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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 42"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 42

> स विसृज्य ततो रामः पुष्पकं हेमभूषितम्।  
> प्रविवेश महाबाहुरशोकवनिकां तदा ॥ १ ॥

सुवर्णभूषित पुष्पक विमानको बिदा करके महाबाहु श्रीरामने अशोक-वनिका ( अन्तःपुरके विहार योग्य उपवन ) में प्रवेश किया ॥ १ ॥

> चन्दनागुरुचूतैश्च तुङ्गकालेयकैरपि।  
> देवदारुवनैश्चापि समन्तादुपशोभिताम् ॥ २ ॥

चन्दन, अगुरु, आम, तुङ्ग, ( नारियल ), कालेयक ( रक्तचन्दन ) तथा देवदारु-वन सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ २ ॥

> चम्पकाशोकपुंनागमधूकपनसासनैः।  
> शोभितां पारिजातैश्च विधूमज्वलनप्रभैः ॥ ३ ॥

चम्पा, अशोक, पुंनाग, महुआ, कटहल, असन तथा धूमरहित अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले पारिजातसे वह वाटिका सुशोभित थी ॥ ३ ॥

> लोध्रनीपार्जुनैर्नागैः सप्तपर्णातिमुक्तकैः।  
> मन्दारकदलीगुल्मलताजालसमावृताम् ॥ ४ ॥

लोध, कदम्ब, अर्जुन, नागकेसर, छितवन, अतिमुक्तक, मन्दार, कदली तथा गुल्मों और लताओंके समूह उसमें सब ओर व्याप्त थे ॥ ४ ॥

> प्रियङ्गुभिः कदम्बैश्च तथा च बकुलैरपि।  
> जम्बूभिर्दाडिमैश्चैव कोविदारैश्च शोभिताम् ॥ ५ ॥

प्रियङ्गु, धूलिकदम्ब, बकुल, जामुन, अनार और कोविदार आदि वृक्ष उस उपवनको सुशोभित करते थे ॥ ५ ॥

> सर्वदा कुसुमै रम्यैः फलवद्भिर्मनोरमैः।  
> दिव्यगन्धरसोपेतैस्तरुणाङ्कुरपल्लवैः ॥ ६ ॥

सदा फूल और फल देनेवाले रमणीय, मनोरम, दिव्य रस और गन्धसे युक्त तथा नूतन अङ्कुर-पल्लवोंसे अलंकृत वृक्ष भी उस अशोक-वनिकाकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ६ ॥

> तथैव तरुभिर्दिव्यैः शिल्पिभिः परिकल्पितैः।  
> चारुपल्लवपुष्पाढ्यैर्मत्तभ्रमरसंकुलैः ॥ ७ ॥

वृक्ष लगानेकी कलामें कुशल मालियोंद्वारा तैयार किये गये दिव्य वृक्ष, जिनमें मनोहर पल्लव तथा पुष्प शोभा पाते थे और जिनके ऊपर मतवाले भ्रमर छा रहे थे, उस उपवनकी श्री-वृद्धि कर रहे थे ॥ ७ ॥

> कोकिलैर्भृङ्गराजैश्च नानावर्णैश्च पक्षिभिः।  
> शोभितां शतशश्चित्रां चूतवृक्षावतंसकैः ॥ ८ ॥

कोकिल, भृङ्गराज आदि रंग-बिरंगे सैकड़ों पक्षी उस वाटिकाकी शोभा थे, जो आम्रकी डालियोंके अग्रभागपर बैठकर वहाँ विचित्र सुषुमाकी सृष्टि कर रहे थे ॥ ८ ॥

> शातकुम्भनिभाः केचित् केचिदग्निशिखोपमाः।  
> नीलाञ्जननिभाश्चान्ये भान्ति तत्र स्म पादपाः ॥ ९ ॥

कोई वृक्ष सुवर्णके समान पीले, कोई अग्नि-शिखाके समान उज्ज्वल और कोई नीले अञ्जनके समान श्याम थे, जो स्वयं सुशोभित होकर उस उपवनकी शोभा बढ़ाते थे ॥९॥

> सुरभीणि च पुष्पाणि माल्यानि विविधानि च ।  
> दीर्घिका विविधाकाराः पूर्णाः परमवारिणा ॥ १० ॥

वहाँ अनेक प्रकारके सुगन्धित पुष्प और गुच्छ दृष्टिगोचर होते थे । उत्तम जलसे भरी हुई भाँति-भाँतिकी बावड़ियाँ देखी जाती थीं ॥ १० ॥

> माणिक्यकृतसोपानाः स्फाटिकान्तरकुट्टिमाः ।  
> फुल्लपद्मोत्पलवनाश्चक्रवाकोपशोभिताः ॥ ११ ॥  
> दात्यूहशुकसंघुष्टा हंससारसनादिताः ।  
> तरुभिः पुष्पशबलैस्तीरजैरुपशोभिताः ॥ १२ ॥

जिनमें माणिक्यकी सीढ़ियाँ बनी थीं । सीढ़ियोंके बाद कुछ दूरतक जलके भीतरकी भूमि स्फटिक मणिसे बँधी हुई थी । उन बावड़ियोंके भीतर खिले हुए कमल और कुमुदोंके समूह शोभा पाते थे, चक्रवाक भी उनकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ पपीहे और तोते वहाँ मीठी बोली बोल रहे थे । हंसों और सारसोंके कलरव गूँज रहे थे । फूलोंसे चितकबरे दिखायी देनेवाले तटवर्ती वृक्ष उन्हें शोभासम्पन्न बना रहे थे ॥१२॥

> प्राकारैर्विविधाकारैः शोभिताश्च शिलातलैः ।  
> तत्रैव च वनोद्देशे वैदूर्यमणिसंनिभैः ॥ १३ ॥  
> शाद्वलैः परमोपेतां पुष्पितद्रुमकाननाम् ।

वे भाँति-भाँतिके परकोटों और शिलाओंसे भी सुशोभित थीं । वहीं वनप्रान्तमें नीलमके समान रंगवाली हरी-हरी घासें उस वाटिकाका शृङ्गार कर रही थीं । वहाँके वृक्षोंका समुदाय फूलोंके भारसे लदा हुआ था ॥ १३½ ॥

> तत्र संघर्षजातानां वृक्षाणां पुष्पशालिनाम् ॥ १४ ॥  
> प्रस्तराः पुष्पशबला नभस्तारागणैरिव ।

वहाँ मानो परस्पर होड़ लगाकर खिले हुए पुष्पशाली वृक्षोंके झड़े हुए फूलोंसे काले-काले प्रस्तर उसी तरह चितकबरे दिखायी देते थे, जैसे तारोंके समुदायसे अलंकृत आकाश ॥ १४½ ॥

> नन्दनं हि यथेन्द्रस्य ब्राह्मं चैत्ररथं यथा ॥ १५ ॥  
> तथाभूतं हि रामस्य काननं संनिवेशनम् ।  
> बह्वासनगृहोपेतां लताग्रहसमावृताम् ॥ १६ ॥  
> अशोकवनिकां स्फीतां प्रविश्य रघुनन्दनः ।  
> आसने च शुभाकारे पुष्पप्रकरभूषिते ॥ १७ ॥  
> कुथास्तरणसंस्तीर्णे रामः संनिषसाद ह ।

जैसे इन्द्रका नन्दन और ब्रह्माजीका बनाया हुआ कुबेरका चैत्ररथ वन सुशोभित होता है, उसी प्रकार सुन्दर भवनोंसे विभूषित श्रीरामका वह क्रीडा-कानन शोभा पा रहा था ॥ वहाँ अनेक ऐसे भवन बने थे, जिनके भीतर बैठनेके लिये बहुत-से आसन सजाये गये थे । वह वाटिका अनेक लतामण्डपोंसे सम्पन्न दिखायी देती थी । उस समृद्धिशालिनी अशोक-वनिकामें प्रवेश करके रघुकुलनन्दन श्रीराम पुष्पराशिसे विभूषित एक सुन्दर आसनपर बैठे, जिसपर कालीन बिछा था ॥ १६-१७½ ॥

> सीतामादाय हस्तेन मधु मैरेयकं शुचि ॥ १८ ॥  
> पाययामास काकुत्स्थः शचीमिव पुरंदरः ।

जैसे देवराज इन्द्र शचीको सुधापान कराते हैं, उसी प्रकार ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने अपने हाथसे पवित्र पेय मधु लेकर सीताजीको पिलाया ॥ १८½ ॥

> मांसानि च सुमृष्टानि फलानि विविधानि च ॥ १९ ॥  
> रामस्याभ्यवहारार्थं किंकरास्तूर्णमाहरन् ।

सेवकगण श्रीरामके भोजनके लिये वहाँ तुरंत ही राजोचित भोग्य पदार्थ ( भाँति-भाँतिकी रसोई ) तथा नाना प्रकारके फल ले आये ॥ १९½ ॥

> उपानृत्यंश्च राजानं नृत्यगीतविशारदाः ॥ २० ॥  
> अप्सरोरगसंघाश्च किंनरीपरिवारिताः ।

उस समय राजा रामके समीप नृत्य और गीतकी कलामें निपुण अप्सराएँ और नाग-कन्याएँ किन्नरियोंके साथ मिलकर नृत्य करने लगीं ॥ २०½ ॥

> दक्षिणा रूपवत्यश्च स्त्रियः पानवशं गताः ॥ २१ ॥  
> उपानृत्यन्त काकुत्स्थं नृत्यगीतविशारदाः ।

नाचने-गानेमें कुशल और चतुर बहुत-सी रूपवती स्त्रियाँ मधुपानजनित मदके वशीभूत हो श्रीरामचन्द्रजीके निकट अपनी नृत्य-कलाका प्रदर्शन करने लगीं ॥ २१½ ॥

> मनोऽभिरामा रामास्ता रामो रमयतां वरः ॥ २२ ॥  
> रमयामास धर्मात्मा नित्यं परमभूषिताः ।

दूसरोंके मनको रमानेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा श्रीराम सदा उत्तम वस्त्राभूषणोंसे भूषित हुई उन मनोऽभिराम रमणियों-को उपहार आदि देकर संतुष्ट रखते थे ॥ २२½ ॥

> स तया सीतया सार्धमासीनो विरराज ह ॥ २३ ॥  
> अरुन्धत्या इवासीनो वसिष्ठ इव तेजसा ।

उस समय भगवान् श्रीराम सीतादेवीके साथ सिंहासनपर विराजमान हो अपने तेजसे अरुन्धतीके साथ बैठे हुए वसिष्ठजीके समान शोभा पाते थे ॥ २३½ ॥

> एवं रामो मुदा युक्तः सीतां सुरसुतोपमाम् ॥ २४ ॥  
> रमयामास वैदेहीमहन्यहनि देववत् ।

यों श्रीराम प्रतिदिन देवताके समान आनन्दित रहकर देवकन्याके समान सुन्दरी विदेहनन्दिनी सीताके साथ रमण करते थे ॥ २४½ ॥

> तथा तयोर्विहरतोः सीताराघवयोश्चिरम् ॥ २५ ॥  
> अत्यक्रामच्छुभः कालः शैशिरो भोगदः सदा ।  
> प्राप्तयोर्विविधान् भोगानतीतः शिशिरागमः ॥ २६ ॥

इस प्रकार सीता और रघुनाथजी चिरकालतक विहार करते रहे । इतनेहीमें सदा भोग प्रदान करनेवाला शिशिर-ऋतुका सुन्दर समय व्यतीत हो गया । भाँति-भाँतिके भोगोंका उपभोग करते हुए उन राजदम्पतिका वह शिशिरकाल बीत गया ॥ २५-२६ ॥

> पूर्वाह्णे धर्मकार्याणि कृत्वा धर्मेण धर्मवित् ।  
> शेषं दिवसभागार्धमन्तःपुरगतोऽभवत् ॥ २७ ॥  
> सीतापि देवकार्याणि कृत्वा पौर्वाह्णिकानि वै ।  
> श्वश्रूणामकरोत् पूजां सर्वासामविशेषतः ॥ २८ ॥

धर्मज्ञ श्रीराम दिनके पूर्वभागमें धर्मके अनुसार धार्मिक कृत्य करते थे और शेष आधे दिन अन्तःपुरमें रहते थे ॥ सीताजी भी पूर्वाह्णकालमें देवपूजन आदि करके सब सासुओंकी समानरूपसे सेवा-पूजा करती थीं ॥ २८ ॥

> अभ्यगच्छत् ततो रामं विचित्राभरणाम्बरा ।  
> त्रिविष्टपे सहस्राक्षमुपविष्टं यथा शची ॥ २९ ॥

तत्पश्चात् विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो श्रीरामचन्द्रजीके पास चली जाती थीं । ठीक उसी तरह, जैसे स्वर्गमें शची सहस्राक्ष इन्द्रकी सेवामें उपस्थित होती हैं ॥ २९ ॥

> दृष्ट्वा तु राघवः पत्नीं कल्याणेन समन्विताम् ।  
> प्रहर्षमतुलं लेभे साधुसाध्विति चाब्रवीत् ॥ ३० ॥

इन्हीं दिनों श्रीरामचन्द्रजीने अपनी पत्नीको गर्भके मङ्गलमय चिह्नसे युक्त देखकर अनुपम हर्ष प्राप्त किया और कहा—‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा’ ॥ ३० ॥

> अब्रवीच्च वरारोहां सीतां सुरसुतोपमाम् ।  
> अपत्यलाभो वैदेहि त्वय्ययं समुपस्थितः ॥ ३१ ॥  
> किमिच्छसि वरारोहे कामः किं क्रियतां तव ।  
> उपस्थित है । वरारोहे ! बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है ।  
> मैं तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ ।’ ॥ ३१½ ॥  
> स्मितं कृत्वा तु वैदेही रामं वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ३२ ॥  
> तपोवनानि पुण्यानि द्रष्टुमिच्छामि राघव ।  
> गङ्गातीरोपविष्टानामृषीणामुग्रतेजसाम् ॥ ३३ ॥  
> फलमूलाशिनां देव पादमूलेषु वर्तितुम् ।  
> एष मे परमः कामो यन्मूलफलभोजिनाम् ॥ ३४ ॥  
> अप्येकरात्रिं काकुत्स्थ निवसेयं तपोवने ।

फिर वे देवकन्याके समान सुन्दरी सीतासे बोले— ‘विदेहनन्दिनि ! तुम्हारे गर्भसे पुत्र प्राप्त होनेका यह समय इसपर सीताजीने मुसकराकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ‘रघुनन्दन ! मेरी इच्छा एक बार उन पवित्र तपोवनोंको देखनेकी हो रही है। देव ! गङ्गातटपर रहकर फल-मूल खानेवाले जो उग्र तेजस्वी महर्षि हैं, उनके समीप ( कुछ दिन ) रहना चाहती हूँ । काकुत्स्थ ! फल-मूलका आहार करनेवाले महात्माओंके तपोवनमें एक रात निवास करूँ, यही मेरी इस समय सबसे बड़ी अभिलाषा है’ ॥ ३२–३४½ ॥

> तथेति च प्रतिज्ञातं रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।  
> विस्रब्धा भव वैदेहि श्वो गमिष्यस्यसंशयम् ॥ ३५ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने सीताकी इस इच्छाको पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा की और कहा—‘विदेहनन्दिनि ! निश्चिन्त रहो । कल ही वहाँ जाओगी, इसमें संशय नहीं है’ ॥ ३५ ॥

> एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थो मैथिलीं जनकात्मजाम् ।  
> मध्यकक्षान्तरं रामो निर्जगाम सुहृद्वृतः ॥ ३६ ॥

मिथिलेशकुमारी जानकीसे ऐसा कहकर ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम अपने मित्रोंके साथ बीचके खण्डमें चले गये ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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