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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 57"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 57

> तां श्रुत्वा दिव्यसंकाशां कथामद्भुतदर्शनाम् ।  
> लक्ष्मणः परमप्रीतो राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥

उस दिव्य एवं अद्भुत कथाको सुनकर लक्ष्मणको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे श्रीरघुनाथजीसे बोले—॥ १ ॥

> निक्षिप्तदेहौ काकुत्स्थ कथं तौ द्विजपार्थिवौ ।  
> पुनर्देहेन संयोगं जग्मतुर्देवसम्मतौ ॥ २ ॥

‘काकुत्स्थ ! वे ब्रह्मर्षि वसिष्ठ तथा राजर्षि निमि जो देवताओंद्वारा भी सम्मानित थे, अपने-अपने शरीरको छोड़कर फिर नूतन शरीरसे किस प्रकार संयुक्त हुए ?’ ॥ २ ॥

> तस्य तद् भाषितं श्रुत्वा रामः सत्यपराक्रमः ।  
> तां कथां कथयामास वसिष्ठस्य महात्मनः ॥ ३ ॥

उनका यह प्रश्न सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामने महात्मा वसिष्ठके शरीर-ग्रहणसे सम्बन्ध रखनेवाली उस कथाको पुनः कहना आरम्भ किया— ॥ ३ ॥

> यः स कुम्भो रघुश्रेष्ठ तेजःपूर्णो महात्मनोः ।  
> तस्मिंस्तेजोमयौ विप्रौ सम्भूतावृषिसत्तमौ ॥ ४ ॥

‘रघुश्रेष्ठ ! महामना मित्र और वरुणदेवताके तेज(वीर्य) से युक्त जो वह प्रसिद्ध कुम्भ था, उससे दो तेजस्वी ब्राह्मण प्रकट हुए । वे दोनों ही ऋषियोंमें श्रेष्ठ थे ॥ ४ ॥

> पूर्वं समभवत् तत्र अगस्त्यो भगवानृषिः ।  
> नाहं सुतस्तवेत्युक्त्वा मित्रं तस्मादपाक्रमत् ॥ ५ ॥

‘पहले उस घटसे महर्षि भगवान् अगस्त्य उत्पन्न हुए और मित्रसे यह कहकर कि ‘मैं आपका पुत्र नहीं हूँ’ वहाँसे अन्यत्र चले गये ॥ ५ ॥

> तद्धि तेजस्तु मित्रस्य उर्वश्याः पूर्वमाहितम् ।  
> तस्मिन् समभवत् कुम्भे तत्तेजो यत्र वारुणम् ॥ ६ ॥

‘वह मित्रका तेज था, जो उर्वशीके निमित्तसे पहले ही उस कुम्भमें स्थापित किया गया था । तत्पश्चात् उस कुम्भमें वरुणदेवताका तेज भी सम्मिलित हो गया था ॥ ६ ॥

> कस्यचित् त्वथ कालस्य मित्रावरुणसम्भवः ।  
> वसिष्ठस्तेजसा युक्तो जज्ञे इक्ष्वाकुदैवतम् ॥ ७ ॥

‘तत्पश्चात् कुछ कालके बाद मित्रावरुणके उस वीर्यसे तेजस्वी वसिष्ठमुनिका प्रादुर्भाव हुआ । जो इक्ष्वाकुकुलके देवता ( गुरु या पुरोहित ) हुए ॥ ७ ॥

> तमिक्ष्वाकुर्महातेजा जातमात्रमनिन्दितम् ।  
> वव्रे पुरोधसं सौम्य वंशस्यास्य हिताय नः ॥ ८ ॥

‘सौम्य लक्ष्मण ! महातेजस्वी राजा इक्ष्वाकुने उनके वहाँ जन्म ग्रहण करते ही उन अनिन्द्य मुनि वसिष्ठका हमारे इस कुलके हितके लिये पुरोहितके पदपर वरण कर लिया ॥ ८ ॥

> एवं त्वपूर्वदेहस्य वसिष्ठस्य महात्मनः ।  
> कथितो निर्गमः सौम्य निमेः शृणु यथाभवत् ॥ ९ ॥

‘सौम्य ! इस प्रकार नूतन शरीरसे युक्त वसिष्ठमुनिकी उत्पत्तिका प्रकार बताया गया । अब निमिका जैसा वृत्तान्त है, वह सुनो ॥ ९ ॥

> दृष्ट्वा विदेहं राजानमृषयः सर्व एव ते ।  
> तं च ते याजयामासुर्यज्ञदीक्षां मनीषिणः ॥ १० ॥

‘राजा निमिको देहसे पृथक् हुआ देख उन सभी मनीषी ऋषियोंने स्वयं ही यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करके उस यज्ञको पूरा किया ॥ १० ॥

> तं च देहं नरेन्द्रस्य रक्षन्ति स्म द्विजोत्तमाः ।  
> गन्धैर्माल्यैश्च वस्त्रैश्च पौरभृत्यसमन्विताः ॥ ११ ॥

‘उन श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियोंने पुरवासियों और सेवकोंके साथ रहकर गन्ध, पुष्प और वस्त्रोंसहित राजा निमिके उस शरीरको तेलके कड़ाह आदिमें सुरक्षित रक्खा ॥ ११ ॥

> ततो यज्ञे समाप्ते तु भृगुस्तत्रेदमब्रवीत् ।  
> आनयिष्यामि ते चेतस्तुष्टोऽस्मि तव पार्थिव ॥ १२ ॥

‘तदनन्तर जब यज्ञ समाप्त हुआ, तब वहाँ भृगुने कहा-‘राजन् ! ( राजाके शरीरके अभिमानी जीवात्मन् ! ) मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ, अतः यदि तुम चाहो तो तुम्हारे जीव-चैतन्यको मैं पुनः इस शरीरमें ला दूँगा’ ॥ १२ ॥

> सुप्रीताश्च सुराः सर्वे निमिश्चेतस्तदाब्रुवन् ।  
> वरं वरय राजर्षे क ते चेतो निरूप्यताम् ॥ १३ ॥

‘भृगुके साथ ही अन्य सब देवताओंने भी अत्यन्त प्रसन्न होकर निमिके जीवात्मासे कहा—‘राजर्षे ! वर माँगो । तुम्हारे जीव-चैतन्यको कहाँ स्थापित किया जाय’ ॥ १३ ॥

> एवमुक्तः सुरैः सर्वैर्निमिश्चेतस्तदाब्रवीत् ।  
> नेत्रेषु सर्वभूतानां वसेयं सुरसत्तमाः ॥ १४ ॥

‘समस्त देवताओंके ऐसा कहनेपर निमिके जीवात्माने उस समय उनसे कहा—‘सुरश्रेष्ठ ! मैं समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें निवास करना चाहता हूँ’ ॥ १४ ॥

> बाढमित्येव विबुधा निमिश्चेतस्तदाब्रुवन् ।  
> नेत्रेषु सर्वभूतानां वायुभूतश्चरिष्यसि ॥ १५ ॥

‘तब देवताओंने निमिके जीवात्मासे कहा—‘बहुत अच्छा, तुम वायुरूप होकर समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें विचरते रहोगे ॥ १५ ॥

> त्वत्कृते च निमिष्यन्ति चक्षूंषि पृथिवीपते ।  
> वायुभूतेन चरता विश्रामार्थं मुहुर्मुहुः ॥ १६ ॥

‘‘पृथ्वीनाथ ! वायुरूपसे विचरते हुए आपके सम्बन्धसे जो थकावट होगी, उसका निवारण करके विश्राम पानेके लिये प्राणियोंके नेत्र बारंबार बंद हो जाया करेंगे’ ॥ १६ ॥

> एवमुक्त्वा तु विबुधाः सर्वे जग्मुर्यथागतम् ।  
> ऋषयोऽपि महात्मानो निमेर्देहं समाहरन् ॥ १७ ॥  
> अरणिं तत्र निक्षिप्य मथनं चक्रुरोजसा ।

‘ऐसा कहकर सब देवता जैसे आये थे, वैसे चले गये; फिर महात्मा ऋषियोंने निमिके शरीरको पकड़ा और उसपर अरणि रखकर उसे बलपूर्वक मथना आरम्भ किया ॥१७॥

> मन्त्रहोमैर्महात्मानः पुत्रहेतोर्निमेस्तदा ॥ १८ ॥  
> अरण्यां मथ्यमानायां प्रादुर्भूतो महातपाः ।  
> मथनान्मिथिरित्याहुर्जननाज्जनकोऽभवत् ॥ १९ ॥  
> यस्माद् विदेहात् सम्भूतो वैदेहस्तु ततः स्मृतः ।  
> एवं विदेहराजश्च जनकः पूर्वकोऽभवत् ।  
> मिथिर्नाम महातेजास्तेनायं मैथिलोऽभवत् ॥ २० ॥

‘पूर्ववत् मन्त्रोच्चारणपूर्वक होम करते हुए उन महात्माओंने जब निमिके पुत्रकी उत्पत्तिके लिये अरणि-मन्थन आरम्भ किया, तब उस मन्थनसे महातपस्वी मिथि उत्पन्न हुए । इस अद्भुत जन्मका हेतु होनेके कारण वे जनक कहलाये तथा विदेह ( जीव रहित शरीर ) से प्रकट होनेके कारण उन्हें वैदेह भी कहा गया । इस प्रकार पहले विदेहराज जनकका नाम महातेजस्वी मिथि हुआ, जिससे यह जनकवंश मैथिल कहलाया ॥ १८–२० ॥

> इति सर्वमशेषतो मया  
> कथितं सम्भवकारणं तु सौम्य ।  
> नृपपुङ्गवशापजं द्विजस्य  
> द्विजशापाच्च यदद्भुतं नृपस्य ॥ २१ ॥

‘सौम्य लक्ष्मण ! राजाओंमें श्रेष्ठ निमिके शापसे ब्राह्मण वसिष्ठका और ब्राह्मण वसिष्ठके शापसे राजा निमिका जो अद्भुत जन्म घटित हुआ, उसका सारा कारण मैंने तुम्हें कह सुनाया’ ॥ २१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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