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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 5"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 5

> सुकेशं धार्मिकं दृष्ट्वा वरलब्धं च राक्षसम् ।  
> ग्रामणीर्नाम गन्धर्वो विश्वावसुसमप्रभः ॥ १ ॥  
> तस्य देववती नाम द्वितीया श्रीरिवात्मजा ।  
> त्रिषु लोकेषु विख्याता रूपयौवनशालिनी ॥ २ ॥  
> तां सुकेशाय धर्मात्मा ददौ रक्षःश्रियं यथा ।

( अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ) तदनन्तर एक दिन विश्वावसुके समान तेजस्वी ग्रामणी नामक गन्धर्वने राक्षस सुकेशको धर्मात्मा तथा वरप्राप्त वैभवसे सम्पन्न देख अपनी देववती नामक कन्याका उसके साथ ब्याह कर दिया । वह कन्या दूसरी लक्ष्मीके समान दिव्य रूप और यौवनसे सुशोभित एवं तीनों लोकोंमें विख्यात थी । धर्मात्मा ग्रामणीने राक्षसोंकी मूर्तिमती राजलक्ष्मीके समान देववतीका हाथ सुकेशके हाथमें दे दिया ॥ १-२½ ॥

> वरदानकृतैश्वर्यं सा तं प्राप्य पतिं प्रियम् ॥ ३ ॥  
> आसीद् देववती तुष्टा धनं प्राप्येव निर्धनः ।

बरदानमें मिले हुए ऐश्वर्यसे सम्पन्न प्रियतम पतिको पाकर देववती बहुत संतुष्ट हुई, मानो किसी निर्धनको धनकी राशि मिल गयी हो ॥ ३½ ॥

> स तया सह संयुक्तो रराज रजनीचरः ॥ ४ ॥  
> अञ्जनादभिनिष्क्रान्तः करेण्वेव महागजः ।  
> ततः काले सुकेशस्तु जनयामास राघव ॥ ५ ॥  
> त्रीन् पुत्राञ्जनयामास त्रेताग्निसमविग्रहान् ।

जैसे अञ्जन नामक दिग्गजसे उत्पन्न कोई महान् गज किसी हथिनीके साथ शोभा पा रहा हो, उसी तरह वह राक्षस गन्धर्व-कन्या देववतीके साथ रहकर अधिक शोभा पाने लगा॥ रघुनन्दन ! तदनन्तर समय आनेपर सुकेशने देववतीके गर्भसे तीन पुत्र उत्पन्न किये, जो तीनों अग्नियोंके समान तेजस्वी थे ॥ ५½ ॥

> माल्यवन्तं सुमालिं च मालिं च बलिनां वरम् ॥ ६ ॥  
> त्रीन् त्रिनेत्रसमान् पुत्रान् राक्षसान् राक्षसाधिपः ।

उनके नाम थे—माल्यवान्, सुमाली और माली । माली बलवानोंमें श्रेष्ठ था । वे तीनों त्रिनेत्रधारी महादेवजीके समान शक्तिशाली थे । उन तीनों राक्षसपुत्रोंको देखकर राक्षसराज सुकेश बड़ा प्रसन्न हुआ ॥ ६½ ॥

> त्रयो लोका इवाव्यग्राः स्थितास्त्रय इवाग्नयः ॥ ७ ॥  
> त्रयो मन्त्रा इवात्युग्रास्त्रयो घोरा इवामयाः ।

वे तीनों लोकोंके समान सुस्थिर, तीन अग्नियोंके समान तेजस्वी, तीन मन्त्रों ( शक्तियों अथवा वेदों³ ) के समान उग्र तथा तीन रोगों⁴के समान अत्यन्त भयंकर थे ॥ ७½ ॥

> त्रयः सुकेशस्य सुतास्त्रेताग्निसमतेजसः ॥ ८ ॥  
> विववृद्धिमगमंस्तत्र व्याधयोपेक्षिता इव ।

सुकेशके वे तीनों पुत्र त्रिविध अग्नियोंके समान तेजस्वी थे । वे वहाँ उसी तरह बढ़ने लगे, जैसे उपेक्षावश दवा न करनेसे रोग बढ़ते हैं ॥ ८½ ॥

> वरप्राप्तिं पितुस्ते तु ज्ञात्वैश्वर्यं तपोबलात् ॥ ९ ॥  
> तपस्तप्तुं गता मेरुं भ्रातरः कृतनिश्चयाः ।

उन्हें जब यह मालूम हुआ कि हमारे पिताको तपोबलके द्वारा वरदान एवं ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई है, तब वे तीनों भाई तपस्या करनेका निश्चय करके मेरुपर्वतपर चले गये ॥ ९½ ॥

> प्रगृह्य नियमान् घोरान् राक्षसा नृपसत्तम ॥ १० ॥  
> विचेरुस्ते तपो घोरं सर्वभूतभयावहम् ।

नृपश्रेष्ठ ! वे राक्षस वहाँ भयंकर नियमोंको ग्रहण करके घोर तपस्या करने लगे । उनकी वह तपस्या समस्त प्राणियोंको भय देनेवाली थी ॥ १०½ ॥

> सत्यार्जवशमोपेतैस्तपोभिर्भुवि दुर्लभैः ॥ ११ ॥  
> संतापयन्तस्त्रींल्लोकान् सदेवासुरमानुषान् ।

सत्य, सरलता एवं शम-दम आदिसे युक्त तपके द्वारा, जो भूतलपर दुर्लभ है, वे देवताओं, असुरों और मनुष्योंसहित तीनों लोकोंको संतप्त करने लगे ॥ ११½ ॥

> ततो विभुश्चतुर्वक्त्रो विमानवरमाश्रितः ॥ १२ ॥  
> सुकेशपुत्रानामन्त्र्य वरदोऽस्मीत्यभाषत ।

तब चार मुखवाले भगवान् ब्रह्मा एक श्रेष्ठ विमानपर बैठकर वहाँ गये और सुकेशके पुत्रोंको सम्बोधित करके बोले--‘मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ‘ ॥ १२½ ॥

> ब्रह्माणं वरदं ज्ञात्वा सेन्द्रैर्देवगणैर्वृतम् ॥ १३ ॥  
> ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे वेपमाना इव द्रुमाः ।

इन्द्र आदि देवताओंसे घिरे हुए वरदायक ब्रह्माजीको आया जान वे सब-के-सब वृक्षोंके समान काँपते हुए हाथ जोड़कर बोले--॥ १३½ ॥

> तपसाऽऽराधितो देव यदि नो दिशसे वरम् ॥ १४ ॥  
> अजेयाः शत्रुहन्तारस्तथैव चिरजीविनः ।  
> प्रभविष्णवो भवामेति परस्परमनुव्रताः ॥ १५ ॥

‘देव ! यदि आप हमारी तपस्यासे आराधित एवं संतुष्ट होकर हमें वर देना चाहते हैं तो ऐसी कृपा कीजिये, जिससे हमें कोई परास्त न कर सके । हम शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ, चिरजीवी तथा प्रभावशाली हों । साथ ही हमलोगोंमें परस्पर प्रेम बना रहे‘ ॥ १४-१५ ॥

> एवं भविष्यथेत्युक्त्वा सुकेशतनयान् विभुः ।  
> स ययौ ब्रह्मलोकाय ब्रह्मा ब्राह्मणवत्सलः ॥ १६ ॥

यह सुनकर ब्रह्माजीने कहा--‘तुम ऐसे ही होओगे‘ । सुकेशके पुत्रोंसे ऐसा कहकर ब्राह्मणवत्सल ब्रह्माजी ब्रह्मलोकको चले गये ॥ १६ ॥

> वरं लब्ध्वा तु ते सर्वे राम रात्रिंचरास्तदा ।  
> सुरासुरान् प्रवाधन्ते वरदानसुनिर्भयाः ॥ १७ ॥

श्रीराम ! वर पाकर वे सब निशाचर उस वरदानसे अत्यन्त निर्भय हो देवताओं तथा असुरोंको भी बहुत कष्ट देने लगे ॥ १७ ॥

> तैर्बाध्यमानास्त्रिदशाः सर्षिसङ्घाः सचारणाः ।  
> त्रातारं नाधिगच्छन्ति निरयस्था यथा नराः ॥ १८ ॥

उनके द्वारा सताये जाते हुए देवता, ऋषि-समुदाय और चारण नरकमें पड़े हुए मनुष्योंके समान किसीको अपना रक्षक या सहायक नहीं पाते थे ॥ १८ ॥

> अथ ते विश्वकर्माणं शिल्पिनां वरमव्ययम् ।  
> ऊचुः समेत्य संहृष्टा राक्षसा रघुसत्तम ॥ १९ ॥

रघुवंशशिरोमणे ! एक दिन शिल्प-कर्मके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ अविनाशी विश्वकर्माके पास जाकर वे राक्षस हर्ष और उत्साहसे भरकर बोले--॥ १९ ॥

> ओजस्तेजोबलवतां महतामात्मतेजसा ।  
> गृहकर्ता भवानेव देवानां हृदयेप्सितम् ॥ २० ॥  
> अस्माकमपि तावत् त्वं गृहं कुरु महामते ।  
> हिमवन्तमुपाश्रित्य मेरुं मन्दरमेव वा ॥ २१ ॥  
> महेश्वरगृहप्रख्यं गृहं नः क्रियतां महत् ।

‘महामते ! जो ओज, बल और तेजसे सम्पन्न होनेके कारण महान् हैं, उन देवताओंके लिये आप ही अपनी शक्तिसे मनोवाञ्छित भवनका निर्माण करते हैं; अतः हमारे लिये भी आप हिमालय, मेरु अथवा मन्दराचलपर चलकर भगवान् शंकरके दिव्य भवनकी भाँति एक विशाल निवासस्थानका निर्माण कीजिये‘ ॥ २०-२१½ ॥

> विश्वकर्मा ततस्तेषां राक्षसानां महाभुजः ॥ २२ ॥  
> निवासं कथयामास शक्रस्येवामरावतीम् ।

यह सुनकर महाबाहु विश्वकर्माने उन राक्षसोंको एक ऐसे निवासस्थानका पता बताया, जो इन्द्रकी अमरावतीको भी लज्जित करनेवाला था ॥ २२½ ॥

> दक्षिणस्योदधेस्तीरे त्रिकूटो नाम पर्वतः ॥ २३ ॥  
> सुवेल इति चाप्यन्यो द्वितीयो राक्षसेश्वरः ।

( वे बोले--)‘राक्षसपतियो ! दक्षिण समुद्रके तटपर एक त्रिकूट नामक पर्वत है और दूसरा सुवेल नामसे विख्यात शैल है ॥ २३½ ॥

> शिखरे तस्य शैलस्य मध्यमेऽम्बुदसंनिभे ॥ २४ ॥  
> शाकुनैरपि दुष्प्रापे टङ्कच्छिन्नचतुर्दिशि ।  
> त्रिंशद्योजनविस्तीर्णा शतयोजनमायता ॥ २५ ॥  
> स्वर्णप्राकारसंवीता हेमतोरणसंवृता ।  
> मया लङ्केति नगरी शक्राज्ञसेन निर्मिता ॥ २६ ॥

‘उस त्रिकूटपर्वतके मझले शिखरपर जो हरा-भरा होनेके कारण मेघके समान नीला दिखायी देता है तथा जिसके चारों ओरके आश्रय टाँकीसे काट दिये गये हैं, अतएव जहाँ पक्षियोंके लिये भी पहुँचना कठिन है, मैंने इन्द्रकी आज्ञासे लङ्का नामक नगरीका निर्माण किया है । वह तीस योजन चौड़ी और सौ योजन लंबी है । उसके चारों ओर सोनेकी चहारदीवारी है और उसमें सोनेके ही फाटक लगे हैं ॥ २४–२६ ॥

> तस्यां वसत दुर्धर्षा यूयं राक्षसपुंगवाः ।  
> अमरावतीं समासाद्य सेन्द्रा इव दिवौकसः ॥ २७ ॥

‘दुर्धर्ष राक्षसशिरोमणियो ! जैसे इन्द्र आदि देवता अमरावतीपुरीका आश्रय लेकर रहते हैं, उसी प्रकार तुम लोग भी उस लङ्कापुरीमें जाकर निवास करो ॥ २७ ॥

> लङ्कादुर्गं समासाद्य राक्षसैर्बहुभिर्वृताः ।  
> भविष्यथ दुराधर्षाः शत्रूणां शत्रुसूदनाः ॥ २८ ॥

‘शत्रुसूदन वीरो ! लङ्काके दुर्गका आश्रय लेकर बहुत-से राक्षसोंके साथ जब तुम निवास करोगे, उस समय शत्रुओंके लिये तुमपर विजय पाना अत्यन्त कठिन होगा’ ॥ २८ ॥

> विश्वकर्मवचः श्रुत्वा ततस्ते राक्षसोत्तमाः ।  
> सहस्रानुचरा भूत्वा गत्वा तामवसन् पुरीम् ॥ २९ ॥

विश्वकर्माकी यह बात सुनकर वे श्रेष्ठ राक्षस सहस्रों अनुचरोंके साथ उस पुरीमें जाकर बस गये ॥ २९ ॥

> दृढप्राकारपरिखां हैमैर्गृहशतैर्वृताम् ।  
> लङ्कामवाप्य ते हृष्टा न्यवसन् रजनीचराः ॥ ३० ॥

उसकी खाई और चहारदीवारी बड़ी मजबूत बनी थी । सोनेके सैकड़ों महल उस नगरीकी शोभा बढ़ा रहे थे । उस लङ्कापुरीमें पहुँचकर वे निशाचर बड़े हर्षके साथ वहाँ रहने लगे ॥ ३० ॥

> एतस्मिन्नेव काले तु यथाकामं च राघव ।  
> नर्मदा नाम गन्धर्वी बभूव रघुनन्दन ॥ ३१ ॥  
> तस्याः कन्यात्रयं ह्यासीद्ध्रीश्रीकीर्तिसमद्युति ।  
> ज्येष्ठक्रमेण सा तेषां राक्षसानामराक्षसी ॥ ३२ ॥  
> कन्यास्तैः प्रददौ हृष्टाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः ।  
> त्रयाणां राक्षसेन्द्राणां तिस्रो गन्धर्वकन्यकाः ॥ ३३ ॥  
> दत्ता मात्रा महाभागा नक्षत्रे भगदैवते ।

रघुकुलनन्दन श्रीराम ! इन्हीं दिनों नर्मदा नामकी एक गन्धर्वी थी । उसके तीन कन्याएँ हुईं, जो ह्री, श्री और कीर्ति* के समान शोभासम्पन्न थीं । इनकी माता यद्यपि राक्षसी नहीं थी तो भी उसने अपनी रुचिके अनुसार सुकेशके उन तीनों राक्षसजातीय पुत्रोंके साथ अपनी कन्याओंका ज्येष्ठ आदि अवस्थाके अनुसार विवाह कर दिया । वे कन्याएँ बहुत प्रसन्न थीं । उनके मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर थे ॥ माता नर्मदाने उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें उन तीनों महा-भाग्यवती गन्धर्व-कन्याओंको उन तीनों राक्षसराजोंके हाथमें दे दिया ॥ ३३½ ॥

> कृतदारास्तु ते राम सुकेशतनयास्तदा ॥ ३४ ॥  
> चिक्रीडुः सह भार्याभिरप्सरोभिरिवामराः ।

श्रीराम ! जैसे देवता अप्सराओंके साथ क्रीड़ा करते हैं, उसी प्रकार सुकेशके पुत्र विवाहके पश्चात् अपनी उन पत्नियोंके साथ रहकर लौकिक सुखका उपभोग करने लगे ॥३४½॥

> ततो माल्यवतो भार्या सुन्दरी नाम सुन्दरी ॥ ३५ ॥  
> स तस्यां जनयामास यदपत्यं निबोध तत् ।  
> वज्रमुष्टिर्विरूपाक्षो दुर्मुखश्चैव राक्षसः ॥ ३६ ॥  
> सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च मत्तोन्मत्तौ तथैव च ।  
> अनला चाभवत् कन्या सुन्दर्यां राम सुन्दरी ॥ ३७ ॥

उनमें माल्यवान्की स्त्रीका नाम सुन्दरी था । वह अपने नामके अनुरूप ही परम सुन्दरी थी । माल्यवान्ने उसके गर्भसे जिन संतानोंको जन्म दिया, उन्हें बता रहा हूँ; सुनिये ॥ वज्रमुष्टि, विरूपाक्ष, राक्षस दुर्मुख, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, मत्त और उन्मत्त—ये सात पुत्र थे । श्रीराम ! इनके अतिरिक्त सुन्दरीके गर्भसे अनला नामवाली एक सुन्दरी कन्या भी उत्पन्न हुई थी ॥ ३६-३७ ॥

> सुमालिनोऽपि भार्याऽऽसीत् पूर्णचन्द्रनिभानना ।  
> नाम्ना केतुमती राम प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ ३८ ॥

सुमालीकी पत्नी भी बड़ी सुन्दरी थी । उसका मुख पूर्णचन्द्रमाके समान मनोहर और नाम केतुमती था । सुमालीको वह प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी ॥ ३८ ॥

> सुमाली जनयामास यदपत्यं निशाचरः ।  
> केतुमत्यां महाराज तन्निबोधानुपूर्वशः ॥ ३९ ॥

महाराज ! निशाचर सुमालीने केतुमतीके गर्भसे जो संतानें उत्पन्न की थीं, उनका भी क्रमशः परिचय दिया जा जा रहा है, सुनिये ॥ ३९ ॥

> प्रहस्तोऽकम्पनश्चैव विकटः कालिकामुखः ।  
> धूम्राक्षश्चैव दण्डश्च सुपार्श्वश्च महाबलः ॥ ४० ॥  
> संह्रादिः प्रघसश्चैव भासकर्णश्च राक्षसः ।  
> राका पुष्पोत्कटा चैव कैकसी च शुचिस्मिताः ॥ ४१ ॥  
> कुम्भीनसी च इत्येते सुमालेः प्रसवाः स्मृताः ॥ ४२ ॥

प्रहस्त, अकम्पन, विकट, कालिकामुख, धूम्राक्ष, दण्ड, महाबली सुपार्श्व, संह्रादि, प्रघस तथा राक्षस भासकर्ण—ये सुमालीके पुत्र थे और राका, पुष्पोत्कटा, कैकसी और कुम्भीनसी—ये चार पवित्र मुस्कानवाली उसकी कन्याएँ थीं । ये सब सुमालीकी संतानें बतायी गयी हैं ॥ ४०–४२ ॥

> मालेस्तु वसुदा नाम गन्धर्वी रूपशालिनी ।  
> भार्यासीत् पद्मपत्राक्षी स्वक्षी यक्षीवरोपमा ॥ ४३ ॥

मालीकी पत्नी गन्धर्वकन्या वसुदा थी, जो अपने रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित होती थी । उसके नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान विशाल एवं सुन्दर थे। वह श्रेष्ठ यक्ष-पत्नियोंके समान सुन्दरी थी ॥ ४३ ॥

> सुमालेरनुजस्तस्यां जनयामास यत् प्रभो।  
> अपत्यं कथ्यमानं तु मया त्वं शृणु राघव ॥ ४४ ॥

प्रभो ! रघुनन्दन ! सुमालीके छोटे भाई मालीने वसुदाके गर्भसे जो संतति उत्पन्न की थी, उसका मैं वर्णन कर रहा हूँ; आप सुनिये ॥ ४४ ॥

> अनलश्चानिलश्चैव हरः सम्पातिरेव च।  
> एते विभीषणामात्या मालेयास्ते निशाचराः ॥ ४५ ॥

अनल, अनिल, हर और सम्पाति—ये चार निशाचर मालीके ही पुत्र थे, जो इस समय विभीषणके मन्त्री हैं ॥ ४५ ॥

> ततस्तु ते राक्षसपुङ्गवास्त्रयो  
> निशाचरैः पुत्रशतैश्च संवृताः।  
> सुरान् सहेन्द्रानृषिनागयक्षान्  
> बबाधिरे तान् बहुवीर्यदर्पिताः ॥ ४६ ॥

माल्यवान् आदि तीनों श्रेष्ठ राक्षस अपने सैकड़ों पुत्रों तथा अन्यान्य निशाचरोंके साथ रहकर अपने बाहुबलके अभिमानसे युक्त हो इन्द्र आदि देवताओं, ऋषियों, नागों तथा यक्षोंको पीड़ा देने लगे ॥ ४६ ॥

> जगद्भ्रमन्तोऽनिलवद् दुरासदा  
> रणेषु मृत्युप्रतिमानतेजसः।  
> वरप्रदानादपि गर्विता भृशं  
> क्रतुक्रियाणां प्रशमंकराः सदा ॥ ४७ ॥

वे वायुकी भाँति सारे संसारमें विचरनेवाले थे । युद्धमें उन्हें जीतना बहुत ही कठिन था। वे मृत्युके तुल्य तेजस्वी थे। वरदान मिल जानेसे भी उनका घमंड बहुत बढ़ गया था; अतः वे यज्ञादि क्रियाओंका सदा अत्यन्त विनाश किया करते थे ॥ ४७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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