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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 83"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 83

> स मुहूर्तादुपश्रुत्य देवर्षिरमितप्रभः ।  
> स्वमाश्रमं शिष्यवृतः क्षुधार्तः संन्यवर्तत ॥ १ ॥  
> सोऽपश्यदरजां दीनां रजसा समभिप्लुताम् ।  
> ज्योत्स्नामिव ग्रहग्रस्तां प्रत्यूषे न विराजतीम् ॥ २ ॥  
> तस्य रोषः समभवत् क्षुधार्तस्य विशेषतः ।  
> निर्दहन्निव लोकांस्त्रीञ्शिष्यांश्चेतदुवाच ह ॥ ३ ॥

दो घड़ी बाद किसी शिष्यके मुँहसे अरजाके ऊपर किये गये बलात्कारकी बात सुनकर अमित तेजस्वी देवर्षि शुक्र भूखसे पीड़ित हो शिष्योंसे घिरे हुए अपने आश्रमको लौट आये ॥ उन्होंने देखा, अरजा दुखी होकर रो रही है । उसके शरीरमें धूल लिपटी हुई है तथा वह प्रातःकाल राहुग्रस्त चन्द्रमाकी शोभाहीन चाँदनीके समान सुशोभित नहीं हो रही है ॥ यह देख विशेषतः भूखसे पीड़ित होनेके कारण देवर्षि शुक्रका रोष बढ़ गया और वे तीनों लोकोंको दग्ध-से करते हुए अपने शिष्योंसे इस प्रकार बोले—॥ ३ ॥

> पश्यध्वं विपरीतस्य दण्डस्याविदितात्मनः ।  
> विपत्तिं घोरसंकाशां क्रुद्धादग्निशिखामिव ॥ ४ ॥

‘देखो, शास्त्रविपरीत आचरण करनेवाले अज्ञानी राजा दण्डको कुपित हुए मेरी ओरसे अग्नि-शिखाके समान कैसी घोर विपत्ति प्राप्त होती है ॥ ४ ॥

> क्षयोऽस्य दुर्मतेः प्राप्तः सानुगस्य दुरात्मनः ।  
> यः प्रदीप्तां हुताशस्य शिखां वै स्प्रष्टुमर्हति ॥ ५ ॥

‘सेवकोंसहित इस दुर्बुद्धि एवं दुरात्मा राजाके विनाशका समय आ गया है, जो प्रज्वलित आगकी दहकती हुई ज्वाला-को गले लगाना चाहता है ॥ ५ ॥

> यस्मात् स कृतवान् पापमीदृशं घोरसंहितम् ।  
> तस्मात् प्राप्स्यति दुर्मेधाः फलं पापस्य कर्मणः ॥ ६ ॥

‘उस दुर्बुद्धिने जब ऐसा घोर पाप किया है, तब इसे उस पापकर्मका फल अवश्य प्राप्त होगा ॥ ६ ॥

> सप्तरात्रेण राजासौ सपुत्रबलवाहनः ।  
> पापकर्मसमाचारो वधं प्राप्स्यति दुर्मतिः ॥ ७ ॥

‘पापकर्मका आचरण करनेवाला वह दुर्बुद्धि नरेश सात रातके भीतर ही पुत्र, सेना और सवारियोंसहित नष्ट हो जायगा ॥ ७ ॥

> समन्ताद् योजनशतं विषयं चास्य दुर्मतेः ।  
> धक्ष्यते पांसुवर्षेण महता पाकशासनः ॥ ८ ॥

‘खोटे विचारवाले इस राजाके राज्यको जो सब ओरसे सौ योजन लंबा-चौड़ा है, देवराज इन्द्र भारी धूलकी वर्षा करके नष्ट कर देंगे ॥ ८ ॥

> सर्वसत्त्वानि यानीह स्थावराणि चराणि च ।  
> महता पांसुवर्षेण विलयं सर्वतोऽगमन् ॥ ९ ॥

‘यहाँ जो सब प्रकारके स्थावर-जङ्गम जीव निवास करते हैं, इस धूलकी भारी वर्षासे सब ओर विलीन हो जायँगे ॥९॥

> दण्डस्य विषयो यावत् तावत् सर्वं समुच्छ्रयम् ।  
> पांसुवर्षमिशालक्ष्यं सप्तरात्रं भविष्यति ॥ १० ॥

‘जहाँतक दण्डका राज्य है, वहाँतकके समस्त चराचर प्राणी सात राततक केवल धूलिकी वर्षा पाकर अदृश्य हो जायँगे’ ॥ १० ॥

> इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षस्तमाश्रमनिवासिनम् ।  
> जनं जनपदान्तेषु स्थीयतामिति चाब्रवीत् ॥ ११ ॥

ऐसा कहकर क्रोधसे लाल आँखें किये शुक्रने उस आश्रममें निवास करनेवाले लोगोंसे कहा—‘दण्डके राज्यकी सीमाके अन्तमें जो देश हैं, उनमें जाकर निवास करो’ ॥ ११ ॥

> श्रुत्वा तूशनसो वाक्यं सोऽऽश्रमावसथो जनः ।  
> निष्क्रान्तो विषयात् तस्मात् स्थानं चक्रेऽथ बाह्यतः ॥ १२ ॥

शुक्राचार्यकी यह बात सुनकर आश्रमवासी मनुष्य उस राज्यसे निकल गये और सीमासे बाहर जाकर निवास करने लगे ॥ १२ ॥

> स तथोक्त्वा मुनिजनमरजामिदमब्रवीत् ।  
> इहैव वस दुर्मेधे आश्रमे सुसमाहिता ॥ १३ ॥

आश्रमवासी मुनियोंसे ऐसी बात कहकर शुक्रने अरजासे कहा—‘खोटी बुद्धिवाली लड़की ! तू यहीं इस आश्रममें मनको परमात्माके ध्यानमें एकाग्र करके रह ॥ १३ ॥

> इदं योजनपर्यन्तं सरः सुरुचिरप्रभम् ।  
> अरजे विज्वरा भुङ्क्ष्व कालश्चात्र प्रतीक्ष्यताम् ॥ १४ ॥

‘अरजे ! यह जो एक योजन फैला हुआ सुन्दर तालाब है, इसका तू निश्चिन्त होकर उपभोग कर और अपने अपराधकी निवृत्तिके लिये यहाँ समयकी प्रतीक्षा करती रह ॥ १४ ॥

> त्वत्समीपे च ये सत्त्वा वासमेष्यन्ति तां निशाम् ।  
> अवध्याः पांसुवर्षेण ते भविष्यन्ति नित्यदा ॥ १५ ॥

‘जो जीव उन रात्रियोंमें तुम्हारे समीप रहेंगे, वे कभी भी धूलकी वर्षासे मारे नहीं जायँगे—सदा बने रहेंगे’ ॥ १५ ॥

> श्रुत्वा नियोगं ब्रह्मर्षेः सारजा भार्गवी तदा ।  
> तथेति पितरं प्राह भार्गवं भृशदुःखिता ॥ १६ ॥

ब्रह्मर्षिका यह आदेश सुनकर वह भृगुकन्या अरजा अत्यन्त दुःखित होनेपर भी अपने पिता भार्गवसे बोली— ‘बहुत अच्छा’ ॥ १६ ॥

> इत्युक्त्वा भार्गवो वासमन्यत्र समकारयत् ।  
> तच्च राज्यं नरेन्द्रस्य सभृत्यबलवाहनम् ॥ १७ ॥  
> सप्ताहाद् भस्मसाद् भूतं यथोक्तं ब्रह्मवादिना ।

ऐसा कहकर शुक्रने दूसरे राज्यमें जाकर निवास किया तथा उन ब्रह्मवादीके कथनानुसार राजा दण्डका वह राज्य सेवक, सेना और सवारियोंसहित सात दिनमें भस्म हो गया ॥१७॥

> तस्यासौ दण्डविषयो विन्ध्यशैवलयोर्नृप ॥ १८ ॥  
> शप्तो ब्रह्मर्षिणा तेन वैधर्म्ये सहिते कृते ।  
> ततः प्रभृति काकुत्स्थ दण्डकारण्यमुच्यते ॥ १९ ॥

नरेश्वर ! विन्ध्य और शैवलगिरिके मध्यभागमें दण्डका राज्य था । काकुत्स्थ ! धर्मयुग कृतयुगमें धर्मविरुद्ध आचरण करनेपर उन ब्रह्मर्षिने राजा और उनके देशको शाप दे दिया । तभीसे वह भूभाग दण्डकारण्य कहलाता है ॥ १८-१९ ॥

> तपस्विनः स्थिता ह्यत्र जनस्थानमतोऽभवत् ।  
> एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां पृच्छसि राघव ॥ २० ॥

इस स्थानपर तपस्वीलोग आकर बस गये; इसलिये इसका नाम जनस्थान हो गया । रघुनन्दन ! आपने जिसके विषयमें मुझसे पूछा था, यह सब मैंने कह सुनाया ॥ २० ॥

> संध्यामुपासितुं वीर समयो ह्यतिवर्तते ।  
> एते महर्षयः सर्वे पूर्णकुम्भाः समन्ततः ॥ २१ ॥  
> कृतोदका नरव्याघ्र आदित्यं पर्युपासते ।

वीर ! अब संध्योपासनाका समय बीता जा रहा है । पुरुषसिंह ! सब ओर ये सब महर्षि स्नान कर चुकनेके बाद भरे हुए घड़े लेकर सूर्यदेवकी उपासना कर रहे हैं ॥ २१½ ॥

> स तैर्ब्राह्मणमभ्यस्तं सहितैर्ब्रह्मवित्तमैः ।  
> रविरस्तंगतो राम गच्छोदकमुपस्पृश ॥ २२ ॥

श्रीराम ! वे सूर्य वहाँ एकत्र हुए उन उत्तम ब्रह्मवेत्ताओं-द्वारा पढ़े गये ब्राह्मणमन्त्रोंको सुनकर और उसी रूपमें पूजा पाकर अस्ताचलको चले गये । अब आप भी जायँ और आचमन एवं स्नान आदि करें ॥ २२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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