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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 62"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 62

> तयोः संवदतोरेवं रामलक्ष्मणयोस्तदा ।  
> वासन्तिकी निशा प्राप्ता न शीता न च घर्मदा ॥ १ ॥

श्रीराम और लक्ष्मण परस्पर इस प्रकार कथा-वार्ता करते हुए प्रतिदिन प्रजापालनके कार्यमें लगे रहते थे । एक समय वसन्तऋतुकी रात आयी, जो न अधिक सर्दी लानेवाली थी और न गर्मी ॥ १ ॥

> ततः प्रभाते विमले कृतपूर्वाह्निकक्रियः ।  
> अभिचक्राम काकुत्स्थो दर्शनं पौरकार्यवित् ॥ २ ॥

वह रात बीतनेपर जब निर्मल प्रभातकाल आया, तब पुरवासियोंके कार्योंको जाननेवाले श्रीरघुनाथजी पूर्वाह्णकालके नित्यकर्म—संध्या-वन्दन आदिसे निवृत्त हो बाहर निकलकर प्रजाजनोंके दृष्टिपथमें आये ॥ २ ॥

> ततः सुमन्त्रस्त्वागम्य राघवं वाक्यमब्रवीत् ।  
> एते प्रतिहता राजन् द्वारि तिष्ठन्ति तापसाः ॥ ३ ॥  
> भार्गवं च्यवनं चैव पुरस्कृत्य महर्षयः ।  
> दर्शनं ते महाराज चोदयन्ति कृतत्वराः ॥ ४ ॥

उसी समय सुमन्त्रने आकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ‘राजन् ! ये तपस्वी महर्षि भृगुपुत्र च्यवन मुनिको आगे करके द्वारपर खड़े हैं । द्वारपालोंने इनका भीतर आना रोक दिया है । महाराज ! इन्हें आपके दर्शनकी जल्दी लगी हुई है और ये अपने आगमनकी सूचना देनेके लिये हमें बारंबार प्रेरित करते हैं ॥ ३-४ ॥

> प्रीयमाणा नरव्याघ्र यमुनातीरवासिनः ।  
> तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रामः प्रोवाच धर्मवित् ॥ ५ ॥  
> प्रवेश्यन्तां महाभागा भार्गवप्रमुखा द्विजाः ।

‘पुरुषसिंह ! ये सब महर्षि यमुनातटपर निवास करते हैं और आपसे विशेष प्रेम रखते हैं ।’ सुमन्त्रकी यह बात सुनकर धर्मज्ञ श्रीरामने कहा—‘सूत ! भार्गव च्यवन आदि सभी महाभाग ब्रह्मर्षियोंको भीतर बुलाया जाय’ ॥ ५½ ॥

> राज्ञस्त्वाज्ञां पुरस्कृत्य द्वाःस्थो मूर्ध्नि कृताञ्जलिः ॥ ६ ॥  
> प्रवेशयामास तदा तापसान् सुदुरासदान् ।

राजाकी यह आज्ञा शिरोधार्य करके द्वारपालने मस्तकपर दोनों हाथ जोड़ लिये और उन अत्यन्त दुर्जय तेजस्वी तापसोंको वह राजभवनके भीतर ले आया ॥ ६½ ॥

> शतं समधिकं तत्र दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ ७ ॥  
> प्रविष्टं राजभवनं तापसानां महात्मनाम् ।  
> ते द्विजाः पूर्णकलशैः सर्वतीर्थाम्बुसत्कृतैः ॥ ८ ॥  
> गृहीत्वा फलमूलं च रामस्याभ्याहरन् बहु ।

उन तपस्वी महात्माओंकी संख्या सौसे अधिक थी । वे सब-के-सब अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे थे । उन सबने राजभवनमें प्रवेश किया और समस्त तीर्थोंके जलसे भरे हुए घड़ोंके साथ बहुत-से फल-मूल लेकर श्रीरामचन्द्रजीको भेंट किये ॥ ७-८½ ॥

> प्रतिगृह्य तु तत् सर्वं रामः प्रीतिपुरस्कृतः ॥ ९ ॥  
> तीर्थोदकानि सर्वाणि फलानि विविधानि च ।  
> उवाच च महाबाहुः सर्वानेव महामुनीन् ॥ १० ॥

महाबाहु श्रीरामने बड़ी प्रसन्नताके साथ वह सारा उपहार–वे सारे तीर्थजल और नाना प्रकारके फल लेकर उन सभी महामुनियोंसे कहा–॥ ९-१० ॥

> इमान्यासनमुख्यानि यथार्हमुपविश्यताम् ।  
> रामस्य भाषितं श्रुत्वा सर्वे एव महर्षयः ॥ ११ ॥  
> बृसीषु रुचिराख्यासु निषेदुः काञ्चनीषु ते ।

‘महात्माओ ! ये उत्तमोत्तम आसन प्रस्तुत हैं । आपलोग यथायोग्य इन आसनोंपर बैठ जायँ ।’ श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर वे सभी महर्षि रुचिर शोभासे सम्पन्न उन सुवर्णमय आसनोंपर बैठे ॥ ११½ ॥

> उपविष्टानृषींस्तत्र दृष्ट्वा परपुरंजयः ।  
> प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥ १२ ॥

उन महर्षियोंको वहाँ आसनोंपर विराजमान देख शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़ संयतभाव-से कहा—॥ १२ ॥

> किमागमनकार्यं वः किं करोमि समाहितः ।  
> आज्ञाप्योऽहं महर्षीणां सर्वकामकरः सुखम् ॥ १३ ॥

‘महर्षियो ! किस कामसे यहाँ आपलोगोंका शुभागमन हुआ है ? मैं एकाग्रचित्त होकर आपकी क्या सेवा करूँ ? यह सेवक आपकी आज्ञा पानेके योग्य है । आदेश मिलनेपर मैं बड़े सुखसे आपकी सभी इच्छाओंको पूर्ण कर सकता हूँ॥१३॥

> इदं राज्यं च सकलं जीवितं च हृदि स्थितम् ।  
> सर्वमेतद् द्विजार्थं मे सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ॥ १४ ॥

‘यह सारा राज्य, इस हृदयकमलमें विराजमान यह जीवात्मा तथा यह मेरा सारा वैभव ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये ही है, मैं आपके समक्ष यह सच्ची बात कहता हूँ’ ॥ १४ ॥

> तस्य तद् वचनं श्रुत्वा साधुकारो महानभूत् ।  
> ऋषीणामुग्रतपसां यमुनातीरवासिनाम् ॥ १५ ॥

श्रीरघुनाथजीके ये वचन सुनकर उन यमुनातीर-निवासी उग्र तपस्वी महर्षियोंने उच्चस्वरसे उन्हें साधुवाद दिया ॥१५॥

> ऊचुश्चैव महात्मानो हर्षेण महता वृताः ।  
> उपपन्नं नरश्रेष्ठ तवैव भुवि नान्यतः ॥ १६ ॥

फिर वे महात्मा बड़े हर्षके साथ बोले——‘नरश्रेष्ठ ! इस भूमण्डलमें ऐसी बातें आपके ही योग्य हैं । दूसरे किसीके मुखसे इस तरहकी बात नहीं निकलती ॥ १६ ॥

> बहवः पार्थिवा राजन्नतिक्रान्ता महाबलाः ।  
> कार्यस्य गौरवं मत्वा प्रतिज्ञां नाभ्यरोचयन् ॥ १७ ॥

‘राजन् ! हम बहुत-से महाबली राजाओंके पास गये; परंतु उन्होंने कार्यके गौरवको समझकर उसे सुननेके बाद भी ‘करूँगा’ ऐसी प्रतिज्ञा करनेकी रुचि नहीं दिखायी ॥ १७ ॥

> त्वया पुनर्ब्राह्मणगौरवादियं  
> कृता प्रतिज्ञा ह्यनवेक्ष्य कारणम् ।  
> ततश्च कर्ता ह्यसि नात्र संशयो  
> महाभयात् त्रातुमृषींस्त्वमर्हसि ॥ १८ ॥

‘परंतु आपने हमारे आनेका कारण जाने बिना ही केवल ब्राह्मणोंके प्रति आदरका भाव होनेसे हमारा काम करनेकी प्रतिज्ञा कर डाली है; इसलिये आप अवश्य यह काम कर सकेंगे, इसमें संशय नहीं है । आप ही महान् भयसे ऋषियोंको बचा सकेंगे’ ॥ १८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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