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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 53"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 53

> लक्ष्मणस्य तु तद् वाक्यं निशम्य परमाद्भुतम् ।  
> सुप्रीतश्चाभवद् रामो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १ ॥

लक्ष्मणके उस अत्यन्त अद्भुत वचनको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—॥ १ ॥

> दुर्लभस्त्वीदृशो बन्धुरस्मिन् काले विशेषतः ।  
> यादृशस्त्वं महाबुद्धिर्मम सौम्य मनोऽनुगः ॥ २ ॥

‘सौम्य ! तुम बड़े बुद्धिमान् हो । जैसे तुम मेरे मनका अनुसरण करनेवाले हो, ऐसा भाई विशेषतः इस समय मिलना कठिन है ॥ २ ॥

> यच्च मे हृदये किंचिद् वर्तते शुभलक्षण ।  
> तन्निशामय च श्रुत्वा कुरुष्व वचनं मम ॥ ३ ॥

‘शुभलक्षण लक्ष्मण ! अब मेरे मनमें जो बात है, उसे सुनो और सुनकर वैसा ही करो ॥ ३ ॥

> चत्वारो दिवसाः सौम्य कार्यं पौरजनस्य च ।  
> अकुर्वाणस्य सौमित्रे तन्मे मर्माणि कृन्तति ॥ ४ ॥

‘सौम्य ! सुमित्राकुमार ! मुझे पुरवासियोंका काम किये बिना चार दिन बीत चुके हैं, यह बात मेरे मर्मस्थलको विदीर्ण कर रही है ॥ ४ ॥

> आहूयन्तां प्रकृतयः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा ।  
> कार्यार्थिनश्च पुरुषाः स्त्रियो वा पुरुषर्षभ ॥ ५ ॥

‘पुरुषप्रवर ! तुम प्रजा, पुरोहित और मन्त्रियोंको बुलाओ । जिन पुरुषों अथवा स्त्रियोंको कोई काम हो, उनको उपस्थित करो ॥ ५ ॥

> पौरकार्याणि यो राजा न करोति दिने दिने ।  
> संवृते नरके घोरे पतितो नात्र संशयः ॥ ६ ॥

‘जो राजा प्रतिदिन पुरवासियोंके कार्य नहीं करता, वह निस्संदेह सब ओरसे निश्छिद्र अतएव वायुसंचारसे रहित घोर नरकमें पड़ता है ॥ ६ ॥

> श्रूयते हि पुरा राजा नृगो नाम महायशाः ।  
> बभूव पृथिवीपालो ब्रह्मण्यः सत्यवाक् शुचिः ॥ ७ ॥

‘सुना जाता है पहले इस पृथ्वीपर नृगनामसे प्रसिद्ध एक महायशस्वी राजा राज्य करते थे । वे भूपाल बड़े ब्राह्मण-भक्त, सत्यवादी तथा आचार-विचारसे पवित्र थे ॥ ७ ॥

> स कदाचिद् गवां कोटीः सवत्साः स्वर्णभूषिताः ।  
> नृदेवो भूमिदेवेभ्यः पुष्करेषु ददौ नृपः ॥ ८ ॥

‘उन नरदेवने किसी समय पुष्कर तीर्थमें जाकर ब्राह्मणोंको सुवर्णसे भूषित तथा बछड़ोंसे युक्त एक करोड़ गौएँ दान कीं ॥ ८ ॥

> ततः सङ्गाद् गता धेनुः सवत्सा स्पर्शितानघ ।  
> ब्राह्मणस्याहिताग्नेस्तु दरिद्रस्योञ्छवर्तिनः ॥ ९ ॥

‘निष्पाप लक्ष्मण ! उस समय दूसरी गौओंके साथ-साथ एक दरिद्र, उञ्छवृत्तिसे जीवन निर्वाह करनेवाले एवं अग्निहोत्री ब्राह्मणकी बछड़ेसहित गाय वहाँ चली गयी और राजाने संकल्प करके उसे किसी ब्राह्मणको दे दिया ॥ ९ ॥

> स नष्टां गां क्षुधार्तो वै अन्विषंस्तत्र तत्र ह ।  
> नापश्यत् सर्वराष्ट्रेषु संवत्सरगणान् बहून् ॥ १० ॥

‘वह बेचारा ब्राह्मण भूखसे पीड़ित हो उस खोयी हुई गायको बहुत वर्षोंतक सारे राज्योंमें जहाँ-तहाँ ढूँढ़ता फिरा; परंतु वह उसे नहीं दिखायी दी ॥ १० ॥

> ततः कनखलं गत्वा जीर्णवत्सां निरामयाम् ।  
> ददर्श तां स्विकां धेनुं ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ ११ ॥

‘अन्तमें एक दिन कनखल पहुँचकर उसने अपनी गाय एक ब्राह्मणके घरमें देखी। वह नीरोग और हृष्ट-पुष्ट थी, किंतु उसका बछड़ा बहुत बड़ा हो गया था ॥ ११ ॥

> अथ तां नामधेयेन स्वकेनोवाच ब्राह्मणः।  
> आगच्छ शबलेत्येवं सा तु शुश्राव गौः स्वरम् ॥ १२ ॥

‘ब्राह्मणने अपने रक्खे हुए ‘शबला’ नामसे उसको पुकारा—‘शबले ! आओ ! आओ ।’ गौने उस स्वरको सुना ॥ १२ ॥

> तस्य तं स्वरमाज्ञाय क्षुधार्तस्य द्विजस्य वै।  
> अन्वगात् पृष्ठतः सा गौर्गच्छन्तं पावकोपमम् ॥ १३ ॥

‘भूखसे पीड़ित हुए उस ब्राह्मणके उस परिचित स्वरको पहचानकर वह गौ आगे-आगे जाते हुए उस अग्नितुल्य तेजस्वी ब्राह्मणके पीछे हो ली ॥ १३ ॥

> योऽपि पालयते विप्रःसोऽपि गामन्वगाद् द्रुतम्।  
> गत्वा च तमृषिं चष्टे मम गौरिति सत्वरम् ॥ १४ ॥  
> स्पर्शिता राजसिंहेन मम दत्ता नृगेण ह।

‘जो ब्राह्मण उन दिनों उसका पालन करता था, वह भी तुरंत उस गायका पीछा करता हुआ गया और जाकर उन ब्रह्मर्षिसे बोला—‘ब्रह्मन् ! यह गौ मेरी है। मुझे राजाओंमें श्रेष्ठ नृगने इसे दानमें दिया है’ ॥ १४½ ॥

> तयोर्ब्राह्मणयोर्वादो महानासीद् विपश्चितोः ॥ १५ ॥  
> विवन्दतौ ततोऽन्योन्यं दातारमभिजग्मतुः।

‘फिर तो उन दोनों विद्वान् ब्राह्मणोंमें उस गौको लेकर महान् विवाद खड़ा हो गया। वे दोनों परस्पर लड़ते-झगड़ते हुए उन दानी नरेश नृगके पास गये ॥ १५½ ॥

> तौ राजभवनद्वारि न प्राप्तौ नृगशासनम् ॥ १६ ॥  
> अहोरात्राण्यनेकानि वसन्तौ क्रोधमीयतुः।

‘वहाँ राजभवनके दरवाजेपर जाकर वे कई दिनोंतक टिके रहे, परंतु उन्हें राजाका न्याय नहीं प्राप्त हुआ (वे उनसे मिले ही नहीं)। इससे उन दोनोंको बड़ा क्रोध हुआ॥१६½॥

> ऊचतुश्च महात्मानौ तावुभौ द्विजसत्तमौ ॥ १७ ॥  
> क्रुद्धौ परमसंतप्तौ वाक्यं घोराभिसंहितम्।

‘वे दोनों श्रेष्ठ महात्मा ब्राह्मण अत्यन्त संतप्त और कुपित हो राजाको शाप देते हुए यह घोर वाक्य बोले—॥ १७½ ॥

> अर्थिनां कार्यसिद्ध्यर्थं यस्मात्त्वं नैषि दर्शनम् ॥ १८ ॥  
> अदृश्यः सर्वभूतानां कृकलासो भविष्यसि।  
> बहुवर्षसहस्राणि बहुवर्षशतानि च ॥ १९ ॥  
> श्वभ्रे त्वं कृकलीभूतो दीर्घकालं निवत्स्यसि।

‘राजन् ! अपने विवादका निर्णय करानेकी इच्छासे आये हुए प्रार्थी पुरुषोंके कार्यकी सिद्धिके लिये तुम उन्हें दर्शन नहीं देते हो; इसलिये तुम सब प्राणियोंसे छिपकर रहनेवाले गिरगिट हो जाओगे और सहस्रों वर्षोंके दीर्घकालतक गड्ढेमें गिरगिट होकर ही पड़े रहोगे ॥ १८-१९½ ॥

> उत्पत्स्यते हि लोकेऽस्मिन् यदूनां कीर्तिवर्धनः ॥ २० ॥  
> वासुदेव इति ख्यातो विष्णुः पुरुषविग्रहः।  
> स ते मोक्षयिता शापाद् राजंस्तस्माद् भविष्यसि ॥ २१ ॥  
> कृता च तेन कालेन निष्कृतिस्ते भविष्यति।  
> भारावतरणार्थं हि नरनारायणावुभौ ॥ २२ ॥  
> उत्पत्स्येते महावीर्यौ कलौ युग उपस्थिते।

‘जब यदुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले वासुदेवनामसे विख्यात भगवान् विष्णु पुरुषरूपसे इस जगत्में अवतार लेंगे, उस समय वे ही तुम्हें इस शापसे छुड़ायेंगे, इसलिये इस समय तो तुम गिरगिट हो ही जाओगे, फिर श्रीकृष्णावतारके समयमें ही तुम्हारा उद्धार होगा। कलियुग उपस्थित होनेसे कुछ ही पहले महापराक्रमी नर और नारायण दोनों इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अवतीर्ण होंगे’ ॥ २०—२२½ ॥

> एवं तौ शापमुत्सृज्य ब्राह्मणौ विगतज्वरौ ॥ २३ ॥  
> तां गां हि दुर्बलां वृद्धां ददतुर्ब्राह्मणाय वै।

‘इस प्रकार शाप देकर वे दोनों ब्राह्मण शान्त हो गये। उन्होंने वह बूढ़ी और दुबली गाय किसी ब्राह्मणको दे दी २३

> एवं स राजा तं शापमुपभुङ्क्ते सुदारुणम् ॥ २४ ॥  
> कार्यार्थिनां विमर्दो हि राज्ञां दोषाय कल्पते।

‘इस प्रकार राजा नृग उस अत्यन्त दारुण शापका उपभोग कर रहे हैं। अतः कार्यार्थी पुरुषोंका विवाद यदि निर्णीत न हो तो वह राजाओंके लिये महान् दोषकी प्राप्ति करानेवाला होता है ॥ २४½ ॥

> तच्छीघ्रं दर्शनं मह्यमभिवर्तन्तु कार्यिणः ॥ २५ ॥  
> सुकृतस्य हि कार्यस्य फलं नावैति पार्थिवः।  
> तस्माद् गच्छ प्रतीक्षस्व सौमित्रे कार्यवाञ्जनः ॥ २६ ॥

‘अतः कार्यार्थी मनुष्य शीघ्र मेरे सामने उपस्थित हों। प्रजापालनरूप पुण्यकर्मका फल क्या राजाको नहीं मिलता है ? अवश्य प्राप्त होता है। अतः सुमित्रानन्दन ! तुम जाओ, राजद्वारपर प्रतीक्षा करो कि कौन कार्यार्थी पुरुष आ रहा है’ ॥ २५-२६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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