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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 94"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 94

> तत् सर्वमखिलेनाशु प्रस्थाप्य भरताग्रजः ।  
> हयं लक्षणसम्पन्नं कृष्णसारं मुमोच ह ॥ १ ॥

इस प्रकार सब सामग्री पूर्णरूपसे भेजकर भरतके बड़े भाई श्रीरामने उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न तथा कृष्णसार मृगके समान काले रंगवाले एक घोड़ेको छोड़ा ॥ १ ॥

> ऋत्विग्भिर्लक्ष्मणं सार्धमश्वे च विनियुज्य च ।  
> ततोऽभ्यगच्छत् काकुत्स्थः सह सैन्येन नैमिषम् ॥ २ ॥

ऋत्विजोंसहित लक्ष्मणको उस अश्वकी रक्षाके लिये नियुक्त करके श्रीरघुनाथजी सेनाके साथ नैमिषारण्यको गये ॥ २ ॥

> यज्ञवाटं महाबाहुर्दृष्ट्वा परममद्भुतम् ।  
> प्रहर्षमतुलं लेभे श्रीमानिति च सोऽब्रवीत् ॥ ३ ॥

वहाँ बने हुए अत्यन्त अद्भुत यज्ञ-मण्डपको देखकर महाबाहु श्रीरामको अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई और वे बोले— ‘बहुत सुन्दर है’ ॥ ३ ॥

> नैमिषे वसतस्तस्य सर्वे एव नराधिपाः ।  
> आनिन्युरुपहारांश्च तान् रामः प्रत्यपूजयत् ॥ ४ ॥

नैमिषारण्यमें निवास करते समय श्रीरामचन्द्रजीके पास भूमण्डलके सभी नरेश भाँति-भाँतिके उपहार ले आये और श्रीरामचन्द्रजीने उन सबका स्वागत-सत्कार किया ॥ ४ ॥

> अन्नपानादिवस्त्राणि सर्वोपकरणानि च ।  
> भरतः सहशत्रुघ्नो नियुक्तो राजपूजने ॥ ५ ॥

उन्हें अन्न, पान, वस्त्र तथा अन्य सब आवश्यक सामान दिये गये । शत्रुघ्नसहित भरत उन राजाओंके स्वागत-सत्कारमें नियुक्त किये गये थे ॥ ५ ॥

> वानराश्च महात्मानः सुग्रीवसहितास्तदा ।  
> परिवेषणं च विप्राणां प्रयताः सम्प्रचक्रिरे ॥ ६ ॥

सुग्रीवसहित महामनस्वी वानर परम पवित्र एवं संयत-चित्त हो उस समय वहाँ ब्राह्मणोंको भोजन परोसते थे ॥ ६ ॥

> विभीषणश्च रक्षोभिर्बहुभिः सुसमाहितः ।  
> ऋषीणामुग्रतपसां किंकरः समपद्यत ॥ ७ ॥

बहुतेरे राक्षसोंसे घिरे हुए विभीषण अत्यन्त सावधान रहकर उग्र तपस्वी ऋषियोंके सेवाकार्यमें संलग्न थे ॥ ७ ॥

> उपकार्या महार्हाश्च पार्थिवानां महात्मनाम् ।  
> सानुगानां नरश्रेष्ठो व्यादिदेश महाबलः ॥ ८ ॥  
> एवं सुविहितो यज्ञो ह्यश्वमेधो ह्यवर्तत ।  
> लक्ष्मणेन सुगुप्ता सा हयचर्या प्रवर्तत ॥ ९ ॥

महाबली नरश्रेष्ठ श्रीरामने सेवकोंसहित महामनस्वी भूपालोंको ठहरनेके लिये बहुमूल्य वासस्थान (खेमे) दिये ॥ इस प्रकार सुन्दर ढंगसे अश्वमेध यज्ञका कार्य प्रारम्भ हुआ और लक्ष्मणके संरक्षणमें रहकर घोड़ेके भूमण्डलमें भ्रमणका कार्य भी भलीभाँति सम्पन्न हो गया ॥ ९ ॥

> ईदृशं राजसिंहस्य यज्ञप्रवरमुत्तमम् ।  
> नान्यः शब्दोऽभवत् तत्र हयमेधे महात्मनः ॥ १० ॥  
> छन्दतो देहि देहीति यावत् तुष्यन्ति याचकाः ।  
> तावत् सर्वाणि दत्तानि क्रतुमुख्ये महात्मनः ॥ ११ ॥  
> विविधानि च गौडानि खाण्डवानि तथैव च ।

राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी महात्मा श्रीरघुनाथजीका वह श्रेष्ठ यज्ञ इस प्रकार उत्तम विधिसे होने लगा । उस अश्वमेध यज्ञमें केवल एक ही बात सब ओर सुनायी पड़ती थी—जबतक याचक संतुष्ट न हों, तबतक उनकी इच्छाके अनुसार सब वस्तुएँ दिये जाओ, इसके सिवा दूसरी बात नहीं सुनायी देती थी । इस प्रकार महात्मा श्रीरामके श्रेष्ठ यज्ञमें नाना प्रकारके गुड़के बने हुए खाद्य पदार्थ और खाण्डव आदि तबतक निरन्तर दिये जाते थे जबतक कि पानेवाले पूर्णतः संतुष्ट होकर बस न कर दें ॥ १०-११½ ॥

> न निःसृतं भवत्योष्ठाद् वचनं यावदर्थिनाम् ॥ १२ ॥  
> तावद् वानररक्षोभिर्दत्तमेवाभ्यदृश्यत ।

जबतक याचकोंके मनकी बात ओठसे बाहर नहीं निकलने पाती थी, तबतक ही राक्षस और वानर उन्हें उनकी अभीष्ट वस्तुएँ दे देते थे । यह बात सबने देखी ॥ १२½ ॥

> न कश्चिन्मलिनो वापि दीनो वाप्यथवा कृशः ॥ १३ ॥  
> तस्मिन् यज्ञवरे राज्ञो हृष्टपुष्टजनावृते ।

राजा श्रीरामके उस श्रेष्ठ यज्ञमें हृष्ट-पुष्ट मनुष्य भरे हुए थे, वहाँ कोई भी मलिन, दीन अथवा दुर्बल नहीं दिखायी देता था ॥ १३½ ॥

> ये च तत्र महात्मानो मुनयश्चिरजीविनः ॥ १४ ॥  
> नास्मरंस्तादृशं यज्ञं दानौघसमलंकृतम् ।

उस यज्ञमें जो चिरजीवी महात्मा मुनि पधारे थे, उन्हें ऐसे किसी भी यज्ञका स्मरण नहीं था, जिसमें दानकी ऐसी धूम रही हो । वह यज्ञ दानराशिसे पूर्णतः अलंकृत दिखायी देता था ॥ १४½ ॥

> यः कृत्यवान् सुवर्णेन सुवर्णं लभते स सः ॥ १५ ॥  
> वित्तार्थी लभते वित्तं रत्नार्थी रत्नमेव च ।

जिसे सुवर्णकी आवश्यकता थी, वह सुवर्ण पाता था, धन चाहनेवालेको धन मिलता था और रत्नकी इच्छावालेको रत्न ॥ १५½ ॥

> हिरण्यानां सुवर्णानां रत्नानामथ वाससाम् ॥ १६ ॥  
> अनिशं दीयमानानां राशिः समुपदृश्यते ।

वहाँ निरन्तर दिये जानेवाले चाँदी, सोने, रत्न और वस्त्रोंके ढेर लगे दिखायी देते थे ॥ १६½ ॥

> न शक्रस्य न सोमस्य यमस्य वरुणस्य च ॥ १७ ॥  
> ईदृशो दृष्टपूर्वो न एवमूचुस्तपोधनाः ।

वहाँ आये हुए तपस्वी मुनि कहते थे कि ऐसा यज्ञ तो पहले कभी इन्द्र, चन्द्रमा, यम और वरुणके यहाँ भी नहीं देखा गया ॥ १७½ ॥

> सर्वत्र वानरास्तस्थुः सर्वत्रैव च राक्षसाः ॥ १८ ॥  
> वासोधनान्नकामेभ्यः पूर्णहस्ता ददुर्भृशम् ।

वानर और राक्षस सर्वत्र हाथोंमें देनेकी सामग्री लिये खड़े रहते थे और वस्त्र, धन तथा अन्नकी इच्छा रखनेवाले याचकोंको अधिक-से-अधिक देते थे ॥ १८½ ॥

> ईदृशो राजसिंहस्य यज्ञः सर्वगुणान्वितः ।  
> संवत्सरमथो साग्रं वर्तते न च हीयते ॥ १९ ॥

राजसिंह भगवान् श्रीरामका ऐसा सर्वगुणसम्पन्न यज्ञ एक वर्षसे भी अधिक कालतक चलता रहा । उसमें कभी किसी बातकी कमी नहीं हुई ॥ १९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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