश्च विनाशितः ॥ ५ ॥

‘अनार्य ! आज तूने मेरे चिरकालसे उपार्जित यश, पराक्रम, तेज और विश्वासपर पानी फेर दिया ॥ ५ ॥

> शत्रोः प्रख्यातवीर्यस्य रञ्जनीयस्य विक्रमैः ।  
> पश्यतो युद्धलुब्धोऽहं कृतः कापुरुषस्त्वया ॥ ६ ॥

‘मेरे शत्रुका बल-पराक्रम विख्यात है । उसे अपने बल-विक्रमद्वारा संतुष्ट करना मेरे लिये उचित है और मैं युद्धका लोभी हूँ, तो भी तूने रथ हटाकर शत्रुकी दृष्टिमें मुझे कायर सिद्ध कर दिया ॥ ६ ॥

> यत् त्वं कथमिदं मोहान्न चेद् वहसि दुर्मते ।  
> सत्योऽयं प्रतितर्को मे परेण त्वमुपस्कृतः ॥ ७ ॥

‘दुर्मते ! यदि तू इस रथको मोहवश किसी तरह भी शत्रुके सामने नहीं ले जाता है तो मेरा यह अनुमान सत्य है कि शत्रुने तुझे घूस देकर फोड़ लिया है ॥ ७ ॥

> नहि तद् विद्यते कर्म सुहृदो हितकाङ्क्षिणः ।  
> रिपूणां सदृशं त्वेतद् यत् त्वयैतदनुष्ठितम् ॥ ८ ॥

‘हित चाहनेवाले मित्रका यह काम नहीं है । तूने जो कार्य किया है, वह शत्रुओंके करने योग्य है ॥ ८ ॥

> निवर्तय रथं शीघ्रं यावन्नापैति मे रिपुः ।  
> यदि वाप्युषितोऽसि त्वं स्मर्यते यदि मे गुणः ॥ ९ ॥

‘यदि तू मेरे साथ बहुत दिनोंसे रहा है और यदि मेरे गुर्णोका तुझे स्मरण है तो मेरे इस रथको शीघ्र लौटा ले चल । कहीं ऐसा न हो कि मेरा शत्रु भाग जाय’ ॥ ९ ॥

> एवं परुषमुक्तस्तु हितबुद्धिरबुद्धिना ।  
> अब्रवीद् रावणं सूतो हितं सानुनयं वचः ॥ १० ॥

यद्यपि सारथिकी बुद्धिमें रावणके लिये हितकी ही भावना थी तथापि उस मूर्खने जब उससे ऐसी कठोर बात कही, तब सारथिने बड़ी विनयके साथ यह हितकर वचन कहा—॥ १० ॥

> न भीतोऽस्मि न मूढोऽस्मि नोपजप्तोऽस्मि शत्रुभिः ।  
> न प्रमत्तो न निःस्नेहो विस्मृता न च सत्क्रिया ॥ ११ ॥

‘महाराज ! मैं डरा नहीं हूँ । मेरा विवेक भी नष्ट नहीं हुआ है और न मुझे शत्रुओंने ही बहकाया है । मैं असावधान भी नहीं हूँ । आपके प्रति मेरा स्नेह भी कम नहीं हुआ है तथा आपने जो मेरा सत्कार किया है, उसे भी मैं नहीं भूला हूँ ॥ ११ ॥

> मया तु हितकामेन यशश्च परिरक्षता ।  
> स्नेहप्रसन्नमनसा हितमित्यप्रियं कृतम् ॥ १२ ॥  
> नासिन्नर्थे महाराज त्वं मां प्रियहिते रतम् ।  
> कश्चिल्लघुरिवानार्यो दोषतो गन्तुमर्हसि ॥ १३ ॥

‘मैं सदा आपका हित चाहता हूँ और आपके यशकी रक्षाके लिये ही यत्नशील रहता हूँ । मेरा हृदय आपके प्रति स्नेहसे आर्द्र है । इस कार्यसे आपका हित होगा—यह सोचकर ही मैंने इसे किया है । भले ही यह आपको अप्रिय लगा हो ॥ ‘महाराज ! मैं आपके प्रिय और हितमें तत्पर रहनेवाला हूँ; अतः इस कार्यके लिये आप किसी ओछे और अनार्य पुरुषकी भाँति मुझपर दोषारोपण न करें ॥ १३ ॥

> श्रूयतां प्रति दास्यामि यन्निमित्तं मया रथः ।  
> नदीवेग इवाम्भोभिः संयुगे विनिवर्तितः ॥ १४ ॥

‘जैसे चन्द्रोदयके कारण बढ़ा हुआ समुद्रका जल नदीके वेगको पीछे लौटा देता है, उसी प्रकार मैंने जिस कारणसे आपके रथको युद्धभूमिसे पीछे हटाया है, उसे बता रहा हूँ, सुनिये ॥ १४ ॥

> श्रमं तवावगच्छामि महता रणकर्मणा ।  
> नहि ते वीर्यसौमुख्यं प्रकर्षं नोपधारये ॥ १५ ॥

‘उस समय मैंने यह समझा था कि आप महान् युद्धके कारण थक गये हैं । शत्रुकी अपेक्षा मैंने आपकी प्रबलता नहीं देखी, आपमें अधिक पराक्रम नहीं पाया ॥ १५ ॥

> रथोद्वहनखिन्नाश्च भग्ना मे रथवाजिनः ।  
> दीना घर्मपरिश्रान्ता गावो वर्षहता इव ॥ १६ ॥

‘मेरे घोड़े भी रथको खींचते-खींचते थक गये थे । इनके पाँव लड़खड़ा रहे थे । ये धूपसे पीड़ित हो वर्षाकी मारी हुई गौओंके समान दुखी हो गये थे ॥ १६ ॥

> निमित्तानि च भूयिष्ठं यानि प्रादुर्भवन्ति नः ।  
> तेषु तेष्वभिपन्नेषु लक्षयाम्यप्रदक्षिणम् ॥ १७ ॥

‘साथ ही इस समय मेरे सामने जो-जो लक्षण प्रकट हो रहे हैं, यदि वे सफल हुए तो हमें उसमें अपना अमङ्गल ही दिखायी देता है ॥ १७ ॥

> देशकालौ च विशेषौ लक्षणानीङ्गितानि च ।  
> दैन्यं हर्षश्च खेदश्च रथिनश्च बलाबलम् ॥ १८ ॥

‘सारथिको देश-कालका, शुभाशुभ लक्षणोंका, रथीकी चेष्टाओंका, उत्साह, अनुत्साह और खेदका तथा बलाबलका भी ज्ञान रखना चाहिये ॥ १८ ॥

> स्थलनिम्नानि भूमेश्च समानि विषमाणि च ।  
> युद्धकालश्च विज्ञेयः परस्यान्तरदर्शनम् ॥ १९ ॥

‘धरतीके जो ऊँचे-नीचे, सम-विषम स्थान हों, उनकी भी जानकारी रखनी चाहिये । युद्धका उपयुक्त अवसर कब होगा, इसे जानना और शत्रुकी दुर्बलतापर भी दृष्टि रखनी चाहिये ॥ १९ ॥

> उपयानापयाने च स्थानं प्रत्यपसर्पणम् ।  
> सर्वमेतद् रथस्थेन ज्ञेयं रथकुटुम्बिना ॥ २० ॥  
> तव विश्रामहेतोस्तु तथैषां रथवाजिनाम् ।  
> रौद्रं वर्जयता खेदं क्षमं कृतमिदं मया ॥ २१ ॥

‘शत्रुके पास जाने; दूर हटने, युद्धमें स्थिर रहने तथा युद्धभूमिसे अलग हो जानेका उपयुक्त अवसर कब आता है, इन सब बातोंको समझना रथपर बैठे हुए सारथिका कर्तव्य है ॥ ‘आपको तथा इन रथके घोड़ोंको थोड़ी देरतक विश्राम देने और खेद दूर करनेके लिये मैंने जो यह कार्य किया है, सर्वथा उचित है ॥ २१ ॥

> स्वेच्छया न मया वीर रथोऽयमपवाहितः ।  
> भर्तुः स्नेहपरीतेन मयेदं यत् कृतं प्रभो ॥ २२ ॥

‘वीर ! प्रभो ! मैंने मनमानी करनेके लिये नहीं, स्वामीके स्नेहवश उनकी रक्षाके लिये इस रथको दूर हटाया है ॥२२॥

> आज्ञापय यथातत्त्वं वक्ष्यस्यरिनिषूदन ।  
> तत् करिष्याम्यहं वीर गतानृण्येन चेतसा ॥ २३ ॥

‘शत्रुसूदन वीर ! अब आज्ञा दीजिये । आप ठीक समझकर जो कुछ भी कहेंगे, उसे मैं मनमें आपके ऋणसे उऋण होनेकी भावना रखकर करूँगा’ ॥ २३ ॥

> संतुष्टस्तेन वाक्येन रावणस्तस्य सारथेः ।  
> प्रशस्यैनं बहुविधं युद्धलुब्धोऽब्रवीदिदम् ॥ २४ ॥

सारथिके इस कथनसे रावण बहुत संतुष्ट हुआ और नाना प्रकारसे उसकी सराहना करके युद्धके लिये लोलुप होकर बोला—॥ २४ ॥

> रथं शीघ्रमिमं सूत राघवाभिमुखं नय ।  
> नाहत्वा समरे शत्रून् निवर्तिष्यति रावणः ॥ २५ ॥

‘सूत ! अब तुम इस रथको शीघ्र रामके सामने ले चलो । रावण समरमें अपने शत्रुओंको मारे बिना घर नहीं लौटेगा’ ॥ २५ ॥

> एवमुक्त्वा रथस्थस्य रावणो राक्षसेश्वरः ।  
> ददौ तस्य शुभं ह्येकं हस्ताभरणमुत्तमम् ।  
> श्रुत्वा रावणवाक्यानि सारथिः संन्यवर्तत ॥ २६ ॥  
> ततो द्रुतं रावणवाक्यचोदितः  
> प्रचोदयामास हयान् स सारथिः ।  
> स राक्षसेन्द्रस्य ततो महारथः  
> क्षणेन रामस्य रणाग्रतोऽभवत् ॥ २७ ॥

ऐसा कहकर राक्षसराज रावणने सारथिको पुरस्कारके रूपमें अपने हाथका एक सुन्दर आभूषण उतारकर दे दिया । रावणका आदेश सुनकर सारथिने पुनः रथको लौटाया ॥ रावणकी आज्ञासे प्रेरित हो सारथिने तुरंत ही अपने घोड़े हाँके । फिर तो राक्षसराजका वह विशाल रथ क्षणभरमें युद्धके मुहानेपर श्रीरामचन्द्रजीके समीप जा पहुँचा ॥ २७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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