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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 111"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 111

> प्रभातायां तु शर्वर्यां पृथुवक्षा महायशाः ।  
> रामः कमलपत्राक्षः पुरोधसमथाब्रवीत् ॥ १ ॥

तदनन्तर रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब विशाल वक्षःस्थलवाले महायशस्वी कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी पुरोहित-से बोले—॥ १ ॥

> अग्निहोत्रं व्रजत्वग्रे दीप्यमानं सह द्विजैः ।  
> वाजपेयातपत्रं च शोभमानं महापथे ॥ २ ॥

‘मेरे अग्निहोत्रकी प्रज्वलित आग ब्राह्मणोंके साथ आगे-आगे चले । महाप्रयाणके पथपर इस यात्राके समय मेरे वाजपेय यज्ञका सुन्दर छत्र भी चलना चाहिये’ ॥ २ ॥

> ततो वसिष्ठस्तेजस्वी सर्वे निरवशेषतः ।  
> चकार विधिवद् धर्मं माहाप्रस्थानिकं विधिम् ॥ ३ ॥

उनके इस प्रकार कहनेपर तेजस्वी वसिष्ठ मुनिने महा-प्रस्थानकालके लिये उचित समस्त धार्मिक क्रियाओंका विधिपूर्वक पूर्णतः अनुष्ठान किया ॥ ३ ॥

> ततः सूक्ष्माम्बरधरो ब्रह्ममावर्तयन् परम् ।  
> कुशान् गृहीत्वा पाणिभ्यां सरयूं प्रययावथ ॥ ४ ॥

फिर भगवान् श्रीराम सूक्ष्म वस्त्र धारण किये दोनों हाथोंमें कुश लेकर परब्रह्मके प्रतिपादक वेद-मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए सरयूनदीके तटपर चले ॥ ४ ॥

> अव्याहरन् कचित् किंचिन्निश्चेष्टो निःसुखः पथि ।  
> निर्जगाम गृहात् तस्माद् दीप्यमानो यथांशुमान् ॥ ५ ॥

उस समय वे वेदपाठके सिवा कहीं किसीसे और कोई बात नहीं करते थे । चलनेके अतिरिक्त उनमें कोई दूसरी चेष्टा नहीं दिखायी देती थी तथा वे लौकिक सुखका परित्याग करके देदीप्यमान सूर्यकी भाँति प्रकाशित होते हुए घरसे निकले थे और गन्तव्य पथपर बढ़ रहे थे ॥ ५ ॥

> रामस्य दक्षिणे पार्श्वे सपद्मा श्रीरुपाश्रिता ।  
> सव्येऽपि च मही देवी व्यवसायस्तथाग्रतः ॥ ६ ॥  
> शरा नानाविधाश्चापि धनुरायत्तमुत्तमम् ।  
> तथायुधाश्च ते सर्वे ययुः पुरुषविग्रहाः ॥ ७ ॥

भगवान् श्रीरामके दाहिने पार्श्वमें कमल हाथमें लिये श्रीदेवी उपस्थित थीं । वामभागमें भूदेवी विराजमान थीं तथा आगे-आगे उनकी व्यवसाय ( संहार )-शक्ति चल रही थी ॥ नाना प्रकारके बाण, विशाल एवं उत्तम धनुष तथा दूसरे-दूसरे अस्त्र-शस्त्र--सभी पुरुष-शरीर धारण करके भगवान्के साथ चले ॥ ७ ॥

> वेदा ब्राह्मणरूपेण गायत्री सर्वरक्षिणी ।  
> ओङ्कारोऽथ वषट्कारः सर्वे राममनुव्रताः ॥ ८ ॥

चारों वेद ब्राह्मणका रूप धारण करके चल रहे थे । सबकी रक्षा करनेवाली गायत्री देवी, ओंकार और वषट्कार सभी भक्तिभावसे श्रीरामका अनुसरण करते थे ॥ ८ ॥

> ऋषयश्च महात्मानः सर्वे एव महीसुराः ।  
> अन्वगच्छन् महात्मानं स्वर्गद्वारमपावृतम् ॥ ९ ॥

महात्मा ऋषि तथा समस्त ब्राह्मण भी ब्रह्मलोकके खुले हुए द्वारस्वरूप परमात्मा श्रीरामके पीछे-पीछे गये ॥ ९ ॥

> तं यान्तमनुगच्छन्ति ह्यन्तःपुरचराः स्त्रियः ।  
> सवृद्धबालदासीकाः सर्वषवरकिंकराः ॥ १० ॥

अन्तःपुरकी स्त्रियाँ भी बालकों, वृद्धों, दासियों, म्नोजों और सेवकोंके साथ निकलकर सरयूतटकी ओर जाते हुए श्रीरामके पीछे-पीछे जा रही थीं ॥ १० ॥

> सान्तःपुरश्च भरतः शत्रुघ्नसहितो ययौ ।  
> रामं गतिमुपागम्य साग्निहोत्रमनुव्रताः ॥ ११ ॥

भरत और शत्रुघ्न अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ अपने आश्रयस्वरूप भगवान् श्रीरामके, जो अग्निहोत्रके साथ जा रहे थे, पीछे-पीछे गये ॥ ११ ॥

> ते च सर्वे महात्मानः साग्निहोत्राः समागताः ।  
> सपुत्रदाराः काकुत्स्थमनुजग्मुर्महामतिम् ॥ १२ ॥

वे सब महामनस्वी श्रेष्ठ पुरुष एवं ब्राह्मण अग्निहोत्रकी अग्नि तथा स्त्री-पुत्रोंके साथ इस महायात्रामें सम्मिलित हो परम बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीका अनुगमन कर रहे थे ॥ १२ ॥

> मन्त्रिणो भृत्यवर्गाश्च सपुत्रपशुबान्धवाः ।  
> सर्वे सहानुगा राममन्वगच्छन् प्रहृष्टवत् ॥ १३ ॥

समस्त मन्त्री और भृत्यवर्ग भी अपने पुत्रों, पशुओं, बन्धुओं तथा अनुचरोंसहित हर्षपूर्वक श्रीरामके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥ १३ ॥

> ततः सर्वाः प्रकृतयो हृष्टपुष्टजनावृताः ।  
> गच्छन्तमनुगच्छन्ति राघवं गुणरञ्जिताः ॥ १४ ॥  
> ततः स्त्रीपुमांसस्ते सपक्षिपशुबान्धवाः ।  
> राघवस्यानुगाः सर्वे हृष्टा विगतकल्मषाः ॥ १५ ॥

हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए समस्त प्रजाजन श्रीरघुनाथजीके गुणोंपर मुग्ध थे; इसलिये वे स्त्री, पुरुष, पशु-पक्षी तथा बन्धु-बान्धवोंसहित उस महायात्रामें श्रीरामके अनुगामी हुए । उन सबके हृदयमें प्रसन्नता थी और वे सभी पापसे रहित थे ॥ १४-१५ ॥

> स्नाताः प्रमुदिताः सर्वे हृष्टपुष्टाश्च वानराः ।  
> दृढं किलकिलाशब्दैः सर्वं राममनुव्रतम् ॥ १६ ॥

सम्पूर्ण हृष्ट-पुष्ट वानरगण भी स्नान करके बड़ी प्रसन्नताके साथ किलकारियाँ मारते हुए भगवान् श्रीरामके साथ जा रहे थे, वह सारा समुदाय ही श्रीरामका भक्त था ॥ १६ ॥

> न तत्र कश्चिद् दीनो वा व्रीडितो वापि दुःखितः ।  
> हृष्टं समुदितं सर्वं बभूव परमाद्भुतम् ॥ १७ ॥

उनमें कोई भी ऐसा नहीं था, जो दीन-दुखी अथवा लज्जित हो । वहाँ एकत्र हुए सब लोगोंके हृदयमें महान् हर्ष छा रहा था और इस प्रकार वह जनसमुदाय अत्यन्त आश्चर्यजनक जान पड़ता था ॥ १७ ॥

> द्रष्टुकामोऽथ निर्यान्तं रामं जानपदो जनः ।  
> यः प्राप्तः सोऽपि दृष्ट्वैव स्वर्गायानुगतो जनः ॥ १८ ॥

जनपदके लोगोंमेंसे जो श्रीरामकी यात्रा देखनेके लिये आये थे, वे भी यह सब समारोह देखते ही भगवान्के साथ परमधाम जानेको तैयार हो गये ॥ १८ ॥

> ऋक्षवानरराक्षांसि जनाश्च पुरवासिनः ।  
> आगच्छन् परया भक्त्या पृष्ठतः सुसमाहिताः ॥ १९ ॥

रीछ, वानर, राक्षस और पुरवासी मनुष्य बड़ी भक्तिके साथ श्रीरामचन्द्रजीके पीछे-पीछे एकाग्रचित्त होकर चले आ रहे थे ॥ १९ ॥

> यानि भूतानि नगरेऽप्यन्तर्धानगतानि च ।  
> राघवं तान्यनुययुः स्वर्गाय समुपस्थितम् ॥ २० ॥

अयोध्यानगरमें जो अदृश्य प्राणी रहते थे, वे भी साकेत-धाम जानेके लिये उद्यत हुए श्रीरघुनाथजीके पीछे-पीछे चल दिये ॥ २० ॥

> यानि पश्यन्ति काकुत्स्थं स्थावराणि चराणि च ।  
> सर्वाणि रामगमने अनुजग्मुर्हि तान्यपि ॥ २१ ॥

चराचर प्राणियोंमेंसे जो-जो श्रीरघुनाथजीको जाते देखते थे, वे सभी उस यात्रामें उनके पीछे-पीछे चल देते थे ॥ २१ ॥

> नोच्छ्वसत् तद्योध्यायां सुसूक्ष्ममपि दृश्यते ।  
> तिर्यग्योनिगताश्चैव सर्वे राममनुव्रताः ॥ २२ ॥

उस समय उस अयोध्यामें साँस लेनेवाला कोई छोटे-से-छोटा प्राणी भी रह गया हो, ऐसा नहीं देखा जाता था । तिर्यग्योनिके समस्त जीव भी श्रीराममें भक्तिभाव रखकर उनके पीछे-पीछे चले जा रहे थे ॥ २२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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