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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 93"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 93

> एतदाख्याय काकुत्स्थो भ्रातृभ्याममितप्रभः ।  
> लक्ष्मणं पुनरेवाह धर्मयुक्तमिदं वचः ॥ १ ॥  
> वसिष्ठं वामदेवं च जाबालिमथ काश्यपम् ।  
> द्विजांश्च सर्वप्रवरानश्वमेधपुरस्कृतान् ॥ २ ॥  
> एतान् सर्वान् समानीय मन्त्रयित्वा च लक्ष्मण ।  
> हयं लक्षणसम्पन्नं विमोक्ष्यामि समाधिना ॥ ३ ॥

अपने दोनों भाइयोंको यह कथा सुनाकर अमिततेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे पुनः यह धर्मयुक्त बात कही—॥ ‘लक्ष्मण ! मैं अश्वमेध यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणोंमें अग्रगण्य एवं सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि और काश्यप आदि सभी द्विजोंको बुलाकर और उनसे सलाह लेकर पूरी सावधानीके साथ शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न घोड़ा छोड़ूँगा’ ॥ २-३ ॥

> तद् वाक्यं राघवेणोक्तं श्रुत्वा त्वरितविक्रमः ।  
> द्विजान् सर्वान् समाहूय दर्शयामास राघवम् ॥ ४ ॥

रघुनाथजीके कहे हुए इस वचनको सुनकर शीघ्रगामी लक्ष्मणने समस्त ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें श्रीरामचन्द्रजीसे मिलाया ॥ ४ ॥

> ते दृष्ट्वा देवसंकाशं कृतपादाभिवन्दनम् ।  
> राघवं सुदुराधर्षमाशीर्भिः समपूजयन् ॥ ५ ॥

उन ब्राह्मणोंने देखा, देवतुल्य तेजस्वी और अत्यन्त दुर्जय श्रीराघवेन्द्र हमारे चरणोंमें प्रणाम करके खड़े हैं, तब उन्होंने शुभ आशीर्वादोंद्वारा उनका सत्कार किया ॥ ५ ॥

> प्राञ्जलिःस तदा भूत्वा राघवो द्विजसत्तमान् ।  
> उवाच धर्मसंयुक्तमश्वमेधाश्रितं वचः ॥ ६ ॥

उस समय रघुकुलभूषण श्रीराम हाथ जोड़कर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे अश्वमेध यज्ञके विषयमें धर्मयुक्त श्रेष्ठ वचन बोले ॥ ६ ॥

> तेऽपि रामस्य तच्छ्रुत्वा नमस्कृत्वा वृषध्वजम् ।  
> अश्वमेधं द्विजाः सर्वे पूजयन्ति स सर्वशः ॥ ७ ॥

वे सब ब्राह्मण भी श्रीरामकी वह बात सुनकर भगवान् शंकरको प्रणाम करके सब प्रकारसे अश्वमेध यज्ञकी सराहना करने लगे ॥ ७ ॥

> स तेषां द्विजमुख्यानां वाक्यमद्भुतदर्शनम् ।  
> अश्वमेधाश्रितं श्रुत्वा भृशं प्रीतोऽभवत् तदा ॥ ८ ॥  
> विज्ञाय कर्म तत् तेषां रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।  
> प्रेषयस्व महाबाहो सुग्रीवाय महात्मने ॥ ९ ॥  
> यथा महद्भिर्हरिभिर्बहुभिश्च वनौकसाम् ।  
> सार्धमागच्छ भद्रं ते अनुभोक्तुं महोत्सवम् ॥ १० ॥

अश्वमेध यज्ञके विषयमें उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका अद्भुत ज्ञानसे युक्त वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ उस कर्मके लिये उन ब्राह्मणोंकी स्वीकृति जानकर श्रीराम लक्ष्मणसे बोले—‘महाबाहो ! तुम महात्मा वानरराज सुग्रीवके पास यह संदेश भेजो कि ‘कपिश्रेष्ठ ! तुम बहुत-से विशालकाय वनवासी वानरोंके साथ यहाँ यज्ञ-महोत्सवका आनन्द लेनेके लिये आओ । तुम्हारा कल्याण हो’ ॥ ९-१० ॥

> विभीषणश्च रक्षोभिः कामगैर्बहुभिर्वृतः ।  
> अश्वमेधं महायज्ञमायात्वतुलविक्रमः ॥ ११ ॥

‘साथ ही अतुल-पराक्रमी विभीषणको भी यह सूचना दो कि ‘वे इच्छानुसार चलनेवाले बहुत-से राक्षसोंके साथ हमारे महान् अश्वमेध यज्ञमें पधारें’ ॥ ११ ॥

> राजानश्च महाभागा ये मे प्रियचिकीर्षवः ।  
> सानुगाः क्षिप्रमायान्तु यज्ञं भूमिनिरीक्षकाः ॥ १२ ॥

‘इनके सिवा मेरा प्रिय करनेकी इच्छावाले जो महाभाग राजा हैं, वे भी यज्ञ-भूमि देखनेके लिये सेवकोंसहित शीघ्र यहाँ आवें ॥ १२ ॥

> देशान्तरगता ये च द्विजा धर्मसमाहिताः ।  
> आमन्त्रयस्व तान् सर्वानश्वमेधाय लक्ष्मण ॥ १३ ॥

‘लक्ष्मण ! जो धर्मनिष्ठ ब्राह्मण कार्यवश दूसरे-दूसरे देशोंमें चले गये हैं, उन सबको अपने अश्वमेध यज्ञके लिये आमन्त्रित करो ॥ १३ ॥

> ऋषयश्च महाबाहो आहूयन्तां तपोधनाः ।  
> देशान्तरगताः सर्वे सदाराश्च द्विजातयः ॥ १४ ॥

‘महाबाहो ! तपोधन ऋषियोंको तथा अन्य राज्यमें रहनेवाले स्त्रियोंसहित समस्त ब्रह्मर्षियोंको भी बुला लो ॥ १४ ॥

> तथैव तालावचरास्तथैव नटनर्तकाः ।  
> यज्ञवाटश्च सुमहान् गोमत्या नैमिषे वने ॥ १५ ॥  
> आज्ञाप्यतां महाबाहो तद्धि पुण्यमनुत्तमम् ।

‘महाबाहो ! ताल लेकर रंगभूमिमें संचरण करनेवाले सूत्र-धार तथा नट और नर्तक भी बुला लिये जायँ । नैमिषारण्यमें गोमतीके तटपर विशाल यज्ञमण्डप बनानेकी आज्ञा दो; क्योंकि वह वन बहुत ही उत्तम और पवित्र स्थान है ॥ १५½ ॥

> शान्तयश्च महाबाहो प्रवर्तन्तां समन्ततः ॥ १६ ॥  
> शतशश्चापि धर्मज्ञाः क्रतुमुख्यमनुत्तमम् ।  
> अनुभूय महायज्ञं नैमिषे रघुनन्दन ॥ १७ ॥

‘महाबाहु रघुनन्दन ! वहाँ यज्ञकी निर्विघ्न-समाप्तिके लिये सर्वत्र शान्ति-विधान प्रारम्भ करा दो । नैमिषारण्यमें सैकड़ों धर्मज्ञ पुरुष उस परम उत्तम और श्रेष्ठ महायज्ञको देखकर कृतार्थ हों ॥ १६-१७ ॥

> तुष्टः पुष्टश्च सर्वोऽसौ मानितश्च यथाविधि ।  
> प्रतियास्यति धर्मज्ञ शीघ्रमामन्त्र्यतां जनः ॥ १८ ॥

‘धर्मज्ञ लक्ष्मण ! शीघ्र लोगोंको आमन्त्रित करो और जो लोग आवें, वे सब विधिपूर्वक तुष्ट, पुष्ट एवं सम्मानित होकर लौटें ॥ १८ ॥

> शतं वाहसहस्राणां तण्डुलानां वपुष्मताम् ।  
> अयुतं तिलमुद्गस्य प्रयात्वग्रे महाबल ॥ १९ ॥  
> चणकानां कुलित्थानां माषाणां लवणस्य च ।  
> अतोऽनुरूपं स्नेहं च गन्धं संक्षिप्तमेव च ॥ २० ॥  
> सुवर्णकोट्यो बहुला हिरण्यस्य शतोत्तराः ।  
> अग्रतो भरतः कृत्वा गच्छत्वग्रे समाधिना ॥ २१ ॥

‘महाबली सुमित्राकुमार ! लाखों बोझ ढोनेवाले पशु खड़े दानेवाले चावल लेकर और दस हजार पशु तिल, मूँग, चना, कुल्थी, उड़द और नमकके बोझ लेकर आगे चलें ॥ ‘इसीके अनुरूप घी, तेल, दूध, दही तथा बिना घिसे हुए चन्दन और बिना पिसे हुए सुगन्धित पदार्थ भी भेजे जाने चाहिये । भरत सौ करोड़से भी अधिक सोने-चाँदीके सिक्के साथ लेकर पहले ही जायँ और बड़ी सावधानीके साथ यात्रा करें ॥ २०-२१ ॥

> अन्तरापणवीथ्यश्च सर्वे च नटनर्तकाः ।  
> सूदा नार्यश्च बहवो नित्यं यौवनशालिनः ॥ २२ ॥

‘मार्गमें आवश्यक वस्तुओंके क्रय-विक्रयके लिये जगह-जगह बाजारें भी लगनी चाहिये; अतः इसके प्रवर्तक वणिक् एवं व्यवसायीलोग भी यात्रा करें । समस्त नट और नर्तक भी जायँ । बहुत-से रसोइये तथा सदा युवावस्थासे सुशोभित होनेवाली स्त्रियाँ भी यात्रा करें ॥ २२ ॥

> भरतेन तु सार्धं ते यान्तु सैन्यानि चाग्रतः ।  
> नैगमान् बालवृद्धांश्च द्विजांश्च सुसमाहितान् ॥ २३ ॥  
> कर्मान्तिकान् वर्धकिनः कोशाध्यक्षांश्च नैगमान् ।  
> मम मातृस्तथा सर्वाः कुमारान्तःपुराणि च ॥ २४ ॥  
> काञ्चनीं मम पत्नीं च दीक्षायां ज्ञांश्च कर्मणि ।  
> अग्रतो भरतः कृत्वा गच्छत्वग्रे महायशाः ॥ २५ ॥  
> उपकार्या महार्हाश्च पार्थिवानां महौजसाम् ।  
> सानुगानां नरश्रेष्ठो व्यादिदेश महाबलः ॥ २६ ॥  
> अन्नपानानि वस्त्राणि अनुगानां महात्मनाम् ।

‘भरतके साथ आगे-आगे सेनाएँ भी जायँ । महायशस्वी भरत शास्त्रवेत्ता विद्वानों, बालकों, वृद्धों, एकाग्र चित्तवाले ब्राह्मणों, काम करनेवाले नौकरों, बढ़इयों, कोषाध्यक्षों, वैदिकों, मेरी सब माताओं, कुमारोंके अन्तःपुरों ( भरत आदिकी स्त्रियों ), मेरी पत्नीकी सुवर्णमयी प्रतिमा तथा यज्ञ-कर्मकी दीक्षाके जानकार ब्राह्मणोंको आगे करके पहले ही यात्रा करें ॥ तत्पश्चात् महाबली नरश्रेष्ठ श्रीरामने सेवकोंसहित महातेजस्वी नरेशोंके ठहरनेके लिये बहुमूल्य वासस्थान बनाने ( खेमे आदि लगाने ) के लिये आदेश दिया तथा सेवकोंसहित उन महात्मा नरेशोंके लिये अन्न-पान एवं वस्त्र आदिकी भी व्यवस्था करायी ॥ २६½ ॥

> भरतः स तदा यातः शत्रुघ्नसहितस्तदा ॥ २७ ॥  
> वानराश्च महात्मानः सुग्रीवसहितास्तदा ।  
> विप्राणां प्रवराः सर्वे चक्रुश्च परिवेषणम् ॥ २८ ॥

तदनन्तर शत्रुघ्नसहित भरतने नैमिषारण्यको प्रस्थान किया । उस समय वहाँ सुग्रीवसहित महात्मा वानर जितने भी श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ उपस्थित थे, उन सबको रसोई परोसनेका काम करते थे ॥ २७-२८ ॥

> विभीषणश्च रक्षोभिः स्त्रीभिश्च बहुभिर्वृतः ।  
> ऋषीणामुग्रतपसां पूजां चक्रे महात्मनाम् ॥ २९ ॥

स्त्रियों तथा बहुत-से राक्षसोंके साथ विभीषण उग्र तपस्वी महात्मा मुनियोंके स्वागत-सत्कारका काम सँभालते थे ॥२९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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