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title: "युद्धकाण्ड, Sarga 101"
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# युद्धकाण्ड, Sarga 101

> शक्त्या निपातितं दृष्ट्वा रावणेन बलीयसा ।  
> लक्ष्मणं समरे शूरं शोणितौघपरिप्लुतम् ॥ १ ॥  
> स दत्त्वा तुमुलं युद्धं रावणस्य दुरात्मनः ।  
> विसृजन्नेव बाणौघान् सुषेणमिदमब्रवीत् ॥ २ ॥

महाबली रावणने शूरवीर लक्ष्मणको अपनी शक्तिसे युद्धमें धराशायी कर दिया था । वे रक्तके प्रवाहसे नहा उठे थे । यह देख भगवान् श्रीरामने दुरात्मा रावणके साथ घोर युद्ध करके बाण-समूहोंकी वर्षा करते हुए ही सुषेणसे इस प्रकार कहा—॥ १-२ ॥

> एष रावणवीर्येण लक्ष्मणः पतितो भुवि ।  
> सर्पवच्चेष्टते वीरो मम शोकमुदीरयन् ॥ ३ ॥

‘ये वीर लक्ष्मण रावणके पराक्रमसे घायल होकर पृथ्वीपर पड़े हैं और चोट खाये हुए सर्पकी भाँति छटपटा रहे हैं । इस अवस्थामें इन्हें देखकर मेरा शोक बढ़ता जा रहा है॥३॥

> शोणितार्द्रमिमं वीरं प्राणैः प्रियतरं मम ।  
> पश्यतो मम का शक्तिर्योद्धुं पर्याकुलात्मनः ॥ ४ ॥

‘ये वीर सुमित्राकुमार मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं, इन्हें लहूलुहान देखकर मेरा मन व्याकुल हो रहा है, ऐसी दशामें मुझमें युद्ध करनेकी शक्ति क्या होगी ? ॥ ४ ॥

> अर्थ स समरश्लाघी भ्राता मे शुभलक्षणः ।  
> यदि पञ्चत्वमापन्नः प्राणैर्मे किं सुखेन वा ॥ ५ ॥

‘ये मेरे शुभलक्षण भाई, जो सदा युद्धका हौसला रखते थे, यदि मर गये तो मुझे इन प्राणोंके रखने और सुख भोगनेसे क्या प्रयोजन है ? ॥ ५ ॥

> लज्जतीव हि मे वीर्यं भ्रश्यतीव कराद् धनुः ।  
> सायका व्यवसीदन्ति दृष्टिर्बाष्पवशं गता ॥ ६ ॥

‘इस समय मेरा पराक्रम लज्जित-सा हो रहा है, हाथसे धनुष खसकता-सा जा रहा है, मेरे सायक शिथिल हो रहे हैं और नेत्रोंमें आँसू भर आये हैं ॥ ६ ॥

> अवसीदन्ति गात्राणि स्वप्नयाने नृणामिव ।  
> चिन्ता मे वर्धते तीव्रा मुमूर्षापि च जायते ॥ ७ ॥  
> भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा रावणेन दुरात्मना ।  
> विघ्नन्तं तु दुःखार्तं मर्मण्यभिहतं भृशम् ॥ ८ ॥

‘जैसे स्वप्नमें मनुष्योंके शरीर शिथिल हो जाते हैं, वही दशा मेरे इन अङ्गोंकी है । मेरी तीव्र चिन्ता बढ़ती जा रही है और दुरात्मा रावणके द्वारा घायल होकर मार्मिक आघातसे अत्यन्त पीड़ित एवं दुःखातुर हुए भाई लक्ष्मणको कराहते देख मुझे मर जानेकी इच्छा हो रही है’ ॥ ७-८ ॥

> राघवो भ्रातरं दृष्ट्वा प्रियं प्राणं बहिश्चरम् ।  
> दुःखेन महताविष्टो ध्यानशोकपरायणः ॥ ९ ॥

श्रीरघुनाथजी बाहर विचरनेवाले प्राणोंके समान प्रिय भाई लक्ष्मणको इस अवस्थामें देख महान् दुःखसे व्याकुल हो गये, चिन्ता और शोकमें डूब गये ॥ ९ ॥

> परं विषादमापन्नो विललापाकुलेन्द्रियः ।  
> भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा लक्ष्मणं रणपांसुषु ॥ १० ॥

उनके मनमें बड़ा विषाद हुआ। इन्द्रियोंमें व्याकुलता छा गयी और वे रणभूमिकी धूलमें घायल होकर पड़े हुए भाई लक्ष्मणकी ओर देखकर विलाप करने लगे—॥ १० ॥

> विजयोऽपि हि मे शूर न प्रियायोपकल्पते ।  
> अचक्षुर्विषयश्चन्द्रः कां प्रीतिं जनयिष्यति ॥ ११ ॥

‘शूरवीर ! अब संग्राममें विजय भी मिल जाय तो मुझे प्रसन्नता नहीं होगी । अन्धेके सामने चन्द्रमा अपनी चाँदनी बिखेर दें तो भी वे उसके मनमें कौन-सा आह्लाद पैदा कर सकेंगे ? ॥ ११ ॥

> किं मे युद्धेन किं प्राणैर्युद्धकार्यं न विद्यते ।  
> यत्रायं निहतः शेते रणमूर्धनि लक्ष्मणः ॥ १२ ॥

‘अब इस युद्धसे अथवा प्राणोंकी रक्षासे मुझे क्या प्रयोजन है ? अब लड़ने-भिड़नेकी कोई आवश्यकता नहीं है। जब संग्रामके मुहानेपर मारे जाकर लक्ष्मण ही सदाके लिये सो गये, तब युद्ध जीतनेसे क्या लाभ है ? ॥ १२ ॥

> यथैव मां वनं यान्तमनुयाति महाद्युतिः ।  
> अहमप्यनुयास्यामि तथैवैनं यमक्षयम् ॥ १३ ॥

‘वनमें आते समय जैसे महातेजस्वी लक्ष्मण मेरे पीछे-पीछे चले आये थे, उसी तरह यमलोकमें जाते समय मैं भी इनके पीछे-पीछे जाऊँगा ॥ १३ ॥

> इष्टबन्धुजनो नित्यं मां स नित्यमनुव्रतः ।  
> इमामवस्थां गमितो राक्षसैः कूटयोधिभिः ॥ १४ ॥

‘हाय ! जो सदा मुझमें अनुराग रखनेवाले मेरे प्रिय बन्धुजन थे, छलसे युद्ध करनेवाले निशाचरोंने आज उनकी यह दशा कर दी ॥ १४ ॥

> देशे देशे कलत्राणि देशे देशे च बान्धवाः ।  
> तं तु देशं न पश्यामि यत्र भ्राता सहोदरः ॥ १५ ॥

‘प्रत्येक देशमें स्त्रियाँ मिल सकती हैं, देश-देशमें जाति-भाई उपलब्ध हो सकते हैं; परंतु ऐसा कोई देश मुझे नहीं दिखायी देता, जहाँ सहोदर भाई मिल सके ॥ १५ ॥

> किं नु राज्येन दुर्धर्षलक्ष्मणेन विना मम ।  
> कथं वक्ष्याम्यहं त्वम्बां सुमित्रां पुत्रवत्सलाम् ॥ १६ ॥

‘दुर्धर्ष वीर लक्ष्मणके बिना मैं राज्य लेकर क्या करूँगा ? पुत्रवत्सला माता सुमित्रासे किस तरह बात कर सकूँगा ॥१६॥

> उपालम्भं न शक्ष्यामि सोढुं दत्तं सुमित्रया ।  
> किं नु वक्ष्यामि कौसल्यां मातरं किं नु कैकयीम् ॥१७॥

‘माता सुमित्राके दिये हुए उलाहनेको कैसे सह सकूँगा ? माता कौसल्या और कैकेयीको क्या जवाब दूँगा ? ॥ १७ ॥

> भरतं किं नु वक्ष्यामि शत्रुघ्नं च महाबलम् ।  
> सह तेन वनं यातो विना तेनागतः कथम् ॥ १८ ॥

‘भरत और महाबली शत्रुघ्न जब पूछेंगे कि आप लक्ष्मणके साथ वनमें गये थे, फिर उनके बिना ही कैसे लौट आये तो उन्हें मैं क्या उत्तर दूँगा ? ॥ १८ ॥

> इहैव मरणं श्रेयो न तु बन्धुविगर्हणम् ।  
> किं मया दुष्कृतं कर्म कृतमन्यत्र जन्मनि ॥ १९ ॥  
> येन मे धार्मिको भ्राता निहतश्चाग्रतः स्थितः ।

‘अतः मेरे लिये यहीं मर जाना अच्छा है । भाई-बन्धुओंमें जाकर उनकी कही हुई खोटी-खरी बातें सुनना अच्छा नहीं । मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा अपराध किया था, जिसके कारण मेरे सामने खड़ा हुआ मेरा धर्मात्मा भाई मारा गया ॥ १९½ ॥

> हा भ्रातर्मनुजश्रेष्ठ शूराणां प्रवर प्रभो ॥ २० ॥  
> एकाकी किं नु मां त्यक्त्वा परलोकाय गच्छसि ।

‘हा भाई नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ! हा प्रभावशाली शूरप्रवर ! तुम मुझे छोड़कर अकेले क्यों परलोकमें जा रहे हो ? ॥२०½॥

> विलपन्तं च मां भ्रातः किमर्थं नावभाषसे ॥ २१ ॥  
> उत्तिष्ठ पश्य किं शेषे दीनं मां पश्य चक्षुषा ।  
> शोकार्तस्य प्रमत्तस्य पर्वतेषु वनेषु च ॥ २२ ॥  
> विषण्णस्य महाबाहो समाश्वासयिता मम ।

‘भैया ! मैं तुम्हारे बिना रो रहा हूँ । तुम मुझसे बोलते क्यों नहीं हो ? प्रिय बन्धु ! उठो । आँख खोलकर देखो । क्यों सो रहे हो ? मैं बहुत दुखी हूँ । मुझपर दृष्टिपात करो ॥ ‘महाबाहो ! पर्वतों और वनोंमें जब मैं शोकसे पीड़ित हो प्रमत्त एवं विषादग्रस्त हो जाता था, तब तुम्हीं मुझे धैर्य बँधाते थे ( फिर इस समय मुझे क्यों नहीं सान्त्वना देते हो ? )’ ॥ २२½ ॥

> राममेवं ब्रुवाणं तु शोकव्याकुलितेन्द्रियम् ॥ २३ ॥  
> आश्वासयन्नुवाचेदं सुषेणः परमं वचः ।

इस तरह विलाप करते हुए भगवान् श्रीरामकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठी थीं । उस समय सुषेणने उन्हें आश्वासन देते हुए यह उत्तम बात कही–॥ २३½ ॥

> त्यजेमां नरशार्दूल बुद्धिं वैक्लव्यकारिणीम् ॥ २४ ॥  
> शोकसंजननीं चिन्तां तुल्यां बाणैश्चमूमुखे ।

‘पुरुषसिंह ! व्याकुलता उत्पन्न करनेवाली इस चिन्तायुक्त बुद्धिका परित्याग कीजिये; क्योंकि युद्धके मुहानेपर की हुई चिन्ता बाणोंके समान होती है और केवल शोकको जन्म देती है ॥ २४½ ॥

> नैव पञ्चत्वमापन्नो लक्ष्मणो लक्ष्मिवर्धनः ॥ २५ ॥  
> नह्यस्य विकृतं वक्त्रं न च श्यामत्वमागतम् ।  
> सुप्रभं च प्रसन्नं च मुखमस्य निरीक्ष्यताम् ॥ २६ ॥

‘आपके भाई शोभावर्द्धक लक्ष्मण मरे नहीं हैं । देखिये, इनके मुखकी आकृति अभी बिगड़ी नहीं है और न इनके चेहरेपर कालापन ही आया है । इनका मुख प्रसन्न एवं कान्तिमान् दिखायी दे रहा है ॥ २५-२६ ॥

> पद्मपत्रतलौ हस्तौ सुप्रसन्ने च लोचने ।  
> नेदृशं दृश्यते रूपं गतासूनां विशां पते ॥ २७ ॥

‘इनके हाथोंकी हथेलियाँ कमल-जैसी कोमल हैं, आँखें भी बहुत साफ हैं । प्रजानाथ ! मरे हुए प्राणियोंका ऐसा रूप नहीं देखा जाता है ॥ २७ ॥

> विषादं मा कृथा वीर सप्राणोऽयमरिंदम ।  
> आख्याति तु प्रसुप्तस्य स्रस्तगात्रस्य भूतले ॥ २८ ॥  
> सोच्छ्वासं हृदयं वीर कम्पमानं मुहुर्मुहुः ।

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर ! आप विषाद न करें । इनके शरीरमें प्राण हैं । वीर ! ये सो गये हैं । इनका शरीर शिथिल होकर भूतलपर पड़ा है । साँस चल रही है और हृदय बारंबार कम्पित हो रहा है—उसकी गति बंद नहीं हुई है । यह लक्षण इनके जीवित होनेकी सूचना दे रहा है’ ॥२८½॥

> एवमुक्त्वा महाप्राज्ञः सुषेणो राघवं वचः ॥ २९ ॥  
> समीपस्थमुवाचेदं हनूमन्तं महाकपिम् ।

श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् सुषेणने पास ही खड़े हुए महाकपि हनुमान्जीसे कहा—॥ २९½ ॥

> सौम्य शीघ्रमितो गत्वा पर्वतं हि महोदयम् ॥ ३० ॥  
> पूर्वं तु कथितो योऽसौ वीर जाम्बवता तव ।  
> दक्षिणे शिखरे जातां महौषधिमिहानय ॥ ३१ ॥  
> विशल्यकरणीं नाम्ना सावर्ण्यकरणीं तथा ।  
> संजीवकरणीं वीर संधानीं च महौषधीम् ॥ ३२ ॥  
> संजीवनार्थं धीरस्य लक्ष्मणस्य त्वमानय ।  
> इत्येवमुक्तो हनुमान् गत्वा चौषधिपर्वतम् ।  
> चिन्तामभ्यगमच्छ्रीमानजानंस्ता महौषधीः ॥ ३३ ॥

‘सौम्य ! तुम शीघ्र ही यहाँसे महोदय पर्वतपर, जिसका पता जाम्बवान् तुम्हें पहले बता चुके हैं, जाओ और उसके दक्षिण शिखरपर उगी हुई विशल्यकरणी, सावर्ण्यकरणी, संजीवकरणी तथा संधानी नामसे प्रसिद्ध महौषधियोंको यहाँ ले आओ । वीर ! उन्हींसे वीरवर लक्ष्मणके जीवनकी रक्षा होगी’ ॥ उनके ऐसा कहनेपर हनुमान्जी ओषधिपर्वत ( महोदय-गिरि ) पर गये; परंतु उन महौषधियोंको न पहचाननेके कारण वे चिन्तामें पड़ गये ॥ ३३ ॥

> तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना मारुतेरमितौजसः ।  
> इदमेव गमिष्यामि गृहीत्वा शिखरं गिरेः ॥ ३४ ॥

इसी समय अमित तेजस्वी हनुमान्जीके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘मैं पर्वतके इस शिखरको ही ले चलूँ ॥३४॥

> अस्मिंस्तु शिखरे जातामोषधीं तां सुखावहाम् ।  
> प्रतर्केणावगच्छामि सुषेणो ह्येवमब्रवीत् ॥ ३५ ॥

‘इसी शिखरपर वह सुखदायिनी ओषधि उत्पन्न होती होगी, ऐसा मुझे अनुमानतः ज्ञात होता है; क्योंकि सुषेणने ऐसा ही कहा था ॥ ३५ ॥

> अगृह्य यदि गच्छामि विशल्यकरणीमहम् ।  
> कालात्ययेन दोषः स्याद् वैक्लव्यं च महद् भवेत् ॥ ३६ ॥

‘यदि विशल्यकरणीको लिये बिना ही लौट जाऊँ तो अधिक समय बीतनेसे दोषकी सम्भावना है और उससे बड़ी भारी घबराहट हो सकती है’ ॥ ३६ ॥

> इति संचिन्त्य हनुमान् गत्वा क्षिप्रं महाबलः ।  
> आसाद्य पर्वतश्रेष्ठं त्रिः प्रकम्प्य गिरेः शिरः ॥ ३७ ॥  
> फुल्लनानातरुगणं समुत्पाट्य महाबलः ।  
> गृहीत्वा हरिशार्दूलो हस्ताभ्यां समतोलयत् ॥ ३८ ॥

ऐसा सोचकर महाबली हनुमान् तुरंत उस श्रेष्ठ पर्वतके पास जा पहुँचे और उसके शिखरको तीन बार हिलाकर उसे उखाड़ लिया । उसके ऊपर नाना प्रकारके वृक्ष खिले हुए थे । वानरश्रेष्ठ महाबली हनुमान्ने उसे दोनों हाथोंपर उठाकर तौला ॥ ३७-३८ ॥

> स नीलमिव जीमूतं तोयपूर्णं नभस्तलात् ।  
> उत्पपात गृहीत्वा तु हनूमान्शिखरं गिरेः ॥ ३९ ॥

जलसे भरे हुए नीले मेघके समान उस पर्वतशिखरको लेकर हनुमान्जी ऊपरको उछले ॥ ३९ ॥

> समागम्य महावेगः संन्यस्य शिखरं गिरेः ।  
> विश्रम्य किंचिद्धनुमान् सुषेणमिदमब्रवीत् ॥ ४० ॥

उनका वेग महान् था । उस शिखरको सुषेणके पास पहुँचाकर उन्होंने पृथ्वीपर रख दिया और थोड़ी देर विश्राम करके हनुमान्जीने सुषेणसे इस प्रकार कहा—॥ ४० ॥

> औषधीर्नावगच्छामि ता अहं हरिपुङ्गव ।  
> तदिदं शिखरं कृत्स्नं गिरेस्तस्याहृतं मया ॥ ४१ ॥

‘कपिश्रेष्ठ ! मैं उन ओषधियोंको पहचानता नहीं हूँ । इसलिये उस पर्वतका सारा शिखर ही लेता आया हूँ’ ॥४१ ॥

> एवं कथयमानं तु प्रशस्य पवनात्मजम् ।  
> सुषेणो वानरश्रेष्ठो जग्राहोत्पाट्य चौषधीः ॥ ४२ ॥

ऐसा कहते हुए हनुमान्जीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके वानरश्रेष्ठ सुषेणने उन ओषधियोंको उखाड़ लिया ॥ ४२ ॥

> विस्मितास्तु बभूवुस्ते सर्वे वानरपुङ्गवाः ।  
> दृष्ट्वा तु हनुमत्कर्म सुरैरपि सुदुष्करम् ॥ ४३ ॥

हनुमान्जीका वह कर्म देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुष्कर था । उसे देखकर समस्त वानरयूथपति बड़े विस्मित हुए ॥ ४३ ॥

> ततः संक्षोदयित्वा तामोषधीं वानरोत्तमः ।  
> लक्ष्मणस्य ददौ नस्तः सुषेणः सुमहाद्युतिः ॥ ४४ ॥

महातेजस्वी कपिश्रेष्ठ सुषेणने उस ओषधिको कूट-पीसकर लक्ष्मणजीकी नाकमें दे दिया ॥ ४४ ॥

> सशल्यः स समाघ्राय लक्ष्मणः परवीरहा ।  
> विशल्यो विरुजः शीघ्रमुदतिष्ठन्महीतलात् ॥ ४५ ॥

शत्रुका संहार करनेवाले लक्ष्मणके सारे शरीरमें बाण धँसे हुए थे । उस अवस्थामें उस ओषधिको सूँघते ही उनके शरीरसे बाण निकल गये और वे नीरोग हो शीघ्र ही भूतलसे उठकर खड़े हो गये ॥ ४५ ॥

> तमुत्थितं तु हरयो भूतलात् प्रेक्ष्य लक्ष्मणम् ।  
> साधुसाध्विति सुप्रीता लक्ष्मणं प्रत्यपूजयन् ॥ ४६ ॥

लक्ष्मणको भूतलसे उठकर खड़ा हुआ देख वे वानर अत्यन्त प्रसन्न हो ‘साधु-साधु’ कहकर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ४६ ॥

> एह्येहीत्यब्रवीद् रामो लक्ष्मणं परवीरहा ।  
> सस्वजे गाढमालिङ्ग्य बाष्पपर्याकुलेक्षणः ॥ ४७ ॥

तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—‘आओ-आओ’ ऐसा कहकर उन्होंने उन्हें दोनों भुजाओंमें भर लिया और गाढ़ आलिंगन करके हृदयसे लगा लिया । उस समय उनके नेत्रोंमें आँसू छलक रहे थे ॥ ४७ ॥

> अब्रवीच्च परिष्वज्य सौमित्रिं राघवस्तदा ।  
> दिष्ट्या त्वां वीर पश्यामि मरणात् पुनरागतम् ॥४८॥

सुमित्राकुमारको हृदयसे लगाकर श्रीरघुनाथजीने कहा— ‘वीर ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि मैं तुम्हें मृत्युके मुखसे पुनः लौटा हुआ देखता हूँ ॥ ४८ ॥

> नहि मे जीवितेनार्थः सीतया च जयेन वा ।  
> को हि मे जीवितेनार्थस्त्वयि पञ्चत्वमागते ॥ ४९ ॥

‘तुम्हारे बिना मुझे जीवनकी रक्षासे, सीतासे अथवा विजयसे भी कोई मतलब नहीं है । जब तुम्हीं नहीं रहोगे, तब मैं इस जीवनको रखकर क्या करूँगा ?’ ॥ ४९ ॥

> इत्येवं ब्रुवतस्तस्य राघवस्य महात्मनः ।  
> खिन्नः शिथिलया वाचा लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत् ॥५०॥

महात्मा रघुनाथजीके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण खिन्न हो शिथिल वाणीमें धीरे-धीरे बोले—॥ ५० ॥

> तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय पुरा सत्यपराक्रम ।  
> लघुः कश्चिदिवासत्त्वो नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ५१ ॥

‘आर्य ! आप सत्यपराक्रमी हैं । आपने पहले रावणका वध करके विभीषणको लङ्काका राज्य देनेकी प्रतिज्ञा की थी । वैसी प्रतिज्ञा करके अब किसी ओछे और निर्बल मनुष्यकी भाँति आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ ५१ ॥

> नहि प्रतिज्ञां कुर्वन्ति वितथां सत्यवादिनः ।  
> लक्ष्मणं हि महत्त्वस्य प्रतिज्ञापरिपालनम् ॥ ५२ ॥  
> नैराश्यमुपगन्तुं च नालं ते मत्कृतेऽनघ ।  
> वधेन रावणस्याद्य प्रतिज्ञामनुपालय ॥ ५३ ॥

‘सत्यवादी पुरुष झूठी प्रतिज्ञा नहीं करते हैं । प्रतिज्ञाका पालन ही बड़प्पनका लक्षण है । निष्पाप रघुवीर ! मेरे लिये आपको इतना निराश नहीं होना चाहिये । आज रावणका वध करके आप अपनी प्रतिज्ञा पूरी कीजिये ॥ ५२-५३॥

> न जीवन् यास्यते शत्रुस्तव बाणपथं गतः ।  
> नर्दतस्तीक्ष्णदंष्ट्रस्य सिंहस्येव महागजः ॥ ५४ ॥

‘आपके बाणोंका लक्ष्य बनकर शत्रु जीवित नहीं लौट सकता । ठीक उसी तरह, जैसे गरजते हुए तीखी दाढ़वाले सिंहके सामने आकर महान् गजराज जीवित नहीं रह सकता ॥ ५४ ॥

> अहं तु वधमिच्छामि शीघ्रमस्य दुरात्मनः ।  
> यावदस्तं न यात्येष कृतकर्मा दिवाकरः ॥ ५५ ॥  
> यदि वधमिच्छसि रावणस्य संख्ये  
> यदि च कृतां हि तवेच्छसि प्रतिज्ञाम् ।  
> यदि तव राजसुताभिलाष आर्य  
> कुरु च वचो मम शीघ्रमद्य वीर ॥५६॥

‘ये सूर्यदेव अपने दिनभरका भ्रमणकार्य पूरा करके अस्ताचलको नहीं चले जाते, तबतक ही जितना शीघ्र सम्भव हो सके, मैं उस दुरात्मा रावणका वध देखना चाहता हूँ ।५५। ‘आर्य ! वीरवर ! यदि आप युद्धमें रावणका वध करना चाहते हैं, यदि आपके मनमें अपनी प्रतिज्ञाको पूरी करनेकी इच्छा है तथा आप राजकुमारी सीताको पानेकी अभिलाषा रखते हैं तो आज शीघ्र ही रावणको मारकर मेरी प्रार्थना सफल करें’ ॥ ५६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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