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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 96"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 96

> तौ रजन्यां प्रभातायां स्नातौ हुतहुताशनौ ।  
> यथोक्तमृषिणा पूर्वं सर्वं तत्रोपगायताम् ॥ १ ॥

रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब स्नान-संध्याके पश्चात् समिधा-होमका कार्य पूरा करके वे दोनों भाई ऋषिके बताये अनुसार वहाँ सम्पूर्ण रामायणका गान करने लगे ॥ १ ॥

> तांस श्रुश्राव काकुत्स्थः पूर्वाचार्यविनिर्मिताम् ।  
> अपूर्वां पाठ्यजातिं च गेयेन समलंकृताम् ॥ २ ॥

श्रीरघुनाथजीने भी वह गान सुना, जो पूर्ववर्ती आचार्यों-के बताये हुए नियमोंके अनुकूल था । संगीतकी विशेषताओंसे युक्त स्वरोंके अलापनेकी अपूर्व शैली थी ॥ २ ॥

> प्रमाणैर्बहुभिर्बद्धां तन्त्रीलयसमन्विताम् ।  
> बालाभ्यां राघवः श्रुत्वा कौतूहलपरोऽभवत् ॥ ३ ॥

बहुसंख्यक प्रमाणों—ध्वनिपरिच्छेदके साधनभूत द्रुत, मध्य और विलम्बित—इन तीनोंकी आवृत्तियों अथवा सप्तविध स्वरोंके भेदकी सिद्धिके लिये बने हुए स्थानोंसे बँधा और वीणाकी लयसे मिलता हुआ उन दोनों बालकोंका वह मधुर गान सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा कौतूहल हुआ ॥ ३ ॥

> अथ कर्मान्तरे राजा समाहूय महामुनीन् ।  
> पार्थिवांश्च नरव्याघ्रः पण्डितान् नैगमांस्तथा ॥ ४ ॥  
> पौराणिकाञ्शब्दविदो ये वृद्धाश्च द्विजातयः ।  
> स्वराणां लक्षणज्ञांश्च उत्सुकान् द्विजसत्तमान् ॥ ५ ॥  
> लक्षणज्ञांश्च गान्धर्वान् नैगमांश्च विशेषतः ।  
> पादाक्षरसमासज्ञांश्छन्दःसु परिनिष्ठितान् ॥ ६ ॥  
> कलामात्राविशेषज्ञाञ्ज्यौतिषे च परं गतान् ।  
> क्रियाकल्पविदश्चैव तथा कार्यविशारदान् ॥ ७ ॥  
> भाषाज्ञानिङ्गितज्ञांश्च नैगमांश्चाप्यशेषतः ।

तदनन्तर पुरुषसिंह राजा श्रीरामने कर्मानुष्ठानसे अवकाश मिलनेपर बड़े-बड़े मुनियों, राजाओं, वेदवेत्ता पण्डितों, पौराणिकों, वैयाकरणों, बड़े-बूढ़े ब्राह्मणों, स्वरों और लक्षणोंके ज्ञाताओं, गीत सुननेके लिये उत्सुक द्विजों, सामुद्रिक लक्षणों तथा संगीत-विद्याके जानकारों, विशेषतः निगमागमके विद्वानों, अथवा पुरवासियों, भिन्न-भिन्न छन्दोंके चरणों, उनके गुरु-लघु अक्षरों तथा उनके सम्बन्धोंका ज्ञान रखनेवाले पण्डितों, वैदिक छन्दोंके परिनिष्ठित विद्वानों, स्वरोंकी ह्रस्व, दीर्घ आदि मात्राओंके विशेषज्ञों, ज्योतिष विद्याके पारंगत पण्डितों, कर्म-काण्डियों, कार्यकुशल पुरुषों, विभिन्न भाषाओं और चेष्टा तथा संकेतोंको समझनेवाले पुरुषों एवं सारे महाजनोंको बुलवाया ॥ ४-७½ ॥

> हेतूपचारकुशलान् हैतुकांश्च बहुश्रुतान् ॥ ८ ॥  
> छन्दोविदः पुराणज्ञान् वैदिकान् द्विजसत्तमान् ।  
> चित्रज्ञान् वृत्तसूत्रज्ञान् गीतनृत्यविशारदान् ॥ ९ ॥  
> शाखज्ञान् नीतिनिपुणान् वेदान्तार्थप्रबोधकान् ।  
> एतान् सर्वान् समानीय गातारौ समवेशयत् ॥ १० ॥

इतना ही नहीं, तर्कके प्रयोगमें निपुण नैयायिकों, युक्ति-वादी एवं बहुज्ञ विद्वानों, छन्दों, पुराणों और वेदोंके ज्ञाता द्विजवरों, चित्रकलाके जानकारों, धर्मशास्त्रके अनुकूल सदाचारके ज्ञाताओं, दर्शन एवं कल्पसूत्रके विद्वानों, नृत्य और गीतमें प्रवीण पुरुषों, विभिन्न शास्त्रोंके ज्ञाताओं, नीतिनिपुण पुरुषों तथा वेदान्तके अर्थको प्रकाशित करनेवाले ब्रह्मवेत्ताओंको भी वहाँ बुलवाया । इन सबको एकत्र करके भगवान् श्रीरामने रामायण-गान करनेवाले उन दोनों बालकोंको सभामें बुलाकर बिठाया ॥ ८—१० ॥

> तेषां संवदतां तत्र श्रोतॄणां हर्षवर्धनम् ।  
> गेयं प्रचक्रतुस्तत्र तावुभौ मुनिदारकौ ॥ ११ ॥

सभासदोंमें श्रोताओंका हर्ष बढ़ानेवाली बातें होने लगीं । उसी समय दोनों मुनिकुमारोंने गाना आरम्भ किया ॥ ११ ॥

> ततः प्रवृत्तं मधुरं गान्धर्वमतिमानुषम् ।  
> न च तृप्तिं ययुः सर्वे श्रोतारो गेयसम्पदा ॥ १२ ॥

फिर तो मधुर संगीतका तार बँध गया । बड़ा अलौकिक गान था । गेय वस्तुकी विशेषताओंके कारण सभी श्रोता मुग्ध होकर सुनने लगे । किसीको तृप्ति नहीं होती थी ॥ १२ ॥

> हृष्टा मुनिगणाः सर्वे पार्थिवाश्च महौजसः ।  
> पिबन्त इव चक्षुर्भिः पश्यन्ति स्म मुहुर्मुहुः ॥ १३ ॥

मुनियोंके समुदाय और महापराक्रमी भूपाल सभी आनन्दमग्न होकर उन दोनोंकी ओर बारंबार इस तरह देख रहे थे, मानो उनकी रूपमाधुरीको नेत्रोंसे पी रहे हैं ॥ १३ ॥

> ऊचुः परस्परं चेदं सर्व एव समाहिताः ।  
> उभौ रामस्य सदृशौ बिम्बाद् बिम्बमिवोत्थितौ ॥ १४ ॥

वे सब एकाग्रचित्त हो परस्पर इस प्रकार कहने लगे–‘इन दोनों कुमारोंकी आकृति श्रीरामचन्द्रजीसे बिल्कुल मिलती-जुलती है । ये बिम्बसे प्रकट हुए प्रतिबिम्बके समान जान पड़ते हैं ॥ १४ ॥

> जटिलौ यदि न स्यातां न वल्कलधरौ यदि ।  
> विशेषं नाधिगच्छामो गायतो राघवस्य च ॥ १५ ॥

‘यदि इनके सिरपर जटा न होती और ये वल्कल न पहने होते तो हमें श्रीरामचन्द्रजीमें तथा गान करनेवाले इन दोनों कुमारोंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता’ ॥ १५ ॥

> एवं प्रभाषमाणेषु पौरजानपदेषु च ।  
> प्रवृत्तमादितः पूर्वसर्गं नारददर्शितम् ॥ १६ ॥  
> ततः प्रभृति सर्गांश्च यावद् विंशत्यगायताम् ।  
> ततोऽपराह्णसमये राघवः समभाषत ॥ १७ ॥  
> श्रुत्वा विंशतिसर्गांस्तान् भ्रातरं भ्रातृवत्सलः ।  
> अष्टादश सहस्राणि सुवर्णस्य महात्मनोः ॥ १८ ॥  
> प्रयच्छ शीघ्रं काकुत्स्थ यदन्यदभिकाङ्क्षितम् ।

नगर और जनपदमें निवास करनेवाले मनुष्य जब इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय नारदजीके द्वारा प्रदर्शित प्रथम सर्ग—मूल-रामायणका आरम्भसे ही गान प्रारम्भ हुआ ॥ वहाँसे लेकर बीस सर्गोंतकका उन्होंने गान किया । तत्पश्चात् अपराह्णका समय हो गया । उतनी देरमें बीस सर्गोंका गान सुनकर भ्रातृवत्सल श्रीरघुनाथजीने भाई भरतसे कहा—‘काकुत्स्थ ! तुम इन दोनों महात्मा बालकोंको अठारह हजार स्वर्ण-मुद्राएँ पुरस्कारके रूपमें शीघ्र प्रदान करो । इसके सिवा यदि और किसी वस्तुके लिये इनकी इच्छा हो तो उसे भी शीघ्र ही दे दो’ ॥ १७-१८½ ॥

> ददौ स शीघ्रं काकुत्स्थो बालयोर्वै पृथक् पृथक् ॥ १९ ॥  
> दीयमानं सुवर्णं तु नाग्रहीतां कुशीलवौ ।

आज्ञा पाकर भरत शीघ्र ही उन दोनों बालकोंको अलग-अलग स्वर्णमुद्राएँ देने लगे; किंतु उस दिये जाते हुए सुवर्ण-को कुश और लवने नहीं ग्रहण किया ॥ १९½ ॥

> ऊचतुश्च महात्मानौ किमनेनेति विस्मितौ ॥ २० ॥  
> वन्येन फलमूलेन निरतौ वनवासिनौ ।  
> सुवर्णेन हिरण्येन किं करिष्यावहे वने ॥ २१ ॥

वे दोनों महामनस्वी बन्धु विस्मित होकर बोले—‘इस धनकी क्या आवश्यकता है । हम वनवासी हैं । जंगली फल-मूलसे जीवन-निर्वाह करते हैं । सोना-चाँदी वनमें ले जाकर क्या करेंगे ?’ ॥ २०-२१ ॥

> तथा तयोः प्रब्रुवतोः कौतूहलसमन्विताः ।  
> श्रोतारश्चैव रामश्च सर्व एव सुविस्मिताः ॥ २२ ॥  
> तस्य चैवागमं रामः काव्यस्य श्रोतुमुत्सुकः ।  
> पप्रच्छ तौ महातेजास्तावुभौ मुनिदारकौ ॥ २३ ॥

उनके ऐसा कहनेपर सब श्रोताओंके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ । श्रोता और श्रीराम सभी आश्चर्यचकित हो गये ॥ तब श्रीरामचन्द्रजी यह सुननेके लिये उत्सुक हुए कि इस काव्यकी उपलब्धि कहाँसे हुई है । फिर उन महातेजस्वी रघुनाथजीने दोनों मुनिकुमारोंसे पूछा—॥ २३ ॥

> किंप्रमाणमिदं काव्यं का प्रतिष्ठा महात्मनः ।  
> कर्ता काव्यस्य महतः क चासौ मुनिपुङ्गवः ॥ २४ ॥

‘इस महाकाव्यकी श्लोक-संख्या कितनी है ? इसके रचयिता महात्मा कविका आवासस्थान कौन-सा है ? इस महान् काव्यके कर्ता कौन मुनीश्वर हैं और वे कहाँ हैं ?’ ॥२४॥

> पृच्छन्तं राघवं वाक्यमूचतुर्मुनिदारकौ ।  
> वाल्मीकिर्भगवान् कर्ता सम्प्राप्तो यज्ञसंविधम् ।  
> येनेदं चरितं तुभ्यमशेषं सम्प्रदर्शितम् ॥ २५ ॥

इस प्रकार पूछते हुए श्रीरघुनाथजीसे वे दोनों मुनिकुमार बोले—‘महाराज ! जिस काव्यके द्वारा आपके इस सम्पूर्ण चरित्रका प्रदर्शन कराया गया है, उसके रचयिता भगवान् वाल्मीकि हैं और वे इस यज्ञस्थलमें पधारे हुए हैं ॥ २५ ॥

> संनिबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्रकम् ।  
> उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना ॥ २६ ॥

‘उन तपस्वी कविके बनाये हुए इस महाकाव्यमें चौबीस हजार श्लोक और एक सौ उपाख्यान हैं ॥ २६ ॥

> आदिप्रभृति वै राजन् पञ्चसर्गशतानि च ।  
> काण्डानि षट्कृतानीह सोत्तराणि महात्मना ॥ २७ ॥

‘राजन् ! उन महात्माने आदिसे लेकर अन्ततक पाँच सौ सर्ग तथा छः काण्डोंका निर्माण किया है । इनके सिवा उन्होंने उत्तरकाण्डकी भी रचना की है ॥ २७ ॥

> कृतानि गुरुणास्माकमृषिणा चरितं तव ।  
> प्रतिष्ठा जीवितं यावत् तावत् सर्वस्य वर्तते ॥ २८ ॥

‘हमारे गुरु महर्षि वाल्मीकिने ही उन सबका निर्माण किया है । उन्होंने आपके चरित्रको महाकाव्यका रूप दिया है । इसमें आपके जीवनतककी सारी बातें आ गयी हैं ॥२८॥

> यदि बुद्धिः कृता राजञ्छ्रवणाय महारथ ।  
> कर्मान्तरे क्षणीभूतस्तच्छृणुष्व सहानुजः ॥ २९ ॥

‘महारथी नरेश ! यदि आपने इसे सुननेका विचार किया हो तो यज्ञ-कर्मसे अवकाश मिलनेपर इसके लिये निश्चित समय निकालिये और अपने भाइयोंके साथ बैठकर इसे नियमित रूपसे सुनिये’ ॥ २९ ॥

> बाढमित्यब्रवीद् रामस्तौ चानुज्ञाप्य राघवम् ।  
> प्रहृष्टौ जग्मतुः स्थानं यत्रास्ते मुनिपुङ्गवः ॥ ३० ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने कहा—‘बहुत अच्छा । हम इस काव्यको सुनेंगे ।’ तत्पश्चात् श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा ले दोनों भाई कुश और लव प्रसन्नतापूर्वक उस स्थानपर गये, जहाँ मुनिवर वाल्मीकिजी ठहरे हुए थे ॥ ३० ॥

> रामोऽपि मुनिभिः सार्धं पार्थिवैश्च महात्मभिः ।  
> श्रुत्वा तद् गीतिमाधुर्यं कर्मशालामुपागमत् ॥ ३१ ॥

श्रीरामचन्द्रजी भी महात्मा मुनियों और राजाओंके साथ उस मधुर संगीतको सुनकर कर्मशाला ( यज्ञमण्डप ) में चले गये ॥ ३१ ॥

> शुश्राव तत्ताललयोपपन्नं  
> सर्गान्वितं सुस्वरशब्दयुक्तम् ।  
> तन्त्रीलयव्यञ्जनयोगयुक्तं  
> कुशीलवाभ्यां परिगीयमानम् ॥ ३२ ॥

इस प्रकार प्रथम दिन कतिपय सर्गोंसे युक्त सुन्दर स्वर एवं मधुर शब्दोंसे पूर्ण, ताल और लयसे सम्पन्न तथा वीणाके लयकी व्यञ्जनासे युक्त वह काव्यगान, जिसे कुश और लवने गाया था, श्रीरामने सुना ॥ ३२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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