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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 54"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 54

> रामस्य भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः परमार्थवित् ।  
> उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं राघवं दीप्ततेजसम् ॥ १ ॥

श्रीरामका यह भाषण सुनकर परमार्थवेत्ता लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर उद्दीप्त तेजवाले श्रीरघुनाथजीसे बोले—॥ १ ॥

> अल्पापराधे काकुत्स्थ द्विजाभ्यां शाप ईदृशः ।  
> महान् नृगस्य राजर्षेर्यमदण्ड इवापरः ॥ २ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण ! उन दोनों ब्राह्मणोंने थोड़ेसे ही अपराधपर राजर्षि नृगको द्वितीय यमदण्डके समान ऐसा महान् शाप दे दिया ॥ २ ॥

> श्रुत्वा तु पापसंयुक्तमात्मानं पुरुषर्षभ ।  
> किमुवाच नृगो राजा द्विजौ क्रोधसमन्वितौ ॥ ३ ॥

‘पुरुषप्रवर ! अपनेको शापरूपी पापसे संयुक्त हुआ सुनकर राजा नृगने उन क्रोधी ब्राह्मणोंसे क्या कहा ?’ ॥ ३ ॥

> लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु राघवः पुनरब्रवीत् ।  
> शृणु सौम्य यथा पूर्वं स राजा शापविक्षतः ॥ ४ ॥

लक्ष्मणके इस प्रकार पूछनेपर श्रीरघुनाथजी फिर बोले— ‘सौम्य ! पूर्वकालमें शापग्रस्त होकर राजा नृगने जो कुछ कहा, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥

> अथाध्वनि गतौ विप्रौ विज्ञाय स नृपस्तदा ।  
> आहूय मन्त्रिणः सर्वान् नैगमान् सपुरोधसः ॥ ५ ॥  
> तानुवाच नृगो राजा सर्वाश्च प्रकृतीस्तथा ।  
> दुःखेन सुसमाविष्टः श्रूयतां मे समाहिताः ॥ ६ ॥

‘जब राजा नृगको यह पता लगा कि वे दोनों ब्राह्मण चले गये और कहीं रास्तेमें होंगे, तब उन्होंने मन्त्रियोंको, समस्त पुरवासियोंको, पुरोहितोंको तथा समस्त प्रकृतियोंको भी बुलाकर दुःखसे पीड़ित होकर कहा—‘आपलोग सावधान होकर मेरी बात सुनें—॥ ५-६ ॥

> नारदः पर्वतश्चैव मम दत्त्वा महद्भयम् ।  
> गतौ त्रिभुवनं भद्रौ वायुभूतावनिन्दितौ ॥ ७ ॥

‘‘नारद और पर्वत—ये दोनों कल्याणकारी और अनिन्द्य देवर्षि मेरे पास आये थे । वे दोनों ब्राह्मणोंके दिये हुए शापकी बात बताकर मुझे महान् भय दे वायुके समान तीव्र गतिसे ब्रह्मलोकको चले गये ॥ ७ ॥

> कुमारोऽयं वसुर्नाम स चेहाद्याभिषिच्यताम् ।  
> श्वभ्रं च यत् सुखस्पर्शं क्रियतां शिल्पिभिर्मम ॥ ८ ॥

‘ये जो वसु नामक राजकुमार हैं, इन्हें इस राज्यपर अभिषिक्त कर दिया जाय और कारीगर मेरे लिये एक ऐसा गड्ढा तैयार करें, जिसका स्पर्श सुखद हो ॥ ८ ॥

> यत्राहं संक्षयिष्यामि शापं ब्राह्मणनिःसृतम् ।  
> वर्षघ्नमेकं श्वभ्रं तु हिमघ्नमपरं तथा ॥ ९ ॥  
> ग्रीष्मघ्नं तु सुखस्पर्शमेकं कुर्वन्तु शिल्पिनः ।

‘ब्राह्मणके मुखसे निकले हुए उस शापको वहीं रहकर मैं बिताऊँगा । एक गड्ढा ऐसा होना चाहिये, जो वर्षाके कष्टका निवारण करनेवाला हो । दूसरा सर्दीसे बचानेवाला हो और शिल्पी लोग तीसरा एक ऐसा गड्ढा तैयार करें जो गर्मी-का निवारण करे और जिसका स्पर्श सुखदायक हो ॥ ९½ ॥

> फलवन्तश्च ये वृक्षाः पुष्पवत्यश्च या लताः ॥ १० ॥  
> विरोप्यन्तां बहुविधाश्छायावन्तश्च गुल्मिनः ।  
> क्रियतां रमणीयं च श्वभ्राणां सर्वतोदिशम् ॥ ११ ॥  
> सुखमत्र वसिष्यामि यावत्कालस्य पर्ययः ।  
> पुष्पाणि च सुगन्धीनि क्रियन्तां तेषु नित्यशः ॥ १२ ॥  
> परिवार्य यथा मे स्युरर्ध्वयोजनं तथा ।

‘जो फल देनेवाले वृक्ष हैं और फूल देनेवाली लताएँ हैं, उन्हें उन गड्ढोंमें लगाया जाय । घनी छायावाले अनेक प्रकारके वृक्षोंका वहाँ आरोपण किया जाय । उन गड्ढोंके चारों ओर डेढ़-डेढ़ योजन (छः-छः कोस) की भूमि घेरकर खूब रमणीय बना दी जाय । जबतक शापका समय बीतेगा, तबतक मैं वहीं सुखपूर्वक रहूँगा । उन गड्ढोंमें प्रतिदिन सुगन्धित पुष्प संचित किये जायँ’ ॥ १०-१२½ ॥

> एवं कृत्वा विधानं स संनिवेश्य वसुं तदा ॥ १३ ॥  
> धर्मनित्यः प्रजाः पुत्र क्षत्रधर्मेण पालय ।

‘ऐसी व्यवस्था करके राजकुमार वसुको राजसिंहासनपर बिठाकर राजाने उस समय उनसे कहा—‘बेटा ! तुम प्रतिदिन धर्मपरायण रहकर क्षत्रिय-धर्मके अनुसार प्रजाका पालन करो ॥ १३½ ॥

> प्रत्यक्षं ते तथा शापो द्विजाभ्यां मयि पातितः ॥ १४ ॥  
> नरश्रेष्ठ सरोषाभ्यामपराधेऽपि तादृशे ।  
> मा कृथास्त्वनुसंतापं मत्कृते हि नरर्षभ ॥ १५ ॥  
> कृतान्तः कुशलः पुत्र येनास्मि व्यसनीकृतः ।

‘दोनों ब्राह्मणोंने मुझपर जिस प्रकार शापद्वारा प्रहार किया है, वह तुम्हारी आँखोंके सामने है । नरश्रेष्ठ ! वैसे थोड़ेसे अपराधपर भी रुष्ट होकर उन्होंने मुझे शाप दे दिया है॥ ‘पुरुषप्रवर ! तुम मेरे लिये संताप न करो । बेटा ! जिसने मुझे व्यसनी बनाया—संकटमें डाला है, अपना किया हुआ वह प्राचीन कर्म ही अनुकूल-प्रतिकूल फल देनेमें समर्थ होता है ॥ १५½ ॥

> प्राप्तव्यान्येव प्राप्नोति गन्तव्यान्येव गच्छति ॥ १६ ॥  
> लब्धव्यान्येव लभते दुःखानि च सुखानि च ।  
> पूर्वं जात्यन्तरे वत्स मा विषादं कुरुष्व ह ॥ १७ ॥

‘वत्स ! पूर्वजन्ममें किये गये कर्मके अनुसार मनुष्य उन्हीं वस्तुओंको पाता है, जिन्हें पानेका वह अधिकारी है। उन्हीं स्थानोंपर जाता है, जहाँ जाना उसके लिये अनिवार्य है तथा उन्हीं दुःखों और सुखोंको उपलब्ध करता है, जो उसके लिये नियत हैं; अतः तुम विषाद न करो’ ॥१६-१७॥

> एवमुक्त्वा नृपस्तत्र सुतं राजा महायशाः।  
> श्वभ्रं जगाम सुकृतं वासाय पुरुषर्षभ ॥ १८ ॥

‘नरश्रेष्ठ ! अपने पुत्रसे ऐसा कहकर महायशस्वी नरपाल राजा नृगने अपने रहनेके लिये सुन्दर ढंगसे तैयार किये गये गड्ढेमें प्रवेश किया ॥ १८ ॥

> एवं प्रविश्येव नृपस्तदानीं  
> श्वभ्रं महद्रत्नविभूषितं तत् ।  
> सम्पादयामास तदा महात्मा  
> शापं द्विजाभ्यां हि रुषा विमुक्तम् ॥ १९ ॥

‘इस तरह उस रत्नविभूषित महान् गर्तमें प्रवेश करके उस समय महात्मा राजा नृगने ब्राह्मणोंद्वारा रोषपूर्वक दिये गये उस शापको भोगना आरम्भ किया’ ॥ १९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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