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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 72"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 72

> हते तु लवणे देवाः सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः।  
> ऊचुः सुमधुरां वाणीं शत्रुघ्नं शत्रुतापनम् ॥ १ ॥

लवणासुरके मारे जानेपर इन्द्र और अग्नि आदि देवता आकर शत्रुओंको संताप देनेवाले शत्रुघ्नसे अत्यन्त मधुर बाणीमें बोले—॥ १ ॥

> दिष्ट्या ते विजयो वत्स दिष्ट्या लवणराक्षसः।  
> हतः पुरुषशार्दूल वरं वरय सुव्रत ॥ २ ॥

‘वत्स ! सौभाग्यकी बात है कि तुम्हें विजय प्राप्त हुई और लवणासुर मारा गया । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुरुषसिंह ! तुम वर माँगो ॥ २ ॥

> वरदास्तु महाबाहो सर्व एव समागताः।  
> विजयाकाङ्क्षिणस्तुभ्यममोघं दर्शनं हि नः ॥ ३ ॥

‘महाबाहो ! हम सब लोग तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आये हैं । हम तुम्हारी विजय चाहते थे । हमारा दर्शन अमोघ है ( अतएव तुम कोई वर माँगो )’ ॥ ३ ॥

> देवानां भाषितं श्रुत्वा शूरो मूर्ध्नि कृताञ्जलिः।  
> प्रत्युवाच महाबाहुः शत्रुघ्नः प्रयतात्मवान् ॥ ४ ॥

देवताओंका यह वचन सुनकर मनको वशमें रखनेवाले शूरवीर महाबाहु शत्रुघ्न मस्तकपर अञ्जलि बाँध इस प्रकार बोले—॥ ४ ॥

> इयं मधुपुरी रम्या मधुरा देवनिर्मिता।  
> निवेशं प्राप्नुयाच्छीघ्रमेष मेऽस्तु वरः परः ॥ ५ ॥

‘देवताओ ! यह देवनिर्मित रमणीय मधुपुरी शीघ्र ही मनोहर राजधानीके रूपमें बस जाय । यही मेरे लिये श्रेष्ठ वर है’ ॥ ५ ॥

> तं देवाः प्रीतमनसो बाढमित्येव राघवम् ।  
> भविष्यति पुरी रम्या शूरसेना न संशयः ॥ ६ ॥

तब देवताओंने उन रघुकुलनन्दन शत्रुघ्नसे प्रसन्न होकर कहा—‘बहुत अच्छा ऐसा ही हो । यह रमणीय पुरी निःसंदेह शूर-वीरोंकी सेनासे सम्पन्न हो जायगी’ ॥ ६ ॥

> ते तथोक्त्वा महात्मानो दिवमारुरुहुस्तदा ।  
> शत्रुघ्नोऽपि महातेजास्तां सेनां समुपानयत् ॥ ७ ॥

ऐसा कहकर महामनस्वी देवता उस समय स्वर्गको चले गये । महातेजस्वी शत्रुघ्नने भी गङ्गातटसे अपनी उस सेनाको बुलवाया ॥ ७ ॥

> सा सेना शीघ्रमागच्छच्छ्रुत्वा शत्रुघ्नशासनम् ।  
> निवेशनं च शत्रुघ्नः श्रावणेन समारभत् ॥ ८ ॥  
> स पुरा दिव्यसंकाशो वर्षे द्वादशमे शुभे ।  
> निविष्टः शूरसेनानां विषयश्चाकुतोभयः ॥ ९ ॥

शत्रुघ्नजीका आदेश पाकर वह सेना शीघ्र चली आयी । शत्रुघ्नने श्रावणमाससे उस पुरीको बसाना आरम्भ किया ॥ तबसे बारहवें वर्षतक वह पुरी तथा वह शूरसेन जनपद पूर्णरूपसे बस गया । वहाँ कहीं किसीसे भय नहीं था । वह देश दिव्य सुख-सुविधाओंसे सम्पन्न था ॥ ९ ॥

> क्षेत्राणि सस्ययुक्तानि काले वर्षति वासवः ।  
> अरोगवीरपुरुषा शत्रुघ्नभुजपालिता ॥ १० ॥

वहाँके खेत खेतीसे हरे-भरे हो गये । इन्द्र वहाँ समयपर वर्षा करने लगे । शत्रुघ्नजीके बाहुबलसे सुरक्षित मधुपुरी नीरोग तथा वीर पुरुषोंसे भरी थी ॥ १० ॥

> अर्धचन्द्रप्रतीकाशा यमुनातीरशोभिता ।  
> शोभिता गृहमुख्यैश्च चत्वरापणवीथिकैः ।  
> चातुर्वर्ण्यसमायुक्ता नानावाणिज्यशोभिता ॥ ११ ॥  
> यच्च तेन पुरा शुभ्रं लवणेन कृतं महत् ।  
> तच्छोभयति शत्रुघ्नो नानावर्णोपशोभिताम् ॥ १२ ॥

वह पुरी यमुनाके तटपर अर्धचन्द्राकार बसी थी और अनेकानेक सुन्दर गृहों, चौराहों, बाजारों तथा गलियोंसे सुशोभित होती थी । उसमें चारों वर्णोंके लोग निवास करते थे तथा नाना प्रकारके वाणिज्य-व्यवसाय उसकी शोभा बढ़ाते थे॥ पूर्वकालमें लवणासुरने जिन विशाल गृहोंका निर्माण कराया था, उनमें सफेदी कराकर उन्हें नाना प्रकारके चित्रोंसे सुसज्जित करके शत्रुघ्नजी उनकी शोभा बढ़ाने लगे ॥ १२ ॥

> आरामैश्च विहारैश्च शोभमानां समन्ततः ।  
> शोभितां शोभनीयैश्च तथान्यैर्दैवमानुषैः ॥ १३ ॥

अनेकानेक उद्यान और विहारस्थल सब ओरसे उस पुरीको सुशोभित करते थे । देवताओं और मनुष्योंसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य शोभनीय पदार्थ भी उस नगरीकी शोभावृद्धि करते थे ॥ १३ ॥

> तां पुरीं दिव्यसंकाशां नानापण्योपशोभिताम् ।  
> नानादेशागतैश्चापि वणिग्भिरुपशोभिताम् ॥ १४ ॥

नाना प्रकारकी क्रय-विक्रय योग्य वस्तुओंसे सुशोभित वह दिव्य पुरी अनेकानेक देशोंसे आये हुए वणिग्जनोंसे शोभा पा रही थी ॥ १४ ॥

> तां समृद्धां समृद्धार्थः शत्रुघ्नो भरतानुजः ।  
> निरीक्ष्य परमप्रीतः परं हर्षमुपागमत् ॥ १५ ॥

उसे पूर्णतः समृद्धिशालिनी देख सफलमनोरथ हुए भरतानुज शत्रुघ्न अत्यन्त प्रसन्न हो बड़े हर्षका अनुभव करने लगे ॥ १५ ॥

> तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना निवेश्य मधुरां पुरीम् ।  
> रामपादौ निरीक्षेऽहं वर्षे द्वादश आगते ॥ १६ ॥

मधुरापुरीको बसाकर उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि अयोध्यासे आये बारहवाँ वर्ष हो गया, अब मुझे वहाँ चलकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दोंका दर्शन करना चाहिये ॥ १६ ॥

> ततः स ताममरपुरोपमां पुरीं  
> निवेश्य वै विविधजनाभिसंवृताम् ।  
> नराधिपो रघुपतिपाददर्शने  
> दधे मतिं रघुकुलवंशवर्धनः ॥ १७ ॥

इस प्रकार नाना प्रकारके मनुष्योंसे भरी हुई उस देवपुरीके समान मनोहर मधुरापुरीको बसाकर रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले राजा शत्रुघ्नने श्रीरघुनाथजीके चरणोंके दर्शनका विचार किया ॥ १७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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