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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 82"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 82

> एतदाख्याय रामाय महर्षिः कुम्भसम्भवः ।  
> अस्यामेवापरं वाक्यं कथायामुपचक्रमे ॥ १ ॥

महर्षि कुम्भज श्रीरामसे इतनी कथा कहकर फिर इसीका अवशिष्ट अंश इस तरह कहने लगे—॥ १ ॥

> ततः स दण्डः काकुत्स्थ बहुवर्षगणायुतम् ।  
> अकरोत् तत्र दान्तात्मा राज्यं निहतकण्टकम् ॥ २ ॥

‘काकुत्स्थ ! तदनन्तर राजा दण्डने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर बहुत वर्षोंतक वहाँ अकण्टक राज्य किया ॥२॥

> अथ काले तु कस्मिंश्चिद्राजा भार्गवमाश्रमम् ।  
> रमणीयमुपाक्रामच्चैत्रे मासि मनोरमे ॥ ३ ॥

‘तत्पश्चात् किसी समय राजा मनोरम चैत्रमासमें शुक्राचार्यके रमणीय आश्रमपर आया ॥ ३ ॥

> तत्र भार्गवकन्यां स रूपेणाप्रतिमां भुवि ।  
> विचरन्तीं वनोद्देशे दण्डोऽपश्यदनुत्तमाम् ॥ ४ ॥

‘वहाँ शुक्राचार्यकी सर्वोत्तम सुन्दरी कन्या, जिसके रूपकी इस भूतलपर कहीं तुलना नहीं थी, वनप्रान्तमें विचर रही थी । दण्डने उसे देखा ॥ ४ ॥

> स दृष्ट्वा तां सुदुर्मेधा अनङ्गशरपीडितः ।  
> अभिगम्य सुसंविग्नां कन्यां वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥

‘उसे देखते ही वह अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला राजा कामदेवके बाणोंसे पीड़ित हो पास जाकर उस डरी हुई कन्यासे बोला—॥ ५ ॥

> कुतस्त्वमसि सुश्रोणि कस्य वासि सुता शुभे ।  
> पीडितोऽहमनङ्गेन पृच्छामि त्वां शुभानने ॥ ६ ॥

‘सुश्रोणि ! तुम कहाँसे आयी हो अथवा शुभे ! तुम किसकी पुत्री हो ? शुभानने ! मैं कामदेवसे पीड़ित हूँ; इसलिये तुम्हारा परिचय पूछता हूँ’ ॥ ६ ॥

> तस्य त्वेवं ब्रुवाणस्य मोहोन्मत्तस्य कामिनः ।  
> भार्गवी प्रत्युवाचेदं वचः सानुनयं त्विदम् ॥ ७ ॥

‘मोहसे उन्मत्त होकर वह कामी राजा जब इस प्रकार पूछने लगा, तब भृगुकन्याने विनयपूर्वक उसे इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ७ ॥

> भार्गवस्य सुतां विद्धि देवस्याक्लिष्टकर्मणः ।  
> अरजां नाम राजेन्द्र ज्येष्ठामाश्रमवासिनीम् ॥ ८ ॥

‘राजेन्द्र ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं पुण्यकर्मा शुक्रदेवताकी ज्येष्ठ पुत्री हूँ । मेरा नाम अरजा है । मैं इसी आश्रममें निवास करती हूँ ॥ ८ ॥

> मा मां स्पृश बलाद् राजन् कन्या पितृवशा ह्यहम् ।  
> गुरुः पिता मे राजेन्द्र त्वं च शिष्यो महात्मनः ॥ ९ ॥

‘राजन् ! बलपूर्वक मेरा स्पर्श न करो । मैं पिताके अधीन रहनेवाली कुमारी कन्या हूँ । राजेन्द्र ! मेरे पिता तुम्हारे गुरु हैं और तुम उन महात्माके शिष्य हो ॥ ९ ॥

> व्यसनं सुमहत् क्रुद्धः स ते दद्यान्महातपाः ।  
> यदि वान्यन्मया कार्यं धर्मदृष्टेन सत्पथा ॥ १० ॥  
> वरयस्व नरश्रेष्ठ पितरं मे महाद्युतिम् ।  
> अन्यथा तु फलं तुभ्यं भवेद् घोराभिसंहितम् ॥ ११ ॥

‘नरश्रेष्ठ ! वे महातपस्वी हैं । यदि कुपित हो जायँ तो तुम्हें बड़ी भारी विपत्तिमें डाल सकते हैं । यदि मुझसे तुम्हें दूसरा ही काम लेना हो ( अर्थात् यदि तुम मुझे अपनी भार्या बनाना चाहते हो ) तो धर्मशास्त्रोक्त सन्मार्गसे चलकर मेरे महातेजस्वी पितासे मुझको माँग लो । अन्यथा तुम्हें अपने स्वेच्छाचारका बड़ा भयानक फल भोगना पड़ेगा ॥ १०-११ ॥

> क्रोधेन हि पिता मेऽसौ त्रैलोक्यमपि निर्दहेत् ।  
> दास्यते चानवद्याङ्ग तव मा याचितः पिता ॥ १२ ॥

‘‘मेरे पिता अपनी क्रोधाग्निसे सारी त्रिलोकीको भी दग्ध कर सकते हैं; अतः सुन्दर अङ्गोंवाले नरेश ! तुम बलात्कार न करो । तुम्हारे याचना करनेपर पिताजी मुझे अवश्य तुम्हारे हाथमें सौंप देंगे’ ॥ १२ ॥

> एवं ब्रुवाणामरजां दण्डः कामवशं गतः ।  
> प्रत्युवाच मदोन्मत्तः शिरस्याधाय चाञ्जलिम् ॥ १३ ॥

‘जब अरजा ऐसी बातें कह रही थी, उस समय कामके अधीन हुए दण्डने मदोन्मत्त होकर दोनों हाथ सिरपर जोड़ लिये और इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १३ ॥

> प्रसादं कुरु सुश्रोणि न कालं क्षेप्तुमर्हसि ।  
> त्वत्कृते हि मम प्राणा विदीर्यन्ते वरानने ॥ १४ ॥

‘‘सुन्दरी ! कृपा करो । समय न बिताओ । वरानने ! तुम्हारे लिये मेरे प्राण निकले जा रहे हैं ॥ १४॥

> त्वां प्राप्य तु वधो वापि पापं वापि सुदारुणम् ।  
> भक्तं भजस्व मां भीरु भजमानं सुविह्वलम् ॥ १५ ॥

‘‘तुम्हें प्राप्त कर लेनेपर मेरा वध हो जाय अथवा मुझे अत्यन्त दारुण दुःख प्राप्त हो तो भी कोई चिन्ता नहीं है । भीरु ! मैं तुम्हारा भक्त हूँ । अत्यन्त व्याकुल हुए मुझ अपने सेवकको स्वीकार करो’ ॥ १५ ॥

> एवमुक्त्वा तु तां कन्यां दोर्भ्यां प्राप्य बलाद् बली ।  
> विस्फुरन्तीं यथाकामं मैथुनायोपचक्रमे ॥ १६ ॥

‘ऐसा कहकर उस बलवान् नरेशने उस भार्गव-कन्याको बलपूर्वक दोनों भुजाओंमें भर लिया । वह उसकी पकड़से छूटनेके लिये छटपटाने लगी तो भी उसने अपनी इच्छाके अनुसार उसके साथ समागम किया ॥ १६ ॥

> तमनर्थं महाघोरं दण्डः कृत्वा सुदारुणम् ।  
> नगरं प्रययावाशु मधुमन्तमनुत्तमम् ॥ १७ ॥

‘वह अत्यन्त दारुण एवं महाभयंकर अनर्थ करके दण्ड तुरंत ही अपने उत्तम नगर मधुमन्तको चला गया ॥ १७ ॥

> अरजापि रुदन्ती सा आश्रमस्याविदूरतः ।  
> प्रतीक्षते सुसंत्रस्ता पितरं देवसंनिभम् ॥ १८ ॥

‘अरजा भी भयभीत हो रोती हुई आश्रमके पास ही अपने देवतुल्य पिताके आनेकी राह देखने लगी’ ॥ १८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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