---
title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 38"
canonical: "https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana/uttara-kanda/sarga-38"
lang: "hi"
---

# उत्तरकाण्ड, Sarga 38

> एवमास्ते महाबाहुरहन्यहनि राघवः ।  
> प्रशासत् सर्वकार्याणि पौरजानपदेषु च ॥ १ ॥

महाबाहु श्रीरघुनाथजी इसी प्रकार प्रतिदिन राजसभामें बैठकर पुरवासियों और जनपदवासियोंके सारे कार्योंकी देखभाल करते हुए शासनका कार्य चलाते थे ॥ १ ॥

> ततः कतिपयाहःसु वैदेहं मिथिलाधिपम् ।  
> राघवः प्राञ्जलिर्भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ २ ॥  
> भवान् हि गतिरव्यग्रा भवता पालिता वयम् ।  
> भवतस्तेजसोग्रेण रावणो निहतो मया ॥ ३ ॥

तदनन्तर कुछ दिन बीतनेपर श्रीरामचन्द्रजीने मिथिलानरेश विदेहराज जनकजीसे हाथ जोड़कर यह बात कही—॥ ‘महाराज ! आप ही हमारे सुस्थिर आश्रय हैं । आपने सदा हमलोगोंका लालन-पालन किया है । आपके ही बढ़े हुए तेजसे मैंने रावणका वध किया है ॥ ३ ॥

> इक्ष्वाकूणां च सर्वेषां मैथिलानां च सर्वशः ।  
> अतुलाः प्रीतयो राजन् सम्बन्धकपुरोगमाः ॥ ४ ॥

‘राजन् ! समस्त इक्ष्वाकुवंशी और मैथिल नरेशोंमें आपसके सम्बन्धके कारण सब प्रकारसे जो प्रेम बढ़ा है, उसकी कहीं तुलना नहीं है ॥ ४ ॥

> तद् भवान् स्वपुरं यातु रत्नान्यादाय पार्थिव ।  
> भरतश्च सहायार्थं पृष्ठतश्चानुयास्यति ॥ ५ ॥

‘पृथ्वीनाथ ! अब आप हमारे द्वारा भेंट किये गये ये रत्न लेकर अपनी राजधानीको पधारें । भरत (तथा उनके साथ-साथ शत्रुघ्न भी ) आपकी सहायताके लिये आपके पीछे-पीछे जायँगे’ ॥ ५ ॥

> स तथेति ततः कृत्वा राघवं वाक्यमब्रवीत् ।  
> प्रीतोऽस्मि भवता राजन् दर्शनेन नयेन च ॥ ६ ॥

तब जनकजी ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—‘राजन् ! मैं आपके दर्शन तथा न्यायानुसार व्यवहारसे बहुत प्रसन्न हूँ ॥ ६ ॥

> यान्येतानि तु रत्नानि मदर्थं संचितानि वै ।  
> दुहित्रे तान्यहं राजन् सर्वाण्येव ददामि वै ॥ ७ ॥

‘आपने मेरे लिये जो रत्न एकत्र किये हैं, वह सब मैं अपनी सीता आदि पुत्रियोंको देता हूँ’ ॥ ७ ॥

> एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थं जनको हृष्टमानसः ।  
> प्रययौ मिथिलां श्रीमांस्तमनुज्ञाय राघवम् ॥ ८ ॥  
> ततः प्रयाते जनके कैकयं मातुलं प्रभुम् ।  
> राघवः प्राञ्जलिर्भूत्वा विनयाद् वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥

श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर श्रीमान् राजा जनक प्रसन्नचित्त हो श्रीरामकी अनुमति ले मिथिलापुरीको चल दिये ॥ जनकजीके चले जानेके पश्चात् श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर अपने मामा केकय-नरेश युधाजित्से, जो बड़े सामर्थ्यशाली थे, विनयपूर्वक कहा—॥ ९ ॥

> इदं राज्यमहं चैव भरतश्च सलक्ष्मणः ।  
> आयत्तस्त्वं हि नो राजन् गतिश्च पुरुषर्षभ ॥ १० ॥

‘राजन् ! पुरुषप्रवर ! यह राज्य, मैं, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न--सब आपके अधीन हैं । आप ही हमारे आश्रय हैं ॥ १० ॥

> राजा हि वृद्धः संतापं त्वदर्थमुपयास्यति ।  
> तस्माद् गमनमद्यैव रोचते तव पार्थिव ॥ ११ ॥

‘महाराज केकयराज वृद्ध हैं । वे आपके लिये बहुत चिन्तित होंगे । इसलिये पृथ्वीनाथ ! आपका आज ही जाना मुझे अच्छा जान पड़ता है ॥ ११ ॥

> लक्ष्मणेनानुयात्रेण पृष्ठतोऽनुगमिष्यते ।  
> धनमादाय बहुलं रत्नानि विविधानि च ॥ १२ ॥  
> युधाजित् तु तथेत्याह गमनं प्रति राघव ।  
> रत्नानि च धनं चैव त्वय्येवाक्षय्यमस्त्विति ॥ १३ ॥

‘आप बहुत-सा धन तथा नाना प्रकारके रत्न लेकर पधारें । मार्गमें सहायताके लिये लक्ष्मण आपके साथ जायँगे’ ॥ तब युधाजित्ने ‘तथास्तु’ कहकर श्रीरामचन्द्रजीकी बात मान ली और कहा—‘रघुनन्दन ! ये रत्न और धन सब तुम्हारे ही पास अक्षयरूपसे रहें’ ॥ १३ ॥

> प्रदक्षिणं च राजानं कृत्वा केकयवर्धनः ।  
> रामेण च कृतः पूर्वमभिवाद्य प्रदक्षिणम् ॥ १४ ॥

फिर पहले श्रीरघुनाथजीने प्रणामपूर्वक अपने मामाकी परिक्रमा की, इसके बाद केकयकुलकी वृद्धि करनेवाले राजकुमार युधाजित्ने भी राजा श्रीरामकी प्रदक्षिणा की ॥ १४ ॥

> लक्ष्मणेन सहायेन प्रयातः केकयेश्वरः ।  
> हतेऽसुरे यथा वृत्रे विष्णुना सह वासवः ॥ १५ ॥  
> तं विसृज्य ततो रामो वयस्यमकुतोभयम् ।  
> प्रतर्दनं काशिपतिं परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥ १६ ॥

इसके बाद केकयराजने लक्ष्मणजीके साथ उसी तरह अपने देशको प्रस्थान किया, जैसे वृत्रासुरके मारे जानेपर इन्द्रने भगवान् विष्णुके साथ अमरावतीकी यात्रा की थी ॥ मामाको विदा करके रघुनाथजीने किसीसे भी भय न माननेवाले अपने मित्र काशिराज प्रतर्दनको हृदयसे लगाकर कहा—॥ १६ ॥

> दर्शिता भवता प्रीतिर्दर्शितं सौहृदं परम् ।  
> उद्योगश्च त्वया राजन् भरतेन कृतः सह ॥ १७ ॥

‘राजन् ! आपने राज्याभिषेकके कार्यमें भरतके साथ पूरा उद्योग किया है और ऐसा करके अपने महान् प्रेम तथा परम सौहार्दका परिचय दिया है ॥ १७ ॥

> तद् भवानद्य काशेय पुरीं वाराणसीं व्रज ।  
> रमणीयां त्वया गुप्तां सुप्राकारां सुतोरणाम् ॥ १८ ॥

‘काशिराज ! अब आप सुन्दर परकोटों तथा मनोहर फाटकोंसे सुशोभित और अपने ही द्वारा सुरक्षित रमणीय पुरी वाराणसीको पधारिये’ ॥ १८ ॥

> एतावदुक्त्वा चोत्थाय काकुत्स्थः परमासनात् ।  
> पर्यष्वजत धर्मात्मा निरन्तरमुरोगतम् ॥ १९ ॥

ऐसा कहकर धर्मात्मा श्रीरामने पुनः अपने उत्तम आसनसे उठकर प्रतर्दनको छातीसे लगा उनका गाढ़ आलिङ्गन किया ॥ १९ ॥

> विसर्जयामास तदा कौसल्याप्रीतिवर्धनः ।  
> राघवेण कृतानुज्ञः काशेयो ह्यकुतोभयः ॥ २० ॥  
> वाराणसीं ययौ तूर्णं राघवेण विसर्जितः ।

इस प्रकार कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले श्रीरामने उस समय काशिराजको विदा किया । श्रीरघुनाथजीकी अनुमति पाकर उनले विदा ले निर्भय काशिराज तत्काल वाराणसीपुरीकी ओर चल दिये ॥ २०½ ॥

> विसृज्य तं काशिपतिं त्रिशतं पृथिवीपतीन् ॥ २१ ॥  
> प्रहसन् राघवो वाक्यमुवाच मधुराक्षरम् ।

काशिराजको विदा करके श्रीरघुनाथजी हँसते हुए अन्य तीन सौ भूपालोंसे मधुर वाणीमें बोले—॥ २१½ ॥

> भवतां प्रीतिरव्यग्रा तेजसा परिरक्षिता ॥ २२ ॥  
> धर्मश्च नियतो नित्यं सत्यं च भवतां सदा ।

‘मेरे ऊपर आपलोगोंका अविचल प्रेम है, जिसकी रक्षा आपने अपने ही तेजसे की है । आपलोगोंमें सत्य और धर्म नियतरूपसे नित्य-निरन्तर निवास करते हैं ॥ २२½ ॥

> युष्माकं चानुभावेन तेजसा च महात्मनाम् ॥ २३ ॥  
> हतो दुरात्मा दुर्बुद्धी रावणो राक्षसाधमः ।

‘आप महापुरुषोंके प्रभाव और तेजसे ही मेरेद्वारा दुर्बुद्धि दुरात्मा राक्षसाधम रावण मारा गया है ॥ २३½ ॥

> हेतुमात्रमहं तत्र भवतां तेजसा हतः ॥ २४ ॥  
> रावणः सगणो युद्धे सपुत्रामात्यबान्धवः ।

‘मैं तो उसके वधमें निमित्तमात्र बना हूँ । वास्तवमें तो आपलोगोंके तेजसे ही पुत्र, मन्त्री, बन्धु-बान्धव तथा सेवक-गणोंके सहित रावण युद्धमें मारा गया है ॥ २४½ ॥

> भवन्तश्च समानीता भरतेन महात्मना ॥ २५ ॥  
> श्रुत्वा जनकराजस्य काननात् तनयां हृताम् ।  
> उद्युक्तानां च सर्वेषां पार्थिवानां महात्मनाम् ॥ २६ ॥  
> कालोऽप्यतीतः सुमहान् गमनं रोचयाम्यतः ।–  
> प्रत्यूचुस्तं च राजानो हर्षेण महता वृताः ॥ २७ ॥  
> दिष्ट्या त्वं विजयी राम स्वराज्येऽपि प्रतिष्ठितः ।

‘वनसे जनकराजनन्दिनी सीताके अपहरणका समाचार सुनकर महात्मा भरतने आपलोगोंको यहाँ बुलाया था ॥ ‘आप सभी महामना भूपाल राक्षसोंपर आक्रमण करनेके लिये उद्योगशील थे । तबसे आजतक यहाँ आपलोगोंका बहुत समय व्यतीत हो गया है । अतः अब मुझे आपलोगोंका अपने नगरको लौट जाना ही उचित जान पड़ता है’ ॥ इसपर राजाओंने अत्यन्त हर्षसे भरकर कहा–‘श्रीराम ! आप विजयी हुए और अपने राज्यपर भी प्रतिष्ठित हो गये, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ २७½ ॥

> दिष्ट्या प्रत्याहृता सीता दिष्ट्या शत्रुः पराजितः ॥ २८ ॥  
> एष नः परमः काम एषा नः प्रीतिरुत्तमा ।  
> यत् त्वां विजयिनं राम पश्यामो हतशात्रवम् ॥ २९ ॥

‘हमारे सौभाग्यसे ही आप सीताको लौटा लाये और उस प्रबल शत्रुको परास्त कर दिया । श्रीराम ! यही हमारा सबसे बड़ा मनोरथ है और यही हमारे लिये सबसे बढ़कर प्रसन्नताकी बात है कि आज हमलोग आपको विजयी देख रहे हैं तथा आपकी शत्रु-मण्डली मारी जा चुकी है ॥२८-२९॥

> एतत् त्वय्युपपन्नं च यदस्मांस्त्वं प्रशंससे ।  
> प्रशंसार्हं न जानीमः प्रशंसां वक्तुमीदृशीम् ॥ ३० ॥

‘प्रशंसनीय श्रीराम ! आप जो हमलोगोंकी प्रशंसा कर रहे हैं, यह आपहीके योग्य है । हम ऐसी प्रशंसा करनेकी कला नहीं जानते हैं ॥ ३० ॥

> आपृच्छामो गमिष्यामो हृदिस्थो नः सदा भवान् ।  
> वर्तामहे महाबाहो प्रीत्यात्र महता वृताः ॥ ३१ ॥  
> भवेच्च ते महाराज प्रीतिरस्मासु नित्यदा ।  
> बाढमित्येव राजानो हर्षेण परमान्विताः ॥ ३२ ॥

‘अब हम आज्ञा चाहते हैं । अपनी पुरीको जायँगे । जिस प्रकार आप सदा हमारे हृदयमें विराजमान रहते हैं, उसी प्रकार हे महाबाहो ! जिसमें हमलोग आपके प्रति प्रेमसे युक्त रहकर आपके हृदयमें बसे रहें, ऐसी प्रीति आपकी हमपर सदा बनी रहनी चाहिये ।’ तब श्रीरघुनाथजीने हर्षसे भरे हुए उन राजाओंसे कहा–‘अवश्य ऐसा ही होगा’॥३१-३२॥

> ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे राघवं गमनोत्सुकाः ।  
> पूजितास्ते च रामेण जग्मुर्देशान् स्वकान् स्वकान् ॥३३॥

तत्पश्चात् जानेके लिये उत्सुक हो सबने हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीसे कहा—‘भगवन् ! अब हम जा रहे हैं ।’ इस तरह श्रीरामसे सम्मानित हो वे सब राजा अपने-अपने देशको चले गये ॥ ३३ ॥

Book: https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
