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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 30"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 30

> जिते महेन्द्रेऽतिबले रावणस्य सुतेन वै ।  
> प्रजापतिं पुरस्कृत्य ययुर्लङ्कां सुरास्तदा ॥ १ ॥

रावणपुत्र मेघनाद जब अत्यन्त बलशाली इन्द्रको जीतकर अपने नगरमें ले गया, तब सम्पूर्ण देवता प्रजापति ब्रह्माजीको आगे करके लङ्कामें पहुँचे ॥ १ ॥

> तत्र रावणमासाद्य पुत्रभ्रातृभिरावृतम् ।  
> अब्रवीद् गगने तिष्ठन् सामपूर्वं प्रजापतिः ॥ २ ॥

ब्रह्माजी आकाशमें खड़े-खड़े ही पुत्रों और भाइयोंके साथ बैठे हुए रावणके निकट जा उसे कोमल वाणीमें समझाते हुए बोले—॥ २ ॥

> वत्स रावण तुष्टोऽस्मि पुत्रस्य तव संयुगे ।  
> अहोऽस्य विक्रमौदार्यं तव तुल्योऽधिकोऽपि वा ॥ ३ ॥

‘वत्स रावण ! युद्धमें तुम्हारे पुत्रकी वीरता देखकर मैं बहुत संतुष्ट हुआ हूँ । अहो ! इसका उदार पराक्रम तुम्हारे समान या तुमसे भी बढ़कर है ॥ ३ ॥

> जितं हि भवता सर्वं त्रैलोक्यं स्वेन तेजसा ।  
> कृता प्रतिज्ञा सफला प्रीतोऽस्मि ससुतस्य ते ॥ ४ ॥

‘तुमने अपने तेजसे समस्त त्रिलोकीपर विजय पायी है और अपनी प्रतिज्ञा सफल कर ली है । इसलिये पुत्रसहित तुमपर मैं बहुत प्रसन्न हूँ ॥ ४ ॥

> अयं च पुत्रोऽतिबलस्तव रावण वीर्यवान् ।  
> जगतीन्द्रजिदित्येव परिख्यातो भविष्यति ॥ ५ ॥

‘रावण ! तुम्हारा यह पुत्र अतिशय बलशाली और पराक्रमी है । आजसे यह संसारमें इन्द्रजित्के नामसे विख्यात होगा ॥ ५ ॥

> बलवान् दुर्जयश्चैव भविष्यत्येव राक्षसः ।  
> यं समाश्रित्य ते राजन् स्थापितास्त्रिदशा वशे ॥ ६ ॥

‘राजन् ! यह राक्षस बड़ा बलवान् और दुर्जय होगा, जिसका आश्रय लेकर तुमने समस्त देवताओंको अपने अधीन कर लिया ॥ ६ ॥

> तन्मुच्यतां महाबाहो महेन्द्रः पाकशासनः ।  
> किं चास्य मोक्षणार्थाय प्रयच्छन्तु दिवौकसः ॥ ७ ॥

‘महाबाहो ! अब तुम पाकशासन इन्द्रको छोड़ दो और बताओ इन्हें छोड़नेके बदलेमें देवता तुम्हें क्या दें’ ॥ ७ ॥

> अथाब्रवीन्महातेजा इन्द्रजित् समितिंजयः ।  
> अमरत्वमहं देव वृणे यद्येष मुच्यते ॥ ८ ॥

तब युद्धविजयी महातेजस्वी इन्द्रजित्ने स्वयं ही कहा— ‘देव ! यदि इन्द्रको छोड़ना है तो मैं इसके बदलेमें अमरत्व लेना चाहता हूँ’ ॥ ८ ॥

> ततोऽब्रवीन्महातेजा मेघनादं प्रजापतिः ।  
> नास्ति सर्वामरत्वं हि कस्यचित् प्राणिनो भुवि ॥ ९ ॥  
> पक्षिणश्चतुष्पदो वा भूतानां वा महौजसाम् ।  
> श्रुत्वा पितामहेनोक्तमिन्द्रजित्प्रभुणाव्ययम् ॥ १० ॥  
> अथाब्रवीत् स तत्रस्थं मेघनादो महाबलः ।  
> श्रूयतां या भवेत् सिद्धिः शतक्रतुविमोक्षणे ॥ ११ ॥  
> ममेष्टं नित्यशो हव्यैर्मन्त्रैः सम्पूज्य पावकम् ।  
> संग्राममवतर्तुं च शत्रुनिर्जयकाङ्क्षिणः ॥ १२ ॥  
> अश्वयुक्तो रथो महामुत्तिष्ठेत् तु विभावसोः ।  
> तत्स्थस्यामरता स्यान्मे एष मे निश्चितो वरः ॥ १३ ॥

यह सुनकर महातेजस्वी प्रजापति ब्रह्माजीने मेघनादसे कहा—‘बेटा ! इस भूतलपर पक्षियों, चौपायों तथा महातेजस्वी मनुष्य आदि प्राणियोंमेंसे कोई भी प्राणी सर्वथा अमर नहीं हो सकता’ ॥ ९ ½ ॥ भगवान् ब्रह्माजीकी कही हुई यह बात सुनकर इन्द्रविजयी महाबली मेघनादने वहाँ खड़े हुए अविनाशी ब्रह्माजीसे कहा—॥ १० ½ ॥ ‘भगवन् ! ( यदि सर्वथा अमरत्व प्राप्त होना असम्भव है ) तब इन्द्रको छोड़नेके सम्बन्धमें जो मेरी दूसरी शर्त है— जो दूसरी सिद्धि प्राप्त करना मुझे अभीष्ट है, उसे सुनिये । मेरे विषयमें यह सदाके लिये नियम हो जाय कि जब मैं शत्रुपर विजय पानेकी इच्छासे संग्राममें उतरना चाहूँ और मन्त्रयुक्त हव्यकी आहुतिसे अग्निदेवकी पूजा करूँ, उस समय अग्निसे मेरे लिये एक ऐसा रथ प्रकट हो जाया करे, जो घोड़ोंसे जुता-जुताया तैयार हो और उसपर जबतक मैं बैठा रहूँ, तबतक मुझे कोई भी मार न सके, यही मेरा निश्चित वर है ॥ ११–१३ ॥

> तस्मिन् यद्यसमाप्ते च जप्यहोमे विभावसौ ।  
> युध्येयं देव संग्रामे तदा मे स्याद् विनाशनम् ॥ १४ ॥

‘यदि युद्धके निमित्त किये जानेवाले जप और होमको पूर्ण किये बिना ही मैं समराङ्गणमें युद्ध करने लगूँ, तभी मेरा विनाश हो ॥ १४ ॥

> सर्वो हि तपसा देव वृणोत्यमरतां पुमान् ।  
> विक्रमेण मया त्वेतदमरत्वं प्रवर्तितम् ॥ १५ ॥

‘देव ! सब लोग तपस्या करके अमरत्व प्राप्त करते हैं; परंतु मैंने पराक्रमद्वारा इस अमरत्वका वरण किया है’ ॥१५॥

> एवमस्त्विति तं चाह वाक्यं देवः पितामहः ।  
> मुक्तश्चेन्द्रजिता शक्रो गताश्च त्रिदिवं सुराः ॥ १६ ॥  
> एतस्मिन्नन्तरे राम दीनो भ्रष्टामरद्युतिः ।  
> इन्द्रश्चिन्तापरीतात्मा ध्यानतत्परतां गतः ॥ १७ ॥

यह सुनकर भगवान् ब्रह्माजीने कहा—‘एवमस्तु ( ऐसा ही हो )’ । इसके बाद इन्द्रजित्ने इन्द्रको मुक्त कर दिया और सब देवता उन्हें साथ लेकर स्वर्गलोकको चले गये ॥ श्रीराम ! उस समय इन्द्रका देवोचित तेज नष्ट हो गया था । वे दुखी हो चिन्तामें डूबकर अपनी पराजयका कारण सोचने लगे ॥ १७ ॥

> तं तु दृष्ट्वा तथाभूतं प्राह देवः पितामहः ।  
> शतक्रतो किमु पुरा करोति स्म सुदुष्कृतम् ॥ १८ ॥

भगवान् ब्रह्माजीने उनकी इस अवस्थाको लक्ष्य किया और कहा—‘शतक्रतो ! यदि आज तुम्हें इस अपमानसे शोक और दुःख हो रहा है तो बताओ पूर्वकालमें तुमने बड़ा भारी दुष्कर्म क्यों किया था ? ॥ १८ ॥

> अमरेन्द्र मया बुद्ध्या प्रजाः सृष्टास्तथा प्रभो ।  
> एकवर्णाः समाभाषा एकरूपाश्च सर्वशः ॥ १९ ॥

‘प्रभो ! देवराज ! पहले मैंने अपनी बुद्धिसे जिन प्रजाओंको उत्पन्न किया था, उन सबकी अङ्गकान्ति, भाषा, रूप और अवस्था सभी बातें एक-जैसी थीं ॥ १९ ॥

> तासां नास्ति विशेषो हि दर्शने लक्षणेऽपि वा ।  
> ततोऽहमेकाग्रमनास्ताः प्रजाः समचिन्तयम् ॥ २० ॥

‘उनके रूप और रंग आदिमें परस्पर कोई विलक्षणता नहीं थी । तब मैं एकाग्रचित्त होकर उन प्रजाओंके विषयमें विशेषता लानेके लिये कुछ विचार करने लगा ॥ २० ॥

> सोऽहं तासां विशेषार्थं स्त्रियमेकां विनिर्ममे ।  
> यद् यत् प्रजानां प्रत्यङ्गं विशिष्टं तत् तदुद्धृतम् ॥ २१ ॥

‘विचारके पश्चात् उन सब प्रजाओंकी अपेक्षा विशिष्ट प्रजाको प्रस्तुत करनेके लिये मैंने एक नारीकी सृष्टि की । प्रजाओंके प्रत्येक अङ्गमें जो-जो अद्भुत विशिष्टता—सारभूत सौन्दर्य था, उसे मैंने उसके अङ्गोंमें प्रकट किया ॥ २१ ॥

> ततो मया रूपगुणैरहल्या स्त्री विनिर्मिता ।  
> हलं नामेह वैरूप्यं हल्यं तत्प्रभवं भवेत् ॥ २२ ॥  
> यस्या न विद्यते हल्यं तेनाहल्येति विश्रुता ।  
> अहल्येत्येव च मया तस्या नाम प्रकीर्तितम् ॥ २३ ॥

‘उन अद्भुत रूप-गुणोंसे उपलक्षित जिस नारीका मेरे द्वारा निर्माण हुआ था, उसका नाम हुआ अहल्या । इस जगत्में हल कहते हैं कुरूपताको, उससे जो निन्दनीयता प्रकट होती है उसका नाम हल्य है । जिस नारीमें हल्य ( निन्दनीय रूप ) न हो, वह अहल्या कहलाती है; इसीलिये वह नवनिर्मित नारी अहल्या नामसे विख्यात हुई । मैंने ही उसका नाम अहल्या रख दिया था ॥ २२-२३ ॥

> निर्मितायां च देवेन्द्र तस्यां नार्यां सुरर्षभ ।  
> भविष्यतीति कस्यैषा मम चिन्ता ततोऽभवत् ॥ २४ ॥  
> त्वं तु शक्र तदा नारीं जानीषे मनसा प्रभो ।  
> स्थानाधिकतया पत्नी ममैषेति पुरंदर ॥ २५ ॥

‘देवेन्द्र ! सुरश्रेष्ठ ! जब उस नारीका निर्माण हो गया, तब मेरे मनमें यह चिन्ता हुई कि यह किसकी पत्नी होगी ? ॥ ‘प्रभो ! पुरंदर ! देवेन्द्र ! उन दिनों तुम अपने स्थान और पदकी श्रेष्ठताके कारण मेरे अनुमतिके बिना ही मन-ही-मन यह समझने लगे थे कि यह मेरी ही पत्नी होगी ॥ २५ ॥

> सा मया न्यासभूता तु गौतमस्य महात्मनः ।  
> न्यस्ता बहूनि वर्षाणि तेन निर्यातिता च ह ॥ २६ ॥

‘मैंने धरोहरके रूपमें महर्षि गौतमके हाथमें उस कन्याको सौंप दिया । वह बहुत वर्षोंतक उनके यहाँ रही । फिर गौतमने उसे मुझे लौटा दिया ॥ २६ ॥

> ततस्तस्य परिज्ञाय महास्थैर्यं महामुनेः ।  
> ज्ञात्वा तपसि सिद्धिं च पत्न्यर्थं स्पर्शिता तदा ॥ २७ ॥

‘महामुनि गौतमके उस महान् स्थैर्य ( इन्द्रिय-संयम ) तथा तपस्याविषयक सिद्धिको जानकर मैंने वह कन्या पुनः उन्हींको पत्नीरूपमें दे दी ॥ २७ ॥

> स तया सह धर्मात्मा रमते स्म महामुनिः ।  
> आसन्निराशा देवास्तु गौतमे दत्तया तया ॥ २८ ॥

‘धर्मात्मा महामुनि गौतम उसके साथ सुखपूर्वक रहने लगे । जब अहल्या गौतमको दे दी गयी, तब देवता निराश हो गये ॥ २८ ॥

> त्वं कुद्धस्त्विह कामात्मा गत्वा तस्याश्रमं मुनेः ।  
> दग्धवांश्च तदा तां स्त्रीं दीप्तामग्निशिखामिव ॥ २९ ॥

‘तुम्हारे तो क्रोधकी सीमा न रही । तुम्हारा मन कामके अधीन हो चुका था; इसलिये तुमने मुनिके आश्रमपर जाकर अग्निशिखाके समान प्रज्वलित होनेवाली उस दिव्य सुन्दरीको देखा ॥ २९ ॥

> सा त्वया धर्षिता शक्र कामार्तेन समन्युना ।  
> दृष्टस्त्वं स तदा तेन आश्रमे परमर्षिणा ॥ ३० ॥

‘इन्द्र ! तुमने कुपित और कामसे पीड़ित होकर उसके साथ बलात्कार किया । उस समय उन महर्षिने अपने आश्रममें तुम्हें देख लिया ॥ ३० ॥

> ततः क्रुद्धेन तेनासि शप्तः परमतेजसा ।  
> गतोऽसि येन देवेन्द्र दशाभागविपर्ययम् ॥ ३१ ॥

‘देवेन्द्र ! इससे उन परम तेजस्वी महर्षिको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया । उसी शापके कारण तुमको इस विपरीत दशामें आना पड़ा है—शत्रुका बंदी बनना पड़ा है ॥ ३१ ॥

> यस्मान्मे धर्षिता पत्नी त्वया वासव निर्भयात् ।  
> तस्मात् त्वं समरे शक्र शत्रुहस्तं गमिष्यसि ॥ ३२ ॥

‘उन्होंने शाप देते हुए कहा—‘वासव ! शक्र ! तुमने निर्भय होकर मेरी पत्नीके साथ बलात्कार किया है; इसलिये तुम युद्धमें जाकर शत्रुके हाथमें पड़ जाओगे ॥ ३२ ॥

> अयं तु भावो दुर्बुद्धे यस्त्वयेह प्रवर्तितः ।  
> मानुषेष्वपि लोकेषु भविष्यति न संशयः ॥ ३३ ॥

‘‘दुर्बुद्धे ! तुम-जैसे राजाके दोषसे मनुष्यलोकमें भी यह जारभाव प्रचलित हो जायगा, जिसका तुमने स्वयं यहाँ सूत्रपात किया है; इसमें संशय नहीं है ॥ ३३ ॥

> तत्रार्धं तस्य यः कर्ता त्वय्यर्धं निपतिष्यति ।  
> न च ते स्थावरं स्थानं भविष्यति न संशयः ॥ ३४ ॥

‘‘जो जारभावसे पापाचार करेगा, उस पुरुषपर उस पापका आधा भाग पड़ेगा और आधा तुमपर पड़ेगा; क्योंकि इसके प्रवर्तक तुम्हीं हो । निःसंदेह तुम्हारा यह स्थान स्थिर नहीं होगा ॥ ३४ ॥

> यश्च यश्च सुरेन्द्रः स्याद् ध्रुवः स न भविष्यति ।  
> एष शापो मया मुक्त इत्यसौ त्वां तदाब्रवीत् ॥ ३५ ॥

‘‘जो कोई भी देवराजके पदपर प्रतिष्ठित होगा, वह वहाँ स्थिर नहीं रहेगा । यह शाप मैंने इन्द्रमात्रके लिये दे दिया है ।’ यह बात मुनिने तुमसे कही थी ॥ ३५ ॥

> तां तु भार्यां सुनिर्भत्स्र्य सोऽब्रवीत् सुमहातपाः ।  
> दुर्विनीते विनिध्वंस ममाश्रमसमीपतः ॥ ३६ ॥  
> रूपयौवनसम्पन्ना यस्मात् त्वमनवस्थिता ।  
> तस्माद् रूपवती लोके न त्वमेका भविष्यति ॥ ३७ ॥

‘फिर उन महातपस्वी मुनिने अपनी उस पत्नीको भी भलीभाँति डाँट-फटकारकर कहा—‘दुष्टे ! तू मेरे आश्रमके पास ही अदृश्य होकर रह और अपने रूप-सौन्दर्यसे भ्रष्ट हो जा । रूप और यौवनसे सम्पन्न होकर मर्यादामें स्थित नहीं रह सकी है, इसलिये अब लोकमें तू अकेली ही रूपवती नहीं रहेगी ( बहुत-सी रूपवती स्त्रियाँ उत्पन्न हो जायँगी) ॥३६-३७॥

> रूपं च ते प्रजाः सर्वा गमिष्यन्ति न संशयः ।  
> यत् तदेकं समाश्रित्य विभ्रमोऽयमुपस्थितः ॥ ३८ ॥

‘‘जिस एक रूप-सौन्दर्यको लेकर इन्द्रके मनमें यह काम-विकार उत्पन्न हुआ था, तेरे उस रूप-सौन्दर्यको समस्त प्रजाएँ प्राप्त कर लेंगी; इसमें संशय नहीं है’ ॥ ३८ ॥

> तदाप्रभृति भूयिष्ठं प्रजा रूपसमन्विता ।  
> सा तं प्रसादयामास महर्षिं गौतमं तदा ॥ ३९ ॥  
> अज्ञानाद् धर्षिता विप्र त्वद्रूपेण दिवौकसा ।  
> न कामकाराद् विप्रर्षे प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ४० ॥

‘तभीसे अधिकांश प्रजा रूपवती होने लगी । अहल्याने उस समय विनीत-वचनोंद्वारा महर्षि गौतमको प्रसन्न किया और कहा—‘विप्रवर ! ब्रह्मर्षे ! देवराजने आपका ही रूप धारण करके मुझे कलंकित किया है । मैं उसे पहचान न सकी थी । अतः अनजानमें मुझसे यह अपराध हुआ है, स्वेच्छा-चारवश नहीं । इसलिये आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये’ ॥ ३९-४० ॥

> अहल्यया त्वेवमुक्तः प्रत्युवाच स गौतमः ।  
> उत्पत्स्यति महातेजा इक्ष्वाकूणां महारथः ॥ ४१ ॥  
> रामो नाम श्रुतो लोके वनं चाप्युपयास्यति ।  
> ब्राह्मणार्थे महाबाहुर्विष्णुर्मानुषविग्रहः ॥ ४२ ॥  
> तं द्रक्ष्यसि यदा भद्रे ततः पूता भविष्यसि ।  
> स हि पावयितुं शक्तस्त्वया यद् दुष्कृतं कृतम् ॥ ४३ ॥

‘अहल्याके ऐसा कहनेपर गौतमने उत्तर दिया—‘भद्रे ! इक्ष्वाकुवंशमें एक महातेजस्वी महारथी वीरका अवतार होगा, जो संसारमें श्रीरामके नामसे विख्यात होंगे । महाबाहु श्रीरामके रूपमें साक्षात् भगवान् विष्णु ही मनुष्य-शरीर धारण करके प्रकट होंगे । वे ब्राह्मण ( विश्वामित्र आदि ) के कार्यसे तपोवनमें पधारेंगे । जब तुम उनका दर्शन करोगी, तब पवित्र हो जाओगी । तुमने जो पाप किया है, उससे तुम्हें वे ही पवित्र कर सकते हैं ॥ ४१–४३ ॥

> तस्यातिथ्यं च कृत्वा वै मत्समीपं गमिष्यसि ।  
> वत्स्यसि त्वं मया सार्धं तदा हि वरवर्णिनि ॥ ४४ ॥

“वरवर्णिनि ! उनका आतिथ्य-सत्कार करके तुम मेरे पास आ जाओगी और फिर मेरे ही साथ रहने लगोगी’ ॥ ४४ ॥

> एवमुक्त्वा स विप्रर्षिराजगाम स्वमाश्रमम् ।  
> तपश्चचार सुमहत् सा पत्नी ब्रह्मवादिनः ॥ ४५ ॥

‘ऐसा कहकर ब्रह्मर्षि गौतम अपने आश्रमके भीतर आ गये और उन ब्रह्मवादी मुनिकी पत्नी वह अहल्या बड़ी भारी तपस्या करने लगी ॥ ४५ ॥

> शापोत्सर्गाद्धि तस्येदं मुनेः सर्वमुपस्थितम् ।  
> तत् स्मर त्वं महाबाहो दुष्कृतं यत् त्वया कृतम्॥४६॥

‘महाबाहो ! उन महर्षि गौतमके शाप देनेसे ही तुमपर यह सारा संकट उपस्थित हुआ है । अतः तुमने जो पाप किया था, उसको याद करो ॥ ४६ ॥

> तेन त्वं ग्रहणं शत्रोर्यातो नान्येन वासव ।  
> शीघ्रं वै यज यज्ञं त्वं वैष्णवं सुसमाहितः ॥ ४७ ॥

‘वासव ! उस शापके ही कारण तुम शत्रुकी कैदमें पड़े हो, दूसरे किसी कारणसे नहीं । अतः अब एकाग्रचित्त हो शीघ्र ही वैष्णव-यज्ञका अनुष्ठान करो ॥ ४७ ॥

> पावितस्तेन यज्ञेन यास्यसे त्रिदिवं ततः ।  
> पुत्रश्च तत्र देवेन्द्र न विनष्टो महारणे ॥ ४८ ॥  
> नीतः संनिहितश्चैव आर्यकेण महोदधौ ।

‘देवेन्द्र ! उस यज्ञसे पवित्र होकर तुम पुनः स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे । तुम्हारा पुत्र जयन्त उस महासमरमें मारा नहीं गया है । उसका नाना पुलोमा उसे महासागरमें ले गया है । इस समय वह उसीके पास है’ ॥४८½॥

> एतच्छ्रुत्वा महेन्द्रस्तु यज्ञमिष्ट्वा च वैष्णवम् ॥ ४९ ॥  
> पुनस्त्रिदिवमाक्रामदन्वशासच्च देवराट् ।

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर देवराज इन्द्रने वैष्णव-यज्ञका अनुष्ठान किया । वह यज्ञ पूरा करके देवराज स्वर्गलोकमें गये और वहाँ देवराज्यका शासन करने लगे ॥ ४९½ ॥

> एतदिन्द्रजितो नाम बलं यत् कीर्तितं मया ॥ ५० ॥  
> निर्जितस्तेन देवेन्द्रः प्राणिनोऽन्ये तु किं पुनः ।

रघुनन्दन ! यह है इन्द्रविजयी मेघनादका बल, जिसका मैंने आपसे वर्णन किया है । उसने देवराज इन्द्रको भी जीत लिया था; फिर दूसरे प्राणियोंकी तो बिसात ही क्या थी ५०½

> आश्चर्यमिति रामश्च लक्ष्मणश्चाब्रवीत् तदा ॥ ५१ ॥  
> अगस्त्यवचनं श्रुत्वा वानरा राक्षसास्तदा ।

अगस्त्यजीकी यह बात सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण तत्काल बोल उठे—‘आश्चर्य है ।’ साथ ही वानरों और राक्षसोंको भी इस बातसे बड़ा विस्मय हुआ ॥ ५१½ ॥

> विभीषणस्तु रामस्य पार्श्वस्थो वाक्यमब्रवीत् ॥ ५२ ॥  
> आश्चर्यं स्मारितोऽस्म्यद्य यत् तद् दृष्टं पुरातनम् ।

उस समय श्रीरामके बगलमें बैठे हुए विभीषणने कहा— ‘मैंने पूर्वकालमें जो आश्चर्यकी बातें देखी थीं, उनका आज महर्षिने स्मरण दिला दिया है’ ॥ ५२½ ॥

> अगस्त्यं त्वब्रवीद् रामः सत्यमेतच्छ्रुतं च मे ॥ ५३ ॥  
> एवं राम समुद्भूतो रावणो लोककण्टकः ।  
> सपुत्रो येन संग्रामे जितः शक्रः सुरेश्वरः ॥ ५४ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने अगस्त्यजीसे कहा—‘आपकी बात सत्य है । मैंने भी विभीषणके मुखसे यह बात सुनी थी ।’ फिर अगस्त्यजी बोले—‘श्रीराम ! इस प्रकार पुत्रसहित रावण सम्पूर्ण जगत्के लिये कष्टकरूप था, जिसने देवराज इन्द्रको भी संग्राममें जीत लिया था’ ॥ ५३-५४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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