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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 32"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 32

> नर्मदापुलिने यत्र राक्षसेन्द्रः स दारुणः ।  
> पुष्पोपहारं कुरुते तस्माद् देशाददूरतः ॥ १ ॥  
> अर्जुनो जयतां श्रेष्ठो माहिष्मत्याः पतिः प्रभुः ।  
> क्रीडते सह नारीभिर्नर्मदातोयमाश्रितः ॥ २ ॥

‘नर्मदाजीके तटपर जहाँ क्रूर राक्षसराज रावण महादेवजीको फूलोंका उपहार अर्पित कर रहा था, उस स्थानसे थोड़ी दूरपर विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ माहिष्मतीपुरीका शक्तिशाली राजा अर्जुन अपनी स्त्रियोंके साथ नर्मदाके जलमें उतरकर क्रीडा कर रहा था ॥ १-२ ॥

> तासां मध्यगतो राजा रराज च तदार्जुनः ।  
> करेणूनां सहस्रस्य मध्यस्थ इव कुञ्जरः ॥ ३ ॥

‘उन सुन्दरियोंके बीचमें विराजमान राजा अर्जुन सहस्रों हथिनियोंके मध्यभागमें स्थित हुए गजराजके समान शोभा पाता था ॥ ३ ॥

> जिज्ञासुः स तु बाहूनां सहस्रस्योत्तमं बलम् ।  
> रुरोध नर्मदावेगं बाहुभिर्बहुभिर्वृतः ॥ ४ ॥

‘अर्जुनके हजार भुजाएँ थीं । उनके उत्तम बलको जाँचने-के लिये उसने उन बहुसंख्यक भुजाओंद्वारा नर्मदाके वेगको रोक दिया ॥ ४ ॥

> कार्तवीर्यभुजासक्तं तज्जलं प्राप्य निर्मलम् ।  
> कूलोपहारं कुर्वाणं प्रतिस्रोतः प्रधावति ॥ ५ ॥

‘कृतवीर्य-पुत्र अर्जुनकी भुजाओंद्वारा रोका हुआ नर्मदाका वह निर्मल जल तटपर पूजा करते हुए रावणके पासतक पहुँच गया और उसी ओर उल्टी गतिसे बहने लगा ॥ ५ ॥

> समीननक्रमकरः सपुष्पकुशसंस्तरः ।  
> स नर्मदाम्भसो वेगः प्रावृट्काल इवाबभौ ॥ ६ ॥

‘नर्मदाके जलका वह वेग मत्स्य, नक्र, मगर, फूल और कुशास्तरणके साथ बढ़ने लगा । उसमें वर्षाकालके समान बाढ़ आ गयी ॥ ६ ॥

> स वेगः कार्तवीर्येण सम्प्रेषित इवाम्भसः ।  
> पुष्पोपहारं सकलं रावणस्य जहार ह ॥ ७ ॥

‘जलका वह वेग, जिसे मानो कार्तवीर्य अर्जुनने ही भेजा हो, रावणके समस्त पुष्पोपहारको बहा ले गया ॥ ७ ॥

> रावणोऽर्धसमाप्तं तमुत्सृज्य नियमं तदा ।  
> नर्मदां पश्यते कान्तां प्रतिकूलां यथा प्रियाम् ॥ ८ ॥

‘रावणका वह पूजन-सम्बन्धी नियम अभी आधा ही समाप्त हुआ था, उसी दशामें उसे छोड़कर वह प्रतिकूल हुई कमनीय कान्तिवाली प्रेयसीकी भाँति नर्मदाकी ओर देखने लगा ॥ ८ ॥

> पश्चिमेन तु तं दृष्ट्वा सागरोद्वारसंनिभम् ।  
> वर्धन्तमम्भसो वेगं पूर्वामाशां प्रविश्य तु ॥ ९ ॥

‘पश्चिमसे आते और पूर्व दिशामें प्रवेश करके बढ़ते हुए जलके उस वेगको उसने देखा । वह ऐसा जान पड़ता था, मानो समुद्रमें ज्वार आ गया हो ॥ ९ ॥

> ततोऽनुद्भ्रान्तशकुनां स्वभावे परमे स्थिताम् ।  
> निर्विकाराङ्गनाभासामपश्यद् रावणो नदीम् ॥ १० ॥

‘उसके तटवर्ती वृक्षोंपर रहनेवाले पक्षियोंमें कोई घबराहट नहीं थी । वह नदी अपनी परम उत्तम स्वाभाविक स्थितिमें स्थित थी—उसका जल पहले ही-जैसा स्वच्छ एवं निर्मल दिखायी देता था । उसमें वर्षाकालिक बाढ़के समय जो मलिनता आदि विकार होते थे, उनका उस समय सर्वथा अभाव था । रावणने उस नदीको विकारशून्य हृदयवाली नारीके समान देखा ॥ १० ॥

> सव्येतरकराङ्गुल्या द्यशब्दास्यो दशाननः ।  
> वेगप्रभवमन्वेष्टुं सोऽदिशच्छुकसारणौ ॥ ११ ॥

‘उसके मुखसे एक शब्द भी नहीं निकला । उसने मौन-व्रतकी रक्षाके लिये बिना बोले ही दाहिने हाथकी अङ्गुलीसे संकेतमात्र करके बाढ़के कारणका पता लगानेके निमित्त शुक और सारणको आदेश दिया ॥ ११ ॥

> तौ तु रावणसंदिष्टौ भ्रातरौ शुकसारणौ ।  
> व्योमान्तरगतौ वीरौ प्रस्थितौ पश्चिमामुखौ ॥ १२ ॥

‘रावणका आदेश पाकर दोनों वीर भ्राता शुक और सारण आकाशमार्गसे पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १२ ॥

> अर्धयोजनमात्रं तु गत्वा तौ रजनीचरौ ।  
> पश्येतां पुरुषं तोये क्रीडन्तं सहयोषितम् ॥ १३ ॥

‘केवल आधा योजन जानेपर ही उन दोनों निशाचरोंने एक पुरुषको स्त्रियोंके साथ जलमें क्रीडा करते देखा ॥ १३ ॥

> बृहत्सालप्रतीकाशं तोयव्याकुलमूर्धजम् ।  
> मदरक्तान्तनयनं मदव्याकुलचेतसम् ॥ १४ ॥

‘उसका शरीर विशाल सालवृक्षके समान ऊँचा था । उसके केश जलसे ओतप्रोत हो रहे थे । नेत्रप्रान्तमें मदकी लाली दिखायी दे रही थी और चित्त भी मदसे व्याकुल जान पड़ता था ॥ १४ ॥

> नदीं बाहुसहस्रेण रुन्धन्तमरिमर्दनम् ।  
> गिरिं पादसहस्रेण रुन्धन्तमिव मेदिनीम् ॥ १५ ॥

‘वह शत्रुमर्दन वीर अपनी सहस्र भुजाओंसे नदीके वेगको रोककर सहस्रों चरणोंसे पृथ्वीको थामे रखनेवाले पर्वतके समान शोभा पाता था ॥ १५ ॥

> बालानां वरनारीणां सहस्रेण समावृतम् ।  
> समदानां करेणूनां सहस्रेणेव कुञ्जरम् ॥ १६ ॥

‘नयी अवस्थाकी सहस्रों सुन्दरियाँ उसे घेरे हुए ऐसी जान पड़ती थीं, मानो सहस्रों मदमत्त हथिनियोंने किसी गजराजको घेर रक्खा हो ॥ १६ ॥

> तमद्भुततरं दृष्ट्वा राक्षसौ शुकसारणौ ।  
> संनिवृत्तावुपागम्य रावणं तमथोचतुः ॥ १७ ॥

‘उस परम अद्भुत दृश्यको देखकर राक्षस शुक और सारण लौट आये और रावणके पास जाकर बोले—॥ १७ ॥

> बृहत्सालप्रतीकाशः कोऽप्यसौ राक्षसेश्वर ।  
> नर्मदां रोधवद् रुद्ध्वा क्रीडापयति योषितः ॥ १८ ॥

‘राक्षसराज ! यहाँसे थोड़ी ही दूरपर कोई सालवृक्षके समान विशालकाय पुरुष है, जो बाँधकी तरह नर्मदाके जलको रोककर स्त्रियोंके साथ क्रीडा कर रहा है ॥ १८ ॥

> तेन बाहुसहस्रेण संनिरुद्धजला नदी ।  
> सागरोद्वारसंकाशानुद्वारान् सृजते मुहुः ॥ १९ ॥

‘उसकी सहस्र भुजाओंसे नदीका जल रुक गया है । इसीलिये यह बारंबार समुद्रके ज्वारकी भाँति जलके उद्वारकी सृष्टि कर रही है’ ॥ १९ ॥

> इत्येवं भाषमाणौ तौ निशाम्य शुकसारणौ ।  
> रावणोऽर्जुन इत्युक्त्वा स ययौ युद्धलालसः ॥ २० ॥

‘इस प्रकार कहते हुए शुक और सारणकी बातें सुनकर रावण बोल उठा–‘वही अर्जुन है’ ऐसा कहकर वह युद्धकी लालसासे उसी ओर चल दिया ॥ २० ॥

> अर्जुनाभिमुखे तस्मिन् रावणे राक्षसाधिपे ।  
> चण्डः प्रवाति पवनः सनादः सरजस्तथा ॥ २१ ॥

‘राक्षसराज रावण जब अर्जुनकी ओर चला, तब धूल और भारी कोलाहलके साथ वायु प्रचण्ड वेगसे चलने लगी॥२१॥

> सकृदेव कृतो रावः सरक्तपृषतो घनैः ।  
> महोदरमहापार्श्वधूम्राक्षशुकसारणैः ॥ २२ ॥  
> संवृतो राक्षसेन्द्रस्तु तत्रागाद् यत्र चार्जुनः ।

‘बादलोंने रक्तबिन्दुओंकी वर्षा करके एक बार ही बड़े जोरसे गर्जना की । इधर राक्षसराज रावण महोदर, महापार्श्व, धूम्राक्ष, शुक और सारणको साथ ले उस स्थानकी ओर चला, जहाँ अर्जुन क्रीडा कर रहा था ॥ २२½ ॥

> अदीर्घेणैव कालेन स तदा राक्षसो बली ॥ २३ ॥  
> तं नर्मदाह्रदं भीममाजगामाञ्जनप्रभः ।

‘काजल या कोयलेके समान काला वह बलवान् राक्षस थोड़ी ही देरमें नर्मदाके उस भयंकर जलाशयके पास जा पहुँचा ॥ २३½ ॥

> स तत्र स्त्रीपरिवृतं वासिताभिरिव द्विपम् ॥ २४ ॥  
> नरेन्द्रं पश्यते राजा राक्षसानां तदार्जुनम् ।

,वहाँ पहुँचकर राक्षसोंके राजा रावणने मैथुनकी इच्छावाली हथिनियोंसे घिरे हुए गजराजके समान सुन्दरी स्त्रियोंसे परिवेष्टित महाराज अर्जुनको देखा ॥ २४½ ॥

> स रोषाद् रक्तनयनो राक्षसेन्द्रो बलोद्धतः ॥ २५ ॥  
> इत्येवमर्जुनामात्यानाह गम्भीरया गिरा ।

‘उसे देखते ही रावणके नेत्र रोषसे लाल हो गये । अपने बलके घमंडसे उद्दण्ड हुए राक्षसराजने अर्जुनके मन्त्रियोंसे गम्भीर वाणीमें इस प्रकार कहा—॥ २५½ ॥

> अमात्याः क्षिप्रमाख्यात हैहयस्य नृपस्य वै ॥ २६ ॥  
> युद्धार्थं समनुप्राप्तो रावणो नाम नामतः ।

‘‘मन्त्रियो ! तुम हैहयराजसे जल्दी जाकर कहो कि रावण तुमसे युद्ध करनेके लिये आया है’ ॥ २६½ ॥

> रावणस्य वचः श्रुत्वा मन्त्रिणोऽथार्जुनस्य ते ॥ २७ ॥  
> उत्तस्थुः सायुधास्तं च रावणं वाक्यमब्रुवन् ।

‘रावणकी बात सुनकर अर्जुनके वे मन्त्री हथियार लेकर खड़े हो गये और रावणसे इस प्रकार बोले–॥ २७½ ॥

> युद्धस्य कालो विज्ञातः साधु भो साधु रावण ॥ २८ ॥  
> यः क्षीबं स्त्रीगतं चैव योद्धुमुत्सहसे नृपम् ।

‘‘वाह रे रावण ! वाह ! तुम्हें युद्धके अवसरका अच्छा ज्ञान है । हमारे महाराज जब मदमत्त होकर स्त्रियोंके बीचमें क्रीडा कर रहे हैं, ऐसे समयमें तुम उनके साथ युद्ध करनेके लिये उत्साहित हो रहे हो ॥ २८½ ॥

> स्त्रीसमक्षगतं यत् त्वं योद्धुमुत्सहसे नृप ॥ २९ ॥  
> वासितामध्यगं मत्तं शार्दूल इव कुञ्जरम् ।

‘‘जैसे कोई व्याघ्र कामवासनासे वासित हथिनियोंके बीचमें खड़े हुए गजराजसे जूझना चाहता हो, उसी प्रकार तुम स्त्रियोंके समक्ष क्रीडा-विलासमें तत्पर हुए राजा अर्जुनके साथ युद्ध करनेका हौसला दिखा रहे हो ॥ २९½ ॥

> क्षमस्वाद्य दशग्रीव उष्यतां रजनी त्वया ।  
> युद्धे श्रद्धा तु यद्यस्ति श्वस्तात समरेऽर्जुनम् ॥ ३० ॥

‘तात ! दशग्रीव ! यदि तुम्हारे हृदयमें युद्धके लिये उत्साह है, तो रातभर क्षमा करो और आजकी रातमें यहीं ठहरो । फिर कल सबेरे तुम राजा अर्जुनको समराङ्गणमें उपस्थित देखोगे ॥ ३० ॥

> यदि वापि त्वरा तुभ्यं युद्धतृष्णासमावृत ।  
> निपात्यास्मान् रणे युद्धमर्जुनेनोपयास्यसि ॥ ३१ ॥

‘‘युद्धकी तृष्णासे घिरे हुए राक्षसराज ! यदि तुम्हें जूझनेके लिये बड़ी जल्दी लगी हो तो पहले रणभूमिमें हम सबको मार गिराओ । उसके बाद महाराज अर्जुनके साथ युद्ध करने पाओगे’ ॥ ३१ ॥

> ततस्तै रावणामात्यैरमात्यास्ते नृपस्य तु ।  
> सूदिताश्चापि ते युद्धे भक्षिताश्च बुभुक्षितैः ॥ ३२ ॥

‘यह सुनकर रावणके भूखे मन्त्री युद्धस्थलमें अर्जुनके अमात्योंको मार-मारकर खाने लगे ॥ ३२ ॥

> ततो हलहलाशब्दो नर्मदातीरगो बभौ ।  
> अर्जुनस्यानुयात्राणां रावणस्य च मन्त्रिणाम् ॥ ३३ ॥

‘इससे अर्जुनके अनुयायियों तथा रावणके मन्त्रियोंका नर्मदाके तटपर बड़ा कोलाहल होने लगा ॥ ३३ ॥

> इषुभिस्तोमरैः प्रासैस्त्रिशूलैर्वज्रकर्षणैः ।  
> सरावणानर्दयन्तः समन्तात् समभिद्रुताः ॥ ३४ ॥

‘अर्जुनके योद्धा बाणों, तोमरों, भालों, त्रिशूलों और वज्र-कर्षण नामक शस्त्रोंद्वारा चारों ओरसे धावा करके रावणसहित समस्त राक्षसोंको घायल करने लगे ॥ ३४ ॥

> हैहयाधिपयोधानां वेग आसीत् सुदारुणः ।  
> सनक्रमीनमकरसमुद्रस्येव निःस्वनः ॥ ३५ ॥

‘हैहयराजके योद्धाओंका वेग नाकों, मत्स्यों और मगरोंसहित समुद्रकी भीषण गर्जनाके समान अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था ॥ ३५ ॥

> रावणस्य तु तेऽमात्याः प्रहस्तशुकसारणाः ।  
> कार्तवीर्यबलं क्रुद्धा निहन्ति स्म स्वतेजसा ॥ ३६ ॥

‘रावणके वे मन्त्री प्रहस्त, शुक और सारण आदि कुपित हो अपने बल-पराक्रमसे कार्तवीर्य अर्जुनकी सेनाका संहार करने लगे ॥ ३६ ॥

> अर्जुनाय तु तत्कर्म रावणस्य समन्त्रिणः ।  
> क्रीडमानाय कथितं पुरुषैर्भयविह्वलैः ॥ ३७ ॥

‘तब अर्जुनके सेवकोंने भयसे विह्वल होकर क्रीडामें लगे हुए अर्जुनसे मन्त्रीसहित रावणके उस क्रूर कर्मका समाचार सुनाया ॥ ३७ ॥

> श्रुत्वा न भेतव्यमिति स्त्रीजनं स तदार्जुनः ।  
> उत्ततार जलात् तस्माद् गङ्गातोयादिवाऽऽजनः ॥ ३८ ॥

‘सुनकर अर्जुनने अपनी स्त्रियोंसे कहा—‘तुम सब लोग डरना मत ।’ फिर उन सबके साथ वह नर्मदाके जलसे उसी तरह बाहर निकला, जैसे कोई दिग्गज ( हथिनियोंके साथ ) गङ्गाजीके जलसे बाहर निकला हो ॥ ३८ ॥

> क्रोधदूषितनेत्रस्तु स तदार्जुनपावकः ।  
> प्रजज्वाल महाघोरो युगान्त इव पावकः ॥ ३९ ॥

‘उसके नेत्र रोषसे रक्तवर्णके हो गये । वह अर्जुनरूपी अनल प्रलयकालके महाभयंकर पावककी भाँति प्रज्वलित हो उठा ॥ ३९ ॥

> स तूर्णतरमादाय वरहेमाङ्गदो गदाम् ।  
> अभिदुद्राव रक्षांसि तमांसीव दिवाकरः ॥ ४० ॥

‘सुन्दर सोनेका बाजूबंद धारण करनेवाले वीर अर्जुनने तुरंत ही गदा उठा ली और उन राक्षसोंपर आक्रमण किया, मानो सूर्यदेव अन्धकार-समूहपर टूट पड़े हों ॥ ४० ॥

> बाहुविक्षेपकरणां समुद्यम्य महागदाम् ।  
> गारुडं वेगमास्थाय आपपातैव सोऽर्जुनः ॥ ४१ ॥

‘जो भुजाओंद्वारा घुमायी जाती थी, उस विशाल गदाको ऊपर उठाकर गरुड़के समान तीव्र वेगका आश्रय ले राजा अर्जुन तत्काल ही उन निशाचरोंपर टूट पड़ा ॥ ४१ ॥

> तस्य मार्गे समारुदध्य विन्ध्योऽर्कस्येव पर्वतः ।  
> स्थितो विन्ध्य इवाकम्प्यः प्रहस्तो मुसलायुधः ॥ ४२ ॥

‘उस समय मूसलधारी प्रहस्त, जो विन्ध्य-गिरिके समान अविचल था, उसका मार्ग रोककर खड़ा हो गया । ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें विन्ध्याचलने सूर्यदेवका मार्ग रोक लिया था ॥ ४२ ॥

> ततोऽस्य मुसलं घोरं लोहबद्धं मदोद्धतः ।  
> प्रहस्तः प्रेषयन् क्रुद्धो ररास च यथान्तकः ॥ ४३ ॥

‘मदसे उद्दण्ड हुए प्रहस्तने कुपित हो अर्जुनपर लोहेसे मढ़ा हुआ एक भयंकर मूसल चलाया और कालके समान भीषण गर्जना की ॥ ४३ ॥

> तस्याग्रे मुसलस्याग्निरशोकापीडसंनिभः ।  
> प्रहस्तकरमुक्तस्य बभूव प्रदहन्निव ॥ ४४ ॥

‘प्रहस्तके हाथसे छूटे हुए उस मूसलके अग्रभागमें अशोक-पुष्पके समान लाल रंगकी आग प्रकट हो गयी, जो जलाती हुई-सी जान पड़ती थी ॥ ४४ ॥

> आधावमानं मुसलं कार्तवीर्यस्तदार्जुनः ।  
> निपुणं वञ्चयामास गदया गतविक्लवः ॥ ४५ ॥

‘किंतु कार्तवीर्य अर्जुनको इससे तनिक भी भय नहीं हुआ । उसने अपनी ओर वेगपूर्वक आते हुए उस मूसलको गदा मारकर पूर्णतः विफल कर दिया ॥ ४५ ॥

> ततस्तमभिदुद्राव सगदो हैहयाधिपः ।  
> भ्रामयाणो गदां गुर्वीं पञ्चबाहुशतोच्छ्रयाम् ॥ ४६ ॥

‘तत्पश्चात् गदाधारी हैहयराज, जिसे पाँच सौ भुजाओंसे उठाकर चलाया जाता था, उस भारी गदाको घुमाता हुआ प्रहस्तकी ओर दौड़ा ॥ ४६ ॥

> ततो हतोऽतिवेगेन प्रहस्तो गदया तदा ।  
> निपपात स्थितः शैलो वज्रिवज्रहतो यथा ॥ ४७ ॥

‘उस गदासे अत्यन्त वेगपूर्वक आहत होकर प्रहस्त तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो कोई पर्वत वज्रधारी इन्द्रके वज्रका आघात पाकर ढह गया हो ॥ ४७ ॥

> प्रहस्तं पतितं दृष्ट्वा मारीचशुकसारणाः ।  
> समहोदरधूम्राक्षा अपसृष्टा रणाजिरात् ॥ ४८ ॥

‘प्रहस्तको धराशायी हुआ देख मारीच, शुक, सारण, महोदर और धूम्राक्ष समराङ्गणसे भाग खड़े हुए ॥ ४८ ॥

> अपक्रान्तेष्वमात्येषु प्रहस्ते च निपातिते ।  
> रावणोऽभ्यद्रवत् तूर्णमर्जुनं नृपसत्तमम् ॥ ४९ ॥

‘प्रहस्तके गिरने और अमात्योंके भाग जानेपर रावणने नृपश्रेष्ठ अर्जुनपर तत्काल धावा किया ॥ ४९ ॥

> सहस्रबाहोस्तद् युद्धं विंशद्बाहोश्च दारुणम् ।  
> नृपराक्षसयोस्तत्र आरब्धं रोमहर्षणम् ॥ ५० ॥

‘फिर तो हजार भुजाओंवाले नरनाथ और बीस भुजाओंवाले निशाचरनाथमें वहाँ भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ ५० ॥

> सागराविव संक्षुब्धौ चलमूलाविवाचलौ ।  
> तेजोयुक्ताविवादित्यौ प्रदहन्ताविवानलौ ॥ ५१ ॥  
> बलोद्धतौ यथा नागौ वासितार्थे यथा वृषौ ।  
> मेघाविव विनर्दन्तौ सिंहाविव बलोत्कटौ ॥ ५२ ॥  
> रुद्रकालाविव क्रुद्धौ तौ तदा राक्षसार्जुनौ ।  
> परस्परं गदां गृह्य ताडयामासतुर्भृशम् ॥ ५३ ॥

‘विक्षुब्ध हुए दो समुद्रों, जिनकी जड़ हिल रही हों ऐसे दो पर्वतों, दो तेजस्वी आदित्यों, दो दाहक अग्नियों, बलसे उन्मत्त हुए दो गजराजों, काम-वासनावाली गायके लिये लड़नेवाले दो साँड़ों, जोर-जोरसे गर्जनेवाले दो मेघों, उत्कट बलशाली दो सिंहों तथा क्रोधसे भरे हुए रुद्र और कालदेवके समान वे रावण और अर्जुन गदा लेकर एक दूसरेपर गहरी चोटें करने लगे ॥ ५१–५३ ॥

> वज्रप्रहारानचला यथा घोरान् विषेहिरे ।  
> गदाप्रहारांस्तौ तत्र सेहाते नरराक्षसौ ॥ ५४ ॥

‘जैसे पूर्वकालमें पर्वतोंने वज्रके भयंकर आघात सहे थे, उसी प्रकार वे अर्जुन और रावण वहाँ गदाओंके प्रहार सहन करते थे ॥ ५४ ॥

> यथाशनिरवेभ्यस्तु जायतेऽथ प्रतिश्रुतिः ।  
> तथा तयोर्गदापोथैर्दिशः सर्वाः प्रतिश्रुताः ॥ ५५ ॥

‘जैसे बिजलीकी कड़कसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठती हैं, उसी प्रकार उन दोनों वीरोंकी गदाओंके आघातोंसे सभी दिशाएँ गूँजने लगीं ॥ ५५ ॥

> अर्जुनस्य गदा सा तु पात्यमानाहितोरसि ।  
> काञ्चनाभं नभश्चक्रे विद्युत्सौदामनी यथा ॥ ५६ ॥

‘जैसे बिजली चमककर आकाशको सुनहरे रंगसे युक्त कर देती है, उसी प्रकार रावणकी छातीपर गिरायी जाती हुई अर्जुनकी गदा उसके वक्षःस्थलको सुवर्णकी-सी प्रभासे पूर्ण कर देती थी ॥ ५६ ॥

> तथैव रावणेनापि पात्यमाना मुहुर्मुहुः ।  
> अर्जुनोरसि निर्भाति गदोल्केव महागिरौ ॥ ५७ ॥

‘उसी प्रकार रावणके द्वारा भी अर्जुनकी छातीपर बारंबार गिरायी जाती हुई गदा किसी महान् पर्वतपर गिरनेवाली उल्काके समान प्रकाशित हो उठती थी ॥ ५७ ॥

> नार्जुनः खेदमायाति न राक्षसगणेश्वरः ।  
> सममासीत् तयोर्युद्धं यथा पूर्वं बलीन्द्रयोः ॥ ५८ ॥  
> शृङ्गैरिव वृषायुध्यन् दन्ताग्रैरिव कुञ्जरौ ।  
> परस्परं विनिघ्नन्तौ नरराक्षससत्तमौ ॥ ५९ ॥

‘उस समय न तो अर्जुन थकता था और न राक्षसगणोंका राजा रावण ही । पूर्वकालमें परस्पर जूझनेवाले इन्द्र और बलिकी भाँति उन दोनोंका युद्ध एक समान जान पड़ता था॥ ‘जैसे साँड़ अपने सींगोंसे और हाथी अपने दाँतोंके अग्रभागसे परस्पर प्रहार करते हैं, उसी प्रकार वे नरेश और निशाचरराज एक दूसरेपर गदाओंसे चोट करते थे ॥ ५९ ॥

> ततोऽर्जुनेन क्रुद्धेन सर्वप्राणेन सा गदा ।  
> स्तनयोरन्तरे मुक्ता रावणस्य महोरसि ॥ ६० ॥

‘इसी बीचमें अर्जुनने कुपित होकर रावणके विशाल वक्षःस्थलपर दोनों स्तनोंके बीचमें अपनी पूरी शक्तिसे गदाका प्रहार किया ॥ ६० ॥

> वरदानकृतत्राणे सा गदा रावणोरसि ।  
> दुर्बलेव यथावेगं द्विधाभूतापतत् क्षितौ ॥ ६१ ॥

‘परंतु रावण तो वरके प्रभावसे सुरक्षित था; अतः रावणकी छातीपर वेगपूर्वक चोट करके भी वह गदा किसी दुर्बल गदाकी भाँति उसके वक्षकी टक्करसे दो टूक होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ६१ ॥

> स त्वर्जुनप्रयुक्तेन गदाघातेन रावणः ।  
> अपासर्पद् धनुर्मात्रं निषसाद च निष्टनन् ॥ ६२ ॥

‘तथापि अर्जुनकी चलायी हुई गदाके आघातसे पीड़ित हो रावण एक धनुष पीछे हट गया और आर्तनाद करता हुआ बैठ गया ॥ ६२ ॥

> स विह्वलं तदालक्ष्य दशग्रीवं ततोऽर्जुनः ।  
> सहसोत्पत्य जग्राह गरुत्मानिव पन्नगम् ॥ ६३ ॥

‘दशग्रीवको व्याकुल देख अर्जुनने सहसा उछलकर उसे पकड़ लिया, मानो गरुड़ने झपट्टा मारकर किसी सर्पको घर दबाया हो ॥ ६३ ॥

> स तु बाहुसहस्रेण बलाद् गृह्य दशाननम् ।  
> बबन्ध बलवान् राजा बलिं नारायणो यथा ॥ ६४ ॥

‘जैसे पूर्वकालमें भगवान् नारायणने बलिको बाँधा था, उसी तरह बलवान् राजा अर्जुनने दशाननको बलपूर्वक पकड़कर अपने हजार हाथोंके द्वारा उसे मजबूत रस्सोंसे बाँध दिया ॥ ६४ ॥

> बध्यमाने दशग्रीवे सिद्धचारणदेवताः ।  
> साध्वीति वादिनः पुष्पैः किरन्त्यर्जुनमूर्धनि ॥ ६५ ॥

‘दशग्रीवके बाँधे जानेपर सिद्ध, चारण और देवता ‘शाबाश ! शाबाश !’ कहते हुए अर्जुनके सिरपर फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥ ६५ ॥

> व्याघ्रो मृगमिवादाय मृगराडिव कुञ्जरम् ।  
> ररास हैहयो राजा हर्षादम्बुदवन्मुहुः ॥ ६६ ॥

‘जैसे व्याघ्र किसी हिरणको दबोच लेता है अथवा सिंह हाथीको घर दबाता है, उसी प्रकार रावणको अपने वशमें करके हैहयराज अर्जुन हर्षातिरेकसे मेघके समान बारंबार गर्जना करने लगा ॥ ६६ ॥

> प्रहस्तस्तु समाश्वस्तो दृष्ट्वा बद्धं दशाननम् ।  
> सहसा राक्षसः क्रुद्धो ह्यभिदुद्राव हैहयम् ॥ ६७ ॥

‘इसके बाद प्रहस्तने होश सँभाला । दशमुख रावणको बँधा हुआ देख वह राक्षस सहसा कुपित हो हैहयराजकी ओर दौड़ा ॥ ६७ ॥

> नक्तंचराणां वेगस्तु तेषामापततां बभौ ।  
> उद्धूत आतपापाये पयोदानामिवाम्बुधौ ॥ ६८ ॥

‘जैसे वर्षाकाल आनेपर समुद्रमें बादलोंका वेग बढ़ जाता है, उसी प्रकार वहाँ आक्रमण करते हुए उन निशाचरोंका वेग बढ़ा हुआ प्रतीत होता था ॥ ६८ ॥

> मुञ्चमुञ्चेति भाषन्तस्तिष्ठतिष्ठेति चासकृत् ।  
> मुसलानि च शूलानि सोत्ससर्ज तदा रणे ॥ ६९ ॥

‘‘छोड़ो, छोड़ो, ठहरो, ठहरो’ ऐसा बारंबार कहते हुए राक्षस अर्जुनकी ओर दौड़े । उस समय प्रहस्तने रणभूमिमें अर्जुनपर मूसल और शूलके प्रहार किये ॥ ६९ ॥

> अप्राप्तान्येव तान्याशु असम्भ्रान्तस्तदार्जुनः ।  
> आयुधान्यमरारीणां जग्राहारिनिषूदनः ॥ ७० ॥  
> ततस्तैरेव रक्षांसि दुर्धरैः प्रवरायुधैः ।  
> भित्त्वा विद्रावयामास वायुरम्बुधरानिव ॥ ७१ ॥

‘परंतु अर्जुनको उस समय घबराहट नहीं हुई । उस शत्रुसूदन वीरने प्रहस्त आदि देवद्रोही निशाचरोंके छोड़े हुए उन अस्त्रोंको अपने शरीरतक आनेसे पहले ही पकड़ लिया॥ ‘फिर उन्हीं दुर्धर एवं श्रेष्ठ आयुधोंसे उन सब राक्षसोंको घायल करके उसी तरह भगा दिया, जैसे हवा बादलोंको छिन्न-भिन्न करके उड़ा ले जाती है ॥ ७१ ॥

> राक्षसांस्त्रासयामास कार्तवीर्यार्जुनस्तदा ।  
> रावणं गृह्य नगरं प्रविवेश सुहृद्वृतः ॥ ७२ ॥

‘उस समय कार्तवीर्य अर्जुनने समस्त राक्षसोंको भयभीत कर दिया और रावणको लेकर वह अपने सुहृदोंके साथ नगरमें आया ॥ ७२ ॥

> स कीर्यमाणः कुसुमाक्षतोत्करै-  
> र्द्विजैः सपौरैः पुरुहूतसंनिभः ।  
> ततोऽर्जुनः स्वां प्रविवेश तां पुरीं  
> बलिं निगृह्येव सहस्रलोचनः ॥ ७३ ॥

‘नगरके निकट आनेपर ब्राह्मणों और पुरवासियोंने अपने इन्द्रतुल्य तेजस्वी नरेशपर फूलों और अक्षतोंकी वर्षा की और सहस्र नेत्रधारी इन्द्र जैसे बलिको बंदी बनाकर ले गये थे, उसी प्रकार उस राजा अर्जुनने बँधे हुए रावणको साथ लेकर अपनी पुरीमें प्रवेश किया ॥’ ७३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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