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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 46"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 46

> ततो रजन्यां व्युष्टायां लक्ष्मणो दीनचेतनः ।  
> सुमन्त्रमब्रवीद् वाक्यं मुखेन परिशुष्यता ॥ १ ॥

तदनन्तर जब रात बीती और सवेरा हुआ, तब लक्ष्मणने मन-ही-मन दुखी हो सूखे मुखसे सुमन्त्रसे कहा—॥ १ ॥

> सारथे तुरगाञ्शीघ्रान् योजयस्व रथोत्तमे ।  
> स्त्रास्तीर्णं राजवचनात् सीतायाश्वासनं शुभम् ॥ २ ॥  
> सीता हि राजवचनादाश्रमं पुण्यकर्मणाम् ।  
> मया नेया महर्षीणां शीघ्रमानीयतां रथः ॥ ३ ॥

‘सारथे ! एक उत्तम रथमें शीघ्रगामी घोड़ोंको जोतो और उस रथमें सीताजीके लिये सुन्दर आसन बिछा दो। मैं महाराजकी आज्ञासे सीतादेवीको पुण्यकर्मा महर्षियोंके आश्रमपर पहुँचा दूँगा । तुम शीघ्र रथ ले आओ’ ॥ २-३ ॥

> सुमन्त्रस्तु तथेत्युक्त्वा युक्तं परमवाजिभिः ।  
> रथं सुरुचिरप्रख्यं स्वास्तीर्णं सुखशय्यया ॥ ४ ॥

तब सुमन्त्र ‘बहुत अच्छा’ कहकर तुरंत ही उत्तम घोड़ोंसे जुता हुआ एक सुन्दर रथ ले आये, जिसपर सुखद शय्यासे युक्त सुन्दर बिछावन बिछा हुआ था ॥ ४ ॥

> आनीयोवाच सौमित्रिं मित्राणां मानवर्धनम् ।  
> रथोऽयं समनुप्राप्तो यत्कार्यं क्रियतां प्रभो ॥ ५ ॥

उसे लाकर वे मित्रोंका मान बढ़ानेवाले सुमित्राकुमारसे बोले——‘प्रभो ! यह रथ आ गया । अब जो कुछ करना हो कीजिये’ ॥ ५ ॥

> एवमुक्तः सुमन्त्रेण राजवेश्मनि लक्ष्मणः ।  
> प्रविश्य सीतामासाद्य व्याजहार नरर्षभः ॥ ६ ॥

सुमन्त्रके ऐसा कहनेपर नरश्रेष्ठ लक्ष्मण राजमहलमें गये और सीताजीके पास जाकर बोले--॥ ६ ॥

> त्वया किलैष नृपतिर्वरं वै याचितः प्रभुः ।  
> नृपेण च प्रतिज्ञातमाश्रमेष्वाश्रमं प्रति ॥ ७ ॥

‘देवि ! आपने महाराजसे मुनियोंके आश्रमोंपर जानेके लिये वर माँगा था और महाराजने आपको आश्रमपर पहुँचानेके लिये प्रतिज्ञा की थी ॥ ७ ॥

> गङ्गातीरे मया देवि ऋषीणामाश्रमाञ्शुभान् ।  
> शीघ्रं गत्वा तु वैदेहि शासनात् पार्थिवस्य नः ॥ ८ ॥  
> अरण्ये मुनिभिर्जुष्टे अवनेया भविष्यसि ।

‘देवि ! विदेहनन्दिनि ! उस बातचीतके अनुसार मैं राजाकी आज्ञासे शीघ्र ही गङ्गातटपर ऋषियोंके सुन्दर आश्रमोंतक चलूँगा और आपको मुनिजनसेवित वनमें पहुँचाऊँगा’ ।८½॥

> एवमुक्ता तु वैदेही लक्ष्मणेन महात्मना ॥ ९ ॥  
> प्रहर्षमतुलं लेभे गमनं चाप्यरोचयत् ।

महात्मा लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर विदेहनन्दिनी सीताको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ । वे चलनेको तैयार हो गयीं ॥ ९½॥

> वासांसि च महार्हाणि रत्नानि विविधानि च ॥ १० ॥  
> गृहीत्वा तानि वैदेही गमनायोपचक्रमे ।  
> इमानि मुनिपत्नीनां दास्याम्याभरणान्यहम् ॥ ११ ॥  
> वस्त्राणि च महार्हाणि धनानि विविधानि च ।

बहुमूल्य वस्त्र और नाना प्रकारके रत्न लेकर वैदेही सीता वनकी यात्राके लिये उद्यत हो गयीं और लक्ष्मणसे बोलीं—‘ये सब बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और नाना प्रकारके रत्न-धन मैं मुनि-पत्नियोंको दूँगी’ ॥ १०-११½ ॥

> सौमित्रिस्तु तथेत्युक्त्वा रथमारोप्य मैथिलीम् ॥ १२ ॥  
> प्रययौ शीघ्रतुरगं रामस्याज्ञामनुस्मरन् ।

लक्ष्मणने ‘बहुत अच्छा’ कहकर मिथिलेशकुमारी सीताको रथपर चढ़ाया और श्रीरघुनाथजीकी आज्ञाको ध्यानमें रखते हुए उस तेज घोड़ोंवाले रथपर चढ़कर वे वनकी ओर चल दिये ॥ १२½ ॥

> अब्रवीच्च तदा सीता लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम् ॥ १३ ॥  
> अशुभानि बहून्येव पश्यामि रघुनन्दन ।  
> नयनं मे स्फुरत्यद्य गात्रोत्कम्पश्च जायते ॥ १४ ॥  
> हृदयं चैव सौमित्रे अस्वस्थमिव लक्षये ।  
> औत्सुक्यं परमं चापि अधृतिश्च परा मम ॥ १५ ॥

उस समय सीताने लक्ष्मीवर्धन लक्ष्मणसे कहा ‘रघुनन्दन ! मुझे बहुत-से अपशकुन दिखायी देते हैं । आज मेरी दायीं आँख फड़कती है और मेरे शरीरमें कम्प हो रहा है ।१३-१४। ‘सुमित्राकुमार ! मैं अपने हृदयको अस्वस्थ-सा देख रही हूँ । मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है और मेरी अधीरता पराकाष्ठाको पहुँची हुई है ॥ १५ ॥

> शून्यामेव च पश्यामि पृथिवीं पृथुलोचन ।  
> अपि स्वस्ति भवेत् तस्य भ्रातुस्ते भ्रातृवत्सल ॥ १६ ॥

‘विशाललोचन लक्ष्मण ! मुझे पृथ्वी सूनी-सी ही दिखायी देती है । भ्रातृवत्सल ! तुम्हारे भाई कुशलसे रहें ॥ १६ ॥

> श्वश्रूणां चैव मे वीर सर्वासामविशेषतः ।  
> पुरे जनपदे चैव कुशलं प्राणिनामपि ॥ १७ ॥

‘वीर ! मेरी सब सासुएँ समान रूपसे सानन्द रहें । नगर और जनपदमें भी समस्त प्राणी सकुशल रहें’ ॥ १७ ॥

> इत्यञ्जलिकृता सीता देवता अभ्ययाचत ।  
> लक्ष्मणोऽर्थं ततः श्रुत्वा शिरसा वन्द्य मैथिलीम् ॥ १८ ॥  
> शिवमित्यब्रवीद्धृष्टो हृदयेन विशुष्यता ।

ऐसा कहती हुई सीताने हाथ जोड़कर देवताओंसे प्रार्थना की । सीताकी बात सुनकर लक्ष्मणने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और ऊपरसे प्रसन्न हो मुर्झाये हुए हृदयसे कहा–– ‘सबका कल्याण हो’ ॥ १८½ ॥

> ततो वासमुपागम्य गोमतीतीर आश्रमे ॥ १९ ॥  
> प्रभाते पुनरुत्थाय सौमित्रिः सूतमब्रवीत् ।

तदनन्तर गोमतीके तटपर पहुँचकर एक आश्रममें उन सबने रात बितायी । फिर प्रातःकाल उठकर सुमित्राकुमारने सारथिसे कहा––॥ १९½ ॥

> योजयस्व रथं शीघ्रमद्य भागीरथीजलम् ॥ २० ॥  
> शिरसा धारयिष्यामि त्र्यम्बक इवौजसा ।

‘सारथे ! जल्दी रथ जोतो । आज मैं भागीरथीके जलको उसी प्रकार सिरपर धारण करूँगा; जैसे भगवान् शङ्करने अपने तेजसे उसे मस्तकपर धारण किया था’ ॥ २०½ ॥

> सोऽश्वान् विचारयित्वा तु रथे युक्तान् मनोजवान् ॥ २१ ॥  
> आरोहस्वेति वैदेहीं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।

सारथिने मनके समान वेगशाली चारों घोड़ोंको टहलाकर रथमें जोता और विदेहनन्दिनी सीतासे हाथ जोड़कर कहा–– ‘देवि ! रथपर आरूढ़ होइये’ ॥ २१½ ॥

> सा तु सूतस्य वचनादारुरोह रथोत्तमम् ॥ २२ ॥  
> सीता सौमित्रिणा सार्धं सुमन्त्रेण च धीमता ।  
> आससाद विशालाक्षी गङ्गां पापविनाशिनीम् ॥ २३ ॥

सूतके कहनेसे देवी सीता उस उत्तम रथपर सवार हुईं । इस प्रकार सुमित्राकुमार लक्ष्मण और बुद्धिमान् सुमन्त्रके साथ विशाललोचना सीतादेवी पापनाशिनी गङ्गाके तटपर जा पहुँचीं ॥ २२-२३ ॥

> अथार्धदिवसे गत्वा भागीरथ्या जलाशयम् ।  
> निरीक्ष्य लक्ष्मणो दीनः प्ररुरोद महास्वनः ॥ २४ ॥

दोपहरके समय भागीरथीकी जलधारातक पहुँचकर लक्ष्मण उसकी ओर देखते हुए दुखी हो उच्चस्वरसे फूट-फूटकर रोने लगे ॥ २४ ॥

> सीता तु परमायत्ता दृष्ट्वा लक्ष्मणमातुरम् ।  
> उवाच वाक्यं धर्मज्ञा किमिदं रुद्यते त्वया ॥ २५ ॥  
> जाह्नवीतीरमासाद्य चिराभिलषितं मम ।  
> हर्षकाले किमर्थं मां विषादयसि लक्ष्मण ॥ २६ ॥

लक्ष्मणको शोकसे आतुर देख धर्मज्ञा सीता अत्यन्त चिन्तित हो उनसे बोलीं––‘लक्ष्मण ! यह क्या ? तुम रोते क्यों हो ? गङ्गाके तटपर आकर तो मेरी चिरकालकी अभिलाषा पूर्ण हुई है । इस हर्षके समय तुम रोकर मुझे दुखी क्यों करते हो ? ॥ २५-२६ ॥

> नित्यं त्वं रामपार्श्वेषु वर्तसे पुरुषर्षभ ।  
> कच्चिद् विनाकृतस्तेन द्विरात्रं शोकमागतः ॥ २७ ॥

‘पुरुषप्रवर । श्रीरामके पास तो तुम सदा ही रहते हो । क्या दो दिन तक उनसे बिछुड़ जानेके कारण तुम इतने शोकाकुल हो गये हो ? ॥ २७ ॥

> ममापि दयितो रामो जीवितादपि लक्ष्मण ।  
> न चाहमेवं शोचामि मैवं त्वं बालिशो भव ॥ २८ ॥

‘लक्ष्मण ! श्रीराम तो मुझे भी अपने प्राणोंसे बढ़कर प्रिय हैं; परंतु मैं तो इस प्रकार शोक नहीं कर रही हूँ । तुम ऐसे नादान न बनो ॥ २८ ॥

> तारयस्व च मां गङ्गां दर्शयस्व च तापसान् ।  
> ततो मुनिभ्यो वासांसि दास्याम्याभरणानि च ॥ २९ ॥

‘मुझे गङ्गाके उस पार ले चलो और तपस्वी मुनियोंके दर्शन कराओ । मैं उन्हें वस्त्र और आभूषण दूँगी ॥ २९ ॥

> ततः कृत्वा महर्षीणां यथार्हमभिवादनम् ।  
> तत्र चैकां निशामुष्य यास्यामस्तां पुरीं पुनः ॥ ३० ॥

‘तत्पश्चात् उन महर्षियोंका यथायोग्य अभिवादन करके वहाँ एक रात ठहरकर हम पुनः अयोध्यापुरीको लौट चलेंगे ॥ ३० ॥

> ममापि पद्मपत्राक्षं सिंहोरस्कं कृशोदरम् ।  
> त्वरते हि मनो द्रष्टुं रामं रमयतां वरम् ॥ ३१ ॥

‘मेरा मन भी सिंहके समान वक्षःस्थल, कृश उदर और कमलके समान नेत्रवाले श्रीरामको, जो मनको रमानेवालोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, देखनेके लिये उतावला हो रहा है’ ॥ ३१ ॥

> तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा प्रमृज्य नयने शुभे ।  
> नाविकानाह्वयामास लक्ष्मणः परवीरहा ।  
> इयं च सज्जा नौश्चेति दाशाः प्राञ्जलयोऽब्रुवन् ॥ ३२ ॥

सीताजीका यह वचन सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने अपनी दोनों सुन्दर आँखें पोंछ लीं और नाविकोंको बुलाया । उन मल्लाहोंने हाथ जोड़कर कहा––‘प्रभो ! यह नाव तैयार है’ ॥ ३२ ॥

> तितीर्षुर्लक्ष्मणो गङ्गां शुभां नावमुपारुहत् ।  
> गङ्गां संतारयामास लक्ष्मणस्तां समाहितः ॥ ३३ ॥

लक्ष्मण गङ्गाजीको पार करनेके लिये सीताजीके साथ उस सुन्दर नौकापर बैठे और बड़ी सावधानीके साथ उन्होंने सीताको गङ्गाजीके उस पार पहुँचाया ॥ ३३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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