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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 34"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 34

> अर्जुनेन विमुक्तस्तु रावणो राक्षसाधिपः ।  
> चचार पृथिवीं सर्वामनिर्विण्णस्तथा कृतः ॥ १ ॥

अर्जुनसे छुटकारा पाकर राक्षसराज रावण निर्वेदरहित हो पुनः सारी पृथ्वीपर विचरण करने लगा ॥ १ ॥

> राक्षसं वा मनुष्यं वा शृणुते यं बलाधिकम् ।  
> रावणस्तं समासाद्य युद्धे ह्वयति दर्पितः ॥ २ ॥

राक्षस हो या मनुष्य, जिसको भी वह बलमें बढ़ा-चढ़ा सुनता था, उसीके पास पहुँचकर अभिमानी रावण उसे युद्धके लिये ललकारता था ॥ २ ॥

> ततः कदाचित् किष्किन्धां नगरीं वालिपालिताम् ।  
> गत्वाऽऽह्वयति युद्धाय वालिनं हेममालिनम् ॥ ३ ॥

तदनन्तर एक दिन वह वालीद्वारा पालित किष्किन्धापुरीमें जाकर सुवर्णमालाधारी वालीको युद्धके लिये ललकारने लगा ॥ ३ ॥

> ततस्तु वानरामात्यास्तारस्तारापिता प्रभुः ।  
> उवाच वानरो वाक्यं युद्धप्रेप्सुमुपागतम् ॥ ४ ॥

उस समय युद्धकी इच्छासे आये हुए रावणसे वालीके मन्त्री तार, ताराके पिता सुषेण तथा युवराज अङ्गद एवं सुग्रीवने कहा—॥ ४ ॥

> राक्षसेन्द्र गतो वाली यस्ते प्रतिबलो भवेत् ।  
> कोऽन्यः प्रमुखतः स्थातुं तव शक्तः प्लवङ्गमः ॥ ५ ॥

‘राक्षसराज ! इस समय वाली तो बाहर गये हुए हैं । वे ही आपकी जोड़के हो सकते हैं । दूसरा कौन वानर आपके सामने ठहर सकता है ॥ ५ ॥

> चतुर्भ्योऽपि समुद्रेभ्यः सन्ध्यामन्वास्य रावण ।  
> इदं मुहूर्तमायाति वाली तिष्ठ मुहूर्तकम् ॥ ६ ॥

‘रावण ! चारों समुद्रोंसे संन्ध्योपासन करके वाली अब आते ही होंगे । आप दो घड़ी ठहर जाइये ॥ ६ ॥

> एतानस्थिचयान् पश्य य एते शङ्खपाण्डुराः ।  
> युद्धार्थिनामिमे राजन् वानराधिपतेजसा ॥ ७ ॥

‘राजन् ! देखिये, ये जो शङ्खके समान उज्ज्वल हड्डियों-के ढेर लग रहे हैं, ये वालीके साथ युद्धकी इच्छासे आये हुए आप-जैसे वीरोंके ही हैं । वानरराज वालीके तेजसे ही इन सबका अन्त हुआ है ॥ ७ ॥

> यद्रामृतरसः पीतस्त्वया रावण राक्षस ।  
> तदा वालिनमासाद्य तदन्तं तव जीवितम् ॥ ८ ॥

‘राक्षस रावण ! यदि आपने अमृतका रस पी लिया हो तो भी जब आप वालीसे टक्कर लेंगे, तब वही आपके जीवनका अन्तिम क्षण होगा ॥ ८ ॥

> पश्येदानीं जगच्चित्रमिमं विश्रवसः सुत ।  
> इदं मुहूर्तं तिष्ठस्व दुर्लभं ते भविष्यति ॥ ९ ॥

‘विश्रवाकुमार ! वाली सम्पूर्ण आश्चर्यके भण्डार हैं । आप इस समय इनका दर्शन करेंगे । केवल इसी मुहूर्ततक उनकी प्रतीक्षाके लिये ठहरिये; फिर तो आपके लिये जीवन दुर्लभ हो जायगा ॥ ९ ॥

> अथवा त्वरसे मर्तुं गच्छ दक्षिणसागरम् ।  
> वालिनं द्रक्ष्यसे तत्र भूमिष्ठमिव पावकम् ॥ १० ॥

‘अथवा यदि आपको मरनेके लिये बहुत जल्दी लगी हो तो दक्षिण समुद्रके तटपर चले जाइये । वहाँ आपको पृथ्वीपर स्थित हुए अग्निदेवके समान वालीका दर्शन होगा’ ॥ १० ॥

> स तु तारं विनिर्भर्त्स्य रावणो लोकरावणः ।  
> पुष्पकं तत् समारुह्य प्रययौ दक्षिणार्णवम् ॥ ११ ॥

तब लोकोंको रुलानेवाले रावणने तारको भला-बुरा कहकर पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो दक्षिण समुद्रकी ओर प्रस्थान किया ॥ ११ ॥

> तत्र हेमगिरिप्रख्यं तरुणार्कनिभाननम् ।  
> रावणो वालिनं दृष्ट्वा संध्योपासनतत्परम् ॥ १२ ॥

वहाँ रावणने सुवर्णगिरिके समान ऊँचे वालीको संध्योपासन करते हुए देखा । उनका मुख प्रभातकालके सूर्यकी भाँति अरुण प्रभासे उद्भासित हो रहा था ॥ १२ ॥

> पुष्पकादवरुह्याथ रावणोऽञ्जनसंनिभः ।  
> ग्रहीतुं वालिनं तूर्णं निःशब्दपदमव्रजत् ॥ १३ ॥

उन्हें देखकर काजलके समान काला रावण पुष्पकसे उतर पड़ा और वालीको पकड़नेके लिये जल्दी-जल्दी उनकी ओर बढ़ने लगा । उस समय वह अपने पैरोंकी आहट नहीं होने देता था ॥ १३ ॥

> यदृच्छया तदा दृष्टो वालिनापि स रावणः ।  
> पापाभिप्रायकं दृष्ट्वा चकार न तु सम्भ्रमम् ॥ १४ ॥

दैवयोगसे वालीने भी रावणको देख लिया; किंतु वे उसके पापपूर्ण अभिप्रायको जानकर भी घबराये नहीं ॥१४॥

> शशमालक्ष्य सिंहो वा पन्नगं गरुडो यथा ।  
> न चिन्तयति तं वाली रावणं पापनिश्चयम् ॥ १५ ॥

जैसे सिंह खरगोशको और गरुड़ सर्पको देखकर भी उसकी परवा नहीं करता, उसी प्रकार वालीने पापपूर्ण विचार रखनेवाले रावणको देखकर भी चिन्ता नहीं की ॥ १५ ॥

> जिघृक्षमाणमायान्तं रावणं पापचेतसम् ।  
> कक्षावलम्बिनं कृत्वा गमिष्ये त्रीन् महार्णवान् ॥ १६ ॥

उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि जब पापात्मा रावण मुझे पकड़नेकी इच्छासे निकट आयेगा, तब मैं इसे काँखमें दबाकर लटका लूँगा और इसे लिये-दिये शेष तीन महासागरों-पर भी हो आऊँगा ॥ १६ ॥

> द्रक्ष्यन्त्यरिं ममाङ्कस्थं स्रंसद्दूरुकराम्बरम् ।  
> लम्बमानं दशग्रीवं गरुडस्येव पन्नगम् ॥ १७ ॥

इसकी जाँघ, हाथ-पैर और वस्त्र खिसकते होंगे । यह मेरी काँखमें दबा होगा और उस दशामें लोग मेरे शत्रुको गरुड़के पंजेमें दबे हुए सर्पके समान लटकते देखेंगे ॥ १७ ॥

> इत्येवं मतिमास्थाय वाली मौनमुपास्थितः ।  
> जपन् वै नैगमान् मन्त्रांस्तस्थौ पर्वतराडिव ॥ १८ ॥

ऐसा निश्चय करके वाली मौन ही रहे और वैदिक मन्त्रोंका जप करते हुए गिरिराज सुमेरुकी भाँति खड़े रहे ॥ १८ ॥

> तावन्योन्यं जिघृक्षन्तौ हरिराक्षसपार्थिवौ ।  
> प्रयत्नवन्तौ तत् कर्म ईहतुर्बलदर्पितौ ॥ १९ ॥

इस प्रकार बलके अभिमानसे भरे हुए वे वानरराज और राक्षसराज दोनों एक दूसरेको पकड़ना चाहते थे । दोनों ही इसके लिये प्रयत्नशील थे और दोनों ही वह काम बनानेकी घातमें लगे थे ॥ १९ ॥

> हस्तग्राहं तु तं मत्वा पादशब्देन रावणम् ।  
> पराङ्मुखोऽपि जग्राह वाली सर्पमिवाण्डजः ॥ २० ॥

रावणके पैरोंकी हल्की-सी आहटसे वाली यह समझ गये कि अब रावण हाथ बढ़ाकर मुझे पकड़ना चाहता है । फिर तो दूसरी ओर मुँह किये होनेपर भी वालीने उसे उसी तरह सहसा पकड़ लिया, जैसे गरुड़ सर्पको दबोच लेता है ॥२०॥

> ग्रहीतुकामं तं गृह्य रक्षसामीश्वरं हरिः ।  
> खमुत्पपात वेगेन कृत्वा कक्षावलम्बिनम् ॥ २१ ॥

पकड़नेकी इच्छावाले उस राक्षसराजको वालीने स्वयं ही पकड़कर अपनी काँखमें लटका लिया और बड़े वेगसे वे आकाशमें उछले ॥ २१ ॥

> तं च पीडयमानं तु वितुदन्तं नखैर्मुहुः ।  
> जहार रावणं वाली पवनस्तोयदं यथा ॥ २२ ॥

रावण अपने नखोंसे बारंबार वालीको बकोटता और पीड़ा देता रहा, तो भी जैसे वायु बादलोंको उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार वाली रावणको बगलमें दबाये लिये फिरते थे ॥ २२ ॥

> अथ ते राक्षसामात्या ह्रियमाणे दशानने ।  
> मुमोक्षयिषवो वालिं रक्षमाणा अभिद्रुताः ॥ २३ ॥

इस प्रकार रावणके हर लिये जानेपर उसके मन्त्री उसे वालीसे छुड़ानेके लिये कोलाहल करते हुए उनके पीछे-पीछे दौड़ते रहे ॥ २३ ॥

> अन्वीयमानस्तैर्वाली भ्राजतेऽम्बरमध्यगः ।  
> अन्वीयमानो मेघौघैरम्बरस्थ इवांशुमान् ॥ २४ ॥

पीछे-पीछे राक्षस चलते थे और आगे-आगे वाली । इस अवस्थामें वे आकाशके मध्यभागमें पहुँचकर मेघसमूहोंसे अनुगत हुए आकाशवर्ती अंशुमाली सूर्यके समान शोभा पाते थे ॥ २४ ॥

> तेऽशक्नुवन्तः सम्प्राप्तुं वालिनं राक्षसोत्तमाः ।  
> तस्य बाहूरुवेगेन परिश्रान्ता व्यवस्थिताः ॥ २५ ॥

वे श्रेष्ठ राक्षस बहुत प्रयत्न करनेपर भी वालीके पासतक न पहुँच सके । उनकी भुजाओं और जाँघोंके वेगसे उत्पन्न हुई वायुके थपेड़ोंसे थककर वे खड़े हो गये ॥ २५ ॥

> वालिमार्गादपाक्रामन् पर्वतेन्द्रापि गच्छतः ।  
> किं पुनर्जीवनप्रेप्सुर्बिभ्रद् वै मांसशोणितम् ॥ २६ ॥

वालीके मार्गसे उड़ते हुए बड़े-बड़े पर्वत भी हट जाते थे; फिर रक्त-मांसमय शरीर धारण करनेवाला और जीवनकी रक्षा चाहनेवाला प्राणी उनके मार्गसे हट जाय, इसके लिये तो कहना ही क्या है ॥ २६ ॥

> अपक्षिगणसम्पातान् वानरेन्द्रो महाजवः ।  
> क्रमशः सागरान् सर्वान् संध्याकालमवन्दत ॥ २७ ॥

जितनी देरमें वाली समुद्रोंतक पहुँचते थे, उतनी देरमें तीव्रगामी पक्षियोंके समूह भी नहीं पहुँच पाते थे । उन महावेगशाली वानरराजने क्रमशः सभी समुद्रोंके तटपर पहुँचकर संध्या-वन्दन किया ॥ २७ ॥

> सम्पूज्यमानो यातस्तु खचरैः खचरोत्तमः ।  
> पश्चिमं सागरं वाली आजगाम सरावणः ॥ २८ ॥

समुद्रोंकी यात्रा करते हुए आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ वालीकी सभी खेचर प्राणी पूजा एवं प्रशंसा करते थे । वे रावणको बगलमें दबाये हुए पश्चिम समुद्रके तटपर आये ॥ २८ ॥

> तस्मिन् संध्यामुपासित्वा स्नात्वा जप्त्वा च वानरः ।  
> उत्तरं सागरं प्रायाद् वहमानो दशाननम् ॥ २९ ॥

वहाँ स्नान, संध्योपासन और जप करके वे वानरवीर दशाननको लिये-दिये उत्तर समुद्रके तटपर जा पहुँचे ॥२९॥

> बहुयोजनसाहस्रं वहमानो महाहरिः ।  
> वायुवच्च मनोवच्च जगाम सह शत्रुणा ॥ ३० ॥

वायु और मनके समान वेगवाले वे महावानर वाली कई सहस्र योजनतक रावणको ढोते रहे । फिर अपने उस शत्रुके साथ ही वे उत्तर समुद्रके किनारे गये ॥ ३० ॥

> उत्तरे सागरे संध्यामुपासित्वा दशाननम् ।  
> वहमानोऽगमद् वाली पूर्वं वै स महोदधिम् ॥ ३१ ॥

उत्तरसागरके तटपर संध्योपासना करके दशाननका भार वहन करते हुए वाली पूर्व दिशावर्ती महासागरके किनारे गये ॥ ३१ ॥

> तत्रापि संध्यामन्वास्य वासविः स हरीश्वरः ।  
> किष्किन्धामभितो गृह्य रावणं पुनरागमत् ॥ ३२ ॥

वहाँ भी संध्योपासना सम्पन्न करके वे इन्द्रपुत्र वानरराज वाली दशमुख रावणको बगलमें दबाये फिर किष्किन्धापुरीके निकट आये ॥ ३२ ॥

> चतुर्ष्वपि समुद्रेषु संध्यामन्वास्य वानरः ।  
> रावणोद्वहनश्रान्तः किष्किन्धोपवनेऽपतत् ॥ ३३ ॥

इस तरह चारों समुद्रोंमें संध्योपासनाका कार्य पूरा करके रावणको ढोनेके कारण थके हुए वानरराज वाली किष्किन्धाके उपवनमें आ पहुँचे ॥ ३३ ॥

> रावणं तु मुमोचाथ स्वकक्षात् कपिसत्तमः ।  
> कुतस्त्वमिति चोवाच प्रहसन् रावणं मुहुः ॥ ३४ ॥

वहाँ आकर उन कपिश्रेष्ठने रावणको अपनी काँखसे छोड़ दिया और बारंबार हँसते हुए पूछा—‘कहो जी, तुम कहाँसे आये हो’ ॥ ३४ ॥

> विस्मयं तु महद् गत्वा श्रमलोलनिरीक्षणः ।  
> राक्षसेन्द्रो हरीन्द्रं तमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ३५ ॥  
> वानरेन्द्र महेन्द्राभ राक्षसेन्द्रोऽस्मि रावणः ।  
> युद्धेप्सुरिह सम्प्राप्तः स चाद्यासादितस्त्वया ॥ ३६ ॥

रावणकी आँखें श्रमके कारण चञ्चल हो रही थीं । वालीके इस अद्भुत पराक्रमको देखकर उसे महान् आश्चर्य हुआ और उस राक्षसराजने उन वानरराजसे इस प्रकार कहा—॥ ‘महेन्द्रके समान पराक्रमी वानरेन्द्र ! मैं राक्षसेन्द्र रावण हूँ और युद्ध करनेकी इच्छासे यहाँ आया था, सो वह युद्ध तो आपसे मिल ही गया ॥ ३६ ॥

> अहो बलमहो वीर्यमहो गाम्भीर्यमेव च ।  
> येनाहं पशुवद् गृह्य भ्रामितश्चतुरोऽर्णवान् ॥ ३७ ॥

‘अहो ! आपमें अद्भुत बल है, अद्भुत पराक्रम है और आश्चर्यजनक गम्भीरता है । आपने मुझे पशुकी तरह पकड़कर चारों समुद्रोंपर घुमाया है ॥ ३७ ॥

> एवमश्रान्तवद् वीर शीघ्रमेव च वानर ।  
> मां चैवोद्वहमानस्तु कोऽन्यो वीरो भविष्यति ॥ ३८ ॥

‘वानरवीर ! तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा शूरवीर होगा, जो मुझे इस प्रकार बिना थके-माँदे शीघ्रतापूर्वक ढो सके ॥ ३८ ॥

> त्रयाणामेव भूतानां गतिरेषा प्लवङ्गम ।  
> मनोऽनिलसुपर्णानां तव चात्र न संशयः ॥ ३९ ॥

‘वानरराज ! ऐसी गति तो मन, वायु और गरुड़—इन तीन भूतोंकी ही सुनी गयी है । निःसंदेह इस जगत्में चौथे आप भी ऐसे तीव्र वेगवाले हैं ॥ ३९ ॥

> सोऽहं दृष्टबलस्तुभ्यमिच्छामि हरिपुङ्गव ।  
> त्वया सह चिरं सख्यं सुस्निग्धं पावकाग्रतः ॥ ४० ॥

‘कपिश्रेष्ठ ! मैंने आपका बल देख लिया । अब मैं अग्निको साक्षी बनाकर आपके साथ सदाके लिये स्नेहपूर्ण मित्रता कर लेना चाहता हूँ ॥ ४० ॥

> दाराः पुत्राः पुरं राष्ट्रं भोगाच्छादनभोजनम् ।  
> सर्वमेवाविभक्तं नौ भविष्यति हरीश्वर ॥ ४१ ॥

‘वानरराज ! स्त्री, पुत्र, नगर, राज्य, भोग, वस्त्र और भोजन--इन सभी वस्तुओंपर हम दोनोंका साझेका अधिकार होगा’ ॥ ४१ ॥

> ततः प्रज्वालयित्वाग्निं तावुभौ हरिराक्षसौ ।  
> भ्रातृत्वमुपसम्पन्नौ परिष्वज्य परस्परम् ॥ ४२ ॥

तब वानरराज और राक्षसराज दोनोंने अग्नि प्रज्वलित करके एक दूसरेको हृदयसे लगाकर आपसमें भाईचारेका सम्बन्ध जोड़ा ॥ ४२ ॥

> अन्योन्यं लम्बितकरौ ततस्तौ हरिराक्षसौ ।  
> किष्किन्धां विशतुर्हृष्टौ सिंहौ गिरिगुहामिव ॥ ४३ ॥

फिर वे दोनों वानर और राक्षस एक दूसरेका हाथ पकड़े बड़ी प्रसन्नताके साथ किष्किन्धापुरीके भीतर गये, मानो दो सिंह किसी गुफामें प्रवेश कर रहे हों ॥ ४३ ॥

> स तत्र मासमुषितः सुग्रीव इव रावणः ।  
> अमात्यैरागतैर्नीतस्त्रैलोक्योत्सादनार्थिभिः ॥ ४४ ॥

रावण वहाँ सुग्रीवकी तरह सम्मानित हो महीनेभर रहा । फिर तीनों लोकोंको उखाड़ फेंकनेकी इच्छा रखनेवाले उसके मन्त्री आकर उसे लिवा ले गये ॥ ४४ ॥

> एवमेतत् पुरा वृत्तं वालिना रावणः प्रभो ।  
> धर्षितश्च वृतश्चापि भ्राता पावकसंनिधौ ॥ ४५ ॥

प्रभो ! इस प्रकार यह घटना पहले घटित हो चुकी है । वालीने रावणको हराया और फिर अग्निके समीप उसे अपना भाई बना लिया ॥ ४५ ॥

> बलमप्रतिमं राम वालिनोऽभवदुत्तमम् ।  
> सोऽपि त्वया विनिर्दग्धः शलभो वह्निना यथा ॥ ४६ ॥

श्रीराम ! वालीमें बहुत अधिक और अनुपम बल था, परंतु आपने उसको भी अपनी बाणाग्निसे उसी तरह दग्ध कर डाला, जैसे आग पतिंगेको जला देती है ॥ ४६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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