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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 31"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 31

> ततो रामो महातेजा विस्मयात् पुनरेव हि ।  
> उवाच प्रणतो वाक्यमगस्त्यमृषिसत्तमम् ॥ १ ॥

तदनन्तर महातेजस्वी श्रीरामने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको प्रणाम करके पुनः विस्मयपूर्वक पूछा—॥ १ ॥

> भगवन् राक्षसः क्रूरो यदाप्रभृति मेदिनीम् ।  
> पर्यटत् किं तदा लोकाः शून्या आसन् द्विजोत्तम ॥ २ ॥

‘भगवन् ! द्विजश्रेष्ठ ! जब क्रूर निशाचर रावण पृथ्वीपर विजय करता घूम रहा था, उस समय क्या यहाँके सभी लोग शौर्य-सम्बन्धी गुणोंसे शून्य ही थे ? ॥ २ ॥

> राजा वा राजमात्रो वा किं तदा नात्र कश्चन ।  
> धर्षणं यत्र न प्राप्तो रावणो राक्षसेश्वरः ॥ ३ ॥

‘क्या उन दिनों यहाँ कोई भी क्षत्रिय नरेश अथवा क्षत्रियेतर राजा अधिक बलवान् नहीं था, जिससे इस भूतलपर पहुँचकर राक्षसराज रावणको पराजित या अपमानित होना नहीं पड़ा ॥ ३ ॥

> उताहो हतवीर्यास्ते बभूवुः पृथिवीक्षितः ।  
> बहिष्कृता वरास्त्रैश्च बहवो निर्जिता नृपाः ॥ ४ ॥

‘अथवा उस समयके सभी राजा पराक्रमशून्य तथा शस्त्र-ज्ञानसे हीन थे, जिसके कारण उन बहुसंख्यक श्रेष्ठ नरपालोंको रावणसे परास्त होना पड़ा’ ॥ ४ ॥

> राघवस्य वचः श्रुत्वा अगस्त्यो भगवान्ऋषिः ।  
> उवाच रामं प्रहसन् पितामह इवेश्वरम् ॥ ५ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजीकी वह बात सुनकर भगवान् अगस्त्यमुनि ठठाकर हँस पड़े और जैसे ब्रह्माजी महादेवजीसे कोई बात कहते हों, इसी तरह वे श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—॥ ५ ॥

> इत्येवं बाधमानस्तु पार्थिवान् पार्थिवर्षभ ।  
> चचार रावणो राम पृथिवीं पृथिवीपते ॥ ६ ॥

‘पृथ्वीनाथ ! भूपालशिरोमणे ! श्रीराम ! इसी प्रकार सब राजाओंको सताता और पराजित करता हुआ रावण इस पृथ्वीपर विचरने लगा ॥ ६ ॥

> ततो माहिष्मतीं नाम पुरीं स्वर्गपुरीप्रभाम् ।  
> सम्प्राप्तो यत्र सांनिध्यं सदासीद् वसुरेतसः ॥ ७ ॥

‘घूमते-घूमते वह स्वर्गपुरी अमरावतीके समान सुशोभित होनेवाली माहिष्मती नामक नगरीमें जा पहुँचा, जहाँ अग्निदेव सदा विद्यमान रहते थे ॥ ७ ॥

> तुल्य आसीन्नृपस्तस्य प्रभावाद् वसुरेतसः ।  
> अर्जुनो नाम यत्राग्निः शरकुण्डेशयः सदा ॥ ८ ॥

‘उन अग्निदेवके प्रभावसे वहाँ अग्निके ही समान तेजस्वी अर्जुन नामक राजा राज्य करता था, जिसके राज्यकालमें कुशास्तरणसे युक्त अग्निकुण्डमें सदा अग्निदेवता निवास करते थे ॥ ८ ॥

> तमेव दिवसं सोऽथ हैहयाधिपतिर्बली ।  
> अर्जुनो नर्मदां रन्तुं गतः स्त्रीभिः सहेश्वरः ॥ ९ ॥

‘जिस दिन रावण वहाँ पहुँचा, उसी दिन बलवान् हैहयराज राजा अर्जुन अपनी स्त्रियोंके साथ नर्मदा नदीमें जल-क्रीड़ा करनेके लिये चला गया था ॥ ९ ॥

> तमेव दिवसं सोऽथ रावणस्तत्र आगतः ।  
> रावणो राक्षसेन्द्रस्तु तस्यामात्यानपृच्छत ॥ १० ॥

‘उसी दिन रावण माहिष्मतीपुरीमें आया । वहाँ आकर राक्षसराज रावणने राजाके मन्त्रियोंसे पूछा—॥ १० ॥

> कार्जुनो नृपतिः शीघ्रं सम्यगाख्यातुमर्हथ ।  
> रावणोऽहमनुप्राप्तो युद्धेप्सुर्नृवरेण ह ॥ ११ ॥

‘‘मन्त्रियो ! जल्दी और ठीक-ठीक बताओ, राजा अर्जुन कहाँ हैं ? मैं रावण हूँ और तुम्हारे महाराजसे युद्ध करनेके लिये आया हूँ ॥ ११ ॥

> ममागमनमप्यग्रे युष्माभिः संनिवेद्यताम् ।  
> इत्येवं रावणेनोक्तास्तेऽमात्याः सुविपश्चितः ॥ १२ ॥  
> अब्रुवन् राक्षसपतिमसांनिध्यं महीपतेः ।

‘तुमलोग पहले ही जाकर उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दे दो ।’ रावणके ऐसा कहनेपर राजाके विद्वान् मन्त्रियोंने राक्षसराजको बताया कि हमारे महाराज इस समय राजधानीमें नहीं हैं ॥ १२½ ॥

> श्रुत्वा विश्रवसः पुत्रः पौराणामर्जुनं गतम् ॥ १३ ॥  
> अपसृत्यागतो विन्ध्यं हिमवत्संनिभं गिरिम् ।

‘पुरवासियोंके मुखसे राजा अर्जुनके बाहर जानेकी बात सुनकर विश्रवाका पुत्र रावण वहाँसे हटकर हिमालयके समान विशाल विन्ध्यगिरिपर आया ॥ १३½ ॥

> स तमभ्रमिवाविष्टमुद्भ्रान्तमिव मेदिनीम् ॥ १४ ॥  
> अपश्यद् रावणो विन्ध्यमालिखन्तमिवाम्बरम् ।  
> सहस्रशिखरोपेतं सिंहाध्युषितकन्दरम् ॥ १५ ॥

‘वह इतना ऊँचा था कि उसका शिखर बादलोंमें समाया हुआ-सा जान पड़ता था तथा वह पर्वत पृथ्वी फोड़कर ऊपरको उठा हुआ-सा प्रतीत होता था । विन्ध्यके गगनचुम्बी शिखर आकाशमें रेखा खींचते-से जान पड़ते थे । रावणने उस महान् शैलको देखा । वह अपने सहस्रों शृङ्गोंसे सुशोभित हो रहा था और उसकी कन्दराओंमें सिंह निवास करते थे ॥ १४-१५ ॥

> प्रपातपतितैः शीतैः साट्टहासमिवाम्बुभिः ।  
> देवदानवगन्धर्वैः साप्सरोभिः सकिंनरैः ॥ १६ ॥  
> स्वस्त्रीभिः क्रीडमानैश्च स्वर्गभूतं महोच्छ्रयम् ।

‘उसके सर्वोच्च शिखरके तटसे जो शीतल जलकी धाराएँ गिर रही थीं, उनके द्वारा वह पर्वत अट्टहास करता-सा प्रतीत होता था । देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर अपनी-अपनी स्त्रियों और अप्सराओंके साथ वहाँ क्रीड़ा कर रहे थे । वह अत्यन्त ऊँचा पर्वत अपनी सुरम्य सुषमासे स्वर्गके समान सुशोभित हो रहा था ॥ १६½ ॥

> नदीभिः स्यन्दमानाभिः स्फटिकप्रतिमं जलम् ॥ १७ ॥  
> फणाभिश्चलजिह्वाभिरनन्तमिव विष्ठितम् ।  
> उत्क्रामन्तं दरीवन्तं हिमवत्संनिभं गिरिम् ॥ १८ ॥

‘स्फटिकके समान निर्मल जलका स्रोत बहानेवाली नदियोंके कारण वह विन्ध्यगिरि चञ्चल जिह्वावाले फनोंसे उपलक्षित शेषनागके समान स्थित था । अधिक ऊँचाईके कारण वह ऊर्ध्वलोकको जाता-सा जान पड़ता था । हिमालयके समान विशाल एवं विस्तृत विन्ध्यगिरि बहुत-सी गुफाओंसे युक्त दिखायी देता था ॥ १७-१८ ॥

> पश्यमानस्ततो विन्ध्यं रावणो नर्मदां ययौ ।  
> चलोपलजलां पुण्यां पश्चिमोदधिगामिनीम् ॥ १९ ॥  
> महिषैः सृमरैः सिंहैः शार्दूलर्क्षगजोत्तमैः ।  
> उष्णाभितप्तैस्तृषितैः संक्षोभितजलाशयाम् ॥ २० ॥

‘विन्ध्याचलकी शोभाको देखता हुआ रावण पुण्यसलिला नर्मदा नदीके तटपर गया, जिसमें शिलाखण्डोंसे युक्त चञ्चल जल प्रवाहित हो रहा था । वह नदी पश्चिम समुद्रकी ओर चली जा रही थी । धूपसे तपे हुए प्यासे भैंसे, हिरन, सिंह, व्याघ्र, रीछ और गजराज उसके जलाशयको विक्षुब्ध कर रहे थे ॥ १९-२० ॥

> चक्रवाकैः सकारण्डैः सहंसजलकुक्कुटैः ।  
> सारसैश्च सदा मत्तैः कूजद्भिः सुसमावृताम् ॥ २१ ॥

‘सदा मतवाले होकर कलरव करनेवाले चक्रवाक, कारण्डव, हंस, जलकुक्कुट और सारस आदि जलपक्षी नर्मदाकी जल-राशिपर छा रहे थे ॥ २१ ॥

> फुल्लद्रुमकृतोत्तंसां चक्रवाकयुगस्तनीम् ।  
> विस्तीर्णपुलिनश्रोणीं हंसावलिसुमेखलाम् ॥ २२ ॥  
> पुष्परेण्वनुलिप्ताङ्गीं जलफेनामलांशुकाम् ।  
> जलावगाहसुस्पर्शां फुल्लोत्पलशुभेक्षणाम् ॥ २३ ॥  
> पुष्पकाद्वरुह्याशु नर्मदां सरितां वराम् ।  
> इष्टामिव वरां नारीमवगाह्य दशाननः ॥ २४ ॥  
> स तस्याः पुलिने रम्ये नानामुनिनिषेविते ।  
> उपोपविष्टः सचिवैः सार्धं राक्षसपुङ्गवः ॥ २५ ॥

‘सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा परम सुन्दरी प्रियतमा नारीके समान प्रतीत होती थी । खिले हुए तटवर्ती वृक्ष मानो उसके आभूषण थे । चक्रवाकके जोड़े उसके दोनों स्तनोंका स्थान ले रहे थे । ऊँचे और विस्तृत पुलिन नितम्बके समान जान पड़ते थे । हंसोंकी पङ्क्ति मोतियोंकी बनी हुई मेखला (करधनी) के समान शोभा दे रही थी । पुष्पोंके पराग ही अङ्गराग बनकर उसके अङ्ग-अङ्गमें अनुलिप्त हो रहे थे । जलका उज्ज्वल फेन ही उसकी स्वच्छ, श्वेत साड़ीका काम दे रहा था । जलमें गोता लगाना ही उसका सुखद संस्पर्श था और खिले हुए कमल ही उसके सुन्दर नेत्र जान पड़ते थे । राक्षसशिरोमणि दशमुख रावणने शीघ्र ही पुष्पकविमानसे उतरकर नर्मदाके जलमें डुबकी लगायी और बाहर निकलकर वह नाना मुनियोंसे सेवित उसके रमणीय तटपर अपने मन्त्रियोंके साथ बैठा ॥ २२–२५ ॥

> प्रख्याय नर्मदां सोऽथ गङ्गेयमिति रावणः ।  
> नर्मदादर्शने हर्षमाप्तवान् स दशाननः ॥ २६ ॥

‘‘ये साक्षात् गङ्गा हैं’ ऐसा कहकर दशानन रावणने नर्मदाकी प्रशंसा की और उसके दर्शनसे हर्षका अनुभव किया ॥ २६ ॥

> उवाच सचिवांस्तत्र सलीलं शुकसारणौ ।  
> एष रश्मिसहस्रेण जगत् कृत्वेव काञ्चनम् ॥ २७ ॥  
> तीक्ष्णतापकरः सूर्यो नभसो मध्यमास्थितः ।

‘फिर वहाँ उसने शुक, सारण तथा अन्य मन्त्रियोंसे लीलापूर्वक कहा—‘ये सूर्यदेव अपनी सहस्रों किरणोंसे सम्पूर्ण जगत्को मानो काञ्चनमय बनाकर प्रचण्ड ताप देते हुए इस समय आकाशके मध्यभागमें विराज रहे हैं ॥ २७½ ॥

> मामासीनं विदित्वैव चन्द्रायति दिवाकरः ॥ २८ ॥  
> नर्मदाजलशीतश्च सुगन्धिः श्रमनाशनः ।  
> मद्भयादनिलो ह्येष वात्यसौ सुसमाहितः ॥ २९ ॥

‘‘किंतु मुझे यहाँ बैठा जानकर ही चन्द्रमाके समान शीतल हो गये हैं । मेरे ही भयसे वायु भी नर्मदाके जलसे शीतल, सुगन्धित और श्रमनाशक होकर बड़ी सावधानीके साथ मन्दगतिसे बह रही है ॥ २८-२९ ॥

> इयं वापि सरिच्छ्रेष्ठा नर्मदा नर्मवर्धिनी ।  
> नक्रमीनविहंगोर्मिः सभयेवाङ्गना स्थिता ॥ ३० ॥

‘‘सरिताओंमें श्रेष्ठ यह नर्मदा भी क्रीड़ारस एवं प्रीतिको बढ़ा रही है । इसकी लहरोंमें मगर, मत्स्य और जलपक्षी खेल रहे हैं और यह भयभीत नारीके समान स्थित है ॥ ३० ॥

> तद्भवन्तः क्षताः शस्त्रैर्नृपैरिन्द्रसमैर्युधि ।  
> चन्दनस्य रसेनेव रुधिरेण समुक्षिताः ॥ ३१ ॥

‘‘तुमलोग युद्धस्थलमें इन्द्रतुल्य पराक्रमी नरेशोंद्वारा अस्त्र-शस्त्रोंसे घायल कर दिये गये हो और रक्तसे इस प्रकार नहा उठे हो कि तुम्हारे अङ्गोंमें लालचन्दन रसका लेप-सा लगा हुआ जान पड़ता है ॥ ३१ ॥

> ते यूयमवगाहध्वं नर्मदां शर्मदां शुभाम् ।  
> सार्वभौममुखा मत्ता गङ्गामिव महागजाः ॥ ३२ ॥

‘‘अतः तुम सब-के-सब सुख देनेवाली इस मङ्गलकारिणी नर्मदा नदीमें स्नान करो । ठीक उसी तरह, जैसे सार्वभौम आदि महान् दिग्गज मतवाले होकर गङ्गामें अवगाहन करते हैं ॥ ३२ ॥

> अस्यां स्नात्वा महानद्यां पाप्मनो विप्रमोक्ष्यथ ।  
> अहमप्यद्य पुलिने शरदिन्दुसमप्रभे ॥ ३३ ॥  
> पुष्पोपहारं शनकैः करिष्यामि कपर्दिनः ।

‘‘इस महानदीमें स्नान करके तुम पाप-तापसे मुक्त हो जाओगे । मैं भी आज शरद्ऋतुके चन्द्रमाकी भाँति उज्ज्वल नर्मदा-तटपर धीरे-धीरे जटाजूटधारी महादेवजीको फूलोंका उपहार समर्पित करूँगा’ ॥ ३३½ ॥

> रावणेनैवमुक्तास्तु प्रहस्तशुकसारणाः ॥ ३४ ॥  
> समहोदरधूम्राक्षा नर्मदां विजगाहिरे ।

‘रावणके ऐसा कहनेपर प्रहस्त, शुक, सारण, महोदर और धूम्राक्षने नर्मदामें स्नान किया ॥ ३४½ ॥

> राक्षसेन्द्रगजैस्तैस्तु क्षोभिता नर्मदा नदी ॥ ३५ ॥  
> वामनाञ्जनपद्माद्यैर्गङ्गा इव महागजैः ।

‘राक्षसराजकी सेनाके हाथियोंने नर्मदा नदीमें उतरकर उसके जलको मथ डाला, मानो वामन, अञ्जन, पद्म आदि बड़े-बड़े दिग्गजोंने गङ्गाजीके जलको विक्षुब्ध कर डाला हो ॥ ३५½ ॥

> ततस्ते राक्षसाः स्नात्वा नर्मदायां महाबलाः ॥ ३६ ॥  
> उत्तीर्य पुष्पाण्याजह्रुर्बल्यर्थं रावणस्य तु ।

‘तदनन्तर वे महाबली राक्षस गङ्गामें स्नान करके बाहर आये और रावणके शिवपूजनके लिये फूल जुटाने लगे ॥ ३६½ ॥

> नर्मदापुलिने हृद्ये शुभ्राभ्रसदृशप्रभे ॥ ३७ ॥  
> राक्षसैस्तु मुहूर्तेन कृतः पुष्पमयो गिरिः ।

‘श्वेत बादलोंके समान शुभ्र एवं मनोरम नर्मदा-पुलिनपर उन राक्षसोंने दो ही घड़ीमें फूलोंका पहाड़-जैसा ढेर लगा दिया ॥ ३७½ ॥

> पुष्पेषूपहतेष्वेवं रावणो राक्षसेश्वरः ॥ ३८ ॥  
> अवतीर्णो नदीं स्नातुं गङ्गामिव महागजः ।  
> तत्र स्नात्वा च विधिवज्जप्त्वा जप्यमनुत्तमम् ॥ ३९ ॥  
> नर्मदासलिलात् तस्मादुत्ततार स रावणः ।

‘इस प्रकार पुष्पोंका संचय हो जानेपर राक्षसराज रावण स्वयं स्नान करनेके लिये नर्मदा नदीमें उतरा, मानो कोई महान् गजराज गङ्गामें अवगाहन करनेके लिये घुसा हो।३८½। ‘वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके रावणने परम उत्तम जपनीय मन्त्रका जप किया । इसके बाद वह नर्मदाके जलसे बाहर निकला ॥ ३९½ ॥

> ततः क्लिन्नाम्बरं त्यक्त्वा शुक्लवस्त्रसमावृतः ॥ ४० ॥  
> रावणं प्राञ्जलि यान्तमन्वयुः सर्वराक्षसाः ।  
> तद्वतीवशमापन्ना मूर्तिमन्त इवाचलाः ॥ ४१ ॥

‘फिर भीगे कपड़ेको उतारकर उसने श्वेत वस्त्र धारण किया । इसके बाद वह हाथ जोड़े महादेवजीकी पूजाके लिये चला । उस समय और सब राक्षस भी उसके पीछे हो लिये, मानो मूर्तिमान् पर्वत उसकी गतिके अधीन हो खिंचे चले जा रहे हों ॥ ४०-४१ ॥

> यत्र यत्र च याति स्म रावणो राक्षसेश्वरः ।  
> जाम्बूनदमयं लिङ्गं तत्र तत्र स्म नीयते ॥ ४२ ॥

‘राक्षसराज रावण जहाँ-जहाँ भी जाता था, वहाँ-वहाँ एक सुवर्णमय शिवलिङ्ग अपने साथ लिये जाता था ॥ ४२ ॥

> वालुकावेदिमध्ये तु तल्लिङ्गं स्थाप्य रावणः ।  
> अर्चयामास गन्धैश्च पुष्पैश्चामृतगन्धिभिः ॥ ४३ ॥

‘रावणने बालूकी वेदीपर उस शिवलिङ्गको स्थापित कर दिया और चन्दन तथा अमृतके समान सुगन्धवाले पुष्पोंसे उसका पूजन किया ॥ ४३ ॥

> ततः सतामार्तिहरं परं वरं  
> वरप्रदं चन्द्रमयूखभूषणम् ।  
> समर्चयित्वा स निशाचरो जगौ  
> प्रसार्य हस्तान् प्रणनर्त चाग्रतः ॥४४॥

‘जो अपने ललाटमें चन्द्रकिरणोंको आभूषणरूपसे धारण करते हैं, सत्पुरुषोंकी पीड़ा हर लेते हैं तथा भक्तोंको मनोवाञ्छित वर प्रदान करते हैं, उन श्रेष्ठ एवं उत्कृष्ट देवता भगवान् शङ्करका भलीभाँति पूजन करके वह निशाचर उनके सामने गाने और हाथ फैलाकर नाचने लगा ॥ ४४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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