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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 55"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 55

> एष ते नृगशापस्य विस्तरोऽभिहितो मया।  
> यद्यस्ति श्रवणे श्रद्धा शृणुष्वेहापरां कथाम् ॥ १ ॥

( श्रीरामने कहा—) ‘लक्ष्मण ! इस तरह मैंने तुम्हें राजा नृगके शापका प्रसङ्ग विस्तारपूर्वक बताया है। यदि सुननेकी इच्छा हो तो दूसरी कथा भी सुनो’ ॥ १ ॥

> एवमुक्तस्तु रामेण सौमित्रिः पुनरब्रवीत्।  
> तृप्तिराश्चर्यभूतानां कथानां नास्ति मे नृप ॥ २ ॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार फिर बोले— ‘नरेश्वर ! इन आश्चर्यजनक कथाओंके सुननेसे मुझे कभी तृप्ति नहीं होती है’ ॥ २ ॥

> लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु राम इक्ष्वाकुनन्दनः।  
> कथां परमधर्मिष्ठां व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ ३ ॥

लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामने पुनः उत्तम धर्मसे युक्त कथा कहनी आरम्भ की—॥ ३ ॥

> आसीद् राजा निमिर्नाम इक्ष्वाकूणां महात्मनाम्।  
> पुत्रो द्वादशमो वीर्ये धर्मे च परिनिष्ठितः ॥ ४ ॥

‘सुमित्रानन्दन ! महात्मा इक्ष्वाकु-पुत्रोंमें निमि नामक एक राजा हो गये हैं, जो इक्ष्वाकुके बारहवें* पुत्र थे। वे पराक्रम और धर्ममें पूर्णतः स्थिर रहनेवाले थे ॥ ४ ॥

> स राजा वीर्यसम्पन्नः पुरं देवपुरोपमम्।  
> निवेशयामास तदा अभ्याशे गौतमस्य तु ॥ ५ ॥

‘उन पराक्रमसम्पन्न नरेशने उन दिनों गौतम-आश्रमके निकट देवपुरीके समान एक नगर बसाया ॥ ५ ॥

> पुरस्य सुकृतं नाम वैजयन्तमिति श्रुतम्।  
> निवेशं यत्र राजर्षिर्निमिश्चक्रे महायशाः ॥ ६ ॥

‘महायशस्वी राजर्षि निमिने जिस नगरमें अपना निवासस्थान बनाया, उसका सुन्दर नाम रक्खा गया वैजयन्त। इसी नामसे उस नगरकी प्रसिद्धि हुई ( देवराज इन्द्रके प्रासादका नाम वैजयन्त है, उसीकी समतासे निमिके नगरका भी यही नाम रक्खा गया था ) ॥ ६ ॥

> तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना निवेश्य सुमहापुरम्।  
> यजेयं दीर्घसत्रेण पितुः प्रह्लादयन् मनः ॥ ७ ॥

‘उस महान् नगरको बसाकर राजाके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं पिताके हृदयको आह्लाद प्रदान करनेके लिये एक ऐसे यज्ञका अनुष्ठान करूँ, जो दीर्घकालतक चालू रहनेवाला हो ॥ ७ ॥

> ततः पितरमामन्त्र्य इक्ष्वाकुं हि मनोः सुतम्।  
> वसिष्ठं वरयामास पूर्वं ब्रह्मर्षिसत्तमम् ॥ ८ ॥  
> अनन्तरं स राजर्षिर्निमिरिक्ष्वाकुनन्दनः।  
> अत्रिमङ्गिरसं चैव भृगुं चैव तपोनिधिम् ॥ ९ ॥  
> तमुवाच वसिष्ठस्तु निमिं राजर्षिसत्तमम्।  
> वृतोऽहं पूर्वमिन्द्रेण अन्तरं प्रतिपालय ॥ १० ॥

‘तदनन्तर इक्ष्वाकुनन्दन राजर्षि निमिने अपने पिता मनुपुत्र इक्ष्वाकुसे पूछकर अपना यज्ञ करानेके लिये सबसे पहले ब्रह्मर्षिशिरोमणि वसिष्ठजीका वरण किया। उसके बाद अत्रि, अङ्गिरा तथा तपोनिधि भृगुको भी आमन्त्रित किया ॥ ‘उस समय महर्षि वसिष्ठने राजर्षियोंमें श्रेष्ठ निमिसे कहा— ‘देवराज इन्द्रने एक यज्ञके लिये पहलेसे ही मेरा वरण कर लिया है; अतः वह यज्ञ जबतक समाप्त न हो जाय तबतक तुम मेरे आगमनकी प्रतीक्षा करो’ ॥ १० ॥

> अनन्तरं महाविप्रो गौतमः प्रत्यपूरयत् ।  
> वसिष्ठोऽपि महातेजा इन्द्रयज्ञमथाकरोत् ॥ ११ ॥

‘वसिष्ठजीके चले जानेके बाद महान् ब्राह्मण महर्षि गौतमने आकर उनके कामको पूरा कर दिया । उधर महातेजस्वी वसिष्ठ भी इन्द्रका यज्ञ पूरा कराने लगे ॥ ११ ॥

> निमिस्तु राजा विप्रांस्तान् समानीय नराधिपः ।  
> अयजद्धिमवत्पार्श्वे स्वपुरस्य समीपतः ।  
> पञ्चवर्षसहस्राणि राजा दीक्षामथाकरोत् ॥ १२ ॥

‘नरेश्वर राजा निमिने उन ब्राह्मणोंको बुलाकर हिमालयके पास अपने नगरके निकट ही यज्ञ आरम्भ कर दिया, राजा निमिने पाँच हजार वर्षोंतकके लिये यज्ञकी दीक्षा ली ॥१२॥

> इन्द्रयज्ञावसाने तु वसिष्ठो भगवानृषिः ।  
> सकाशामागतो राज्ञो होत्रं कर्तुमनिन्दितः ॥ १३ ॥  
> तदन्तरमथापश्यद् गौतमेनाभिपूरितम् ।

उधर इन्द्र-यज्ञकी समाप्ति होनेपर अनिन्द्य भगवान् वसिष्ठ ऋषि राजा निमिके पास होतृकर्म करनेके लिये आये । वहाँ आकर उन्होंने देखा कि जो समय प्रतीक्षाके लिये दिया था, उसे गौतमने आकर पूरा कर दिया ॥ १३½ ॥

> कोपेन महताविष्टो वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः ॥ १४ ॥  
> स राज्ञो दर्शनाकाङ्क्षी मुहूर्तं समुपाविशत् ।  
> तस्मिन्नहनि राजर्षिर्निद्रयापहृतो भृशम् ॥ १५ ॥  
> ततो मन्युर्वसिष्ठस्य प्रादुरासीन्महात्मनः ।  
> अदर्शनेन राजर्षेर्व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ १६ ॥  
> यस्मात् त्वमन्यं वृतवान् मामवज्ञाय पार्थिव ।  
> चेतनेन विनाभूतो देहस्ते पार्थिवैष्यति ॥ १७ ॥

‘यह देख ब्रह्मकुमार वसिष्ठ महान् क्रोधसे भर गये और राजासे मिलनेके लिये दो घड़ी वहाँ बैठे रहे । परंतु उस दिन राजर्षि निमि अत्यन्त निद्राके वशीभूत हो सो गये थे ॥ ‘राजा मिले नहीं, इस कारण महात्मा वसिष्ठ मुनिको बड़ा क्रोध हुआ । वे राजर्षिको लक्ष्य करके बोलने लगे—॥ ‘‘भूपाल निमे ! तुमने मेरी अवहेलना करके दूसरे पुरोहितका वरण कर लिया है, इसलिये तुम्हारा यह शरीर अचेतन होकर गिर जायगा’ ॥ १७ ॥

> ततः प्रबुद्धो राजा तु श्रुत्वा शापमुदाहृतम् ।  
> ब्रह्मयोनिमथोवाच स राजा क्रोधमूर्च्छितः ॥ १८ ॥

‘तदनन्तर राजाकी नींद खुली । वे उनके दिये हुए शापकी बात सुनकर क्रोधसे मूर्छित हो गये और ब्रह्मयोनि वसिष्ठसे बोले—॥ १८ ॥

> अजानतः शयानस्य क्रोधेन कलुषीकृतः ।  
> उत्क्रष्टवान् मम शापाग्निं यमदण्डमिवापरम् ॥ १९ ॥

‘‘मुझे आपके आगमनकी बात मालूम नहीं थी, इसलिये सो रहा था । परंतु आपने क्रोधसे कलुषित होकर मेरे ऊपर दूसरे यमदण्डकी भाँति शापाग्निका प्रहार किया है ॥ १९ ॥

> तस्मात् तवापि ब्रह्मर्षे चेतनेन विनाकृतः ।  
> देहः स सुचिरप्रख्यो भविष्यति न संशयः ॥ २० ॥

‘‘अतः ब्रह्मर्षे ! चिरन्तन शोभासे युक्त जो आपका शरीर है, वह भी अचेतन होकर गिर जायगा—इसमें संशय नहीं है’ ॥ २० ॥

> इति रोषवशादुभौ तदानी-  
> मन्योन्यं शपितौ नृपद्विजेन्द्रौ ।  
> सहसैव बभूवतुर्विदेहौ  
> तत्तुल्याधिगतप्रभाववन्तौ ॥ २१ ॥

‘इस प्रकार उस समय रोषके वशीभूत हुए वे दोनों नृपेन्द्र और द्विजेन्द्र परस्पर शाप दे सहसा विदेह हो गये । उन दोनोंके प्रभाव ब्रह्माजीके समान थे’ ॥ २१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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