---
title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 70"
canonical: "https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana/uttara-kanda/sarga-70"
lang: "hi"
---

# उत्तरकाण्ड, Sarga 70

> कथां कथयतां तेषां जयं चाकाङ्क्षतां शुभम् ।  
> ब्यतीता रजनी शीघ्रं शत्रुघ्नस्य महात्मनः ॥ १ ॥

इस प्रकार कथा कहते और शुभ विजयकी आकाङ्क्षा रखते हुए उन मुनियोंकी बातें सुनते-सुनते महात्मा शत्रुघ्नकी वह रात बात-की-बातमें बीत गयी ॥ १ ॥

> ततः प्रभाते विमले तस्मिन् काले स राक्षसः ।  
> निर्गतस्तु पुराद् वीरो भक्ष्याहारप्रचोदितः ॥ २ ॥

तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल होनेपर भक्ष्य पदार्थ एवं भोजनके संग्रहकी इच्छासे प्रेरित हो वह वीर राक्षस अपने नगरसे बाहर निकला ॥ २ ॥

> एतस्मिन्नन्तरे वीरः शत्रुघ्नो यमुनां नदीम् ।  
> तीर्त्वा मधुपुरद्वारि धनुष्पाणिरतिष्ठत ॥ ३ ॥

इसी बीचमें वीर शत्रुघ्न यमुना नदीको पार करके हाथमें धनुष लिये मधुपुरीके द्वारपर खड़े हो गये ॥ ३ ॥

> ततोऽर्धदिवसे प्राप्ते क्रूरकर्मा स राक्षसः ।  
> आगच्छद् बहुसाहस्रं प्राणिनां भारमुद्वहन् ॥ ४ ॥

तत्पश्चात् मध्याह्न होनेपर वह क्रूरकर्मा राक्षस हजारों प्राणियोंका बोझा लिये वहाँ आया ॥ ४ ॥

> ततो ददर्श शत्रुघ्नं स्थितं द्वारि धृतायुधम् ।  
> तमुवाच ततो रक्षः किमनेन करिष्यसि ॥ ५ ॥  
> ईदृशानां सहस्राणि सायुधानां नराधम ।  
> भक्षितानि मया रोषात् कालेनानुगतो ह्यसि ॥ ६ ॥

उस समय उसने शत्रुघ्नको अस्त्र-शस्त्र लिये द्वारपर खड़ा देखा । देखकर वह राक्षस उनसे बोला—‘नराधम ! इस हथियारसे तू मेरा क्या कर लेगा । तेरे-जैसे हजारों अस्त्र-शस्त्रधारी मनुष्योंको मैं रोषपूर्वक खा चुका हूँ । जान पड़ता है काल तेरे सिरपर नाच रहा है ॥ ५-६ ॥

> आहारश्चाप्यसम्पूर्णो ममायं पुरुषाधम ।  
> स्वयं प्रविष्टोऽद्य मुखं कथमासाद्य दुर्मते ॥ ७ ॥

‘पुरुषाधम ! आजका यह मेरा आहार भी पूरा नहीं है । दुर्मते ! तू स्वयं ही मेरे मुँहमें कैसे आ पड़ा ?’ ॥ ७ ॥

> तस्यैवं भाषमाणस्य हसतश्च मुहुर्मुहुः ।  
> शत्रुघ्नो वीर्यसम्पन्नो रोषादश्रूण्यवासृजत् ॥ ८ ॥

वह राक्षस इस प्रकारकी बातें कहता हुआ बारंबार हँस रहा था । यह देख पराक्रमी शत्रुघ्नके नेत्रोंसे रोषके कारण अश्रुपात होने लगा ॥ ८ ॥

> तस्य रोषाभिभूतस्य शत्रुघ्नस्य महात्मनः ।  
> तेजोमया मरीच्यस्तु सर्वगात्रैर्विनिष्पतन् ॥ ९ ॥

रोषके वशीभूत हुए महामनस्वी शत्रुघ्नके सभी अङ्गोंसे तेजोमयी किरणें छिटकने लगीं ॥ ९ ॥

> उवाच च सुसंक्रुद्धः शत्रुघ्नः स निशाचरम् ।  
> योद्धुमिच्छामि दुर्बुद्धे द्वन्द्वयुद्धं त्वया सह ॥ १० ॥  
> पुत्रो दशरथस्याहं भ्राता रामस्य धीमतः ।  
> शत्रुघ्नो नाम शत्रुघ्नो वधाकाङ्क्षी तवागतः ॥ ११ ॥

उस समय अत्यन्त कुपित हुए शत्रुघ्न उस निशाचरसे बोले—‘दुर्बुद्धे ! मैं तेरे साथ द्वन्द्वयुद्ध करना चाहता हूँ ॥ ‘मैं महाराज दशरथका पुत्र और परम बुद्धिमान् राजा श्रीरामका भाई हूँ । मेरा नाम शत्रुघ्न है और मैं कामसे भी शत्रुघ्न ( शत्रुओंका संहार करनेवाला ) ही हूँ । इस समय तेरा वध करनेके लिये यहाँ आया हूँ ॥ ११ ॥

> तस्य मे युद्धकामस्य द्वन्द्वयुद्धं प्रदीयताम् ।  
> शत्रुस्त्वं सर्वभूतानां न मे जीवन् गमिष्यसि ॥ १२ ॥

‘मैं युद्ध करना चाहता हूँ । इसलिये तू मुझे द्वन्द्वयुद्धका अवसर दे । तू सम्पूर्ण प्राणियोंका शत्रु है; इसलिये अब मेरे हाथसे जीवित बचकर नहीं जा सकेगा’ ॥ १२ ॥

> तर्ज्जस्तिस्तथा ब्रुवाणे तु राक्षसः प्रहसन्निव ।  
> प्रत्युवाच नरश्रेष्ठं दिष्ट्या प्राप्तोऽसि दुर्मते ॥ १३ ॥

उनके ऐसा कहनेपर वह राक्षस उन नरश्रेष्ठ शत्रुघ्नसे हँसता हुआ-सा बोला—‘दुर्मते ! सौभाग्यकी बात है कि आज तू स्वयं ही मुझे मिल गया ॥ १३ ॥

> मम मातृष्वसुर्भ्राता रावणो नाम राक्षसः ।  
> हतो रामेण दुर्बुद्धे स्त्रीहेतोः पुरुषाधम ॥ १४ ॥

‘खोटी बुद्धिवाले नराधम ! रावण नामक राक्षस मेरी मौसी शूर्पणखाका भाई था, जिसे तेरे भाई रामने एक स्त्रीके लिये मार डाला ॥ १४ ॥

> तच्च सर्वं मया क्षान्तं रावणस्य कुलक्षयम् ।  
> अवज्ञां पुरतः कृत्वा मया यूयं विशेषतः ॥ १५ ॥

‘इतना ही नहीं, उन्होंने रावणके कुलका संहार कर दिया, तथापि मैंने वह सब कुछ सह लिया । तुमलोगोंके द्वारा की गयी अवहेलनाको सामने रखकर—प्रत्यक्ष देखकर भी तुम सबके प्रति मैंने विशेषरूपसे क्षमाभावका परिचय दिया ॥ १५ ॥

> निहताश्च हि ते सर्वे परिभूतास्तृणं यथा ।  
> भूताश्चैव भविष्याश्च यूयं च पुरुषाधमाः ॥ १६ ॥

‘जो नराधम भूतकालमें मेरा सामना करनेके लिये आये थे, उन सबको मैंने तिनकोंके समान तुच्छ समझकर तिरस्कृत किया और मार डाला । जो भविष्यमें आयेंगे, उनकी भी यही दशा होगी और वर्तमानकालमें आनेवाले तुझ-जैसे नराधम भी मेरे हाथसे मरे हुए ही हैं ॥ १६ ॥

> तस्य ते युद्धकामस्य युद्धं दास्यामि दुर्मते ।  
> तिष्ठ त्वं च मुहूर्तं तु यावदायुधमानये ॥ १७ ॥

‘दुर्मते ! तुझे युद्धकी इच्छा है न ! मैं अभी तुझे युद्धका अवसर दूँगा । तू दो घड़ी ठहर जा । तबतक मैं भी अपना अस्त्र ले आता हूँ ॥ १७ ॥

> ईप्सितं यादृशं तुभ्यं सज्जये यावदायुधम् ।  
> तमुवाचाशु शत्रुघ्नः क्व मे जीवन् गमिष्यसि ॥ १८ ॥

‘तेरे वधके लिये जैसे अस्त्रका होना मुझे अभीष्ट है, वैसे अस्त्रको पहले सुसज्जित कर लूँ; फिर युद्धका अवसर दूँगा।’ यह सुनकर शत्रुघ्न तुरंत बोल उठे—‘अब तू मेरे हाथसे जीवित बचकर कहाँ जायगा ? ॥ १८ ॥

> स्वयमेवागतः शत्रुर्न मोक्तव्यः कृतात्मना ।  
> यो हि विक्लवया बुद्ध्या प्रसरं शत्रवे दिशेत् ।  
> स हतो मन्दबुद्धिः स्याद् यथा कापुरुषस्तथा ॥ १९ ॥

‘किसी भी बुद्धिमान् पुरुषको अपने सामने आये हुए शत्रुको छोड़ना नहीं चाहिये । जो अपनी घबरायी हुई बुद्धिके कारण शत्रुको निगल जानेका अवसर दे देता है, वह मन्दबुद्धि पुरुष कायरके समान मारा जाता है ॥ १९ ॥

> तस्मात् सुदुष्टं कुरु जीवलोकं  
> शरैः शितैस्त्वां विविधैर्नयामि ।  
> यमस्य गेहाभिमुखं हि पापं  
> रिपुं त्रिलोकस्य च राघवस्य ॥ २० ॥

‘अतः राक्षस ! अब तू इस जीव-जगत्को अच्छी तरह देख ले । मैं नाना प्रकारके तीखे बाणोंद्वारा तुझ पापीको अभी यमराजके घरकी ओर भेजता हूँ; क्योंकि तू तीनों लोकोंका तथा श्रीरघुनाथजीका भी शत्रु है’ ॥ २० ॥

Book: https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
