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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 48"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 48

> लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा दारुणं जनकात्मजा ।  
> परं विषादमागम्य वैदेही निपपात ह ॥ १ ॥

‘लक्ष्मणजीका यह कठोर वचन सुनकर जनककिशोरी सीताको बड़ा दुःख हुआ । वे मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ १ ॥

> सा मुहूर्तमिवासंज्ञा बाष्पपर्याकुलेक्षणा ।  
> लक्ष्मणं दीनया वाचा उवाच जनकात्मजा ॥ २ ॥

‘दो घड़ीतक उन्हें होश नहीं हुआ । उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी अजस्र धारा बहती रही । फिर होशमें आनेपर जनककिशोरी दीन वाणीमें लक्ष्मणसे बोलीं—॥ २ ॥

> मामिकेयं तनुर्नूनं सृष्टा दुःखाय लक्ष्मण ।  
> धात्रा यस्यास्तथा मेऽद्य दुःखमूर्तिः प्रदृश्यते ॥ ३ ॥

‘लक्ष्मण ! निश्चय ही विधाताने मेरे शरीरको केवल दुःख भोगनेके लिये ही रचा है । इसीलिये आज सारे दुःखोंका समूह मूर्तिमान् होकर मुझे दर्शन दे रहा है ॥ ३ ॥

> किं नु पापं कृतं पूर्वे को वा दारैर्वियोजितः ।  
> याहं शुद्धसमाचारा त्यक्ता नृपतिना सती ॥ ४ ॥

‘मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा ऐसा पाप किया था अथवा किसका स्त्रीसे विछोह कराया था, जो शुद्ध आचरणवाली होनेपर भी महाराजने मुझे त्याग दिया है ॥ ४ ॥

> पुराहमाश्रमे वासं रामपादानुवर्तिनी ।  
> अनुरुध्यापि सौमित्रे दुःखे च परिवर्तिनी ॥ ५ ॥

‘सुमित्रानन्दन ! पहले मैंने वनवासके दुःखमें पड़कर भी उसे सहकर श्रीरामके चरणोंका अनुसरण करते हुए आश्रममें रहना पसंद किया था ॥ ५ ॥

> सा कथं ह्याश्रमे सौम्य वत्स्यामि विजनीकृता ।  
> आख्यास्यामि च कस्याहं दुःखं दुःखपरायणा ॥ ६ ॥

‘किंतु सौम्य ! अब मैं अकेली प्रियजनोंसे रहित हो किस तरह आश्रममें निवास करूँगी ? और दुःखमें पड़नेपर किससे अपना दुःख कहूँगी ॥ ६ ॥

> किं नु वक्ष्यामि मुनिषु कर्म चासत्कृतं प्रभो ।  
> कस्मिन् वा कारणे त्यक्ता राघवेण महात्मना ॥ ७ ॥

‘प्रभो ! यदि मुनिजन मुझसे पूछेंगे कि महात्मा श्रीरघुनाथजीने किस अपराधपर तुम्हें त्याग दिया है तो मैं उन्हें अपना कौन-सा अपराध बताऊँगी ॥ ७ ॥

> न खल्वद्यैव सौमित्रे जीवितं जाह्नवीजले ।  
> त्यजेयं राजवंशस्तु भर्तुर्मे परिहास्यते ॥ ८ ॥

‘सुमित्राकुमार ! मैं अपने जीवनको अभी गङ्गाजीके जलमें विसर्जन कर देती; किंतु इस समय ऐसा अभी नहीं कर सकूँगी; क्योंकि ऐसा करनेसे मेरे पतिदेवका राजवंश नष्ट हो जायगा ॥ ८ ॥

> यथाज्ञं कुरु सौमित्रे त्यज्य मां दुःखभागिनीम् ।  
> निदेशे स्थीयतां राज्ञः शृणु चेदं वचो मम ॥ ९ ॥

‘किंतु सुमित्रानन्दन ! तुम तो वही करो, जैसी महाराजने तुम्हें आज्ञा दी है । तुम मुझ दुखियाको यहाँ छोड़कर महाराजकी आज्ञाके पालनमें ही स्थिर रहो और मेरी यह बात सुनो—॥ ९ ॥

> श्वश्रूणामविशेषेण प्राञ्जलिप्रग्रहेण च ।  
> शिरसा वन्द्य चरणौ कुशलं ब्रूहि पार्थिवम् ॥ १० ॥  
> शिरसाभिनतो ब्रूयाः सर्वासामेव लक्ष्मण ।  
> वक्तव्यश्चापि नृपतिर्धर्मेषु सुसमाहितः ॥ ११ ॥

‘मेरी सब सासुओंको समानरूपसे हाथ जोड़कर मेरी ओरसे उनके चरणोंमें प्रणाम करना । साथ ही महाराजके भी चरणोंमें मस्तक नवाकर मेरी ओरसे उनकी कुशल पूछना॥ ‘लक्ष्मण ! तुम अन्तःपुरकी सभी वन्दनीया स्त्रियोंको मेरी ओरसे प्रणाम करके मेरा समाचार उन्हें सुना देना तथा जो सदा धर्म-पालनके लिये सावधान रहते हैं, उन महाराजको भी मेरा यह संदेश सुना देना ॥ ११ ॥

> जानासि च यथा शुद्धा सीता तत्त्वेन राघव ।  
> भक्त्या च परया युक्ता हिता च तव नित्यशः ॥ १२ ॥

‘रघुनन्दन ! वास्तवमें तो आप जानते ही हैं कि सीता शुद्धचरित्रा है । सर्वदा ही आपके हितमें तत्पर रहती है और आपके प्रति परम प्रेमभक्ति रखनेवाली है ॥ १२ ॥

> अहं त्यक्ता च ते वीर अयशोभीरुणा जने ।  
> यच्च ते वचनीयं स्यादपवादः समुत्थितः ॥ १३ ॥  
> मया च परिहर्तव्यं त्वं हि मे परमा गतिः ।

‘वीर ! आपने अपयशसे डरकर ही मुझे त्यागा है; अतः लोगोंमें आपकी जो निन्दा हो रही है अथवा मेरे कारण जो अपवाद फैल रहा है, उसे दूर करना मेरा भी कर्तव्य है; क्योंकि मेरे परम आश्रय आप ही हैं ॥ १३½ ॥

> वक्तव्यश्चैव नृपतिर्धर्मेण सुसमाहितः ॥ १४ ॥  
> यथा भ्रातृषु वर्तेथास्तथा पौरेषु नित्यदा ।  
> परमो होष धर्मस्ते तस्मात् कीर्तिरनुत्तमा ॥ १५ ॥

‘लक्ष्मण ! तुम महाराजसे कहना कि आप धर्मपूर्वक बड़ी सावधानीसे रहकर पुरवासियोंके साथ वैसा ही बर्ताव करें, जैसा अपने भाइयोंके साथ करते हैं । यही आपका परम धर्म है और इसीसे आपको परम उत्तम यशकी प्राप्ति हो सकती है ॥ १४-१५ ॥

> यत्तु पौरजने राजन् धर्मेण समवाप्नुयात् ।  
> अहं तु नानुशोचामि स्वशरीरं नरर्षभ ॥ १६ ॥

‘राजन् ! पुरवासियोंके प्रति धर्मानुकूल आचरण करनेसे जो पुण्य प्राप्त होगा, वही आपके लिये उत्तम धर्म और कीर्ति है । पुरुषोत्तम ! मुझे अपने शरीरके लिये कुछ भी चिन्ता नहीं है ॥ १६ ॥

> यथापवादं पौराणां तथैव रघुनन्दन ।  
> पतिर्हि देवता नार्याः पतिर्बन्धुः पतिर्गुरुः ॥ १७ ॥  
> प्राणैरपि प्रियं तस्माद् भर्तुः कार्यं विशेषतः ।

‘रघुनन्दन ! जिस तरह पुरवासियोंके अपवादसे बचकर रहा जा सके, उसी तरह आप रहें । स्त्रीके लिये तो पति ही देवता है, पति ही बन्धु है और पति ही गुरु है । इसलिये उसे प्राणोंकी बाजी लगाकर भी विशेषरूपसे पतिका प्रिय करना चाहिये ॥ १७½ ॥

> इति मद्वचनाद् रामो वक्तव्यो मम संग्रहः ॥ १८ ॥  
> निरीक्ष्य माच गच्छ त्वमृतुकालातिवर्तिनीम् ।

‘मेरी ओरसे सारी बातें तुम श्रीरघुनाथजीसे कहना और आज तुम भी मुझे देख जाओ । मैं इस समय ऋतुकालका उल्लङ्घन करके गर्भवती हो चुकी हूँ’ ॥ १८½ ॥

> एवं ब्रुवन्त्यां सीतायां लक्ष्मणो दीनचेतनः ॥ १९ ॥  
> शिरसा वन्द्य धरणीं व्याहर्तुं न शशाक ह ।

सीताके इस प्रकार कहनेपर लक्ष्मणका मन बहुत दुखी हो गया । उन्होंने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया । उस समय उनके मुखसे कोई भी बात नहीं निकल सकी ॥१९½॥

> प्रदक्षिणं च तां कृत्वा रुदन्नेव महास्वनः ॥ २० ॥  
> ध्यात्वा मुहूर्तं तामाह किं मां वक्ष्यसि शोभने ।

उन्होंने जोर-जोरसे रोते हुए ही सीता माताकी परिक्रमा की और दो घड़ीतक सोच-विचारकर उनसे कहा—‘शोभने ! आप यह मुझसे क्या कह रही हैं ? ॥ २०½ ॥

> दृष्टपूर्वं न ते रूपं पादौ दृष्टौ तवानघे ॥ २१ ॥  
> कथमत्र हि पश्यामि रामेण रहितां वने ।

‘निष्पाप पतिव्रते ! मैंने पहले भी आपका सम्पूर्ण रूप कभी नहीं देखा है । केवल आपके चरणोंके ही दर्शन किये हैं । फिर आज यहाँ वनके भीतर श्रीरामचन्द्रजीकी अनुपस्थितिमें मैं आपकी ओर कैसे देख सकता हूँ’ ॥ २१½ ॥

> इत्युक्त्वा तां नमस्कृत्य पुनर्नावमुपारुहत् ॥ २२ ॥  
> आरुरोह पुनर्नावं नाविकं चाभ्यचोदयत् ।

यह कहकर उन्होंने सीताजीको पुनः प्रणाम किया और फिर वे नावपर चढ़ गये । नावपर चढ़कर उन्होंने मल्लाहको उसे चलानेकी आज्ञा दी ॥ २२½ ॥

> स गत्वा चोत्तरं तीरं शोकभारसमन्वितः ॥ २३ ॥  
> सम्मूढ इव दुःखेन रथमध्यारुहद् द्रुतम् ।

शोकके भारसे दबे हुए लक्ष्मण गङ्गाजीके उत्तरी तटपर पहुँचकर दुःखके कारण अचेत-से हो गये और उसी अवस्थामें जल्दीसे रथपर चढ़ गये ॥ २३½ ॥

> मुहुर्मुहुः परावृत्य दृष्ट्वा सीतामनाथवत् ॥ २४ ॥  
> चेष्टन्तीं परतीरस्थां लक्ष्मणः प्रययावथ ।

सीता गङ्गाजीके दूसरे तटपर अनाथकी तरह रोती हुई धरतीपर लोट रही थीं । लक्ष्मण बार-बार मुँह घुमाकर उनकी ओर देखते हुए चल दिये ॥ २४½ ॥

> दूरस्थं रथमालोक्य लक्ष्मणं च मुहुर्मुहुः ।  
> निरीक्ष्यमाणां तूद्विग्नां सीतां शोकः समाविशत्॥२५॥

रथ और लक्ष्मण क्रमशः दूर होते गये । सीता उनकी ओर बारंबार देखकर उद्विग्न हो उठीं । उनके अदृश्य होते ही उनपर गहरा शोक छा गया ॥ २५ ॥

> सा दुःखभारावनता यशस्विनी  
> यशोधरा नाथमपश्यती सती ।  
> रुरोद सा बर्हिणनादिते वने  
> महास्वनं दुःखपरायणा सती ॥ २६ ॥

अब उन्हें कोई भी अपना रक्षक नहीं दिखायी दिया । अतः यशको धारण करनेवाली वे यशस्विनी सती सीता दुःखके भारी भारसे दबकर चिन्तामग्न हो मयूरोंके कलनादसे गूँजते हुए उस वनमें जोर-जोरसे रोने लगीं ॥ २६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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