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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 52"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 52

> तत्र तां रजनीमुष्य केशिन्यां रघुनन्दनः ।  
> प्रभाते पुनरुत्थाय लक्ष्मणः प्रययौ तदा ॥ १ ॥

केशिनीके तटपर वह रात बिताकर रघुनन्दन लक्ष्मण प्रातःकाल उठे और फिर वहाँसे आगे बढ़े ॥ १ ॥

> ततोऽर्धदिवसे प्राप्ते प्रविवेश महारथः ।  
> अयोध्यां रत्नसम्पूर्णां हृष्टपुष्टजनावृताम् ॥ २ ॥

दोपहर होते-होते उनके उस विशाल रथने रत्न-धनसे सम्पन्न तथा हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया ॥ २ ॥

> सौमित्रिस्तु परं दैन्यं जगाम सुमहामतिः ।  
> रामपादौ समासाद्य वक्ष्यामि किमहं गतः ॥ ३ ॥

वहाँ पहुँचकर परम बुद्धिमान् सुमित्राकुमारको बड़ा दुःख हुआ । वे सोचने लगे—‘मैं श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंके समीप जाकर क्या कहूँगा ?’ ॥ ३ ॥

> तस्यैवं चिन्तयानस्य भवनं शशिसंनिभम् ।  
> रामस्य परमोदारं पुरस्तात् समदृश्यत ॥ ४ ॥

वे इस प्रकार सोच-विचार कर ही रहे थे कि चन्द्रमाके समान उज्ज्वल श्रीरामका विशाल राजभवन सामने दिखायी दिया ॥ ४ ॥

> राजस्तु भवनद्वारि सोऽवतीर्य नरोत्तमः ।  
> अवाङ्मुखो दीनमनाः प्रविवेशानिवारितः ॥ ५ ॥

राजमहलके द्वारपर रथसे उतरकर वे नरश्रेष्ठ लक्ष्मण नीचे मुख किये दुखी मनसे बेरोक-टोक भीतर चले गये ॥ ५ ॥

> स दृष्ट्वा राघवं दीनमासीनं परमासने ।  
> नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां ददर्शाग्रजमग्रतः ॥ ६ ॥  
> जग्राह चरणौ तस्य लक्ष्मणो दीनचेतनः ।  
> उवाच दीनया वाचा प्राञ्जलिः सुसमाहितः ॥ ७ ॥

उन्होंने देखा श्रीरघुनाथजी दुखी होकर एक सिंहासनपर बैठे हैं और उनके दोनों नेत्र आँसुओंसे भरे हैं । इस अवस्थामें बड़े भाईको सामने देख दुखी मनसे लक्ष्मणने उनके दोनों पैर पकड़ लिये और हाथ जोड़ चित्तको एकाग्र करके वे दीन वाणीमें बोले—॥ ६-७ ॥

> आर्यस्याज्ञां पुरस्कृत्य विसृज्य जनकात्मजाम् ।  
> गङ्गातीरे यथोद्दिष्टे वाल्मीकेराश्रमे शुभे ॥ ८ ॥  
> तत्र तां च शुभाचारामाश्रमान्ते यशस्विनीम् ।  
> पुनरप्यागतो वीर पादमूलमुपासितुम् ॥ ९ ॥  
> मा शुचः पुरुषव्याघ्र कालस्य गतिरीदृशी ।  
> त्वद्विधा नहि शोचन्ति बुद्धिमन्तो मनस्विनः ॥ १० ॥

‘वीर महाराजकी आज्ञा शिरोधार्य करके मैं उन शुभ आचारवाली, यशस्विनी जनककिशोरी सीताको गङ्गातटपर वाल्मीकिके शुभ आश्रमके समीप निर्दिष्ट स्थानमें छोड़कर पुनः आपके श्रीचरणोंकी सेवाके लिये यहाँ लौट आया हूँ ॥ ‘पुरुषसिंह ! आप शोक न करें । कालकी ऐसी ही गति है । आप-जैसे बुद्धिमान् और मनस्वी मनुष्य शोक नहीं करते हैं ॥ १० ॥

> सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ।  
> संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥ ११ ॥

‘संसारमें जितने संचय हैं, उन सबका अन्त विनाश है, उत्थानका अन्त पतन है, संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है ॥ ११ ॥

> तस्मात् पुत्रेषु दारेषु मित्रेषु च धनेषु च ।  
> नातिप्रसङ्गः कर्तव्यो विप्रयोगो हि तैर्ध्रुवम् ॥ १२ ॥

‘अतः स्त्री, पुत्र, मित्र और धनमें विशेष आसक्ति नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उनसे वियोग होना निश्चित है ॥१२॥

> शक्तस्त्वमात्मनाऽऽत्मानं विनेतुं मनसा मनः ।  
> लोकान् सर्वांश्च काकुत्स्थ किं पुनः शोकमात्मनः ॥१३॥  
> नेदृशेषु विमुह्यन्ति त्वद्विधाः पुरुषर्षभाः ।  
> अपवादः स किल ते पुनरेष्यति राघव ॥ १४ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण ! आप आत्मासे आत्माको, मनसे मनको तथा सम्पूर्ण लोकोंको भी संयत रखनेमें समर्थ हैं; फिर अपने शोकको काबूमें रखना आपके लिये कौन बड़ी बात है !॥ ‘आप-जैसे श्रेष्ठ पुरुष इस तरहके प्रसङ्ग आनेपर मोहित नहीं होते । रघुनन्दन ! यदि आप दुखी रहेंगे तो वह अपवाद आपके ऊपर फिर आ जायगा ॥ १४ ॥

> यदर्थं मैथिली त्यक्ता अपवादभयान्नृप ।  
> सोऽपवादः पुरे राजन् भविष्यति न संशयः ॥ १५ ॥  
> स त्वं पुरुषशार्दूल धैर्येण सुसमाहितः ।  
> त्यजेमां दुर्बलां बुद्धिं संतापं मा कुरुष्व ह ॥ १६ ॥

‘नरेश्वर ! जिस अपवादके भयसे आपने मिथिलेशकुमारीका त्याग किया है, निःसंदेह वह अपवाद इस नगरमें फिर होने लगेगा ( लोग कहेंगे कि दूसरेके घरमें रही हुई स्त्रीका त्याग करके ये रात-दिन उसीकी चिन्तासे दुखी रहते हैं ) ॥ ‘अतः पुरुषसिंह ! आप धैर्यसे चित्तको एकाग्र करके इस दुर्बल शोक-बुद्धिका त्याग करें—संतप्त न हों’ ॥ १६ ॥

> एवमुक्तः स काकुत्स्थो लक्ष्मणेन महात्मना ।  
> उवाच परया प्रीत्या सौमित्रिं मित्रवत्सलः ॥ १७ ॥

महात्मा लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर मित्रवत्सल श्रीरघुनाथजीने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन सुमित्राकुमारसे कहा—॥ १७ ॥

> एवमेतन्नरश्रेष्ठ यथा वदसि लक्ष्मण ।  
> परितोषश्च मे वीर मम कार्यानुशासने ॥ १८ ॥

‘नरश्रेष्ठ वीर लक्ष्मण ! तुम जैसा कहते हो, ठीक ऐसी ही बात है । तुमने मेरे आदेशका पालन किया, इससे मुझे बड़ा संतोष है ॥ १८ ॥

> निवृत्तिश्चागता सौम्य संतापश्च निराकृतः ।  
> भवद्वाक्यैः सुरुचिरैरनुनीतोऽस्मि लक्ष्मण ॥ १९ ॥

‘सौम्य लक्ष्मण ! अब मैं दुःखसे निवृत्त हो गया । संतापको मैंने हृदयसे निकाल दिया और तुम्हारे सुन्दर वचनोंसे मुझे बड़ी शान्ति मिली है’ ॥ १९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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