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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 18"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 18

> प्रविष्टायां हुताशं तु वेदवत्यां स रावणः ।  
> पुष्पकं तु समारुह्य परिचक्राम मेदिनीम् ॥ १ ॥

अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन ! वेदवतीके अग्निमें प्रवेश कर जानेपर रावण पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो पृथ्वीपर सब ओर भ्रमण करने लगा ॥ १ ॥

> ततो मरुत्तं नृपतिं यजन्तं सह दैवतैः ।  
> उशीरबीजमासाद्य ददर्श स तु रावणः ॥ २ ॥

उसी यात्रामें उशीरबीज नामक देशमें पहुँचकर रावणने देखा, राजा मरुत्त देवताओंके साथ बैठकर यज्ञ कर रहे हैं ॥ २ ॥

> संवर्तो नाम ब्रह्मर्षिः साक्षाद् भ्राता बृहस्पतेः ।  
> याजयामास धर्मज्ञः सर्वैर्देवगणैर्वृतः ॥ ३ ॥

उस समय साक्षात् बृहस्पतिके भाई तथा धर्मके, मर्मको जाननेवाले ब्रह्मर्षि संवर्त सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे रहकर वह यज्ञ करा रहे थे ॥ ३ ॥

> दृष्ट्वा देवास्तु तद् रक्षो वरदानेन दुर्जयम् ।  
> तिर्यग्योनिं समाविष्टास्तस्य धर्षणभीरवः ॥ ४ ॥

ब्रह्माजीके वरदानसे जिसको जीतना कठिन हो गया था, उस राक्षस रावणको वहाँ देखकर उसके आक्रमणसे भयभीत हो देवतालोग तिर्यग्योनिमें प्रवेश कर गये ॥ ४ ॥

> इन्द्रो मयूरः संवृत्तो धर्मराजस्तु वायसः ।  
> कृकलासो धनाध्यक्षो हंसश्च वरुणोऽभवत् ॥ ५ ॥

इन्द्र मोर, धर्मराज कौआ, कुबेर गिरगिट और वरुण हंस हो गये ॥ ५ ॥

> अन्वेष्वपि गतेष्वेवं देवेष्वरिनिषूदन ।  
> रावणः प्राविशद् यज्ञं सारमेय इवाशुचिः ॥ ६ ॥

शत्रुसूदन श्रीराम ! इसी तरह दूसरे-दूसरे देवता भी जब विभिन्न रूपोंमें स्थित हो गये, तब रावणने उस यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया, मानो कोई अपवित्र कुत्ता वहाँ आ गया हो ॥६॥

> तं च राजानमासाद्य रावणो राक्षसाधिपः ।  
> प्राह युद्धं प्रयच्छेति निर्जितोऽस्मीति वा वद ॥ ७ ॥

राजा मरुत्तके पास पहुँचकर राक्षसराज रावणने कहा— ‘मुझसे युद्ध करो या अपने मुँहसे यह कह दो कि मैं पराजित हो गया’ ॥ ७ ॥

> ततो मरुत्तो नृपतिः को भवानित्युवाच तम् ।  
> अवहासं ततो मुक्त्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ ८ ॥

तब राजा मरुत्तने पूछा—‘आप कौन हैं ?’ उनका प्रश्न सुनकर रावण हँस पड़ा और बोला—॥ ८ ॥

> अकुतूहलभावेन प्रीतोऽस्मि तव पार्थिव ।  
> धनदस्यानुजं यो मां नावगच्छसि रावणम् ॥ ९ ॥

‘भूपाल ! मैं कुबेरका छोटा भाई रावण हूँ। फिर भी तुम मुझे नहीं जानते और मुझे देखकर भी तुम्हारे मनमें न तो कौतूहल हुआ, न भय ही; इससे मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ ९ ॥

> त्रिषु लोकेषु कोऽन्योऽस्ति यो न जानाति मे बलम् ।  
> भ्रातरं येन निर्जित्य विमानमिदमाहृतम् ॥ १० ॥

‘तीनों लोकोंमें तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा राजा होगा, जो मेरे बलको न जानता हो । मैं वह रावण हूँ, जिसने अपने भाई कुबेरको जीतकर यह विमान छीन लिया है’ ॥ १० ॥

> ततो मरुत्तः स नृपस्तं रावणमथाब्रवीत् ।  
> धन्यः खलु भवान् येन ज्येष्ठो भ्राता रणे जितः ॥ ११ ॥

तब राजा मरुत्तने रावणसे कहा—‘तुम धन्य हो, जिसने अपने बड़े भाईको रणभूमिमें पराजित कर दिया ॥ ११ ॥

> न त्वया सदृशः श्लाघ्यस्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।  
> कं त्वं प्राक्केवलं धर्मं चरित्वा लब्धवान् वरम् ॥ १२ ॥

‘तुम्हारे-जैसा स्पृहणीय पुरुष तीनों लोकोंमें दूसरा कोई नहीं है । तुमने पूर्वकालमें किस शुद्ध धर्मका आचरण करके वर प्राप्त किया है ॥ १२ ॥

> श्रुतपूर्वं हि न मया भाषसे यादृशं स्वयम् ।  
> तिष्ठेदानीं न मे जीवन् प्रतियास्यसि दुर्मते ॥ १३ ॥  
> अद्य त्वां निशितैर्बाणैः प्रेषयामि यमक्षयम् ।

‘तुम स्वयं जो कुछ कह रहे हो, ऐसी बात मैंने पहले कभी नहीं सुनी है । दुर्बुद्धे ! इस समय खड़े तो रहो । मेरे हाथसे जीवित बचकर नहीं जा सकोगे । आज अपने पैने बाणोंसे मारकर तुम्हें यमलोक पहुँचाये देता हूँ’ ॥ १३½ ॥

> ततः शरासनं गृह्य सायकांश्च नराधिपः ॥ १४ ॥  
> रणाय निर्ययौ क्रुद्धः संवर्तो मार्गमावृणोत् ।

तदनन्तर राजा मरुत्त धनुष-बाण लेकर बड़े रोषके साथ युद्धके लिये निकले, परंतु महर्षि संवर्तने उनका रास्ता रोक लिया ॥ १४½ ॥

> सोऽब्रवीत् स्नेहसंयुक्तं मरुत्तं तं महानृषिः ॥ १५ ॥  
> श्रोतव्यं यदि मद्वाक्यं सम्प्रहारो न ते क्षमः ।

उन महर्षिने महाराज मरुत्तसे स्नेहपूर्वक कहा—‘राजन् ! यदि मेरी बात सुनना और उसपर ध्यान देना उचित समझो तो सुनो । तुम्हारे लिये युद्ध करना उचित नहीं है ॥१५½॥

> माहेश्वरमिदं सत्रमसमाप्तं कुलं दहेत् ॥ १६ ॥  
> दीक्षितस्य कुतो युद्धं क्रोधित्वं दीक्षिते कुतः ।

‘यह माहेश्वर यज्ञ आरम्भ किया गया है । यदि पूरा न हुआ तो तुम्हारे समस्त कुलको दग्ध कर डालेगा । जो यज्ञकी दीक्षा ले चुका है, उसके लिये युद्धका अवसर ही कहाँ है ? यज्ञदीक्षित पुरुषमें क्रोधके लिये स्थान ही कहाँ है ? ॥ १६½ ॥

> संशयश्च जये नित्यं राक्षसश्च सुदुर्जयः ॥ १७ ॥  
> स निवृत्तो गुरोर्वाक्यान्मरुत्तः पृथिवीपतिः ।  
> विसृज्य सशरं चापं स्वस्थो मखमुखोऽभवत् ॥ १८ ॥

‘युद्धमें किसकी विजय होगी, इस प्रश्नको लेकर सदा संशय ही बना रहता है । उधर वह राक्षस अत्यन्त दुर्जय है ।’ अपने आचार्यके इस कथनसे पृथ्वीपति मरुत्त युद्धसे निवृत्त हो गये । उन्होंने धनुष-बाण त्याग दिया और स्वस्थभावसे वे यज्ञके लिये उन्मुख हो गये ॥ १७-१८ ॥

> ततस्तं निर्जितं मत्वा घोषयामास वै शुकः ।  
> रावणो जयतीत्युच्चैर्हर्षान्नादं विमुक्तवान् ॥ १९ ॥

तब उन्हें पराजित हुआ मानकर शुकने यह घोषणा कर दी कि महाराज रावणकी विजय हुई और वह बड़े हर्षके साथ उच्चस्वरसे सिंहनाद करने लगा ॥ १९ ॥

> तान् भक्षयित्वा तत्रस्थान् महर्षीन् यज्ञमागतान् ।  
> वितृप्तो रुधिरैस्तेषां पुनः सम्प्रययौ महीम् ॥ २० ॥

उस यज्ञमें आकर बैठे हुए महर्षियोंको खाकर उनके रक्तसे पूर्णतः तृप्त हो रावण फिर पृथ्वीपर विचरने लगा ॥२०॥

> रावणे तु गते देवाः सेन्द्राश्चैव दिवौकसः ।  
> ततः स्वां योनिमासाद्य तानि सत्त्वानि चाब्रुवन् ॥२१॥

रावणके चले जानेपर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता पुनः अपने स्वरूपमें प्रकट हो उन-उन प्राणियोंको ( जिनके रूपमें वे स्वयं प्रकट हुए थे ) वरदान देते हुए बोले ॥ २१ ॥

> हर्षात् तदाब्रवीदिन्द्रो मयूरं नीलबर्हिणम् ।  
> प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञ भुजङ्गाद्धि न ते भयम् ॥ २२ ॥  
> इदं नेत्रसहस्रं तु यत् तद् बर्हे भविष्यति ।  
> वर्षमाणे मयि मुदं प्राप्स्यसे प्रीतिलक्षणाम् ॥ २३ ॥  
> एवमिन्द्रो वरं प्रादान्मयूरस्य सुरेश्वरः ॥ २४ ॥

सबसे पहले इन्द्रने हर्षपूर्वक नीले पंखवाले मोरसे कहा— ‘धर्मज्ञ ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । तुम्हें सर्पसे भय नहीं होगा ॥ ‘मेरे जो ये सहस्र नेत्र हैं, इनके समान चिह्न तुम्हारी पाँखमें प्रकट होंगे । जब मैं मेघरूप होकर वर्षा करूँगा, उस समय तुम्हें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होगी । वह प्रसन्नता मेरी प्राप्तिको लक्षित करानेवाली होगी ।’ इस प्रकार देवराज इन्द्रने मोरको वरदान दिया ॥ २३-२४ ॥

> नीलाः किल पुरा बर्हा मयूराणां नराधिप ।  
> सुराधिपाद् वरं प्राप्य गताः सर्वेऽपि बर्हिणः ॥ २५ ॥

नरेश्वर श्रीराम ! इस वरदानके पहले मोरोंके पंख केवल नीले रंगके ही होते थे । देवराजसे उक्त वर पाकर सब मयूर वहाँसे चले गये ॥ २५ ॥

> धर्मराजोऽब्रवीद् राम प्राग्वंशे वायसं प्रति ।  
> पक्षिस्त्वासि सुप्रीतः प्रीतस्य वचनं शृणु ॥ २६ ॥

श्रीराम ! तदनन्तर धर्मराजने प्राग्वंशकी छतपर बैठे हुए कौएसे कहा–‘पक्षी ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । प्रसन्न होकर जो कुछ कहता हूँ, मेरे इस वचनको सुनो ॥ २६ ॥

> यथान्ये विविधै रोगैः पीड्यन्ते प्राणिनो मया ।  
> ते न ते प्रभविष्यन्ति मयि प्रीते न संशयः ॥ २७ ॥

‘जैसे दूसरे प्राणियोंको मैं नाना प्रकारके रोगोंद्वारा पीड़ित करता हूँ, वे रोग मेरी प्रसन्नताके कारण तुमपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकेंगे; इसमें संशय नहीं है ॥ २७ ॥

> मृत्युतस्ते भयं नास्ति वरान् मम विहंगम ।  
> यावत् त्वां न वधिष्यन्ति नरास्तावद् भविष्यसि ॥२८॥

‘विहङ्गम ! मेरे वरदानसे तुम्हें मृत्युका भय नहीं होगा । जबतक मनुष्य आदि प्राणी तुम्हारा वध नहीं करेंगे, तबतक तुम जीवित रहोगे ॥ २८ ॥

> ये च मद्विषयस्था वै मानवाः क्षुधयार्दिताः ।  
> त्वयि भुक्ते सुतृप्तास्ते भविष्यन्ति सबान्धवाः ॥ २९ ॥

‘मेरे राज्य—यमलोकमें स्थित रहकर जो मानव भूखसे पीड़ित हैं, उनके पुत्र आदि इस भूतलपर जब तुम्हें भोजन करायेंगे, तब वे बन्धु-बान्धवोंसहित परम तृप्त होंगे’ ॥२९॥

> वरुणस्त्वब्रवीद्धंसं गङ्गातोयविचारिणम् ।  
> श्रूयतां प्रीतिसंयुक्तं वचः पत्ररथेश्वर ॥ ३० ॥

तत्पश्चात् वरुणने गङ्गाजीके जलमें विचरनेवाले हंसको सम्बोधित करके कहा—‘पक्षिराज ! मेरा प्रेमपूर्ण वचन सुनो—॥ ३० ॥

> वर्णो मनोरमः सौम्यश्चन्द्रमण्डलसंनिभः ।  
> भविष्यति तवोदग्रः शुद्धफेनसमप्रभः ॥ ३१ ॥

‘तुम्हारे शरीरका रंग चन्द्रमण्डल तथा शुद्ध फेनके समान परम उज्ज्वल, सौम्य एवं मनोरम होगा ॥ ३१ ॥

> मच्छरीरं समासाद्य कान्तो नित्यं भविष्यसि ।  
> प्राप्स्यसे चातुलां प्रीतिमेतन्मे प्रीतिलक्षणम् ॥ ३२ ॥

‘मेरे अङ्गभूत जलका आश्रय लेकर तुम सदा कान्तिमान् बने रहोगे और तुम्हें अनुपम प्रसन्नता प्राप्त होगी । यही मेरे प्रेमका परिचायक चिह्न होगा’ ॥ ३२ ॥

> हंसानां हि पुरा राम न वर्णः सर्वपाण्डुरः ।  
> पक्षा नीलाग्रसंवीताः क्रोडाः शष्पाग्रनिर्मलाः ॥ ३३ ॥

श्रीराम ! पूर्वकालमें हंसोंका रंग पूर्णतः श्वेत नहीं था । उनकी पाँखोंका अग्रभाग नीला और दोनों भुजाओंके बीचका भाग नूतन दूर्वादलके अग्रभाग-सा कोमल एवं श्याम वर्णसे युक्त होता था ॥ ३३ ॥

> अथाब्रवीद् वैश्रवणः कृकलासं गिरौ स्थितम् ।  
> हैरण्यं सम्प्रयच्छामि वर्णं प्रीतस्त्वाप्यहम् ॥ ३४ ॥

तदनन्तर विश्रवाके पुत्र कुबेरने पर्वतशिखरपर बैठे हुए कृकलास ( गिरगिट ) से कहा—‘मैं प्रसन्न होकर तुम्हें सुवर्णके समान सुन्दर रंग प्रदान करता हूँ ॥ ३४ ॥

> सद्द्रव्यं च शिरो नित्यं भविष्यति तवाक्षयम् ।  
> एष काञ्चनको वर्णो मत्प्रीत्या ते भविष्यति ॥ ३५ ॥

‘तुम्हारा सिर सदा ही सुवर्णके समान रंगका एवं अक्षय होगा । मेरी प्रसन्नतासे तुम्हारा यह ( काला ) रंग सुनहरे रंगमें परिवर्तित हो जायगा’ ॥ ३५ ॥

> एवं दत्त्वा वरांस्तेभ्यस्तस्मिन् यज्ञोत्सवे सुराः ।  
> निवृत्ते सह राज्ञा ते पुनः स्वभवनं गताः ॥ ३६ ॥

इस प्रकार उन्हें उत्तम वर देकर वे सब देवता वह यज्ञोत्सव समाप्त होनेपर राजा मरुत्तके साथ पुनः अपने भवन— स्वर्गलोकको चले गये ॥ ३६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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