---
title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 110"
canonical: "https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana/uttara-kanda/sarga-110"
lang: "hi"
---

# उत्तरकाण्ड, Sarga 110

> ते दूता रामवाक्येन चोदिता लघुविक्रमाः ।  
> प्रजग्मुर्मधुरां शीघ्रं चक्रुर्वासं न चाध्वनि ॥ १ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर शीघ्रगामी दूत शीघ्र ही मधुरापुरीको चल दिये । उन्होंने मार्गमें कहीं भी पड़ाव नहीं डाला ॥ १ ॥

> ततस्त्रिभिरहोरात्रैः सम्प्राप्य मधुरामथ ।  
> शत्रुघ्नाय यथातत्त्वमाचख्युः सर्वमेव तत् ॥ २ ॥

लगातार तीन दिन और तीन रात चलकर वे मधुरा पहुँचे और अयोध्याकी सारी बातें उन्होंने शत्रुघ्नसे यथार्थतः कह सुनायीं ॥ २ ॥

> लक्ष्मणस्य परित्यागं प्रतिज्ञां राघवस्य च ।  
> पुत्रयोरभिषेकं च पौरानुगमनं तथा ॥ ३ ॥  
> कुशस्य नगरी रम्या विन्ध्यपर्वतरोधसि ।  
> कुशावतीति नाम्ना सा कृता रामेण धीमता ॥ ४ ॥

श्रीरामकी प्रतिज्ञा, लक्ष्मणका परित्याग, श्रीरामके दोनों पुत्रोंका राज्याभिषेक और पुरवासियोंका श्रीरामके साथ जानेका निश्चय आदि सब बातें बताकर दूतोंने यह भी कहा कि ‘परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामने कुशके लिये विन्ध्यपर्वतके किनारे कुशावती नामक रमणीय नगरीका निर्माण कराया है ॥३-४॥

> श्रावस्तीति पुरी रम्या श्राविता च लवस्य ह ।  
> अयोध्यां विजनां कृत्वा राघवो भरतस्तथा ॥ ५ ॥  
> स्वर्गस्य गमनोद्योगं कृतवन्तौ महारथौ ।  
> एवं सर्वं निवेद्याशु शत्रुघ्नाय महात्मने ॥ ६ ॥  
> विरेमुस्ते ततो दूतास्त्वर राजेति चाब्रुवन् ।

‘इसी तरह लवके लिये श्रावस्ती नामसे प्रसिद्ध सुन्दर पुरी बसायी है । श्रीरघुनाथजी और भरतजी दोनों महारथी वीर अयोध्याको सूनी करके साकेतधामको जानेके लिये उद्योग कर रहे हैं ।’ इस प्रकार महात्मा शत्रुघ्नको शीघ्रतापूर्वक सब बातें बताकर दूतोंने कहा—‘राजन् ! शीघ्रता कीजिये’ इतना कहकर वे चुप हो गये ॥ ५–६½ ॥

> तच्छ्रुत्वा घोरसंकाशं कुलक्षयमुपस्थितम् ॥ ७ ॥  
> प्रकृतीस्तु समानीय काञ्चनं च पुरोधसम् ।  
> तेषां सर्वं यथावृत्तमब्रवीद् रघुनन्दनः ॥ ८ ॥

अपने कुलका भयंकर संहार उपस्थित हुआ सुनकर रघुनन्दन शत्रुघ्नने समस्त प्रजा तथा काञ्चन नामक पुरोहितको बुलाया और उनसे सब बातें यथावत् कह सुनायीं ॥७-८॥

> आत्मनश्च विपर्यासं भविष्यं भ्रातृभिः सह ।  
> ततः पुत्रद्वयं वीरः सोऽभ्यषिञ्चन्नराधिपः ॥ ९ ॥

उन्होंने यह भी बताया कि भाइयोंके साथ मेरे शरीरका भी वियोग होनेवाला है । इसके बाद वीर राजा शत्रुघ्नने अपने दोनों पुत्रोंका राज्याभिषेक किया ॥ ९ ॥

> सुबाहुर्मधुरां लेभे शत्रुघाती च वैदिशाम् ।  
> द्विधा कृत्वा तु तां सेनां माधुरीं पुत्रयोर्द्वयोः ।  
> धनं च युक्तं कृत्वा वै स्थापयामास पार्थिवः ॥ १० ॥

सुबाहुने मधुराका राज्य पाया और शत्रुघातीने विदिशाका । मधुराकी सेनाके दो भाग करके राजा शत्रुघ्नने दोनों पुत्रोंको बाँट दिये तथा बाँटनेके योग्य धनका भी विभाजन करके उन दोनोंको दे दिया और उन्हें अपनी-अपनी राजधानीमें स्थापित कर दिया ॥ १० ॥

> सुबाहुं मधुरायां च वैदिशे शत्रुघातिनम् ।  
> ययौ स्थाप्य तदायोध्यां रथेनैकेन राघवः ॥ ११ ॥

इस प्रकार सुबाहुको मधुरामें तथा शत्रुघातीको विदिशामें स्थापित करके रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न एकमात्र रथके द्वारा अयोध्याके लिये प्रस्थित हुए ॥ ११ ॥

> स ददर्श महात्मानं ज्वलन्तमिव पावकम् ।  
> सूक्ष्मक्षौमाम्बरधरं मुनिभिः सार्धमक्षयैः ॥ १२ ॥

वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा महात्मा श्रीराम अपने तेजसे प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे हैं । उनके शरीरपर महीन रेशमी वस्त्र शोभा पा रहा है तथा वे अविनाशी महर्षियोंके साथ विराजमान हैं ॥ १२ ॥

> सोऽभिवाद्य ततो रामं प्राञ्जलिः प्रयतेन्द्रियः ।  
> उवाच वाक्यं धर्मज्ञं धर्ममेवानुचिन्तयन् ॥ १३ ॥

निकट जा हाथ जोड़कर उन्होंने श्रीरघुनाथजीको प्रणाम किया और धर्मका चिन्तन करते हुए इन्द्रियोंको काबूमें करके वे धर्मके ज्ञाता श्रीरामसे बोले—॥ १३ ॥

> कृत्वाभिषेकं सुतयोर्द्वयो राघवनन्दन ।  
> तवानुगमने राजन् विद्धि मां कृतनिश्चयम् ॥ १४ ॥

‘रघुकुलनन्दन! मैं अपने दोनों पुत्रोंका राज्याभिषेक करके आया हूँ । राजन् ! आप मुझे भी अपने साथ चलनेके दृढ़ निश्चयसे युक्त समझें ॥ १४ ॥

> न चान्यदद्य वक्तव्यमतो वीर न शासनम् ।  
> विहन्यमानमिच्छामि मद्विधेन विशेषतः ॥ १५ ॥

‘वीर ! आज इसके विपरीत आप मुझसे और कुछ न कहियेगा; क्योंकि उससे बढ़कर मेरे लिये दूसरा कोई दण्ड न होगा । मैं नहीं चाहता कि किसीके विशेषतः मुझ-जैसे सेवकके द्वारा आपकी आशाका उल्लङ्घन हो’ ॥ १५ ॥

> तस्य तां बुद्धिमक्लीबां विज्ञाय रघुनन्दनः ।  
> बाढमित्येव शत्रुघ्नं रामो वाक्यमुवाच ह ॥ १६ ॥

शत्रुघ्नका यह दृढ़ विचार जानकर श्रीरघुनाथजीने उनसे कहा--‘बहुत अच्छा’ ॥ १६ ॥

> तस्य वाक्यस्य वाक्यान्ते वानराः कामरूपिणः ।  
> ऋक्षराक्षससङ्घाश्च समापेतुरनेकशः ॥ १७ ॥

उनकी यह बात समाप्त होते ही इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर, रीछ और राक्षसोंके समुदाय बहुत बड़ी संख्यामें वहाँ आ पहुँचे ॥ १७ ॥

> सुग्रीवं ते पुरस्कृत्य सर्वे एव समागताः ।  
> तं रामं द्रष्टुमनसः स्वर्गायाभिमुखं स्थितम् ॥ १८ ॥

साकेत-धामको जानेके लिये उद्यत हुए श्रीरामके दर्शनकी इच्छा मनमें लिये वे सभी वानर सुग्रीवको आगे करके वहाँ पधारे थे ॥ १८ ॥

> देवपुत्रा ऋषिसुता गन्धर्वाणां सुतास्तथा ।  
> रामक्षयं विदित्वा ते सर्वे एव समागताः ॥ १९ ॥  
> ते राममभिवाद्योचुः सर्वे वानरराक्षसाः ।

उनमेंसे कितने ही देवताओंके पुत्र थे, कितने ही ऋषियोंके बालक थे और कितने ही गन्धर्वोंसे उत्पन्न हुए थे । श्रीरघुनाथजीके लीलासंवरणका समय जानकर वे सब-के-सब वहाँ आये थे । उक्त सभी वानर और राक्षस श्रीरामको प्रणाम करके बोले—॥ १९½ ॥

> तवानुगमने राजन् सम्प्राप्ताः स्म समागताः ॥ २० ॥  
> यदि राम विनास्माभिर्गच्छेस्त्वं पुरुषोत्तम ।  
> यमदण्डमिवोद्यम्य त्वया स्म विनिपातिताः ॥ २१ ॥

‘राजन् ! हम भी आपके साथ चलनेका निश्चय लेकर यहाँ आये हैं । पुरुषोत्तम श्रीराम ! यदि आप हमें साथ लिये बिना ही चले जायँगे तो हम यह समझेंगे कि आपने यमदण्ड उठाकर हमें मार गिराया है’ ॥ २०-२१ ॥

> एतस्मिन्नन्तरे रामं सुग्रीवोऽपि महाबलः ।  
> प्रणम्य विधिवद् वीरं विज्ञापयितुमुद्यतः ॥ २२ ॥

इसी बीचमें महाबली सुग्रीव भी वीर श्रीरामको विधिपूर्वक प्रणाम करके अपना अभिप्राय निवेदन करनेके लिये उद्यत हो बोले—॥ २२ ॥

> अभिषिच्याङ्गदं वीरमागतोऽस्मि नरेश्वर ।  
> तवानुगमने राजन् विद्धि मां कृतनिश्चयम् ॥ २३ ॥

‘नरेश्वर ! मैं वीर अङ्गदका राज्याभिषेक करके आया हूँ। आप समझ लें कि मेरा भी आपके साथ चलनेका दृढ़ निश्चय है’ ॥ २३ ॥

> तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रामो रमयतां वरः ।  
> वानरेन्द्रमथोवाच मैत्रं तस्यानुचिन्तयन् ॥ २४ ॥

उनकी यह बात सुनकर मनको रमानेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ श्रीरामने वानरराज सुग्रीवकी मित्रताका विचार करके उनसे कहा—॥ २४ ॥

> सखे शृणुष्व सुग्रीव न त्वयाहं विनाकृतः ।  
> गच्छेयं देवलोकं वा परमं वा पदं महत् ॥ २५ ॥

‘सखे सुग्रीव ! मेरी बात सुनो । मैं तुम्हारे बिना देवलोकमें और महान् परमपद या परमधाममें भी नहीं जा सकता’ ॥ २५ ॥

> तैरेवमुक्तः काकुत्स्थो बाढमित्यब्रवीत् स्मयन् ।  
> विभीषणमथोवाच राक्षसेन्द्रं महायशाः ॥ २६ ॥

पूर्वोक्त वानरों और राक्षसोंकी भी बात सुनकर महायशस्वी श्रीरघुनाथजी ‘बहुत अच्छा’ कहकर मुस्कराये और राक्षसराज विभीषणसे बोले—॥ २६ ॥

> यावत् प्रजा धरिष्यन्ति तावत् त्वं वै विभीषण ।  
> राक्षसेन्द्र महावीर्य लङ्कास्थः स्वं धरिष्यसि ॥ २७ ॥

‘महापराक्रमी राक्षसराज विभीषण ! जबतक संसारकी प्रजा जीवन धारण करेगी, तबतक तुम भी लङ्कामें रहकर अपने शरीरको धारण करोगे ॥ २७ ॥

> यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत् तिष्ठति मेदिनी ।  
> यावच्च मत्कथा लोके तावद् राज्यं तवास्त्विह ॥ २८ ॥

‘जबतक चन्द्रमा और सूर्य रहेंगे, जबतक पृथ्वी रहेगी और जबतक संसारमें मेरी कथा प्रचलित रहेगी, तबतक इस भूतलपर तुम्हारा राज्य बना रहेगा’ ॥ २८ ॥

> शासितश्च सखित्वेन कार्यं ते मम शासनम् ।  
> प्रजाः संरक्ष धर्मेण नोत्तरं वक्तुमर्हसि ॥ २९ ॥

‘मैंने मित्रभावसे ये बातें तुमसे कही हैं । तुम्हें मेरी आज्ञाका पालन करना चाहिये । तुम धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करो । इस समय मैंने जो कुछ कहा है, तुम्हें उसका प्रति-वाद नहीं करना चाहिये ॥ २९ ॥

> किंचान्यद् वक्तुमिच्छामि राक्षसेन्द्र महाबल ।  
> आराधय जगन्नाथमिक्ष्वाकुकुलदैवतम् ॥ ३० ॥  
> आराधनीयमनिशं देवैरपि सवासवैः ।

‘महाबली राक्षसराज ! इसके सिवा मैं तुमसे एक बात और कहना चाहता हूँ । हमारे इक्ष्वाकुकुलके देवता हैं भगवान् जगन्नाथ ( श्रीशेषशायी भगवान् विष्णु ) । इन्द्र आदि देवता भी उनकी निरन्तर आराधना करते रहते हैं । तुम भी सदा उनकी पूजा करते रहना’ ॥ ३०½ ॥

> तथेति प्रतिजग्राह रामवाक्यं विभीषणः ॥ ३१ ॥  
> राजा राक्षसमुख्यानां राघवाज्ञामनुस्मरन् ।

राक्षसराज विभीषणने श्रीरघुनाथजीकी इस आज्ञाको अपने हृदयमें धारण किया और ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसका पालन स्वीकार किया ॥ ३१½ ॥

> तमेवमुक्त्वा काकुत्स्थो हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥ ३२ ॥  
> जीविते कृतबुद्धिस्त्वं मा प्रतिज्ञां वृथा कृथाः ।

विभीषणसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी हनुमान्जीसे बोले—‘तुमने दीर्घकालतक जीवित रहनेका निश्चय किया है । अपनी इस प्रतिज्ञाको व्यर्थ न करो ॥ ३२½ ॥

> मत्कथाः प्रचरिष्यन्ति यावल्लोके हरीश्वर ॥ ३३ ॥  
> तावद् रमस्व सुप्रीतो मद्वाक्यमनुपालयन् ।

‘हरीश्वर ! जबतक संसारमें मेरी कथाओंका प्रचार रहे, तबतक तुम भी मेरी आज्ञाका पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक विचरते रहो’ ॥ ३३½ ॥

> पवमुक्तस्तु हनुमान् राघवेण महात्मना ॥ ३४ ॥  
> वाक्यं विज्ञापयामास परं हर्षमवाप च ।

महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर हनुमान्जीको बड़ा हर्ष हुआ और वे इस प्रकार बोले—॥ ३४½ ॥

> यावत् तव कथा लोके विचरिष्यति पावनी ॥ ३५ ॥  
> तावत् स्थास्यामि मेदिन्यां तवाज्ञामनुपालयन् ।

‘भगवन् ! संसारमें जबतक आपकी पावन कथाका प्रचार रहेगा, तबतक आपके आदेशका पालन करता हुआ मैं इस पृथ्वीपर ही रहूँगा’ ॥ ३५½ ॥

> जाम्बवन्तं तथोक्त्वा तु वृद्धं ब्रह्मसुतं तदा ॥ ३६ ॥  
> मैन्दं च द्विविदं चैव पञ्च जाम्बवता सह ।  
> यावत् कलिश्च सम्प्राप्तस्तावज्जीवत सर्वदा ॥ ३७ ॥

इसके बाद भगवान्ने ब्रह्माजीके पुत्र वृद्ध जाम्बवान्, तथा मैन्द और द्विविदसे भी कहा—‘जाम्बवान्सहित तुम पाँचों व्यक्ति ( जाम्बवान्, विभीषण, हनुमान्, मैन्द और द्विविद ) तबतक जीवित रहो, जबतक कि प्रलय एवं कलियुग न आ जाय’ ( इनमेंसे हनुमान् और विभीषण तो प्रलयकाल-तक रहनेवाले हैं और शेष तीन व्यक्ति कलि और द्वापरकी संधिमें श्रीकृष्णावतारके समय मारे गये या मर गये)॥३६-३७॥

> तानेवमुक्त्वा काकुत्स्थः सर्वांस्तानृक्षवानरान् ।  
> उवाच बाढं गच्छध्वं मया सार्धं यथोदितम् ॥ ३८ ॥

उन सबसे ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने शेष सभी रीछों और वानरोंसे कहा—‘बहुत अच्छा, तुमलोगोंकी बातें मुझे स्वीकार हैं । तुम सब अपने कथनानुसार मेरे साथ चलो’ ॥ ३८ ॥

Book: https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
