---
title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 66"
canonical: "https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana/uttara-kanda/sarga-66"
lang: "hi"
---

# उत्तरकाण्ड, Sarga 66

> एवमुक्त्वा च काकुत्स्थं प्रशस्य च पुनः पुनः ।  
> पुनरेवापरं वाक्यमुवाच रघुनन्दनः ॥ १ ॥  
> इमान्यश्वसहस्राणि चत्वारि पुरुषर्षभ ।  
> रथानां द्वे सहस्रे च गजानां शतमुत्तमम् ॥ २ ॥  
> अन्तरापणवीथ्यश्च नानापण्योपशोभिताः ।  
> अनुगच्छन्तु काकुत्स्थं तथैव नटनर्तकाः ॥ ३ ॥

शत्रुघ्नजीको इस प्रकार समझाकर और उनकी बारंबार प्रशंसा करके रघुकुलनन्दन श्रीरामने पुनः यह बात कही—॥ ‘पुरुषप्रवर ! ये चार हजार घोड़े, दो हजार रथ, सौ हाथी और रास्तेमें तरह-तरहके सामानकी दूकानें लगानेवाले बनिये लोग विक्रयकी आवश्यक वस्तुओंके साथ तुम्हारे साथ जायँगे । साथ ही मनोरञ्जनके लिये नट और नर्तक भी रहेंगे ॥ २-३ ॥

> हिरण्यस्य सुवर्णस्य नियुतं पुरुषर्षभ ।  
> आदाय गच्छ शत्रुघ्न पर्याप्तधनवाहनः ॥ ४ ॥

‘पुरुषश्रेष्ठ शत्रुघ्न ! तुम दस लाख स्वर्णमुद्रा लेकर जाओ । इस तरह पर्याप्त धन और सवारियाँ अपने साथ रक्खो ॥ ४ ॥

> बलं च सुभृतं वीर हृष्टपुष्टमनुद्धतम् ।  
> सम्भाषासम्प्रदानेन रञ्जयस्व नरोत्तम ॥ ५ ॥

‘इस सेनाका भलीभाँति भरण-पोषण किया गया है । यह हर्ष तथा उत्साहसे पूर्ण, संतुष्ट और उद्दण्डतासे रहित होकर आज्ञाके अधीन रहनेवाली है । नरश्रेष्ठ ! इसे मधुर भाषणसे और धन देकर प्रसन्न रखना ॥ ५ ॥

> नह्यर्थास्तत्र तिष्ठन्ति न दारा न च बान्धवाः।  
> सुप्रीतो भृत्यवर्गस्तु यत्र तिष्ठति राघव ॥ ६ ॥

‘रघुनन्दन ! अत्यन्त प्रसन्न रक्खे गये सेवक-समूह ( सैनिक ) जहाँ ( जिस संकटकालमें ) खड़े होते या साथ देते हैं, वहाँ न तो धन टिक पाता है, न स्त्री ठहर सकती है और न भाई-बन्धु ही खड़े हो सकते हैं ( अतः उन सबको सदा संतुष्ट रखना चाहिये ) ॥ ६ ॥

> अतो हृष्टजनाकीर्णां प्रस्थाप्य महतीं चमूम् ।  
> एक एव धनुष्पाणिर्गच्छ त्वं मधुनो वनम् ॥ ७ ॥  
> यथा त्वां न प्रजानाति गच्छन्तं युद्धकाङ्क्षिणम् ।  
> लवणस्तु मधोः पुत्रस्तथा गच्छेरशङ्कितम् ॥ ८ ॥

‘इसलिये हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई इस विशाल सेनाको आगे भेजकर तुम पीछेसे अकेले ही केवल धनुष हाथमें लेकर मधुवनको जाना और इस तरह यात्रा करना, जिससे मधुपुत्र लवणको यह संदेह न हो कि तुम युद्धकी इच्छासे वहाँ जा रहे हो । तुम्हारी गति-विधिका उसे पता नहीं चलना चाहिये ॥ ७-८ ॥

> न तस्य मृत्युरन्योऽस्ति कश्चिद्धि पुरुषर्षभ ।  
> दर्शनं योऽभिगच्छेत स वध्यो लवणेन हि ॥ ९ ॥

‘पुरुषोत्तम ! मैंने जो बताया है, उसके सिवा उसकी मृत्युका दूसरा कोई उपाय नहीं है; क्योंकि जो भी शूलसहित लवणासुरके दृष्टिपथमें आ जाता है, वह अवश्य उसके द्वारा मारा जाता है ॥ ९ ॥

> स ग्रीष्म अपयाते तु वर्षारात्र उपागते ।  
> हन्यास्त्वं लवणं सौम्य स हि कालोऽस्य दुर्मतेः ॥१०॥

‘सौम्य ! जब ग्रीष्म-ऋतु निकल जाय और वर्षाकाल आ जाय, उस समय तुम लवणासुरका वध करना; क्योंकि उस दुर्बुद्धि राक्षसके नाशका वही समय है ॥ १० ॥

> महर्षींस्तु पुरस्कृत्य प्रयान्तु तव सैनिकाः ।  
> यथा ग्रीष्मावशेषेण तरेयुर्जाह्नवीजलम् ॥ ११ ॥

‘तुम्हारे सैनिक महर्षियोंको आगे करके यहाँसे यात्रा करें, जिससे ग्रीष्म ऋतु बीतते-बीतते वे गङ्गाजीको पार कर जायँ ॥ ११ ॥

> तत्र स्थाप्य बलं सर्वं नदीतीरे समाहितः ।  
> अग्रतो धनुषा सार्धं गच्छ त्वं लघुविक्रम ॥ १२ ॥

‘शीघ्रपराक्रमी वीर ! फिर सारी सेनाको वहीं गङ्गाजीके तटपर ठहराकर तुम धनुषमात्र लेकर पूरी सावधानीके साथ अकेले ही आगे जाना’ ॥ १२ ॥

> एवमुक्तस्तु रामेण शत्रुघ्नस्तान् महाबलान् ।  
> सेनामुख्यान् समानीय ततो वाक्यमुवाच ह ॥ १३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर शत्रुघ्नजीने अपने प्रधान सेनापतियोंको बुलाया और इस प्रकार कहा—॥ १३ ॥

> एते वो गणिता वासा यत्र तत्र निवत्स्यथ ।  
> स्थातव्यं चाविरोधेन यथा बाधा न कस्यचित् ॥ १४ ॥

‘देखो, मार्गमें जहाँ-जहाँ डेरा डालना है, उन पड़ावोंका निश्चय कर लिया गया है । तुम्हें वहीं निवास करना होगा । जहाँ भी ठहरो, विरोधभावको मनसे निकाल दो, जिससे किसीको कष्ट न पहुँचे’ ॥ १४ ॥

> तथा तांस्तु समाज्ञाप्य प्रस्थाप्य च महद्बलम् ।  
> कौसल्यां च सुमित्रां च कैकेयीं चाभ्यवादयत् ॥ १५ ॥

इस प्रकार उन सेनापतियोंको आज्ञा दे अपनी विशाल सेनाको आगे भेजकर शत्रुघ्नने कौसल्या, सुमित्रा तथा कैकेयीको प्रणाम किया ॥ १५ ॥

> रामं प्रदक्षिणीकृत्य शिरसाभिप्रणम्य च ।  
> लक्ष्मणं भरतं चैव प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् श्रीरामकी परिक्रमा करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया । फिर हाथ जोड़कर भरत और लक्ष्मणकी भी वन्दना की ॥ १६ ॥

> पुरोहितं वसिष्ठं च शत्रुघ्नः प्रयतात्मवान् ।  
> रामेण चाभ्यनुज्ञातः शत्रुघ्नः शत्रुतापनः ।  
> प्रदक्षिणमथो कृत्वा निर्जगाम महाबलः ॥ १७ ॥

तदनन्तर मनको संयममें रखकर शत्रुघ्नने पुरोहित वसिष्ठको नमस्कार किया । फिर श्रीरामकी आज्ञा ले उनकी परिक्रमा करके शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबली शत्रुघ्न अयोध्यासे निकले ॥ १७ ॥

> प्रस्थाप्य सेनामथ सोऽग्रतस्तदा  
> गजेन्द्रवाजिप्रवरौघसंकुलाम् ।  
> उवास मासं तु नरेन्द्रपार्श्वत-  
> स्त्वथ प्रयातो रघुवंशवर्धनः ॥ १८ ॥

गजराजों और श्रेष्ठ अश्वोंके समुदायसे भरी हुई विशाल सेनाको आगे भेजकर रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले शत्रुघ्न एक मासतक महाराज श्रीरामके पास ही रहे । उसके बाद उन्होंने वहाँसे प्रस्थान किया ॥ १८ ॥

Book: https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
