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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 74"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 74

> तं शयानं नरव्याघ्रं निद्रा नाभ्यागमत् तदा ।  
> चिन्तयानमनेकार्थं रामगीतमनुत्तमम् ॥ १ ॥

सोते समय पुरुषसिंह शत्रुघ्न उस उत्तम श्रीरामचरित्र-सम्बन्धी गानके विषयमें अनेक प्रकारकी बातें सोचते रहे । इसलिये रातमें उन्हें बहुत देरतक नींद नहीं आयी ॥ १ ॥

> तस्य शब्दं सुमधुरं तन्त्रीलयसमन्वितम् ।  
> श्रुत्वा रात्रिर्जगामाशु शत्रुघ्नस्य महात्मनः ॥ २ ॥  
> तस्यां रजन्यां व्युष्टायां कृत्वा पौर्वाह्णिकक्रमम् ।  
> उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं शत्रुघ्नो मुनिपुङ्गवम् ॥ ३ ॥

वीणाके लयके साथ उस रामचरित-गानका सुमधुर शब्द सुनकर महात्मा शत्रुघ्नकी शेष रात बहुत जल्दी बीत गयी ॥ जब वह रात बीती और प्रातःकाल आया, तब पूर्वाह्णकालोचित नित्यकर्म करके शत्रुघ्नने हाथ जोड़कर मुनिवर वाल्मीकिसे कहा—॥ ३ ॥

> भगवन् द्रष्टुमिच्छामि राघवं रघुनन्दनम् ।  
> त्वयानुज्ञातुमिच्छामि सहैभिः संशितव्रतैः ॥ ४ ॥

‘भगवन् ! अब मैं रघुकुलनन्दन श्रीरघुनाथजीका दर्शन करना चाहता हूँ । अतः यदि आपकी आज्ञा हो तो कठोर व्रतका पालन करनेवाले इन साथियोंके साथ मेरी अयोध्या जानेकी इच्छा है’ ॥ ४ ॥

> इत्येवंवादिनं तं तु शत्रुघ्नं शत्रुसूदनम् ।  
> वाल्मीकिः सम्परिष्वज्य विसमर्ज स राघवम् ॥ ५ ॥

इस तरहकी बात कहते हुए रघुकुलभूषण शत्रुसूदन शत्रुघ्नको वाल्मीकिजीने हृदयसे लगा लिया और जानेकी आज्ञा दे दी ॥ ५ ॥

> सोऽभिवाद्य मुनिश्रेष्ठं रथमारुह्य सुप्रभम् ।  
> अयोध्यामगमत् तूर्णं राघवोत्सुकदर्शनः ॥ ६ ॥

शत्रुघ्न श्रीरघुनाथजीके दर्शनके लिये उत्कण्ठित थे, इसलिये मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिको प्रणाम करके वे एक सुन्दर दीप्तिमान् रथपर आरूढ़ हो तुरंत अयोध्याकी ओर चल दिये ॥ ६ ॥

> स प्रविष्टः पुरीं रम्यां श्रीमानिक्ष्वाकुनन्दनः ।  
> प्रविवेश महाबाहुर्यत्र रामो महाद्युतिः ॥ ७ ॥

इक्ष्वाकुकुलको आनन्दित करनेवाले महाबाहु श्रीमान् शत्रुघ्न रमणीय अयोध्यापुरीमें प्रवेश करके सीधे उस राजमहलमें गये, जहाँ महातेजस्वी श्रीराम विराजमान थे ॥ ७ ॥

> स रामं मन्त्रिमध्यस्थं पूर्णचन्द्रनिभाननम् ।  
> पश्यन्नमरमध्यस्थं सहस्रनयनं यथा ॥ ८ ॥  
> सोऽभिवाद्य महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा ।  
> उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा रामं सत्यपराक्रमम् ॥ ९ ॥

जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र देवताओंके बीचमें बैठते हैं, उसी प्रकार पूर्णचन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले भगवान् श्रीराम मन्त्रियोंके मध्यभागमें विराजमान थे । शत्रुघ्नने अपने तेजसे प्रज्वलित होनेवाले सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीरामको देखा, प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा—॥ ८-९ ॥

> यदाज्ञप्तं महाराज सर्वं तत् कृतवानहम् ।  
> हतः स लवणः पापः पुरी चास्य निवेशिता ॥ १० ॥

‘महाराज ! आपने मुझे जिस कामके लिये आज्ञा दी थी, वह सब मैं कर आया हूँ । पापी लवण मारा गया और उसकी पुरी भी बस गयी ॥ १० ॥

> द्वादशैतानि वर्षाणि त्वां विना रघुनन्दन ।  
> नोत्सहेयमहं वस्तुं त्वया विरहितो नृप ॥ ११ ॥

‘रघुनन्दन ! आपका दर्शन किये बिना ये बारह वर्ष तो किसी प्रकार बीत गये; किंतु नरेश्वर ! अब और अधिक कालतक आपसे दूर रहनेका मुझमें साहस नहीं है ॥ ११ ॥

> स मे प्रसादं काकुत्स्थ कुरुष्वामितविक्रम ।  
> मातृहीनो यथा वत्सो न चिरं प्रवसाम्यहम् ॥ १२ ॥

‘अमित पराक्रमी काकुत्स्थ ! जैसे छोटा बच्चा अपनी माँसे अलग नहीं रह सकता, उसी प्रकार मैं चिरकालतक आपसे दूर नहीं रह सकूँगा । इसलिये आप मुझपर कृपा करें’ ॥ १२ ॥

> एवं ब्रुवाणं शत्रुघ्नं परिष्वज्येदमब्रवीत् ।  
> मा विषादं कृथाः शूर नैतत् क्षत्रियचेष्टितम् ॥ १३ ॥

ऐसी बातें कहते हुए शत्रुघ्नको हृदयसे लगाकर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—‘शूरवीर ! विषाद न करो । इस तरह कातर होना क्षत्रियोचित चेष्टा नहीं है ॥ १३ ॥

> नावसीदन्ति राजानो विप्रवासेषु राघव ।  
> प्रजा च परिपाल्या हि क्षात्रधर्मेण राघव ॥ १४ ॥

‘रघुकुलभूषण ! राजालोग परदेशमें रहनेपर भी दुखी नहीं होते हैं । रघुवीर ! राजाको क्षत्रिय-धर्मके अनुसार प्रजाका भलीभाँति पालन करना चाहिये ॥ १४ ॥

> काले काले तु मां वीर अयोध्यामवलोकितुम् ।  
> आगच्छ त्वं नरश्रेष्ठ गन्तासि च पुरं तव ॥ १५ ॥

‘नरश्रेष्ठ वीर ! समय-समयपर मुझसे मिलनेके लिये अयोध्या आया करो और फिर अपनी पुरीको लौट जाया करो ॥ १५ ॥

> ममापि त्वं सुहृदयितः प्राणैरपि न संशयः ।  
> अवश्यं करणीयं च राज्यस्य परिपालनम् ॥ १६ ॥

‘निःसंदेह तुम मुझे भी प्राणोंसे बढ़कर प्रिय हो । परंतु राज्यका पालन करना भी तो आवश्यक कर्तव्य है ॥ १६ ॥

> तस्मात् त्वं वस काकुत्स्थ सप्तरात्रं मया सह ।  
> ऊर्ध्वं गन्तासि मधुरां सभृत्यबलवाहनः ॥ १७ ॥

‘अतः काकुत्स्थ ! अभी सात दिन तो तुम मेरे साथ रहो । उसके बाद सेवक, सेना और सवारियोंके साथ मधुरापुरीको चले जाना’ ॥ १७ ॥

> रामस्यैतद् वचः श्रुत्वा धर्मयुक्तं मनोऽनुगम् ।  
> शत्रुघ्नो दीनया वाचा बाढमित्येव चाब्रवीत् ॥ १८ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात धर्मयुक्त होनेके साथ ही मनके अनुकूल थी । इसे सुनकर शत्रुघ्नने श्रीरामवियोगके भयसे दीन वाणीद्वारा कहा—‘जैसी प्रभुकी आज्ञा’ ॥ १८ ॥

> सप्तरात्रं च काकुत्स्थो राघवस्य यथाज्ञया ।  
> उष्य तत्र महेष्वासो गमनायोपचक्रमे ॥ १९ ॥

श्रीरघुनाथजीकी आज्ञासे सात दिन अयोध्यामें ठहरकर महाधनुर्धर ककुत्स्थकुलभूषण शत्रुघ्न वहाँसे जानेको तैयार हो गये ॥ १९ ॥

> आमन्त्र्य तु महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।  
> भरतं लक्ष्मणं चैव महारथमुपारुहत् ॥ २० ॥

सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम, भरत और लक्ष्मणसे विदा ले शत्रुघ्न एक विशाल रथपर आरूढ़ हुए ॥ २० ॥

> दूरं पद्भ्यामनुगतो लक्ष्मणेन महात्मना ।  
> भरतेन च शत्रुघ्नो जगामाशु पुरीं तदा ॥ २१ ॥

महात्मा लक्ष्मण और भरत पैदल ही उन्हें पहुँचानेके लिये बहुत दूरतक पीछे-पीछे गये । तत्पश्चात् शत्रुघ्न रथके द्वारा शीघ्र ही अपनी राजधानीकी ओर चल दिये ॥ २१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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