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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 71"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 71

> तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्य शत्रुघ्नस्य महात्मनः ।  
> क्रोधमाहारयत् तीव्रं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ १ ॥

महात्मा शत्रुघ्नका वह भाषण सुनकर लवणासुरको बड़ा क्रोध हुआ और बोला—‘अरे ! खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ १ ॥

> पाणौ पाणिं स निष्पिष्य दन्तान् कटकटाय्य च ।  
> लवणो रघुशार्दूलमाह्वयामास चासकृत् ॥ २ ॥

वह हाथ-पर-हाथ रगड़ता और दाँत कटकटाता हुआ रघुकुलके सिंह शत्रुघ्नको बारंबार ललकारने लगा ॥ २ ॥

> तं ब्रुवाणं तथा वाक्यं लवणं घोरदर्शनम् ।  
> शत्रुघ्नो देवशत्रुघ्न इदं वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥

भयंकर दिखायी देनेवाले लवणको इस प्रकार बोलते देख देवशत्रुओंका नाश करनेवाले शत्रुघ्नने यह बात कही—॥३॥

> शत्रुघ्नो न तदा जातो यदान्ये निर्जितास्त्वया ।  
> तदद्य बाणाभिहतो व्रज त्वं यमसादनम् ॥ ४ ॥

‘राक्षस ! जब तूने दूसरे वीरोंको पराजित किया था, उस समय शत्रुघ्नका जन्म नहीं हुआ था । अतः आज मेरे इन बाणोंकी चोट खाकर तू सीधे यमलोककी राह ले ॥ ४ ॥

> ऋषयोऽप्यद्य पापात्मन् मया त्वां निहतं रणे ।  
> पश्यन्तु विप्रा विद्वांसस्त्रिदशा इव रावणम् ॥ ५ ॥  
> त्वयि मद्बाणनिर्दग्धे पतितेऽद्य निशाचर ।  
> पुरे जनपदे चापि क्षेममेव भविष्यति ॥ ६ ॥

‘पापात्मन् ! जैसे देवताओंने रावणको धराशायी हुआ देखा था, उसी तरह विद्वान् ब्राह्मण और ऋषि आज रणभूमिमें मेरेद्वारा मारे गये तुझ दुराचारी राक्षसको भी देखें ॥ ‘निशाचर ! आज मेरे बाणोंसे दग्ध होकर जब तू धरतीपर गिर जायगा, उस समय इस नगर और जनपदमें भी सबका कल्याण ही होगा ॥ ६ ॥

> अद्य मद्बाहुनिष्क्रान्तः शरो वज्रनिभाननः ।  
> प्रवेक्ष्यते ते हृदयं पद्ममंशुरिवार्कजः ॥ ७ ॥

‘आज मेरी भुजाओंसे छूटा हुआ वज्रके समान मुख-वाला बाण उसी तरह तेरी छातीमें धँस जायगा, जैसे सूर्यकी किरण कमलकोशमें प्रविष्ट हो जाती है’ ॥ ७ ॥

> एवमुक्तो महावृक्षं लवणः क्रोधमूर्च्छितः ।  
> शत्रुघ्नोरसि चिक्षेप स च तं शतधाच्छिनत् ॥ ८ ॥

शत्रुघ्नके ऐसा कहनेपर लवण क्रोधसे मूर्छित-सा हो गया और एक महान् वृक्ष लेकर उसने शत्रुघ्नकी छातीपर दे मारा; परंतु शत्रुघ्नने उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये ॥ ८ ॥

> तद् दृष्ट्वा विफलं कर्म राक्षसः पुनरेव तु।  
> पादपान् सुबहून् गृह्य शत्रुघ्नायासृजद् बली ॥ ९ ॥

वह वार खाली गया देख उस बलवान् राक्षसने पुनः बहुत-से वृक्ष ले-लेकर शत्रुघ्नपर चलाये ॥ ९ ॥

> शत्रुघ्नश्चापि तेजस्वी वृक्षानापततो बहून्।  
> त्रिभिश्चतुर्भिरेकैकं चिच्छेद नतपर्वभिः ॥ १० ॥

परंतु शत्रुघ्न भी बड़े तेजस्वी थे । उन्होंने अपने ऊपर आते हुए उन बहुसंख्यक वृक्षोंमेंसे प्रत्येकको झुकी हुई गाँठवाले तीन-तीन या चार-चार बाण मारकर काट डाला ॥१०॥

> ततो बाणमयं वर्षं व्यसृजद् राक्षसोपरि।  
> शत्रुघ्नो वीर्यसम्पन्नो विव्यथे न स राक्षसः ॥ ११ ॥  
> ततः प्रहस्य लवणो वृक्षमुद्यम्य वीर्यवान्।  
> शिरस्यभ्यहनच्छूरं स्रस्ताङ्गः स मुमोह वै ॥ १२ ॥

फिर पराक्रमी शत्रुघ्नने उस राक्षसपर बाणोंकी झड़ी लगा दी, किंतु वह निशाचर इससे व्यथित या विचलित नहीं हुआ॥ तब बल-विक्रमशाली लवणने हँसकर एक वृक्ष उठाया और उसे शूरवीर शत्रुघ्नके सिरपर दे मारा । उसकी चोट खाकर शत्रुघ्नके सारे अङ्ग शिथिल हो गये और उन्हें मूर्छा आ गयी ॥ १२ ॥

> तस्मिन् निपतिते वीरे हाहाकारो महानभूत्।  
> ऋषीणां देवसंघानां गन्धर्वाप्सरसां तथा ॥ १३ ॥

वीर शत्रुघ्नके गिरते ही ऋषियों, देवसमूहों, गन्धर्वों और अप्सराओंमें महान् हाहाकार मच गया ॥ १३ ॥

> तमवज्ञाय तु हतं शत्रुघ्नं भुवि पातितम्।  
> रक्षो लब्धान्तरमपि न विवेश स्वमालयम् ॥ १४ ॥  
> नापि शूलं प्रजग्राह तं दृष्ट्वा भुवि पातितम्।  
> ततो हत इति ज्ञात्वा तान् भक्षान् समुदावहत् ॥ १५ ॥

शत्रुघ्नजीको भूमिपर गिरा देख लवणने समझा ये मर गये, इसलिये अवसर मिलनेपर भी वह राक्षस अपने घरमें नहीं गया और न शूल ही ले आया । उन्हें धराशायी हुआ देख सर्वथा मरा हुआ समझकर ही वह अपनी उस भोजनसामग्री-को एकत्र करने लगा ॥ १४-१५ ॥

> मुहूर्ताल्लब्धसंज्ञस्तु पुनस्तस्थौ धृतायुधः।  
> शत्रुघ्नो वै पुरद्वारि ऋषिभिः सम्प्रपूजितः ॥ १६ ॥

दो ही घड़ीमें शत्रुघ्नको होश आ गया । वे अस्त्र-शस्त्र लेकर उठे और फिर नगरद्वारपर खड़े हो गये । उस समय ऋषियोंने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १६ ॥

> ततो दिव्यममोघं तं जग्राह शरमुत्तमम्।  
> ज्वलन्तं तेजसा घोरं पूरयन्तं दिशो दश ॥ १७ ॥

तदनन्तर शत्रुघ्नने उस दिव्य, अमोघ और उत्तम बाणको हाथमें लिया, जो अपने घोर तेजसे प्रज्वलित हो दसों दिशाओंमें व्याप्त-सा हो रहा था ॥ १७ ॥

> वज्राननं वज्रवेगं मेरुमन्दरसंनिभम्।  
> नतं पर्वसु सर्वेषु संयुगेष्वपराजितम् ॥ १८ ॥

उसका मुख और वेग वज्रके समान था । वह मेरु और मन्दराचलके समान भारी था । उसकी गाँठें झुकी हुई थीं तथा वह किसी भी युद्धमें पराजित होनेवाला नहीं था ॥१८॥

> असृक्चन्दनदिग्धाङ्गं चारुपत्रं पतत्त्रिणम्।  
> दानवेन्द्राचलेन्द्राणामसुराणां च दारुणम् ॥ १९ ॥

उसका सारा अङ्ग रक्तरूपी चन्दनसे चर्चित था । पंख बड़े सुन्दर थे। वह बाण दानवराजरूपी पर्वतराजों एवं असुरोंके लिये बड़ा भयंकर था ॥ १९ ॥

> तं दीप्तमिव कालाग्निं युगान्ते समुपस्थिते।  
> दृष्ट्वा सर्वाणि भूतानि परित्रासमुपागमन् ॥ २० ॥

वह प्रलयकाल उपस्थित होनेपर प्रज्वलित हुई कालाग्निके समान उद्दीप्त हो रहा था । उसे देखकर समस्त प्राणी त्रस्त हो गये ॥ २० ॥

> सदेवासुरगन्धर्वं मुनिभिः साप्सरोगणम्।  
> जगद्धि सर्वमस्वस्थं पितामहमुपस्थितम् ॥ २१ ॥

देवता, असुर, गन्धर्व, मुनि और अप्सराओंके साथ सारा जगत् अस्वस्थ हो ब्रह्माजीके पास पहुँचा ॥ २१ ॥

> उवाच देवदेवेशं वरदं प्रपितामहम्।  
> देवानां भयसम्मोहो लोकानां संक्षयं प्रति ॥ २२ ॥  
> कच्चिल्लोकक्षयो देव सम्प्राप्तो वा युगक्षयः।  
> नेदृशं दृष्टपूर्वं च न श्रुतं प्रपितामह ॥ २३ ॥

जगत्के उन सभी प्राणियोंने वर देनेवाले देवदेवेश्वर प्रपितामह ब्रह्माजीसे कहा—‘भगवन् ! समस्त लोकोंके संहारकी सम्भावनासे देवताओंपर भी भय और मोह छा गया है ॥ ‘देव ! कहीं लोकोंका संहार तो नहीं होगा अथवा प्रलयकाल तो नहीं आ पहुँचा है ? प्रपितामह ! संसारकी ऐसी अवस्था न तो पहले कभी देखी गयी थी और न सुननेमें ही आयी थी’ ॥ २३ ॥

> तेषां तद् वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा लोकपितामहः।  
> भयकारणमयाचष्ट देवानामभयंकरः ॥ २४ ॥  
> उवाच मधुरां वाणीं शृणुध्वं सर्वदेवताः।  
> वधाय लवणस्याजौ शरः शत्रुघ्नधारितः ॥ २५ ॥  
> तेजसा तस्य सम्मूढाः सर्वे स्मः सुरसत्तमाः।

उनकी यह बात सुनकर देवताओंका भय दूर करनेवाले लोकपितामह ब्रह्मानें प्रस्तुत भयका कारण बताते हुए कहा ॥ वे मधुर वाणीमें बोले—‘सम्पूर्ण देवताओ ! मेरी बात सुनो । आज शत्रुघ्नने युद्धस्थलमें लवणासुरका वध करनेके लिये जो बाण हाथमें लिया है, उसीके तेजसे हम सब लोग मोहित हो रहे हैं । ये श्रेष्ठ देवता भी उसीसे घबराये हुए हैं ॥ २५½ ॥

> एष पूर्वस्य देवस्य लोककर्तुः सनातनः ॥ २६ ॥  
> शरस्तेजोमयो वत्सा येन वै भयमागतम् ।

‘पुत्रो ! यह तेजोमय सनातन बाण आदिपुरुष लोककर्ता भगवान् विष्णुका है। जिससे तुम्हें भय प्राप्त हुआ है ॥ २६½ ॥

> एष वै कैटभस्यार्थे मधुनश्च महाशरः ॥ २७ ॥  
> सृष्टो महात्मना तेन वधार्थे दैत्ययोस्तयोः ।

‘परमात्मा श्रीहरिने मधु और कैटभ—इन दोनों दैत्योंका वध करनेके लिये इस महान् बाणकी सृष्टि की थी ॥ २७½ ॥

> एक एव प्रजानाति विष्णुस्तेजोमयं शरम् ॥ २८ ॥  
> एषा एव तनुः पूर्वा विष्णोस्तस्य महात्मनः ।

‘एकमात्र भगवान् विष्णु ही इस तेजोमय बाणको जानते हैं; क्योंकि यह बाण साक्षात् परमात्मा विष्णुकी ही प्राचीन मूर्ति है ॥ २८½ ॥

> इतो गच्छत पश्यध्वं वध्यमानं महात्मना ॥ २९ ॥  
> रामानुजेन वीरेण लवणं राक्षसोत्तमम् ।

‘अब तुमलोग यहाँसे जाओ और श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई महामनस्वी वीर शत्रुघ्नके हाथसे राक्षसप्रवर लवणासुरका वध होता देखो’ ॥ २९½ ॥

> तस्य ते देवदेवस्य निशम्य वचनं सुराः ॥ ३० ॥  
> आजग्मुर्यत्र युध्येते शत्रुघ्नलवणावुभौ ।

देवाधिदेव ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर देवतालोग उस स्थानपर आये, जहाँ शत्रुघ्नजी और लवणासुर दोनोंका युद्ध हो रहा था ॥ ३०½ ॥

> तं शरं दिव्यसंकाशं शत्रुघ्नकरधारितम् ॥ ३१ ॥  
> ददृशुः सर्वभूतानि युगान्ताग्निमिवोत्थितम् ।

शत्रुघ्नजीके द्वारा हाथमें लिये गये उस दिव्य बाणको सभी प्राणियोंने देखा। वह प्रलयकालके अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था ॥ ३१½ ॥

> आकाशमावृतं दृष्ट्वा देवैर्हि रघुनन्दनः ॥ ३२ ॥  
> सिंहनादं भृशं कृत्वा ददर्श लवणं पुनः ।

आकाशको देवताओंसे भरा हुआ देख रघुकुलनन्दन शत्रुघ्नने बड़े जोरसे सिंहनाद करके लवणासुरकी ओर देखा ॥ ३२½ ॥

> आहूतश्च पुनस्तेन शत्रुघ्नेन महात्मना ॥ ३३ ॥  
> लवणः क्रोधसंयुक्तो युद्धाय समुपस्थितः ।

महात्मा शत्रुघ्नके पुनः ललकारनेपर लवणासुर क्रोधसे भर गया और फिर युद्धके लिये उनके सामने आया ॥ ३३½ ॥

> आकर्णात् स विकृष्याथ तद् धनुर्धन्विनां वरः ॥ ३४ ॥  
> स मुमोच महाबाणं लवणस्य महोरसि ।

तब धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ शत्रुघ्नजीने अपने धनुषको कानतक खींचकर उस महाबाणको लवणासुरके विशाल वक्षःस्थलपर चलाया ॥ ३४½ ॥

> उरस्तस्य विदार्याशु प्रविवेश रसातलम् ॥ ३५ ॥  
> गत्वा रसातलं दिव्यः शरो विबुधपूजितः ।  
> पुनरेवागमत् तूर्णमिक्ष्वाकुकुलनन्दनम् ॥ ३६ ॥

वह देवपूजित दिव्य बाण तुरंत ही उस राक्षसके हृदयको विदीर्ण करके रसातलमें घुस गया तथा रसातलमें जाकर वह फिर तत्काल ही इक्ष्वाकुकुलनन्दन शत्रुघ्नजीके पास आ गया ॥ ३५-३६ ॥

> शत्रुघ्नशरनिर्भिन्नो लवणः स निशाचरः ।  
> पपात सहसा भूमौ वज्राहत इवाचलः ॥ ३७ ॥

शत्रुघ्नजीके बाणसे विदीर्ण होकर निशाचर लवण वज्रके मारे हुए पर्वतके समान सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३७ ॥

> तच्च शूलं महद् दिव्यं हते लवणराक्षसे ।  
> पश्यतां सर्वदेवानां रुद्रस्य वशमन्वगात् ॥ ३८ ॥

लवणासुरके मारे जाते ही वह दिव्य एवं महान् शूल सब देवताओंके देखते-देखते भगवान् रुद्रके पास आ गया ॥३८॥

> एकेषुपातेन भयं निपात्य  
> लोकत्रयस्यास्य रघुप्रवीरः ।  
> विनिर्भिभावुत्तमचापबाण-  
> स्तमः प्रणुदेव सहस्ररश्मिः ॥ ३९ ॥

इस प्रकार उत्तम धनुष-बाण धारण करनेवाले रघुकुलके प्रमुख वीर शत्रुघ्न एक ही बाणके प्रहारसे तीनों लोकोंके भयको नष्ट करके उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे त्रिभुवनका अन्धकार दूर करके सहस्र किरणधारी सूर्यदेव प्रकाशित हो उठते हैं ॥ ३९ ॥

> ततो हि देवा ऋषिपन्नगाश्च  
> प्रपूजिरे ह्यप्सरसश्च सर्वाः ।  
> दिष्ट्या जयो दाशरथेरवाप्त-  
> स्त्यक्त्वा भयं सर्प इव प्रशान्तः ॥ ४० ॥

‘सौभाग्यकी बात है कि दशरथनन्दन शत्रुघ्नने भय छोड़कर विजय प्राप्त की और सर्पके समान लवणासुर मर गया’ ऐसा कहकर देवता, ऋषि, नाग और समस्त अप्सराएँ उस समय शत्रुघ्नजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगीं ॥ ४० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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