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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 105"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 105

> कस्यचित् त्वथ कालस्य रामे धर्मपरे स्थिते ।  
> कालस्तापसरूपेण राजद्वारमुपागमत् ॥ १ ॥

तदनन्तर कुछ समय और बीत जानेपर जब कि भगवान् श्रीराम धर्मपूर्वक अयोध्याके राज्यका पालन कर रहे थे, साक्षात् काल तपस्वीके रूपमें राजभवनके द्वारपर आया ॥ १ ॥

> सोऽब्रवील्लक्ष्मणं वाक्यं धृतिमन्तं यशस्विनम् ।  
> मां निवेदय रामाय सम्प्राप्तं कार्यगौरवात् ॥ २ ॥

उसने द्वारपर खड़े हुए धैर्यवान् एवं यशस्वी लक्ष्मणसे कहा—‘मैं एक भारी कार्यसे आया हूँ । तुम श्रीरामचन्द्रजीसे मेरे आगमनकी सूचना दे दो ॥ २ ॥

> दूतो ह्यतिबलस्याहं महर्षेरमितौजसः ।  
> रामं दिदृक्षुरायातः कार्येण हि महाबल ॥ ३ ॥

‘महाबली लक्ष्मण ! मैं अमित तेजस्वी महर्षि अतिबलका दूत हूँ और एक आवश्यक कार्यवश श्रीरामचन्द्रजीसे मिलने आया हूँ’ ॥ ३ ॥

> तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सौमित्रिस्त्वरयान्वितः ।  
> न्यवेदयत रामाय तापसं तं समागतम् ॥ ४ ॥

उसकी वह बात सुनकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने बड़ी उतावलीके साथ भीतर जाकर श्रीरामचन्द्रजीसे उस तापसके आगमनकी सूचना दी–॥ ४ ॥

> जयस्व राजधर्मेण उभौ लोकौ महाद्युते ।  
> दूतस्त्वां द्रष्टुमायातस्तपसा भास्करप्रभः ॥ ५ ॥

‘महातेजस्वी महाराज ! आप अपने राजधर्मके प्रभावसे इहलोक और परलोकपर भी विजयी हों । एक महर्षि दूतके रूपमें आपसे मिलने आये हैं । वे तपस्याजनित तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे हैं’ ॥ ५ ॥

> तद् वाक्यं लक्ष्मणोक्तं वै श्रुत्वा राम उवाच ह ।  
> प्रवेश्यतां मुनिस्तात महौजास्तस्य वाक्यधृक् ॥ ६ ॥

लक्ष्मणकी कही हुई वह बात सुनकर श्रीरामने कहा–– ‘तात ! उन महातेजस्वी मुनिको भीतर ले आओ, जो कि अपने स्वामीके संदेश लेकर आये हैं’ ॥ ६ ॥

> सौमित्रिस्तु तथेत्युक्त्वा प्रावेशयत तं मुनिम् ।  
> ज्वलन्तमेव तेजोभिः प्रदहन्तमिवांशुभिः ॥ ७ ॥

तब ‘जो आज्ञा’ कहकर सुमित्राकुमार उन मुनिको भीतर ले आये । वे तेजसे प्रज्वलित होते और अपनी प्रखर किरणोंसे दग्ध करते हुए-से जान पड़ते थे ॥ ७ ॥

> सोऽभिगम्य रघुश्रेष्ठं दीप्यमानं स्वतेजसा ।  
> ऋषिर्मधुरया वाचा वर्धस्वेत्याह राघवम् ॥ ८ ॥

अपने तेजसे दीप्तिमान् रघुकुलतिलक श्रीरामके पास पहुँचकर ऋषिने उनसे मधुर वाणीमें कहा—‘रघुनन्दन ! आपका अभ्युदय हो’ ॥ ८ ॥

> तस्मै रामो महातेजाः पूजामर्घ्यपुरोगमाम् ।  
> ददौ कुशलमव्यग्रं प्रष्टुं चैवोपचक्रमे ॥ ९ ॥

महातेजस्वी श्रीरामने उन्हें पाद्य-अर्घ्य आदि पूजनोप-चार समर्पित किया और शान्तभावसे उनका कुशल-समाचार पूछना आरम्भ किया ॥ ९ ॥

> पृष्टश्च कुशलं तेन रामेण वदतां वरः ।  
> आसने काञ्चने दिव्ये निषसाद महायशाः ॥ १० ॥  
> तमुवाच ततो रामः स्वागतं ते महामते ।  
> प्रापयास्य च वाक्यानि यतो दूतस्त्वमागतः ॥ ११ ॥

श्रीरामके पूछनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ महायशस्वी मुनि कुशल-समाचार बताकर दिव्य सुवर्णमय आसनपर विराजमान हुए ॥ तदनन्तर श्रीरामने उनसे कहा—‘महामते ! आपका स्वागत है । आप जिनके दूत होकर यहाँ पधारे हैं, उनका संदेश सुनाइये’ ॥ ११ ॥

> चोदितो राजसिंहेन मुनिर्वाक्यमभाषत ।  
> द्वन्द्वे होतत् प्रवक्तव्यं हितं वै यद्यवेक्षसे ॥ १२ ॥  
> यः शृणोति निरीक्षेद् वा स वध्यो भविता तव ।  
> भवेद् वै मुनिमुख्यस्य वचनं यद्यवेक्षसे ॥ १३ ॥

राजसिंह श्रीरामके द्वारा इस प्रकार प्रेरित होनेपर मुनि बोले––‘यदि आप हमारे हितपर दृष्टि रक्खें तो जहाँ हम और आप दो ही आदमी रहें, वहीं इस बातको कहना उचित है ॥ ‘यदि आप मुनिश्रेष्ठ अतिबलके वचनपर ध्यान दें तो आपको यह भी घोषित करना होगा कि जो कोई मनुष्य हम दोनोंकी बातचीत सुन ले अथवा हमें वार्तालाप करते देख ले, वह आप ( श्रीराम ) का वध्य होगा’ ॥ १३ ॥

> तथेति च प्रतिज्ञाय रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।  
> द्वारि तिष्ठ महाबाहो प्रतिहारं विसर्जय ॥ १४ ॥

श्रीरामने ‘तथास्तु’ कहकर इस बातके लिये प्रतिज्ञा की और लक्ष्मणसे कहा—‘महाबाहो ! द्वारपालको विदा कर दो और स्वयं ड्योढ़ीपर खड़े होकर पहरा दो ॥ १४ ॥

> स मे वध्यः खलु भवेद् वाचं द्वन्द्वसमीरितम् ।  
> ऋषेर्मम च सौमित्रे पश्येद् वा शृणुयाच्च यः ॥ १५ ॥

‘सुमित्रानन्दन ! जो ऋषि और मेरी—दोनोंकी कही हुई बात सुन लेगा या बात करते हमें देख लेगा, वह मेरेद्वारा मारा जायगा’ ॥ १५ ॥

> ततो निक्षिप्य काकुत्स्थो लक्ष्मणं द्वारि संग्रहम् ।  
> तमुवाच मुने वाक्यं कथयस्वेति राघवः ॥ १६ ॥  
> तत् ते मनीषितं वाक्यं येन वासि समाहितः ।  
> कथयस्वाविशङ्कस्त्वं ममापि हृदि वर्तते ॥ १७ ॥

इस प्रकार अपनी बात ग्रहण करनेवाले लक्ष्मणको दरवाजेपर तैनात करके श्रीरघुनाथजीने समागत महर्षिसे कहा–– ‘मुने ! अब आप निःशङ्क होकर वह बात कहिये, जिसे कहना आपको अभीष्ट है अथवा जिसे कहनेके लिये ही आप यहाँ भेजे गये हैं । मेरे हृदयमें भी उसे सुननेके लिये उत्कण्ठा है’ ॥ १६-१७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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